युवाओं ने कुलीन तबकों की खुद की ओढ़ी उस चुप्पी को तोड़ दिया, जो उन्हें मोदी सरकार की आलोचना में एक भी शब्द खुलकर बोलने से रोकती थी, और कुछ कहना भी हो तो दाएं-बाएं, आगे-पीछे झांकने के बाद दबी आवाज में.
हमारी शिक्षा व्यवस्था बच्चों पर रटंत विद्या का बोझ डालकर और फिर प्रतियोगी परीक्षाओं में ‘बाजी मारने’ के लिए धकेलकर तमाम प्रतिभाओं का गला घोंट देती है. ऊपर से पेपर लीक भी कहर ढाता है.
कहीं नगरपालिका का चुनाव भी हो रहा हो और कांग्रेस का वहां कोई नाम-ओ-निशान भी न हो फिर भी आप BJP को कांग्रेस पर हमला करते पाएंगे. यह सब बताता है कि मोदी कांग्रेस को ही एकमात्र संभावित प्रतिद्वंद्वी मानते हैं.
दिलजीत दोसांझ अभिनीत ‘सतलुज’ फिल्म किसी पार्टी या नेता पर उंगली नहीं उठाती लेकिन हमें मालूम है कि पंजाब में जनसंख्या का स्वरूप ऐसा है कि यह फिल्म चिनगारी का काम कर सकती है.
सैको की ‘रिपोर्टिंग’ अविश्वसनीय रूप से तह तक जाती है लेकिन कुछ मामलों में वे चूक गए हैं. लेकिन इस वजह से हम उस बात को न ओझल करें जिस पर सैको ने ज़ोर दिया है कि किस तरह स्थानीय झगड़े दंगों का रूप ले लेते हैं.
विचारधारा या सत्ता की गोंद राजनीतिक दलों को जोड़े रखती है. इनमें से कोई भी अगर उन्हें न जोड़ती हो तो दलबदल उद्योग जैसे पैमाने पर होने लगता है, जैसा इन दिनों हुआ है.
भारत के लिए उन्होंने जो काम किए उसके सम्मोहन से खुद मोदी और उनके समर्थक अगर मुक्त हो सकें तो उन्हें भविष्य पर नजर डालनी चाहिए कि आगे उनके लिए चुनौतियां क्या-क्या हैं.
हमारे शहरी शासन का मुख्य अभिशाप यह नहीं है कि झुग्गी बस्ती जैसे गांवों या अवैध कॉलोनियों में ज्यादा वोटर रहते हैं, बल्कि यह है कि राजनीतिक जमात उनका जीवन स्तर सुधारने की जगह उन्हें रिझाने में लगी रहती है.
तेल का झटका, मॉनसून फेल होने का डर, व्यापक बेरोजगारी, और आसन्न महंगाई से उपजे संकट इंदिरा युग में भी थे और आज भी हैं; इंदिरा गांधी ने जो आत्मघाती कदम उठाया था वह आज के लिए भी एक सबक है.
एक रेगुलेटर के तौर पर, FSSAI की ज़िम्मेदारी है कि वह आम लोगों के हितों की रक्षा करे और उन्हें नुकसानदायक खाने-पीने की चीज़ों से बचाए, लेकिन असल में उसके काम संतोषजनक नहीं रहे हैं.