Tuesday, 5 July, 2022
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गरीबों और वंचितों के लिए फ़ायदेमंद है गठबंधन सरकार

इवर्सेन और सोस्की ने अपने रिसर्च में पाया है कि जिन देशों में गठबंधन सरकारें बन रही हैं, उनमें असमानता कम बढ़ी है, जबकि जिन देशों में पूर्ण बहुमत की स्थाई सरकारें बनी है, उनमें असमानता तेज़ी से बढ़ रही है.

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बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव ने चुनाव परिणाम आने के पूर्व ही यह वक्तव्य दिया है कि इस बार पार्टी पूर्ण बहुमत से दूर रह जाएगी. इसके साथ ही उनका यह भी मानना है कि बीजेपी बहुमत के लिए ज़रूरी आंकड़ा जुटा लेगी. पूर्ण बहुमत न मिलने की सूरत में वह बहुमत कैसे जुटाएगी, यह एक अहम सवाल है, लेकिन इससे इतर राम माधव की बात से एक निष्कर्ष यह भी निकलता है कि इस बार के चुनाव में किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत तो नहीं मिलने जा रहा है.

बीजेपी में जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर जैसे सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्रों को देखने वाले राम माधव की बात को इसलिए भी सीरियसली लिए जाने की ज़रूरत है क्योंकि वो पार्टी में आरएसएस से भेजे गए नेता हैं. उन्हें लगातार महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं और उन्हें बीजेपी की राजनीति का उभरता सितारा माना जाता है.

उनके अलावा भारत के चुनावों पर अध्ययन करने वाले शोधार्थियों और सर्वे एजेंसियों का भी किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने का ही पूर्वानुमान है. किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत न मिलने का मतलब है कि इस बार केंद्र में विभिन्न पार्टियों के गठबंधन की सरकार बनेगी.

बात जब गठबंधन सरकार की आती है तो एक आम धारणा (कॉमन सेंस) उभर कर आती है कि यह देश के विकास के लिए अच्छी नहीं होती है. दुनियाभर में सरकारों के कामकाज पर चल रहे शोध के माध्यम से इस लेख में इस धारणा की सत्यता की पड़ताल की गयी है, साथ में इसको भारत के परिप्रेक्ष्य में भी देखने की कोशिश की गयी है.


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भारत में गठबंधन सरकारों की शुरुआत

भारत में केंद्रीय स्तर पर गठबंधन सरकार की शुरुआत आपातकाल के बाद हुई, जब पहली बार ग़ैर कांग्रेसी पार्टी यानी जनता पार्टी की सरकार बनी. उस सरकार में मोरारजी देसाई और चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बने. जनता पार्टी अपने आप में कई दलों का गठबंधन थी, जिसमें समाजवादी से लेकर लोकदल और जनसंघ तक के लोग थे. उसके बाद गठबंधन सरकारों का दौर 80 के दशक के अंत में लौटा, जब वीपी सिंह ने राजीव गांधी के ख़िलाफ़ बग़ावत करके जनमोर्चा बना लिया. 1989 के लोकसभा चुनाव में राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी बहुमत से चूक गयी, जिसकी वजह से उन्होंने सरकार बनाने से इंकार कर दिया. राजीव गांधी के इंकार के बाद वीपी सिंह जनता दल, बीजेपी और वाम दलों के समर्थन से प्रधानमंत्री बने.

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मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू किए जाने के बाद लालकृष्ण आडवाणी की बिहार में रामरथ यात्रा के दौरान गिरफ़्तारी का बहाना बनाकर बीजेपी ने वीपी सिंह की सरकार से समर्थन वापस ले लिया, जिसके बाद चंद्रशेखर कांग्रेस के बाहरी समर्थन से प्रधानमंत्री बन गए. ये सरकार भी लंबी नहीं चली. इसके बाद की सभी सरकारें मिली जुली रहीं. चाहे वह नरसिंह राव की सरकार हो या एचडी देवेगौड़ा की या इंद्रकुमार गुजराल की या अटल बिहारी वाजपेयी की या मनमोहन सिंह की.

गठबंधन सरकारों का यह सिलसिला 2014 के आम चुनाव में आकर टूटा, जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने पूर्ण बहुमत प्राप्त किया. हालांकि उन्होंने भी सरकार मिली जुली ही चलाई और एनडीए के कई घटक दल सरकार में शामिल रहे.

