जब-जब केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकारे रहीं, ज्यादातर फैसले पूंजीपतियों और सामंती शक्तियों के हक़ में किए गए. ऐसे शासन में क्षेत्रीय आकांक्षाओं, लोक-कल्याण और जनहित के कार्यों को नज़रंदाज़ किया गया.
भारत जैसे देश में जहां समाज जाति और वर्ग के नाम पर बुरी तरह बंटा हो, वहां समाजवाद की सफलता सामाजिक न्याय संबंधी नीतियों के कार्यान्वन पर निर्भर करती है.
भाजपा के विरोध में कोई एक ऐसा मोर्चा नहीं बन सका है जो तमाम गैर भाजपाई दलों की एकता के लिए धुरी का काम करे. ऐसे में चुनाव के बाद कई दल पाला बदल सकते हैं.
इवर्सेन और सोस्की ने अपने रिसर्च में पाया है कि जिन देशों में गठबंधन सरकारें बन रही हैं, उनमें असमानता कम बढ़ी है, जबकि जिन देशों में पूर्ण बहुमत की स्थाई सरकारें बनी है, उनमें असमानता तेज़ी से बढ़ रही है.
पूर्व मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी उर्फ वायएसआर के नेतृत्व में राज्य सरकार माओवादी हिंसा के फन कुचलने में कामयाब रही. बाद की सरकारों ने भी रेड्डी की रणनीति पर कठोरतापूर्वक अमल किया जिसके नतीजे अब सामने आ रहे हैं.
तीन कारकों—राजनीतिक समर्थन, कलेक्टर के कार्यालय का एक 'लिसनिंग पोस्ट' (सूचना केंद्र) के रूप में कार्य करना, और उग्रवाद-विरोधी अभियानों में हस्तक्षेप न करना—ने यह सुनिश्चित किया कि दंतेवाड़ा अभियान सफल रहा.