सरकार कड़वा सच क्यों नहीं बोल सकती, इसे समझना बहुत आसान है. तमाम युद्धों की तरह यह युद्ध भी जब रुक जाएगा तब भी भारत के हित विजेता के साथ भी जुड़े होंगे और हारने वालों के साथ भी.
एक पक्ष सोचता है कि आज भारत अपनी हैसियत से ज्यादा आगे बढ़कर कदम उठा रहा है, जबकि दूसरा पक्ष सोचता है कि मोदी ने भारत की हैसियत कमजोर कर दी है और भारत अपनी हैसियत से कम कदम उठा रहा है. सच यह है कि दोनों ही गलत हैं.
लोकतंत्र की ‘रेटिंग’ करना एक जोखिम भरा काम है. मैं केवल इस सीधी-सी कसौटी को लागू करता हूं—कहां सबसे शांतिपूर्वक तथा सामान्य ढंग से राजनीतिक सत्ता का निरंतरता के साथ बदलाव होता रहा है.
डॉनल्ड ट्रंप ने मानमर्दन का दौर ला दिया है, उनका तरीका अमेरिका के मित्रों पर खुलकर अशिष्टता के साथ धौंस जमाने वाला रहा है. ट्रंप को मालूम है कि उनमें से कोई भी उनका प्रतिकार नहीं कर सकता.
हर देश अब यह खेल खेलना सीख रहा है. कुछ देश नए सहयोगी ढूंढ रहे हैं या उन देशों की अहमियत समझ रहे हैं, जिनमें पहले उनकी बहुत कम दिलचस्पी थी. इसका सबसे साफ उदाहरण भारत और यूरोप हैं.
अगले वीकेंड तक बांग्लादेश में एक चुनी हुई सरकार बन जाएगी. यह भारत के लिए मौका है कि वह चुनाव वाले पश्चिम बंगाल और असम में ‘घुसपैठिया’ वाली भाषा को नरम करके बिगड़े रिश्तों को फिर से ठीक करे.
किसी भी युद्ध को जीतने तो क्या, शुरू करने की कुंजी यह होती है कि उसका लक्ष्य स्पष्ट हो. यह पूरी तरह से राजनीतिक विषय होता है. यह न तो भावनात्मक मामला होता है, और न ही शुद्ध रूप से सैन्य मामला.
चीन को छोड़ कोई भी देश ट्रंप के साथ बराबरी की हैसियत से बात नहीं कर सकता. इसलिए, जो ‘मिडल पावर’ देश इन बहुपक्षीय संगठनों के मूल आधार थे वे आज बेसहारा महसूस कर रहे हैं.
1950 के दशक में अरब का तेल हासिल करने में ब्रिटेन की नाकामी कोई गलत फ़ैसला नहीं था. साम्राज्य का सूरज डूब रहा था, और एक नई महाशक्ति उभर आई थी. क्या अब एक और अराजकता सिर उठा रही है?