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Thursday, 23 April, 2026
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संसद में मोदी सरकार को हार मिली लेकिन भारत की जीत हुई है

भारत की संसदीय शक्ति कभी पूरी तरह संख्यात्मक नहीं रही. क्षेत्रों को आवाज़ देकर संघवाद ने भारत को एक राष्ट्र बनाया. अब जब केवल संख्यात्मक सिद्धांत को प्राथमिकता दी जा रही है, तो राष्ट्रीय एकता खतरे में है.

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भारत की संसद में नरेंद्र मोदी सरकार के 131वें संविधान संशोधन बिल की हार को हमें कैसे समझना चाहिए. क्या हम कह सकते हैं कि भारत जीत गया और सरकार हार गई. किसी देश की राजनीतिक जिंदगी में ऐसे पल आते हैं जब चुनी हुई सरकार की हार, देश की जीत बन जाती है. यह वैसा ही एक पल था.

इसे समझने के लिए हमें तीनों बिलों की तकनीकी बातों से आगे जाना होगा. कौन सी जनगणना को आधार बनाया जाना चाहिए था, 2011 या 2026-27. क्या महिलाओं के आरक्षण को उस परिसीमन बिल से अलग किया जाना चाहिए था, जिसमें संसद की सीटें बढ़ाने की बात थी. और क्या सीटों की बढ़ोतरी बराबर होनी चाहिए थी या राज्यों की बदलती आबादी के हिसाब से.

इन मुद्दों पर बहुत चर्चा हुई है. लेकिन राजनीति में सक्रिय आम लोगों के लिए ये सब बहुत बारीक और बेकार की बातें थीं. उनके लिए असली सवाल कुछ और था. इस पूरी प्रक्रिया का बड़ा मकसद क्या था.

महिलाओं के लिए आरक्षण असली मुद्दा नहीं था, भले ही बीजेपी के नेतृत्व वाले गठबंधन ने इसे ऐसे पेश किया. संसद में महिलाओं की संख्या बढ़ाने पर सभी पार्टियों में सहमति थी. 2023 में एक पहले का संविधान संशोधन लगभग सर्वसम्मति से पास हो चुका था, जिसमें यह सिद्धांत तय हो गया था.

असली मुद्दा यह था कि राज्यों के बीच सीटों का बंटवारा कैसे होगा और इसके साथ ही संसद में सत्ता कैसे बांटी जाएगी. क्योंकि ज्यादातर क्षेत्रीय पार्टियां अपने-अपने राज्यों में होती हैं, इसलिए यह सवाल बन गया कि राष्ट्रीय सत्ता में किस पार्टी का कितना असर होगा.

बीजेपी की ताकत मुख्य रूप से उत्तर और पश्चिम भारत में है, दक्षिण में नहीं. अगर दक्षिण की सीटें कम हो जातीं और उत्तर की बढ़ जातीं, तो केंद्र में बीजेपी के बने रहने की संभावना काफी बढ़ जाती.

पहले से चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिविजन प्रक्रिया भी उन समूहों के खिलाफ मानी जा रही है जो बीजेपी को कम समर्थन देते हैं, और उन वर्गों को फायदा देती है जो ज्यादा संसाधन और दस्तावेज रखते हैं, जैसे ऊंची जातियां, जो आम तौर पर बीजेपी को वोट देती हैं. विपक्ष ने सवाल उठाया कि क्या नई परिसीमन प्रक्रिया, जिसमें दक्षिण की सीटें कम हों, और यह चल रही प्रक्रिया मिलकर चुनावी मैदान को स्थायी रूप से बदल देंगी.

तमिलनाडु का पहलू

इस डर को सबसे साफ तमिलनाडु में देखा जा सकता है, उसके इतिहास की वजह से. जो लोग इस इतिहास को ठीक से नहीं जानते या दक्षिण में काम नहीं किया है, वे इस सोच की गंभीरता को समझ नहीं पाते. दक्षिण भारत, खासकर तमिलनाडु, के मामले में सावधानी जरूरी है, नहीं तो दिल्ली जोखिम उठा सकती है.

तमिलनाडु की राजनीति को समझने के लिए हमें दो बातों पर ध्यान देना होगा. भाषा और जाति. 1960 के दशक में तमिलनाडु ने तीन-भाषा फॉर्मूले का विरोध किया, क्योंकि उसे हिंदी थोपने का तरीका माना गया. यह मुद्दा 1937-38 से शुरू हुआ था, जब राजगोपालाचारी सरकार ने हिंदी को पढ़ाई की भाषा बनाने की कोशिश की, जिससे बड़े विरोध हुए. 1940 तक यह फैसला वापस ले लिया गया, लेकिन 1960 के दशक में तीन-भाषा फॉर्मूले के रूप में फिर आया. तमिलनाडु में फिर बड़े विरोध हुए. अंत में राज्य ने दो-भाषा फॉर्मूला अपनाया, तमिल और अंग्रेजी.

जाति के मामले में, इतिहासकार निकोलस डिर्क्स ने कहा है कि जहां उत्तर भारत में धर्म राजनीति का मुख्य आधार रहा है, वहीं दक्षिण में जाति मुख्य आधार रही है. यही एक वजह है कि बीजेपी दक्षिण में सत्ता में नहीं आ पाई, सिर्फ कर्नाटक को छोड़कर. उत्तर भारत में भी बीजेपी को सबसे बड़ी चुनौतियां जाति आधारित राजनीति से मिली हैं, जिसे दक्षिण के प्रभाव का विस्तार कहा जा सकता है. 1990 के दशक में मंडल के रूप में यह राजनीति उभरी, 2010 के दशक में कमजोर हुई, और फिर वापस आ सकती है.

