यह कहना आसान है कि मौजूदा छात्र आंदोलन क्या नहीं है, लेकिन यह बताना मुश्किल है कि यह क्या है. पिछले एक हफ्ते की घटनाओं को देखें, तो यह तथाकथित ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ (IAC) आंदोलन को सीधे तरीके से दोहराना नहीं है. यह उतना संगठित भी नहीं है. इसमें आरएसएस की जुटाई हुई भीड़ नहीं है. जंतर-मंतर पर मौजूद लोग साध्वी ऋतंभरा का वैसे स्वागत नहीं करेंगे, जैसा 2011 में अन्ना हज़ारे और उनके साथियों ने किया था. इस आंदोलन में कोई ऐसा व्यक्ति भी नहीं है, जो अरविंद केजरीवाल की तरह इसे अपनी राजनीतिक पहचान बनाने के लिए इस्तेमाल कर रहा हो. न ही यहां अन्ना हज़ारे की तरह किसी बुजुर्ग चेहरे को आंदोलन का प्रतीक बनाकर आगे रखा गया है.
इसी तरह नेपाल और बांग्लादेश के छात्र आंदोलनों से इसकी तुलना भी सही नहीं है. वहां का मकसद सरकार बदलना था. प्रदर्शनकारी हिंसक थे और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना चाहते थे, ताकि दुनिया का ध्यान उनकी ओर जाए, लेकिन जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे लोगों का ऐसा कोई इरादा नहीं दिखता. वे न तो भारत सरकार को गिराना चाहते हैं और न ही संसद को जलाना चाहते हैं.
और जैसा कि तथाकथित ‘गोदी मीडिया’ कहता है, वैसे भी ये लोग देश विरोधी नहीं हैं. ये किसी बड़े आईएसआई षड्यंत्र का हिस्सा नहीं हैं. इन्हें सीआईए या चीन से फंडिंग भी नहीं मिली है.
तो फिर इस आंदोलन की तुलना किससे की जाए? इसका जवाब देना आसान नहीं है क्योंकि यह आंदोलन किसी तय रणनीति या राजनीतिक सत्ता हासिल करने के लिए नहीं चल रहा. यह किसी सीधी और तय दिशा में भी नहीं बढ़ रहा है. कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) की शुरुआत सोशल मीडिया पर हुई. इसकी वजह भारत के मुख्य न्यायाधीश की वह टिप्पणी थी, जिसमें उन्होंने देश के कुछ युवाओं को “कॉकरोच” कहा था. इसके बाद शिक्षा व्यवस्था और नीट पेपर लीक के खिलाफ बड़ा छात्र आंदोलन शुरू हुआ, लेकिन जब सोनम वांगचुक इस आंदोलन से जुड़े और उन्होंने अनशन शुरू किया, तो आंदोलन का रूप बदल गया और अब, सरकार की लाठी और पैलेट गन की कार्रवाई के बाद यह आंदोलन एक बार फिर नए रूप में बदलता नजर आ रहा है.
एक साफ दिखने वाला गुस्सा
जैसा कि अभी यह प्रदर्शन दिख रहा है, यह सिर्फ एक आंदोलन नहीं, बल्कि एक भावना बन चुका है. यह लोगों के गुस्से और नाराज़गी की आवाज़ है. इसकी मांगें लगातार बदल रही हैं. खबर है कि सोनम वांगचुक ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को थोड़ा नरम किया है और अब सिर्फ इस पर विचार करने की बात कह रहे हैं, लेकिन जिस गुस्से को यह आंदोलन दिखा रहा है, वह खत्म नहीं हुआ है.
इस मायने में यह आंदोलन मुझे 2012 के दिल्ली गैंगरेप मामले के बाद लोगों के गुस्से की ज्यादा याद दिलाता है, न कि इंडिया अगेंस्ट करप्शन (IAC) आंदोलन की. उस समय भी युवाओं को लगा था कि नेताओं ने अपना काम ठीक से नहीं किया और महिलाओं के लिए देश को सुरक्षित बनाने में नाकाम रहे. यही गुस्सा सड़कों पर उतर आया था.
