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Tuesday, 16 July, 2024
होममत-विमत‘क्या बांग्लादेश सेक्युलर है?’ 1971 के युद्ध में हिंदू नरसंहार का 'ज़िक्र' न होना डॉक्युमेंट्री पर सवाल उठाता है

‘क्या बांग्लादेश सेक्युलर है?’ 1971 के युद्ध में हिंदू नरसंहार का ‘ज़िक्र’ न होना डॉक्युमेंट्री पर सवाल उठाता है

'बे ऑफ ब्लड' दर्शकों को अपनी तरफ खींचने वाली डॉक्युमेंट्री है, लेकिन अधूरी है. यह 1971 के युद्ध के दौरान पूर्वी पाकिस्तान में हुए हिंदुओं की टारगेटेड हत्याओं जैसे पहलू को नज़रअंदाज़ करती है.

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कोलकाता: फ़िल्म निर्माता कृष्णेंदु बोस मार्च 1971 में 10 साल के थे, जब तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति याह्या खान ने ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ शुरू किया था, जो एक ऐसा क्रूर सैन्य अभियान था, जिसमें भाषा, संस्कृति और पहचान पर पश्चिमी पाकिस्तान के आधिपत्य के खिलाफ़ पूर्वी पाकिस्तान के विद्रोह को कुचलने के लिए बलात्कार, यातना और हत्या का इस्तेमाल किया गया था.

उस समय पूर्वी पाकिस्तानियों का प्रतिरोध का नारा ‘जॉय बांग्ला’ था, जिसका अर्थ बंगाल की जीत है, लेकिन युवा बोस को इसके महत्व का कोई अंदाज़ा नहीं था. उन्हें लगा कि हर कोई कंजंक्टिवाइटिस के बारे में बात कर रहा है, जिसे कई बंगाली ‘जॉय बांग्ला’ भी कहते हैं.

बोस ने 14 जून को बांग्लादेश उप उच्चायोग द्वारा कोलकाता के नंदन सांस्कृतिक केंद्र में आयोजित अपनी 95 मिनट की डॉक्यूमेंट्री बे ऑफ ब्लड की विशेष स्क्रीनिंग में कहा, “मैं एक घोटी हूं (बंगाल के पश्चिमी हिस्से से, जिसने विभाजन का दंश नहीं झेला) और दिल्ली में पला-बढ़ा हूँ. मुझे लगा कि जॉय बांग्ला का मतलब आंखों की बीमारी है. बहुत बाद में मुझे पता चला कि यह युद्ध की पुकार थी जिसने उस राष्ट्र को जन्म दिया जिसे हम अब बांग्लादेश के नाम से जानते हैं.”

पिछले साल रिलीज़ हुई बे ऑफ ब्लड में इतिहासकारों, युद्ध नायकों, सेना के दलबदलुओं और बलात्कार पीड़ितों के साथ साक्षात्कारों की एक श्रृंखला के माध्यम से 1971 में बांग्लादेश के खूनी जन्म की पीड़ा को दर्शाया गया है.

बोस ने अपने बचपन की अज्ञानता को याद करते हुए कहा, “यह सिर्फ़ मेरे साथ नहीं हुआ. जब हमने कान्स में अपनी फिल्म दिखाई, तो बहुत कम लोगों को पूर्वी पाकिस्तान में हुए नरसंहार के बारे में पता था.”

कोलकाता में 'बे ऑफ ब्लड' की स्क्रीनिंग के दौरान निर्देशक कृष्णेंदु बोस बोलते हुए | फोटो: दीप हलदर | दिप्रिंट
कोलकाता में ‘बे ऑफ ब्लड’ की स्क्रीनिंग के दौरान निर्देशक कृष्णेंदु बोस बोलते हुए | फोटो: दीप हलदर | दिप्रिंट

बांग्लादेशी अधिकारियों के अनुमान के अनुसार, 1971 के युद्ध के दौरान लगभग 30 लाख लोग मारे गए, लाखों महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया और करोड़ों लोग विस्थापित हुए. लेकिन बे ऑफ ब्लड भी ऑपरेशन सर्चलाइट की पूरी कहानी नहीं बताता है. यह पूर्वी पाकिस्तान में याह्या खान की सेना और अर्धसैनिक सहयोगियों द्वारा अल्पसंख्यक हिंदुओं के नरसंहार को नजरअंदाज करता है. यह एक ऐसी त्रासदी थी जिसकी अनुगूँज आज भी बढ़ते इस्लामी कट्टरवाद और अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों में सुनाई पड़ती है.

