चंडीगढ़: कई सालों की कोशिशों के बाद पंजाब सरकार आखिरकार ऐसा एंटी-सैक्रिलेज कानून पास करने में सफल हो गई है, जिसमें सिखों के जीवित गुरु माने जाने वाले गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी पर सख्त सजा का प्रावधान है.
सोमवार को पंजाब सरकार ने जागत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) अधिनियम, 2026 को नोटिफाई कर दिया, क्योंकि राज्यपाल ने इस बिल को मंजूरी दे दी. यह मुद्दा पिछले एक दशक से राज्य की राजनीति में छाया रहा, लोगों में गुस्सा पैदा करता रहा और कानून और प्रशासन दोनों की परीक्षा लेता रहा.
पंजाब ने पिछले एक दशक में कम से कम तीन बार सख्त एंटी-सैक्रिलेज कानून लाने की कोशिश की, जिसमें केंद्रीय आपराधिक कानून में बदलाव करना था, लेकिन हर बार असफल रहा.
इस बार सरकार ने तरीका बदला और राज्य कानून का रास्ता अपनाया, ताकि पहले की रुकावटों से बचकर कानून पास किया जा सके. सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी ने इसे “गेम चेंजर” बताया और कहा कि पिछली सरकारें जहां सफल नहीं हो पाईं, वहां यह सरकार सफल हुई है.
पिछले हफ्ते जब पंजाब विधानसभा ने इस बिल को सर्वसम्मति से पास किया, तो यह राजनीतिक जरूरत और कानूनी रणनीति दोनों को दिखाता है, जिसका मकसद पिछली असफलताओं को पार करना था.
सोमवार को दिप्रिंट से बात करते हुए मुख्यमंत्री भगवंत मान ने कहा कि उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि यह कानून उन जरूरी प्रक्रियाओं को पार करे, जहां पहले के एंटी-सैक्रिलेज कानून फंस जाते थे.
अब जब राज्यपाल ने मंजूरी दे दी और सरकार ने आधिकारिक नोटिफिकेशन जारी कर दिया, तो यह कानून लागू हो गया है और फिलहाल राज्य में गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी से जुड़े मामलों में यही कानून लागू होगा.
यह पिछले दशक के पैटर्न से अलग है, जब अलग-अलग सरकारों की कोशिशें या तो लौटा दी गईं, रोक दी गईं या राष्ट्रपति के पास लंबित रह गईं.
इसके विपरीत, यह कानून इस बार उस स्तर पर रुका नहीं और तुरंत लागू हो गया, जिससे इसे कानूनी ताकत मिली है. मुख्यमंत्री मान ने इसे देश के सबसे सख्त कानूनों में से एक बताया है.
यह संशोधन जानबूझकर ऐसा बनाया गया है ताकि पहले वाली प्रक्रिया से बचा जा सके.
एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने कहा कि केंद्रीय आपराधिक कानून में बदलाव करने के बजाय राज्य के मौजूदा कानून में संशोधन करके इसे गुरु ग्रंथ साहिब की सुरक्षा और प्रबंधन से जुड़ा कानून बनाया गया है, न कि भारतीय न्याय संहिता, 2023 से टकराव वाला.
उन्होंने यह भी कहा कि यह सिर्फ एक और कानून नहीं है, बल्कि सोच-समझकर किया गया कदम है, जिसमें सख्त सजा, प्रशासनिक बदलाव और कानूनी संतुलन शामिल है, ताकि पहले जैसी रुकावटें न आएं.
मुख्यमंत्री मान के लिए यह कानून इसलिए अहम है क्योंकि अब ध्यान इरादे से हटकर लागू करने पर आ गया है.
उन्होंने कहा, यह बदलाव सिर्फ प्रक्रिया का नहीं है. अब कानून लागू हो चुका है, इसलिए बात इरादे से आगे बढ़कर लागू करने की हो गई है.
उन्होंने कहा कि 2015 में हुई बेअदबी की घटनाओं के बाद पहली बार पंजाब में ऐसा राज्य कानून लागू हुआ है, जिसमें सख्त सजा का प्रावधान है, जिसमें उम्रकैद तक की सजा शामिल है, और जांच, हिरासत और मुकदमे की पूरी व्यवस्था तय की गई है.
हालांकि, इससे सभी कानूनी सवाल पूरी तरह खत्म नहीं होते.
क्योंकि आपराधिक कानून समवर्ती सूची में आता है, इसलिए आगे चलकर अदालत में चुनौती या केंद्रीय कानून से टकराव जैसे सवाल उठ सकते हैं.
लेकिन फिलहाल सरकार वहां सफल हुई है, जहां पिछली सरकारें नहीं हो पाईं और एक राजनीतिक मांग को कानून में बदल दिया है.