इस बार भी युवाओं को लगता है कि नेताओं ने देश को निराश किया है. छात्रों को ऐसी शिक्षा व्यवस्था का सामना करना पड़ रहा है, जिसमें कई कमियां हैं. हर साल, एक के बाद एक परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक हो जाते हैं और फिर काले बाज़ार में बेचे जाते हैं. जब दुनिया के ज्यादातर देशों में ऐसा नहीं होता, तो भारत में भी इसे रोका जा सकता है. लेकिन अगर यह बार-बार हो रहा है, तो इससे लगता है कि सरकार को देश के युवाओं की ज्यादा चिंता नहीं है और उसने इसे रोकने के लिए ज़रूरी कदम नहीं उठाए.
यही इस पूरे मामले की सबसे बड़ी बात है. इसके साथ कुछ और गहरी परेशानियां भी जुड़ी हुई हैं. युवाओं के लिए नौकरी पाना पहले से ज्यादा मुश्किल हो गया है. उन्हें अपने भविष्य को लेकर भरोसा नहीं है. 10-15 साल पहले लोग सच में भारत के भविष्य को लेकर उम्मीद से भरे हुए थे. युवाओं को लगता था कि वे अपने माता-पिता से ज्यादा कमाएंगे और उनसे बेहतर जिंदगी जी पाएंगे.
लेकिन अब उन्हें ऐसा नहीं लगता. उन्हें लगता है कि भारत ने उनसे किए गए वादे पूरे नहीं किए. उन्हें लगता है कि नौकरी मिल जाना ही बड़ी बात होगी. यही वजह है कि बहुत से युवा भारत छोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. वे विदेश सिर्फ अच्छी नौकरी के लिए नहीं, बल्कि किसी भी तरह की नौकरी पाने के लिए जाना चाहते हैं.
औसतन हर 20 मिनट में एक भारतीय अमेरिका में गैरकानूनी तरीके से दाखिल होने की कोशिश करते हुए सीमा पर पकड़ा जाता है. इनमें से ज्यादातर गुजरात के होते हैं, जिसे एक आदर्श राज्य के रूप में पेश किया जाता है. इससे समझा जा सकता है कि देश के युवा अपने भविष्य को लेकर कितने निराश हैं. मुझे नहीं लगता कि सरकार इन बातों को समझ रही है.
सरकार का ज्यादा ध्यान दूसरी पार्टियों के नेताओं को अपने साथ लाकर कानून पास कराने के लिए जरूरी संख्या जुटाने पर रहा है. साथ ही, राष्ट्रवाद के नाम पर, जैसे देशभक्ति से जुड़े गीत का अपमान अपराध बनाने जैसे मुद्दों के जरिए, इन बदलावों को सही ठहराने की कोशिश की गई है. हाल के चुनावों में मिली जीत और मुख्य चुनाव आयुक्त की ओर से मतदाता सूची में किए गए बदलावों के बाद सरकार को लगने लगा है कि उसे कोई हरा नहीं सकता.
एक ऐसी सच्चाई, जिसे भुलाया नहीं जा सकता
जब यह प्रदर्शन शुरू हुआ, तो सरकार को लगा कि यह कोई खास मायने नहीं रखता, लेकिन जब आंदोलन बड़ा होने लगा, तो सरकार ने अपनी पुरानी नीति अपनाई—प्रदर्शनों के सामने कभी झुकना नहीं. किसी मंत्री से इस्तीफा नहीं लिया जाएगा. मीडिया के एक हिस्से से कहा जाएगा कि वह प्रदर्शन को कम महत्व दे और इसे विदेशी ताकतों की साजिश बताए.
