नई दिल्ली: शेख इरशाद मंसूरी गुरुग्राम की एक कंपनी में अकाउंट्स मैनेजर हैं. सोमवार सुबह वह पहली बार जंतर-मंतर पहुंचे थे. वह उन हजारों लोगों में शामिल थे, जो सोनम वांगचुक और कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के आह्वान पर 18वीं सदी की इस यूनेस्को धरोहर स्थल पर पहुंचे थे.
उस दिन बाद में क्या हुआ, इसे याद करते हुए इरशाद ने अपने एक परिवार के सदस्य से कहा, “मैं और कई लोग हाथ जोड़कर उनसे (सुरक्षा बलों से) कह रहे थे कि प्लीज़ हमारे ऊपर हथियार मत चलाइए. हम युवा हैं और सिर्फ शिक्षा को लेकर अपनी मांग उठा रहे हैं.”
परिवार के सदस्य ने दिप्रिंट को बताया कि इसके बाद इरशाद को बस इतना याद है कि उनकी बाईं आंख से खून बहने लगा. कुछ ही सेकंड में चोट ठुड्डी के नीचे, कंधे और सीने तक फैल गई. मध्य प्रदेश के रहने वाले 25 साल के इरशाद को तुरंत पास के लेडी हार्डिंग अस्पताल ले जाया गया, जहां उनका इलाज चल रहा है. वहीं उन्हें बताया गया कि उन्हें पैलेट गन लगी थी.
उनके इलाज से जुड़े एक सूत्र ने कहा, “मंगलवार को उनकी गर्दन और आंख की दो सर्जरी की गईं, जिनमें शरीर से पैलेट के टुकड़े निकाले गए.”
इरशाद उन 70 से ज्यादा लोगों में शामिल हैं, जो उस समय घायल हुए जब दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) ने ‘चलो संसद’ मार्च में शामिल होने के लिए मध्य दिल्ली की सड़कों पर उतरे हज़ारों लोगों को हटाने के लिए बल प्रयोग किया. प्रदर्शनकारियों के साथ हुई झड़प में 100 से ज्यादा सुरक्षाकर्मी भी घायल हुए.
हालांकि, दिल्ली पुलिस ने 20 जुलाई की कार्रवाई के दौरान पैलेट गन इस्तेमाल करने से इनकार किया है. वैसे भी पैलेट गन दिल्ली पुलिस के हथियारों का हिस्सा नहीं है, लेकिन पैलेट गन अब भी आरएएफ के हथियारों में शामिल है.
दिप्रिंट ने सीआरपीएफ के प्रवक्ता और इंस्पेक्टर जनरल (आरएएफ) सीमा धुंधिया से फोन और व्हाट्सएप के जरिए कई बार संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन खबर लिखे जाने तक कोई जवाब नहीं मिला. आरएएफ, सीआरपीएफ की दंगा-रोधी इकाई है.
करीब 2010 में जम्मू-कश्मीर में भीड़ को नियंत्रित करने के लिए राज्य पुलिस और सीआरपीएफ ने पैलेट गन का इस्तेमाल शुरू किया था. कई दर्ज मामलों में इससे लोगों की आंखों की रोशनी चली गई. 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा था कि सुरक्षा बल पैलेट गन चलाने से पहले सोच-समझकर फैसला लें. अगले साल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि भीड़ को नियंत्रित करने के दौरान पैलेट गन का इस्तेमाल “आखिरी विकल्प” के तौर पर किया जाता है.
अब तक ‘चलो संसद’ मार्च में किसी प्रदर्शनकारी के पैलेट लगने का पहचान के साथ सामने आया यह एकमात्र मामला है. हालांकि, सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो से संकेत मिलते हैं कि और भी प्रदर्शनकारी पैलेट की चपेट में आए हो सकते हैं.
इरशाद ने परिवार के सदस्य से कहा, “मैंने देखा कि नीली वर्दी वाला जवान (आरएएफ) मेरी तरफ हथियार ताने खड़ा था. मुझे लगा कि वह सिर्फ ऐसे ही खड़ा है और गोली नहीं चलाएगा. तभी अचानक एक चीज़ मेरी बाईं भौंह से टकराई और फट गई. मुझे उसके छोटे-छोटे कण अपने चेहरे, दाईं तरफ ठुड्डी के नीचे और गर्दन पर महसूस हुए.”
