सचखंड श्री हरमंदिर साहिब में स्थित शहीदी गैलरी एक स्थायी श्रद्धांजलि के रूप में खड़ी है, जो सुनिश्चित करती है कि आने वाली पीढ़ियां उन दुखद दिनों के चेहरों और कहानियों को याद रखें.
अब वक्त आ गया है कि हम सिर्फ अपनी पर्यटन क्षमता का ढिंढोरा पीटना बंद करें और एक सच्ची पर्यटन संस्कृति विकसित करें. ऐसी संस्कृति, जो सिर्फ ‘अतिथि देवो भव’ जैसे नारों तक सीमित न हो.
भारत की रक्षा तैयारियों में अब तक हमलावर क्षमता को ज्यादा महत्व दिया गया है, लेकिन ड्रोन और मिसाइल युद्ध ने ज़िंदा रहने और सुरक्षा क्षमता पर भी बराबर ध्यान देने की ज़रूरत दिखा दी है.
हमारे शहरी शासन का मुख्य अभिशाप यह नहीं है कि झुग्गी बस्ती जैसे गांवों या अवैध कॉलोनियों में ज्यादा वोटर रहते हैं, बल्कि यह है कि राजनीतिक जमात उनका जीवन स्तर सुधारने की जगह उन्हें रिझाने में लगी रहती है.
भारत में प्रोटीन की गुणवत्ता से जुड़ी समस्या को दूर करने के लिए ‘एक जैसा समाधान सब पर लागू’ करने की बजाय, अलग-अलग क्षेत्रों के हिसाब से रणनीति बनानी होगी.
ऐसा लगता है कि किसी त्रासदी पर लोगों की प्रतिक्रिया सिर्फ घटना से नहीं, बल्कि इस बात से तय होती है कि उसमें कौन शामिल था और उसके आधार पर कौन-सी राजनीतिक कहानी बनाई जा सकती है.
इम्तियाज़ अली की 'मैं वापस आऊंगा' बंटवारे पर बनी आम फ़िल्मों जैसी नहीं है. यह फ़िल्म पीड़ितों के दुख-दर्द, अपनी ज़मीन पर लौटने की तड़प या नफ़रत के भयानक चक्र में फंसे लोगों के बारे में नहीं है. यह उससे कहीं ज़्यादा जटिल है.