'आर्थिक देशभक्ति' के नाम पर मोदी ने भारतीयों से जो कुछ करने को कहा, उसमें से ज़्यादातर बातें समझदारी भरी थीं. लेकिन अच्छे समय में कोई भी इस तरह का भाषण नहीं देता. संकट सिर पर मंडरा रहा है.
दूरदराज़ के मित्र देशों का बचाव करने के लिए अपनी संपदा और अपना खून दांव पर लगाने में अमेरिका की बढ़ती हिचक न केवल युद्ध का जोखिम बढ़ाएगी बल्कि उसे अकल्पनीय रूप से ज्यादा विनाशकारी बनाएगी.
भूटान के पढ़े-लिखे युवाओं की सबसे पसंदीदा जगहों में ऑस्ट्रेलिया शामिल हो गया है. विदेश जाने वालों में कई हाई स्किल वाले लोग और सरकारी कर्मचारी भी शामिल हैं.
मज़ाक, अगर शी उसे समझ सकें, तो उन्हीं पर भारी पड़ सकता है. सिर्फ अमेरिका ही नहीं, बल्कि भारत के उभार को देखकर चीन भी ‘थ्यूसीडाइड्स ट्रैप’ में फंस सकता है.
'कॉकरोच जनता पार्टी' को लेकर मोदी सरकार की घबराहट साफ़ नज़र आती है, क्योंकि उसे ऐसे दुश्मनों से लड़ने की आदत है जिन्हें वह देख-छू सकती है—यानी ऐसे लोग जिन्हें वह गिरफ़्तार कर सकती है या खरीद सकती है. लेकिन, आप किसी एल्गोरिदम को सलाखों के पीछे कैसे डाल सकते हैं?