इरशाद ने यह भी कहा कि जैसे ही उन्हें चोट लगी, उनका बहुत ज्यादा खून बहने लगा और वह “स्थिति को समझने की क्षमता” खो बैठे.
परिवार को नहीं पता था कि इरशाद प्रदर्शन में गया था
जबलपुर जिले के पाटन उपखंड में रहने वाले एक किसान के बेटे शेख इरशाद मंसूरी पिछले दो साल से दिल्ली-एनसीआर में रह रहे हैं. उनके बड़े भाई शेख मुस्तफा मंसूरी ने बताया कि परिवार को यह नहीं पता था कि वह जंतर-मंतर पर प्रदर्शन में जाने वाला है.
मुस्तफा ने दिप्रिंट से फोन पर कहा, “सोमवार शाम को हमेशा की तरह हमारी रोज की बात हुई थी. कुछ दिन पहले मेरे पिता वहां गए थे और मेरे भाई (इरशाद) के किराए के घर में रह रहे हैं. मैं वहां नहीं जा सका और मेरे पिता को स्मार्टफोन चलाना नहीं आता, इसलिए वह दिल्ली में बेबस हैं.”
पहले जिन परिवार के सदस्य का जिक्र किया गया था, उन्होंने बताया कि इलाज के दौरान इरशाद ने खुद अपने पिता को अस्पताल आने से मना किया.
इरशाद ने परिवार के सदस्य से कहा, “अब मैं ठीक हो रहा हूं और खतरे से बाहर हूं. मुझे इस हालत में देखकर उनकी सेहत पर बुरा असर पड़ेगा.” परिवार के सदस्य ने बताया कि 25 वर्षीय इरशाद की गर्दन और दाईं आंख पर टांके लगे हैं, लेकिन इन चोटों का उनकी आंखों की रोशनी या कुल मिलाकर सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा है. अस्पताल के एक सूत्र ने भी दिप्रिंट से पुष्टि की, “उनके सभी जरूरी स्वास्थ्य संकेत सामान्य हैं और वह अच्छी तरह ठीक हो रहे हैं.”
दिप्रिंट ने इस मामले पर प्रतिक्रिया के लिए लेडी हार्डिंग अस्पताल की निदेशक डॉ. हिमानी अहलूवालिया से संपर्क किया. उन्होंने मरीज और डॉक्टर के बीच गोपनीयता का हवाला देते हुए कोई भी जानकारी देने से इनकार कर दिया.
‘मैं फिर जंतर-मंतर लौटूंगा’
घटना को याद करते हुए इरशाद ने परिवार के सदस्य को बताया कि सोमवार सुबह करीब 9 बजे वह केरल भवन के बाहर थे. इसके बाद वह “अपने निजी काम” से झंडेवालान गए. जंतर-मंतर लौटते समय उन्हें पैलेट लगे.
इरशाद ने परिवार के सदस्य से कहा, “डॉक्टरों को पहले यह पता नहीं था कि पैलेट किस चीज के बने हैं. पहले उन्हें लगा कि यह सिर्फ रबर के हैं. बाद में रिपोर्ट आने के बाद उन्होंने बताया कि यह रबर जैसा है, जिसमें लेड (सीसा) भी मिला हुआ है.”
परिवार के सदस्य ने बताया कि कुछ घंटों के अंदर इरशाद की दो सर्जरी हुईं. डॉक्टरों ने उन्हें बताया कि अब वह खतरे से बाहर हैं और उनके शरीर से पैलेट निकाल दिए गए हैं.
परिवार के सदस्य के मुताबिक, इरशाद को “बिल्कुल भी कोई पछतावा नहीं है.”
इरशाद ने परिवार के सदस्य से कहा, “यह प्रदर्शन युवाओं और उनके भविष्य के लिए था. मुझे नौकरी मिल गई है, लेकिन बात सिर्फ वहीं खत्म नहीं हो जाती. देश के युवाओं को अच्छी शिक्षा और आगे बढ़ने के लिए बेहतर व्यवस्था चाहिए और मैं फिर से उस जगह (जंतर-मंतर) पर लौटूंगा.”
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