क्रिकेट बैट पर एक स्टिकर और एक गाना

बे ऑफ ब्लड 1971 की भयावहता को उन लोगों के साथ साक्षात्कार की एक श्रृंखला के माध्यम से उजागर करता है जो बांग्लादेश के जन्म की कहानी को करीब से जानते हैं.

इनमें उस अवधि पर लेखक सलिल त्रिपाठी के एक निर्णायक कार्य, द कर्नल हू वुड नॉट रिपेंट; सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट कर्नल काजी सज्जाद अली जहीर, जो रणनीतिक सैन्य तैनाती मानचित्रों के साथ पाकिस्तानी सेना से अलग हो गए और भारत के साथ सेना में शामिल हो गए; एक शिक्षाविद और अधिकार कार्यकर्ता जिन्होंने ढाका में एक छोटी लड़की के रूप में पाकिस्तानी सेना द्वारा अपने पिता की हत्या देखने वाले मेघना गुहाठाकुर्ता शामिल हैं.

लेकिन सबसे दिलचस्प कहानियों में से एक है क्रिकेट बैट पर लगे स्टिकर की, जिसने क्रांति की चिंगारी जलाई.

26 फरवरी 1971 को, 18 वर्षीय रकीबुल हसन, जो पाकिस्तान क्रिकेट टीम के एकमात्र पूर्वी पाकिस्तानी थे, ने अपने बैट पर ‘जॉय बांग्ला’ शब्दों वाला स्टिकर लगाया. जब वे ढाका के बंगबंधु स्टेडियम में कॉमनवेल्थ टीम के खिलाफ बल्लेबाजी करने उतरे, तो भीड़ ने जॉय बांग्ला के नारे लगाए, जिससे चार दिवसीय मैच फीका पड़ गया.

मैच कभी पूरा नहीं हुआ. ढाका में पाकिस्तान के खिलाफ और बंगाली भाषियों के लिए एक नए राष्ट्र के पक्ष में प्रदर्शन हुए. और युवा हसन- जिन्होंने डॉक्यूमेंट्री में विस्तार से बात की- ने अपने लोगों की मुक्ति के लिए लड़ने के लिए अपने क्रिकेट बैट को स्टेन गन से बदल दिया.

और अगर क्रिकेट बैट पर लगे स्टिकर ने क्रांति की शुरुआत को चिह्नित किया, तो डॉक्यूमेंट्री में बताया गया है कि कैसे एक गीत ने पूरी दुनिया का ध्यान पूर्वी पाकिस्तान की ओर खींचा.

A photo from the Concert for Bangla Desh | Wikimedia Commons
बांग्लादेश के लिए हो रहे कॉन्सर्ट की फोटो । विकीमीडिया कॉमन्स

1971 की शुरुआत में एक डिनर पार्टी में सितार वादक रविशंकर ने अपने करीबी दोस्त जॉर्ज हैरिसन को भारत की सीमा के पार पूर्व में हुए नरसंहार के बारे में बताया था. शंकर ने अपने दोस्त को यह दिखाने के लिए समाचार लेख और पत्रिका की कटिंग निकाली कि उनका दिमाग क्यों फटा जा रहा था. इसने बड़ा प्रभाव डाला.

जून 1971 के अंत तक, हैरिसन फंड जुटाने और दुनिया को बांग्लादेश के बारे में बताने के लिए एक लाभप्रद कॉन्सर्ट आयोजित करने में व्यस्त हो गए. यह आयोजन न्यूयॉर्क के प्रतिष्ठित मैडिसन स्क्वायर गार्डन में हुआ था, और प्रदर्शन करने के लिए सितारों से सजी एक लाइनअप बनाई गई थी.

