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Thursday, 23 July, 2026
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क्या हत्या के मामले में नाबालिग पर एक एडल्ट की तरह मुकदमा चल सकता है? SC ने कहा—हां

बेंच ने हाई कोर्ट के फ़ैसले को सही ठहराने के लिए जुवेनाइल जस्टिस एक्ट का सहारा लिया और कहा कि जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड शुरुआती आकलन करते समय विशेषज्ञों की सलाह मानने के लिए 'बाध्य' नहीं है.

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को चार साल पहले हत्या के आरोप में गिरफ्तार किए गए 16 साल के एक नाबालिग पर वयस्क (एडल्ट) की तरह मुकदमा चलाने की अनुमति दे दी. इसके साथ ही कोर्ट ने पिछले साल जुलाई में पटना हाई कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें ट्रायल कोर्ट की इस राय को सही माना गया था कि इस मामले में नाबालिग पर वयस्क की तरह मुकदमा चलाया जाना चाहिए.

यह मामला बिहार के एक नाबालिग ‘X’ से जुड़ा है, जिस पर मई 2022 में एक लापता लड़के का गला रेतकर हत्या करने का आरोप लगा था. बाद में उस लड़के का शव एक खेत में मिला था. हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए X ने कहा था कि जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (JJB) ने शुरुआती जांच के दौरान अनुभवी मनोवैज्ञानिकों और मेडिकल विशेषज्ञों की राय को ध्यान में नहीं रखा.

हालांकि, जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस उज्जल भुइयां की दो जजों की बेंच ने कहा कि अपील सुनने वाली अदालतें चाहें तो विशेषज्ञों की मदद ले सकती हैं, लेकिन वे JJB के सामने रखी गई विशेषज्ञों की रिपोर्ट मानने के लिए “बाध्य नहीं” हैं. इसके बावजूद कोर्ट ने कहा कि बोर्ड को जुवेनाइल जस्टिस (JJ) एक्ट की धारा 15 में दिए गए चार मानकों को ध्यान में रखते हुए उपलब्ध सभी सामग्री पर स्वतंत्र रूप से विचार करना होगा.

2023 में ट्रायल कोर्ट ने जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड को यह मामला चिल्ड्रन कोर्ट भेजने का भी निर्देश दिया था. जुवेनाइल जस्टिस एक्ट 2015 की धारा 2(20) के तहत चिल्ड्रन कोर्ट का मतलब बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम 2005 के तहत गठित अदालतों या पॉक्सो एक्ट 2012 के तहत बनी विशेष अदालतों से है. इन अदालतों के पास यह तय करने का अधिकार होता है कि किसी बच्चे पर वयस्क की तरह मुकदमा चलेगा या नहीं. ये अदालतें बच्चे के पुनर्वास और आगे की देखरेख से जुड़े आदेश भी दे सकती हैं.

JJ एक्ट के उद्देश्य को याद करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संसद को इस बात का पता था कि कानून से टकराव में आने वाले किशोरों की संख्या बढ़ रही है और पुराने कानून ऐसे मामलों की जटिलताओं से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं थे.

कोर्ट ने कहा, “ऐसी स्थिति में विधायिका ने 16 से 18 साल के बच्चों को अलग श्रेणी में रखने का फैसला किया, ताकि एक तरफ नाबालिग के सुधार के अधिकार और दूसरी तरफ समाज में अपराध रोकने की जरूरत के बीच संतुलन बनाया जा सके.”

कोर्ट ने यह भी कहा कि हत्या जैसे जघन्य अपराधों में अदालतें उम्रकैद से कम सजा नहीं दे सकतीं.

कोर्ट ने कहा, “कानून अदालतों को उम्रकैद से कम सजा देने का कोई अधिकार नहीं देता. इसलिए IPC की धारा 302 के तहत उम्रकैद ही न्यूनतम सजा मानी जाएगी.”

47 पन्नों के अपने फैसले में बेंच ने JJ एक्ट की धारा 15(1) का हवाला दिया, जो जघन्य अपराधों में जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड द्वारा की जाने वाली शुरुआती जांच से जुड़ी है. कोर्ट ने कहा कि ऐसी जांच के दौरान कुछ जरूरी बातों पर विचार करना अनिवार्य है.

इनमें यह देखना शामिल है कि बच्चा मानसिक और शारीरिक रूप से अपराध करने में सक्षम था या नहीं और क्या वह अपने कृत्य के परिणाम समझ सकता था. इसके अलावा यह भी देखा जाता है कि कथित अपराध किन परिस्थितियों में किया गया.

कोर्ट ने कहा कि आज के बच्चे कम उम्र से ही जटिल जानकारी और हिंसक सामग्री तक पहुंच रखते हैं, जो पहले की पीढ़ियों के लिए उपलब्ध नहीं थी. इसमें कोई शक नहीं कि तकनीक और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने बच्चों के मानसिक विकास को प्रभावित किया है.