क्या सचमुच कमजोर होती है गठबंधन सरकार

लगभग ढाई दसक तक गठबंधन सरकारें देखने के बाद भारत में यह धारणा फैल गयी कि ऐसी सरकारें देश के विकास के लिए अच्छी नहीं हैं. ऐसी धारणा बनाने वालों में लेखक, पत्रकार, राजनेता से लेकर बुद्धिजीवी तक शामिल रहे. इस आमधारणा के पीछे सिर्फ़ एक तर्क है कि गठबंधन सरकार कमज़ोर होती है, क्योंकि वो निर्णय नहीं ले पाती. जबकि विकास दर के आंकड़े बताते हैं कि मिलीजुली सरकार के दौर में भारत के विकास की दर बेहतर रही है.

इस आम धारणा के विरुद्ध भारत में बहुजन आंदोलन के जनक मान्यवर कांशीराम एक ऐसे राजनेता थे, जिन्होंने केंद्र में कमज़ोर सरकार की वकालत किया. उनका कहना था कि उन्हें मज़बूत सरकार नहीं बल्कि मजबूर सरकार चाहिए. कांशीराम की समझ थी कि तथाकथित कमज़ोर सरकार यानी कि गठबंधन सरकार ही कमज़ोर और वंचितों के हित में फ़ैसला ले सकती है. उनकी यह समझ संविधान सभा में सरकार की पद्धति पर हुई बहस और अपने निजी अनुभव से मिली सीख से विकसित हुई दिखती है.

दरअसल संविधान सभा में सरकार की प्रणाली को लेकर जब बहस हुई थी, तब कुछ सदस्यों ने मजबूत सरकार चुनने की प्रणाली की वकालत की थी. उस समय तर्क दिया गया था कि भारत को अमेरिका की तरह राष्ट्रपति शासन जिसे अध्यक्षीय शासन प्रणाली भी कहा जाता है, को अपनाना चाहिए क्योंकि इसमें सरकार को स्थायित्व मिलता है.

इसके जवाब में बाबा साहेब अम्बेडकर ने कहा था कि- यह सही है, अध्यक्षीय शासन प्रणाली वाली सरकार ज़्यादा स्थायित्व प्रदान करती है, लेकिन प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली कैबिनेट शासन प्रणाली वाली सरकार जनता के प्रति ज़्यादा जवाबदेह होती है. इसके अलावा भारत के लोग कैबिनेट प्रणाली वाली सरकार से काफ़ी कुछ परिचित भी रहे हैं.

इन दो कारणों से संविधान सभा ने मज़बूत सरकार के बरख़्श जनता के प्रति ज़्यादा जवाबदेह रहने वाली शासन प्रणाली यानी कैबिनेट सिस्टम को अपनाया. कांशीराम के पास संविधान सभा की उक्त बहस से वाक़िफ़ रहने के अलावा वीपी सिंह सरकार के साथ उनका अपना अनुभव भी था, जिस पर जन दबाव डालकर मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करवा पाना मुमकिन हुआ था. इसलिए वो कमज़ोर यानी गठबंधन सरकार की वकालत करते थे.


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ग़रीबों के लिए गठबंधन सरकारों के फ़ायदेमंद होने की पुष्टि

राजनीति विज्ञान में पिछले कुछ सालों से इस पर रिसर्च चल रहा है कि गठबंधन सरकारें किस वर्ग को फ़ायदा पहुंचाती हैं, और कैसे? ऐसा ही एक शोध हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रो. टोर्बेन इवर्सेन और लन्दन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स एंड पोलिटिकल साइंस के प्रो डेविड सोस्की ने मिलकर किया जो कि अमेरिकन पॉलिटिकल साइंस एसोसिएसन के जर्नल में प्रकाशित हुआ है. इवर्सेन और सोस्की ने अपने रिसर्च में पाया है कि जिन देशों में गठबंधन सरकारें बन रही हैं, उन देशों में असमानता कम बढ़ी है, जबकि जिन देशों में पूर्ण बहुमत की स्थाई सरकारें बनी हैं, उनमें असमानता तेज़ी से बढ़ रही है.

उन्होंने पाया है कि गठबंधन सरकारें संसाधनों के पुनर्वितरण पर ज़्यादा ज़ोर देती हैं, जबकि पूर्ण बहुमत की सरकारें इस बारे में कम ध्यान देती हैं.