सजा का अलग-अलग स्तर
2008 का मूल कानून ज्यादा रेगुलेटरी था, जिसका मकसद गुरु ग्रंथ साहिब की छपाई और वितरण को शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अलावा किसी और द्वारा रोकना था. 2026 का संशोधन इसे सजा देने वाला कानून बना देता है, ताकि कोई भी बेअदबी करने से डरे.
2008 का कानून जून में तब लागू हुआ था जब राज्य में शिरोमणि अकाली दल और बीजेपी की सरकार थी. इसमें सिर्फ यह प्रावधान था कि एसजीपीसी के अलावा कोई गुरु ग्रंथ साहिब की छपाई या वितरण नहीं कर सकता.
इस कानून में सजा सिर्फ दो साल की जेल और जुर्माना था, वह भी छपाई या वितरण के मामले में. नए संशोधन में बेअदबी को शामिल किया गया है और सख्त सजा का प्रावधान किया गया है.
अब किसी भी तरह की बेअदबी, जिसमें नुकसान पहुंचाना, अपमान करना, चोरी करना, खराब करना या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से अपमानजनक दिखाना शामिल है, पर कम से कम 7 साल से लेकर 20 साल तक की जेल और 2 लाख से 10 लाख रुपये तक का जुर्माना होगा.
अगर यह अपराध समाज में तनाव या शांति भंग करने के इरादे से किया गया हो, तो सजा कम से कम 10 साल से लेकर उम्रकैद तक हो सकती है और 5 लाख से 25 लाख रुपये तक का जुर्माना होगा.
यह कानून पहले के मुकाबले आगे बढ़कर साजिश और उकसाने को भी मुख्य अपराध जैसा मानता है, और कोशिश करने पर भी 3 से 5 साल की सजा का प्रावधान है.
इस कानून के तहत सभी अपराध संज्ञेय, गैर-जमानती और गैर-समझौता योग्य होंगे, और इनकी सुनवाई सेशन कोर्ट में होगी.
जांच डीएसपी रैंक से नीचे का अधिकारी नहीं करेगा, जिससे यह दिखता है कि मामले को गंभीरता से लिया जाएगा और जिम्मेदारी तय होगी.
हिरासत की जिम्मेदारी
संशोधन में एक नया ढांचा भी जोड़ा गया है, जिस पर ज्यादा ध्यान नहीं गया है. यह है हिरासत की जिम्मेदारी की व्यवस्था.
कानून में “कस्टोडियन” यानी संरक्षक को वह व्यक्ति या संस्था माना गया है जो गुरु ग्रंथ साहिब के सरूप की देखभाल करता है. उस पर यह कानूनी जिम्मेदारी होगी कि वह इसकी सुरक्षा करे और किसी नुकसान या बेअदबी की घटना की जानकारी दे.
बिल पेश करते समय मुख्यमंत्री मान ने कहा था कि पहले कई मामलों में आरोपी लोग मानसिक अस्थिरता का बहाना बनाकर बच जाते थे.
संशोधित कानून इस समस्या को दूर करने की कोशिश करता है. इसमें जिम्मेदारी बढ़ाई गई है. अब बेअदबी के आरोपी व्यक्ति के अभिभावक या संरक्षक को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है. इसका मकसद पागलपन के बचाव के गलत इस्तेमाल को रोकना है.
इसके अलावा एसजीपीसी को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वह सभी सरूप का एक केंद्रीकृत डिजिटल और फिजिकल रजिस्टर रखे. इसमें छपाई, भंडारण, वितरण और संरक्षक की पूरी जानकारी होगी.
कानून में शब्दों को भी बदला गया है. “बीर” की जगह अब “सरूप” शब्द इस्तेमाल किया गया है, ताकि धार्मिक भाषा के अनुसार हो.
सबसे अहम बात यह है कि अब बेअदबी की परिभाषा में इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल माध्यम से किए गए काम भी शामिल हैं. इसमें सोशल मीडिया और एआई से बने कंटेंट भी आते हैं, जिस पर एसजीपीसी पहले से चिंता जताता रहा है.
आप सरकार का यह कदम उस समय आया है जब नौ महीने पहले इसी तरह का एक बिल, ‘पंजाब प्रिवेंशन ऑफ ऑफेंसेज अगेंस्ट होली स्क्रिप्चर्स बिल, 2025’, सुझाव लेने के लिए विधायकों की सेलेक्ट कमेटी को भेजा गया था.
उस बिल में भी गुरु ग्रंथ साहिब सहित सभी पवित्र ग्रंथों की बेअदबी पर सख्त सजा का प्रस्ताव है.
इस संशोधन के समय और तरीके को लेकर विपक्ष ने सवाल उठाए. उन्होंने पूछा कि जब सभी धार्मिक ग्रंथों पर कानून बनाने वाला बिल पहले से सेलेक्ट कमेटी में है, तो 2008 के कानून में बदलाव क्यों किया जा रहा है. कांग्रेस के नेता प्रताप सिंह बाजवा ने विधानसभा में पूछा कि उस सेलेक्ट कमेटी की कार्रवाई का क्या हुआ. क्या उसे बंद कर दिया गया है.
