सभी पाकिस्तानी तानाशाह एक समय के बाद उन्मादग्रस्त होने के संकेत देते दिखे हैं, 1950 वाले दशक से यह भारत के लिए एक रणनीतिक हकीकत रही है. मुनीर जिस डर से ग्रस्त हैं उसे ‘एक्रोफोबिया’ यानी ऊंचाई से डर के रूप में परिभाषित किया जा सकता है.
चालीस साल पहले, इसी सप्ताह खालिस्तान कमांडो फोर्स के हत्यारे जनरल वैद्य को निशाना बनाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन हमारे इस रिटायर्ड सेनाध्यक्ष की सुरक्षा की सिर्फ इतनी फिक्र की गई थी कि उनके लिए पुलिस का सिर्फ एक गनमैन तैनात किया गया था.
भागवत दूर से नजर रखे हुए थे और मोदी सरकार के खिलाफ युवाओं के आक्रोश को लेकर चिंतित थे. सबसे पहला काम तो उन्होंने यह किया कि Gen-Z के आंदोलनकारियों को राष्ट्र-विरोधी बताने वाली आलोचनाओं को सिरे से खारिज कर दिया.
युवाओं ने कुलीन तबकों की खुद की ओढ़ी उस चुप्पी को तोड़ दिया, जो उन्हें मोदी सरकार की आलोचना में एक भी शब्द खुलकर बोलने से रोकती थी, और कुछ कहना भी हो तो दाएं-बाएं, आगे-पीछे झांकने के बाद दबी आवाज में.
हमारी शिक्षा व्यवस्था बच्चों पर रटंत विद्या का बोझ डालकर और फिर प्रतियोगी परीक्षाओं में ‘बाजी मारने’ के लिए धकेलकर तमाम प्रतिभाओं का गला घोंट देती है. ऊपर से पेपर लीक भी कहर ढाता है.
कहीं नगरपालिका का चुनाव भी हो रहा हो और कांग्रेस का वहां कोई नाम-ओ-निशान भी न हो फिर भी आप BJP को कांग्रेस पर हमला करते पाएंगे. यह सब बताता है कि मोदी कांग्रेस को ही एकमात्र संभावित प्रतिद्वंद्वी मानते हैं.
दिलजीत दोसांझ अभिनीत ‘सतलुज’ फिल्म किसी पार्टी या नेता पर उंगली नहीं उठाती लेकिन हमें मालूम है कि पंजाब में जनसंख्या का स्वरूप ऐसा है कि यह फिल्म चिनगारी का काम कर सकती है.
सैको की ‘रिपोर्टिंग’ अविश्वसनीय रूप से तह तक जाती है लेकिन कुछ मामलों में वे चूक गए हैं. लेकिन इस वजह से हम उस बात को न ओझल करें जिस पर सैको ने ज़ोर दिया है कि किस तरह स्थानीय झगड़े दंगों का रूप ले लेते हैं.
विचारधारा या सत्ता की गोंद राजनीतिक दलों को जोड़े रखती है. इनमें से कोई भी अगर उन्हें न जोड़ती हो तो दलबदल उद्योग जैसे पैमाने पर होने लगता है, जैसा इन दिनों हुआ है.
स्वैच्छिक बदलाव से सभी कंपनियों के लिए बराबर की प्रतिस्पर्धा की स्थिति नहीं बन पाई थी. फूड पैकेट पर चेतावनी वाले लेबल अब एक समान व्यवस्था उपलब्ध करा सकते हैं.