विचारधारा या सत्ता की गोंद राजनीतिक दलों को जोड़े रखती है. इनमें से कोई भी अगर उन्हें न जोड़ती हो तो दलबदल उद्योग जैसे पैमाने पर होने लगता है, जैसा इन दिनों हुआ है.
भारत के लिए उन्होंने जो काम किए उसके सम्मोहन से खुद मोदी और उनके समर्थक अगर मुक्त हो सकें तो उन्हें भविष्य पर नजर डालनी चाहिए कि आगे उनके लिए चुनौतियां क्या-क्या हैं.
हमारे शहरी शासन का मुख्य अभिशाप यह नहीं है कि झुग्गी बस्ती जैसे गांवों या अवैध कॉलोनियों में ज्यादा वोटर रहते हैं, बल्कि यह है कि राजनीतिक जमात उनका जीवन स्तर सुधारने की जगह उन्हें रिझाने में लगी रहती है.
तेल का झटका, मॉनसून फेल होने का डर, व्यापक बेरोजगारी, और आसन्न महंगाई से उपजे संकट इंदिरा युग में भी थे और आज भी हैं; इंदिरा गांधी ने जो आत्मघाती कदम उठाया था वह आज के लिए भी एक सबक है.
भारत के खिलाफ हर युद्ध में हारने के बावजूद पाकिस्तान जीत का दावा करता रहा है. आगे वह क्या कर सकता है, इसका अंदाज़ा लगाने के लिए हम सबूतों पर नज़र डालेंगे.
इस चुनाव ने भाजपा और सेक्युलर पार्टियों के बीच साफ हिंदू-मुस्लिम बंटवारे को और मजबूत कर दिया है. भाजपा के विरोधी अब मुस्लिम पार्टियों जैसे दिखने लगे हैं. हालांकि, उनके नेता हिंदू हैं.
मतगणना के दिन, नेशनल इंटरेस्ट का यह स्पेशल एडिशन पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और असम के नतीजों से मिली खास बातों पर नज़र डालता है. अगर आप BJP की सफलता का श्रेय या दोष केवल 'हिंदुत्व' को देते हैं, तो आप गलती करेंगे. यह उससे कहीं बढ़कर है.
अमेरिका के लक्ष्य अधूरे रह गए, अब उसके पास न तो इतनी ताकत है और न इतना जोश है कि वह युद्ध फिर शुरू कर सके; और ईरान? घुटने टेकने की जगह वह पूरे संकल्प के साथ लड़ा. उसकी बागडोर अब ज्यादा कट्टरपंथी लोगों के हाथ में है
आज निरंतर बदलती विश्व व्यवस्था भारत के लिए एक मौका उपलब्ध करा रही है जिसका लाभ उठाने के लिए उसे खुद को अनुशासित रखना होगा ताकि पाकिस्तान जब अपने लिए मौका देख रहा है तब हम हड़बड़ी में कोई प्रतिक्रिया न कर बैठें.
पंजाब की गिरती हालत के लिए सिर्फ उग्रवाद जिम्मेदार नहीं है. हिंसा खत्म होने के करीब 10 साल बाद शुरू हुई गिरावट के पीछे तीन धीरे-धीरे बढ़ी बड़ी नाकामियां हैं.