बेअदबी की राजनीति
इस संशोधित कानून को 2015 की घटनाओं के बिना समझा नहीं जा सकता. उस समय फरीदकोट जिले में बेअदबी की घटनाओं के बाद बड़े पैमाने पर विरोध हुआ था. इसके बाद बेहबल कलां और कोटकपूरा में पुलिस फायरिंग हुई. इन घटनाओं ने पंजाब की राजनीति को बदल दिया.
तब से बेअदबी एक बड़ा चुनावी मुद्दा बना हुआ है. कांग्रेस ने 2017 में अकाली-बीजेपी सरकार को हटाने के लिए इसे मुद्दा बनाया. आप ने 2022 में फिर इसे उठाया.
कई जांच होने के बाद भी यह मुद्दा राजनीति में बना हुआ है.
पिछले हफ्ते विधानसभा के विशेष सत्र में भी जब इस कानून पर चर्चा हुई, तो 2015 के मामलों की जांच को लेकर आरोप-प्रत्यारोप होते रहे.
कांग्रेस नेताओं ने कहा कि आप ने न्याय दिलाने का वादा किया था, लेकिन वह पूरा नहीं हुआ. वहीं आप नेताओं ने कहा कि कांग्रेस 2017 में सत्ता में आने के बाद भी दोषियों को सजा नहीं दिला सकी.
पहले भारतीय दंड संहिता की धारा 295 और 295ए धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाले मामलों पर लागू होती थीं.
अब भारतीय न्याय संहिता लागू होने के बाद ऐसे मामलों को धारा 298 और 299 के तहत रखा गया है.
धारा 298 में किसी भी व्यक्ति को, जो किसी धर्म का अपमान करने के इरादे से पूजा स्थल या पवित्र चीज को नुकसान पहुंचाता है, दो साल तक की सजा या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं.
धारा 299 में किसी व्यक्ति को, जो जानबूझकर किसी धर्म या धार्मिक मान्यता का अपमान करता है, तीन साल तक की सजा या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं.
धारा 298, आईपीसी की धारा 295 जैसी है और धारा 299, आईपीसी की धारा 295ए जैसी है.
पिछले कुछ सालों से पंजाब में बेअदबी के सबसे ज्यादा मामले दर्ज हुए हैं. एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार 2018 से 2020 के बीच इस तरह के मामलों में पंजाब की दर सबसे ज्यादा रही.
2018 में यह दर 0.7 प्रतिशत थी, जबकि दूसरे राज्यों में यह 0.1 से 0.4 प्रतिशत के बीच थी. 2019 में पंजाब में यह 0.6 प्रतिशत और 2020 में 0.5 प्रतिशत रही.
2017 में जब पहली बार ऐसे आंकड़े जारी किए गए, तब गोवा में यह दर सबसे ज्यादा 0.8 प्रतिशत थी और पंजाब दूसरे नंबर पर 0.6 प्रतिशत के साथ था. 2017 से 2020 के बीच पंजाब में ऐसे कुल 721 मामले दर्ज हुए.
पंजाब ने पिछले एक दशक में कम से कम तीन बार केंद्रीय कानून में बदलाव करके सख्त एंटी-सैक्रिलेज कानून बनाने की कोशिश की.
2016 में अकाली-बीजेपी सरकार और 2018 में कांग्रेस सरकार ने आईपीसी में बदलाव करके उम्रकैद की सजा जोड़ने की कोशिश की, लेकिन दोनों प्रयास असफल रहे.
एक प्रस्ताव को राष्ट्रपति ने “कानून के हिसाब से ज्यादा सख्त” बताकर वापस कर दिया, जबकि दूसरा कई साल तक लंबित रहने के बाद खत्म हो गया.
इस संशोधन की एक खास बात यह भी है कि यह सिर्फ गुरु ग्रंथ साहिब पर केंद्रित है, जबकि 2025 का बिल सभी धार्मिक ग्रंथों जैसे गीता, कुरान और बाइबल को शामिल करना चाहता है. यह फर्क जानबूझकर रखा गया है.
सिख धार्मिक संस्थाएं लंबे समय से कहती रही हैं कि गुरु ग्रंथ साहिब एक जीवित गुरु है और उसकी अलग पहचान है, इसलिए कानून में भी इसे अलग तरीके से देखा जाना चाहिए.
इस संशोधन में उसी मांग को ध्यान में रखा गया है.
एसजीपीसी के अध्यक्ष हरजिंदर सिंह धामी ने पिछले महीने सिख विद्वानों की बैठकों में कहा था कि गुरु ग्रंथ साहिब और बाकी धार्मिक ग्रंथों में फर्क है. उन्होंने इसे सिख गुरुओं द्वारा दिया गया हमेशा जीवित गुरु बताया और कहा कि इसकी पवित्रता, सम्मान और सर्वोच्च स्थान को बनाए रखना सबसे जरूरी है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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