लेकिन सरकार ऐसा करने के बजाय दूसरे रास्ते भी अपना सकती थी. हां, वह प्रदर्शनकारियों की सबसे बड़ी परेशानी दूर नहीं कर सकती थी क्योंकि अर्थव्यवस्था पर उसका नियंत्रण कमजोर हो चुका है और वह नौकरियां पैदा नहीं कर पा रही. लेकिन वह उनकी तुरंत वाली मांगों पर कदम उठा सकती थी.
शिक्षा मंत्री को संगठन के काम के लिए इस्तीफा दिलाया जा सकता था. सोनम वांगचुक को ऐसा रास्ता दिया जा सकता था, जिससे वह सम्मान के साथ अपना अनशन खत्म कर सकें और जब प्रदर्शनकारी राहुल गांधी के आने की मांग करने लगे, तभी सरकार को समझ जाना चाहिए था कि मामला गंभीर हो रहा है और मुख्यधारा की राजनीति जुड़ने से पहले उसे दखल देना चाहिए था, लेकिन सरकार ने इनमें से कुछ भी नहीं किया क्योंकि उसके लिए रणनीति से ज्यादा अहम उसका अहंकार और खुद को सख्त दिखाना था. सोच यही थी—”ऐसे कई आंदोलन पहले भी देखे हैं, इन बच्चों को भी आसानी से संभाल लेंगे.”
हो सकता है सरकार ऐसा कर भी ले. निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन चलाकर सरकार किसी भी भीड़ को हटा सकती है. जिन युवाओं ने पहले कभी बड़े आंदोलनों में हिस्सा नहीं लिया, उन्हें पुलिस और अर्धसैनिक बलों की सख्त कार्रवाई से डराया जा सकता है, लेकिन सरकार जिस चीज़ से नहीं लड़ सकती, वह है लोगों की भावना.
जंतर-मंतर और देश के दूसरे हिस्सों में प्रदर्शन कर रहे लोग सिर्फ एक छोटे हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं. असली गुस्सा और निराशा उन लोगों में भी है, जो सोशल मीडिया पर यह सब देख रहे हैं. जब भी वे किसी पुलिसकर्मी का किसी महिला को थप्पड़ मारते या उसके निजी अंगों के पास लाठी ले जाते हुए वीडियो देखते हैं, उनका गुस्सा और बढ़ जाता है.
ये ऐसे छात्र हैं, जिनकी शिकायतें सच में हैं. किसी तानाशाही शासन के लिए महिला प्रदर्शनकारियों का अपमान करना या उनकी हड्डियां तोड़ देना शायद एक तरीका हो सकता है, लेकिन इस सरकार के लिए, चाहे वह नैतिकता की कितनी भी परवाह करे या न करे, देश की राजधानी के बीचों-बीच, सैकड़ों कैमरों के सामने ऐसा करना सबसे बड़ी रणनीतिक गलती साबित हो सकती है. हो सकता है सरकार इन प्रदर्शनों को रोकने में कामयाब हो जाए.
लेकिन वह लोगों के मन से यह बात कभी नहीं मिटा पाएगी कि जब युवाओं के सामने नौकरी की कमी और परीक्षा व्यवस्था की नाकामी जैसे सवाल आए, तब सरकार ने उनकी बात सुनने के बजाय उन पर हमला किया, उन्हें पीटा और उनका अपमान किया. एक समय था, जब युवाओं को भरोसा था कि नरेंद्र मोदी भारत को बेहतर बनाएंगे. लेकिन यह पीढ़ी शायद अब ऐसा कभी नहीं मानेगी. और यह भी कभी नहीं भूलेगी कि उसकी असली शिकायतों पर सरकार ने कैसा जवाब दिया.
वीर सांघवी प्रिंट और टेलीविजन पत्रकार तथा टॉक शो होस्ट हैं. यह लेख लेखक के निजी विचार हैं.
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