यह पृष्ठभूमि हमें समझने में मदद करती है कि तमिलनाडु और अन्य दक्षिणी राज्यों ने इस संविधान संशोधन बिल पर कैसी प्रतिक्रिया दी.

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के कुछ बयान देखें. उन्होंने कहा कि अगर तमिलनाडु को नुकसान पहुंचाने वाली या उत्तर राज्यों की राजनीतिक ताकत को ज्यादा बढ़ाने वाली कोई भी चीज की गई, तो तमिलनाडु पूरी ताकत से विरोध करेगा. हर परिवार सड़कों पर उतर जाएगा. उन्होंने यह भी कहा कि भारत फिर से 1950 और 1960 के दशक वाली डीएमके की भावना देखेगा.

1950 के दशक में डीएमके अलगाववाद के करीब पहुंच गई थी, जिसे बाद में ज्यादा संघीय ढांचे और डीएमके के सत्ता में आने से हल किया गया. विद्वानों अल्फ्रेड स्टेपान और जुआन लिंज ने कहा कि श्रीलंका ने संघीय व्यवस्था नहीं अपनाई, जिससे तमिल आंदोलन अलगाववाद में बदल गया. जबकि भारत ने संघीय ढांचा मजबूत किया और तमिल अलगाववाद को मुख्यधारा में शामिल कर लिया. उन्होंने यह भी दिखाया कि ऐसा ही कनाडा में क्यूबेक और स्पेन में कैटलोनिया और बास्क क्षेत्र के साथ हुआ.

दक्षिण की सीटें कम होने का डर किस आधार पर था. स्टालिन ने इसका कारण बताया. उन्होंने कहा कि जब केंद्र सरकार ने हमें जनसंख्या कम करने और छोटे परिवार अपनाने को कहा, तो हमने ऐसा किया. क्या अब उसी का हमें सजा मिल रही है. उत्तर भारत की तुलना में दक्षिण में जनसंख्या वृद्धि कम हुई है.

यह भी ध्यान देने की बात है कि आज दक्षिण की आर्थिक ताकत 1950 के दशक से कहीं ज्यादा है. देवेश कपूर और अरविंद सुब्रमणियन ने अपनी किताब ‘ए सिक्स्थ ऑफ ह्यूमैनिटी: इंडिपेंडेंट इंडिया डेवलपमेंट ओडिसी’ में दिखाया है कि दक्षिण भारत कई दशकों से चीन जैसी विकास दर से बढ़ रहा है. 1960 में तमिलनाडु की प्रति व्यक्ति आय उत्तर प्रदेश से थोड़ी ही ज्यादा थी. लेकिन 2020 तक यह तीन गुना से ज्यादा हो गई. तमिलनाडु की प्रति व्यक्ति जीडीपी गुजरात और महाराष्ट्र से भी आगे निकल गई है. अगर अब उत्तर के खिलाफ विरोध होता है, तो उसके आर्थिक असर बहुत ज्यादा होंगे.

बदला हुआ नंबरों का खेल

एक सामान्य लोकतांत्रिक सिद्धांत — एक व्यक्ति एक वोट — के आधार पर स्टालिन की बात का विरोध किया जा सकता है, जैसा कि कई लोगों ने किया. जब तमिलनाडु या दक्षिण की आबादी कम हो गई है, तो उन्हें संसद में उतनी ही सीटें क्यों मिलें, भले ही यह कमी “अच्छे कारण” से हुई हो, यानी कम बच्चे और छोटे परिवार रखने से.

इस सवाल का जवाब संविधान साफ देता है. भारत में, जैसे कई दूसरे देशों में, एक व्यक्ति एक वोट के नियम को हमेशा संघीय सिद्धांत के साथ संतुलित किया गया है. अरुणाचल प्रदेश की आबादी लगभग 15 लाख है और लोकसभा में उसकी 2 सीटें हैं. दिल्ली की आबादी 2 करोड़ से ज्यादा है और उसके पास 7 सीटें हैं. अगर हम एक व्यक्ति एक वोट का नियम पूरी तरह मानें, तो दिल्ली के पास करीब 26-27 सीटें होनी चाहिए. हां, 1976 में जब आखिरी बार सीटों का परिसीमन हुआ था, तब दोनों जगहों की आबादी कम थी, लेकिन तब भी यह अंतर बहुत ज्यादा था.

भारत में संसद की ताकत कभी पूरी तरह सिर्फ संख्या के आधार पर तय नहीं हुई. अलग-अलग क्षेत्रों को आवाज देने के लिए संघीय समझौता बहुत अहम रहा है, जिसने भारत को एक राष्ट्र बनाने में बड़ी भूमिका निभाई. अगर अब केवल संख्या के आधार पर फैसला किया गया, तो यह राष्ट्रीय एकता को गंभीर खतरे में डाल सकता है.

मोदी सरकार बार-बार कहती रही कि किसी भी राज्य की सीटें कम नहीं होंगी. लेकिन यह बात बिल में लिखी नहीं गई थी. और जब इसे संशोधन के रूप में जोड़ने का सुझाव आया, तब तक बहुत देर हो चुकी थी. चालाकी से कुछ छुपाने का डर खत्म नहीं हो पाया.

इस तरह इस बिल की हार ने भारत को एक संघीय संकट और संभावित राष्ट्रीय संकट से बचा लिया. इसी अर्थ में कहा जा सकता है कि देश जीता और सरकार हार गई.

आशुतोष वार्ष्णेय इंटरनेशनल स्टडीज़ और सोशल साइंसेज़ के सोल गोल्डमैन प्रोफेसर और ब्राउन यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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