अब सवाल उठता है कि गठबंधन सरकारों को संसाधनों के पुनर्वितरण पर ज़्यादा ध्यान क्यों देना पड़ता है. इसका सीधा सा जवाब है कि पूर्ण बहुमत की सरकारें भले ही सदन के सदस्यों के बहुमत के आधार पर बनती हैं, लेकिन यदि जनता के वास्तविक मत की बात की जाए तो वह केवल अल्पसंख्यक (इसे धार्मिक अल्पसंख्यक से कनफ्यूज न किया जाए) वोट पाकर ही बनीं होती हैं. सरकार चलाते समय वह इन्हीं अल्पसंख्यक वोट समूह का खयाल रखती हैं.

मसलन, यदि इसको पिछले आम चुनाव के परिणाम के परिप्रेक्ष्य में रखकर समझा जाए तो नरेंद्र मोदी की सरकार भले ही पूर्ण बहुमत की सरकार थी, लेकिन वह कुल वोट का मात्र 33 प्रतिशत पाकर ही बनी थी. सैद्धांतिक तौर पर यदि देखा जाए तो बाक़ी के 67 प्रतिशत वोटों का नरेंद्र मोदी सरकार के निर्णयों में कोई भागीदारी नहीं रही. इसमें भी उत्तर प्रदेश में बीएसपी ने लोकसभा चुनाव में 19.6 प्रतिशत वोट प्राप्त किया था, जबकि इस पार्टी को कोई सीट नहीं मिली थी. इसको सीट न मिलने का मतलब लोकसभा में इस पार्टी के मतदाताओं की आवाज़ भी नहीं पहुंची. चूंकि यह पार्टी सरकार में भी शामिल नहीं रही इसलिए इसके मतदाता समूह की सरकार के निर्णय में कोई भागीदारी नहीं रही. ऐसा ही तमाम अन्य पार्टियों के मतदातों के साथ रहा.

ऐसे में अगर विभिन्न पार्टियों के गठबंधन की सरकार बनती है, तो इसका मतलब होता है कि ज़्यादा से ज़्यादा मतदाता समूहों की इच्छाओं का सरकार के निर्णय में भागीदार बनना. ज़्यादा मतदाताओं की इच्छा से बनी सरकार उनके पक्ष में ज़्यादा निर्णय लेती है.


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भारत में गठबंधन सरकारों की ज़्यादा ज़रूरत

भारत में गठबंधन सरकार यहां के समावेशी विकास के लिए भी ज़रूरी हैं, क्योंकि ‘भारत एक राष्ट्र बनने की प्रक्रिया’ में है, क्योंकि यहां भाषा, क्षेत्र, जाति, धर्म के आधार पर काफी विविधता है और इन अलग अलग समूहों के बीच सौहार्दपूर्ण संबंध यानी फ्रेटर्निटी भी नहीं है’ (आंबेडकर, संविधान सभा के अपने आखिरी भाषण में). भारत में भाषाई, धार्मिक, जातीय और क्षेत्रीय विविधता के आधार पर राजनीतिक पार्टियों का विकास हुआ है, जिसको निकट भविष्य में शायद ही कोई पार्टी समाप्त कर पाए. ऐसे में अगर किसी एक पार्टी को बहुमत मिलता है तो वास्तव में किसी एक क्षेत्र विशेष के लोगों का सरकार और उसके निर्णयों पर दबदबा हो जाता है.

ऐसा आरोप नरेंद्र मोदी सरकार पर पिछले पांच साल में लगाया जाता रहा क्योंकि प्रधानमंत्री के गुजरात से आने की वजह से वहां के व्यापारियों और प्रशासनिक अधिकारियों का शासन में दबदबा रहा. इससे बाक़ी क्षेत्र के अधिकारियों और व्यापारियों में सरकार के कामकाज से नाख़ुशी उपजी. ऐसे में इस बार यदि किसी दल को बहुमत नहीं मिलता है और गठबंधन सरकार बनती है, तो वह समाज के ज़्यादा से ज़्यादा वर्गों और समूहों को साथ लेकर चल पाएगी.

(लेखक लंदन विश्वविद्यालय के रायल हॉलवे में पीएचडी कर रहे हैं)

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