कोर्ट ने कहा, “कानून से टकराव में आए बच्चों से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाली अदालतों और जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड का नजरिया उसी जगह स्थिर नहीं रह सकता, जहां कानून बनने के समय था.” कोर्ट ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की बात कही.

किन बातों पर विचार करना होगा

संक्षेप में कोर्ट ने कहा कि जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के लिए विशेषज्ञों की राय लेना जरूरी नहीं है. लेकिन धारा 15(1) के तहत शुरुआती जांच करते समय उसे इन बातों पर जरूर विचार करना होगा.

पहला, क्या कानून से टकराव में आया बच्चा मानसिक रूप से कथित अपराध करने में सक्षम था.

दूसरा, क्या वह शारीरिक रूप से अपराध करने में सक्षम था.

तीसरा, क्या वह अपने किए गए अपराध के परिणाम समझ सकता था.

चौथा, किन परिस्थितियों में उसने कथित अपराध किया.

कोर्ट ने कहा, “जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड शुरुआती जांच पूरी करने के बाद किसी भी राय या सिफारिश को मानने के लिए बाध्य नहीं है. उसे उपलब्ध सभी सामग्री पर स्वतंत्र रूप से विचार करना होगा. फैसला लेते समय धारा 15 में दिए गए चारों मानकों को ध्यान में रखते हुए सभी दस्तावेजों का एक साथ मूल्यांकन करना होगा.”

मामला सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा

जांच पूरी होने के बाद आरोपी ने दावा किया कि वह नाबालिग है. JJ एक्ट की धारा 9 के तहत मजिस्ट्रेट किसी आरोपी को बच्चा घोषित कर सकता है और मामले की फाइल जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड को भेज सकता है.

इसके बाद JJB ने अपराध के दिन आरोपी की उम्र 16.4 साल मानी और उसे नाबालिग घोषित किया.

इसके बाद बोर्ड ने आरोपी की सोशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट (SIR) और सोशल बैकग्राउंड रिपोर्ट (SBR) मंगाई. ये दोनों रिपोर्ट जुवेनाइल जस्टिस प्रक्रिया में बेहद अहम मानी जाती हैं. SIR में बच्चे का मनोवैज्ञानिक और सामाजिक मूल्यांकन होता है ताकि उसके सुधार और देखभाल का फैसला लिया जा सके. जबकि SBR में बच्चे की पारिवारिक पृष्ठभूमि और मौजूदा परिस्थितियों की जानकारी होती है.

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि JJB की अंतिम रिपोर्ट में यह स्पष्ट और कारणों सहित बताया जाना चाहिए कि बच्चे पर वयस्क की तरह मुकदमा चलाया जाए या नहीं. साथ ही SIR, SBR और गवाहों के बयानों में दी गई टिप्पणियों और सिफारिशों को स्वीकार या खारिज करने के कारण भी दर्ज होने चाहिए.

दो जजों की बेंच ने यह भी कहा कि इस मामले में JJB ने SIR और SBR पर विचार ही नहीं किया, जबकि ये आरोपी बच्चे की शुरुआती जांच के लिए “बहुत महत्वपूर्ण दस्तावेज” हैं.

कोर्ट ने कहा, “बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में SIR और SBR का कोई जिक्र नहीं किया. उसने खास तौर पर प्रोबेशन अधिकारी और CWPO की सिफारिशों और आरोपी के पिछले रिकॉर्ड पर विचार नहीं किया. हम स्पष्ट करना चाहते हैं कि SIR और SBR केवल अतिरिक्त दस्तावेज नहीं हैं, बल्कि शुरुआती जांच के लिए बेहद महत्वपूर्ण सामग्री हैं.”

मामले के रिकॉर्ड के मुताबिक, आरोपी को उस समय पकड़ा गया जब वह भागने की कोशिश कर रहा था. उसके पास वही हथियार भी मिला था, जिससे मृतक का गला रेता गया था.

काउंसलिंग रिपोर्ट और SIR का अध्ययन करने के बाद JJB के बहुमत ने माना कि नाबालिग के पास अपराध करने की मानसिक और शारीरिक क्षमता नहीं थी. लेकिन बोर्ड के अध्यक्ष मजिस्ट्रेट ने बहुमत से असहमति जताई और कहा कि आरोपी अपने कृत्य को समझने में सक्षम था, इसलिए उस पर वयस्क की तरह मुकदमा चलना चाहिए.

इसके बाद नाबालिग ने छपरा की अदालत का रुख किया. दिसंबर 2023 में अदालत ने JJB का पहले का आदेश रद्द कर दिया और कहा कि X पर वयस्क की तरह मुकदमा चलेगा.

ट्रायल कोर्ट के 2023 के फैसले को चुनौती देते हुए नाबालिग पटना हाई कोर्ट पहुंचा. उसने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने अनुभवी मनोवैज्ञानिकों और मेडिकल विशेषज्ञों की मदद नहीं ली.

24 जुलाई पिछले साल हाई कोर्ट ने उसकी अपील खारिज कर दी. इसके बाद उसने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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