शंकर और हैरिसन ने जोर देकर कहा कि यह कॉन्सर्ट राजनीतिक नहीं था, लेकिन आरोप-प्रत्यारोप का खेल शुरू हो गया. तब अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर भड़क गए. निक्सन ने कथित तौर पर कॉन्सर्ट के लिए आने वाले फंड पर एक निजी बातचीत में कहा, “गॉडडैम इंडियंस!”

1 अगस्त 1971 को मैडिसन स्क्वायर गार्डन में दो कॉन्सर्ट आयोजित किए गए. कलाकारों में रविशंकर, अली अकबर खान, अल्ला रक्खा, कमला चक्रवर्ती, जॉर्ज हैरिसन, रिंगो स्टार, एरिक क्लैप्टन, बॉब डायलन, बिली प्रेस्टन, लियोन रसेल और बैंड बैडफिंगर शामिल थे.

40,000 से अधिक लोग इसमें शामिल हुए और करीब 250,000 डॉलर जुटाए गए.

और दुनिया बांग्लादेश के बारे में जानती थी. लेकिन अब भी, कहानी का एक बड़ा हिस्सा अंधेरे में ही है.

एक असुविधाजनक सच्चाई

कोलकाता में बे ऑफ ब्लड की विशेष स्क्रीनिंग, जिसमें ज़्यादातर पत्रकार, सिनेप्रेमी और इतिहास के शौकीन शामिल हुए, में कुछ तनावपूर्ण क्षण देखने को मिले. दर्शकों में से कुछ ने निर्देशक कृष्णेंदु बोस से कठिन सवाल पूछे.

एक व्यक्ति ने पूछा, “क्या बांग्लादेश आज एक धर्मनिरपेक्ष देश है, जैसा कि आपने अपनी डॉक्यूमेंट्री में बताया है?” इसके तुरंत बाद एक और सवाल आया: “बांग्लादेश में हिंदू कैसे हैं?”

कोलकाता में 14 जून को ‘बे ऑफ ब्लड’ की स्क्रीनिंग में मौजूद दर्शक | फोटो: दीप हलदर | दिप्रिंट

बोस का संक्षिप्त जवाब कि किसी मुद्दे पर “कई दृष्टिकोण” हो सकते हैं, दर्शकों के उत्तेजित सदस्यों को संतुष्ट नहीं कर पाया.

बे ऑफ ब्लड 1971 की कहानी के एक पहलू को वास्तव में नहीं दिखा पाता: पूर्वी पाकिस्तान के हिंदुओं का चुन-चुन कर नरसंहार.

अमेरिकी पत्रकार और शिक्षाविद गैरी जे बास ने अपनी 2013 की किताब द ब्लड टेलीग्राम में ढाका में तत्कालीन अमेरिकी महावाणिज्यदूत आर्चर ब्लड का हवाला देते हुए दिखाया है कि पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी पाकिस्तान में हिंदू समुदाय को व्यवस्थित रूप से निशाना बनाया जबकि निक्सन प्रशासन ने इसे रोकने के लिए कुछ नहीं किया. लेकिन बे ऑफ ब्लड इस पर विस्तार से बात नहीं करता.

डॉक्यूमेंट्री में एक और प्रमुख तत्व गायब है रजाकार और अल-बद्र – पूर्वी पाकिस्तान के भीतर अर्धसैनिक बल जिसने बलात्कार और हत्या के अपने अभियान में, विशेष रूप से हिंदुओं के खिलाफ़, पश्चिमी पाकिस्तानी सेना की सक्रिय रूप से सहायता की – की भूमिका.

पिछले अगस्त में, एक सजायाफ्ता युद्ध अपराधी और रजाकार डेलवर हुसैन सईदी की मौत से उसके सैकड़ों समर्थक शोकग्रस्त होकर सड़कों पर उतर आए, जिससे बांग्लादेश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने की असलियत उजागर हुई. और हिंदुओं पर लगातार हमले बताते हैं कि बांग्लादेश में संकट अभी खत्म नहीं हुआ है और बे ऑफ ब्लड अंततः एक अधूरी कहानी है, भले ही इसे अच्छी तरह से बताया गया हो.

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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