नई दिल्ली: दिल्ली के गुरुद्वारा बंगला साहिब में हर थोड़ी देर में सेवादार संगमरमर के फर्श की सफाई करते और बर्तन धोते नज़र आते हैं. यहां दिन-रात लोगों का आना-जाना लगा रहता है. मंगलवार आधी रात को यहां आने वालों में कई स्कूली छात्र और प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले युवा भी थे, जो देश के अलग-अलग हिस्सों से जंतर-मंतर में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रदर्शन में शामिल होने दिल्ली आए थे.
सेवादार इस बात की तैयारी कर रहे थे कि सभी के सोने के लिए साफ जगह हो और लंगर में सभी के लिए पर्याप्त खाना उपलब्ध रहे.
सोमवार को पुलिस कार्रवाई के बाद, शहर के गुरुद्वारों ने सीजेपी समर्थकों के लिए अपने दरवाजे खोल दिए हैं. दिल्ली के बीचों-बीच स्थित बंगला साहिब में समर्थकों के लिए बालकनी, बरामदे और सभी गेस्ट रूम खोल दिए गए हैं, ताकि उन्हें खाना, रहने की जगह और फर्स्ट-एड मिल सके.
कोई भी सेवादार एक मिनट के लिए भी नहीं रुकता. काम लगातार चल रहा है. लोगों के लिए गद्दे चाहिए, गर्म खाना चाहिए और पीने के लिए एक कप चाय भी.

बिहार के छपरा से आए 16 साल के प्रियांशु और 19 साल के सूरज जो आठवीं और नौवीं क्लास के छात्र हैं—बरामदे में बैठे 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान के हालात याद कर रहे हैं, जब सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया और आंसू गैस छोड़ी.
सूरज ने प्रियांशु से कहा, “भाई, क्या दिन था वो.”
इसके बाद सूरज अपनी पैंट ऊपर करके अपने पैरों पर लगी चोटें दिखाते हैं. उनका कहना है कि ये चोटें पुलिस लाठीचार्ज में लगी थीं. घाव अब सूख चुके हैं, लेकिन गुस्सा अभी भी है.
प्रियांशु ने कहा, “बिहार में इतने पेपर लीक हो रहे हैं. बच्चे गुस्से में हैं. हमारा भविष्य अब सुरक्षित नहीं है. हमारे जैसे बहुत लोग बिहार में भी प्रदर्शन कर रहे हैं.”
उन्होंने आगे कहा, “हम घर वापस नहीं जाएंगे. हम यहां इंसाफ लेने आए हैं.”
कई हफ्तों से डटे हुए
देशभर से दिल्ली आए सैकड़ों सीजेपी समर्थक कई हफ्तों से जंतर-मंतर पर डेरा डाले हुए हैं. वे सरकार से जवाबदेही, शिक्षा सुधार और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं.
सोमवार के ‘संसद चलो’ मार्च के बाद जब प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर लौटे, तो उन्होंने देखा कि कई हफ्तों की मेहनत से लगाए गए उनके तिरपाल के टेंट फटे पड़े थे. उनका आरोप है कि बांस के डंडों, गद्दों और चटाइयों से बने ये टेंट पुलिस कार्रवाई के दौरान तोड़ दिए गए.

पुलिस ने कहा कि झड़प के बाद अज्ञात लोगों के खिलाफ 5 से 6 एफआईआर दर्ज की गई हैं. इस झड़प में 100 से ज्यादा प्रदर्शनकारी और 118 पुलिसकर्मी घायल हुए. अपने अस्थायी ठिकाने टूट जाने के बाद कई प्रदर्शनकारियों ने पूरी रात अपना बिखरा सामान ढूंढने और टेंट दोबारा बनाने में बिताई. बारिश शुरू होने पर प्रियांशु और सूरज जैसे कई लोग पास के गुरुद्वारों, मंदिरों और मस्जिदों में चले गए.
बंगला साहिब, रकाब गंज साहिब और चांदनी चौक के शीश गंज साहिब जैसे गुरुद्वारों में प्रदर्शनकारियों को सोने के लिए गद्दे या चटाई मिल गई.
आखिरकार चैन की नींद
बंगला साहिब में ठहरे प्रदर्शनकारियों में 20 साल के राहुल भाटी भी हैं, जिन्हें नीट मेडिकल एंट्रेंस एग्जाम दूसरी बार देना पड़ा. उनके साथ उनके 22 साल के चचेरे भाई रमेश भाटी भी हैं, जो एसएससी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं. दोनों जोधपुर के रहने वाले हैं. उन्होंने प्रदर्शन में शामिल होने का फैसला किया, लेकिन अपने माता-पिता को इसकी जानकारी नहीं दी.
राहुल ने कहा, “उन्हें चिंता तो होगी, लेकिन अब मैं और सहन नहीं कर सकता. इस साल नीट में मेरे 532 नंबर आए थे, लेकिन री-नीट में 440 नंबर मिले. मेरे पिता किसान हैं और उन्होंने मेरी पढ़ाई पर बहुत पैसा खर्च किया है. मैं सभी छात्रों के अधिकारों के लिए लड़ूंगा. हम इससे बेहतर के हकदार हैं.”
रमेश के लिए सिर्फ नीट-यूजी 2026 का पेपर लीक ही मुद्दा नहीं है. उनका कहना है कि उन्हें सभी सरकारी परीक्षाओं की चिंता है. दोनों ने लंगर खाने के बाद सिर ढककर बर्तन धोए और फिर सोने की तैयारी की.
राहुल ने कहा, “आज का दिन बहुत लंबा था. गुरुद्वारे हमें सुरक्षित जगह दे रहे हैं, जहां हम सो सकें. प्रदर्शन स्थल पर सोना मुश्किल है. पता नहीं पुलिस फिर कोई कार्रवाई कर दे.”
सेवादार बने सहारा
बंगला साहिब के सेवादारों ने बताया कि सोमवार रात ‘संसद चलो’ मार्च के बाद उन्होंने पूरी रात प्रदर्शनकारियों की मदद की और आगे भी करते रहेंगे.
आंगन में पर्दे साफ कर रहे एक सेवादार ने नाम न बताने की शर्त पर दिप्रिंट से कहा, “कल रात गुरुद्वारे में पैर रखने की भी जगह नहीं थी, लेकिन हमें कोई परेशानी नहीं हुई. ये हमारे अपने बच्चे हैं.”
उन्होंने बताया कि सोमवार शाम करीब 4 बजे झड़प में घायल प्रदर्शनकारी गुरुद्वारे पहुंचने लगे.
उन्होंने कहा, “सभी सेवादार और श्रद्धालुओं ने अपना काम छोड़कर सबसे पहले उनकी मदद की. जो भी गुरुद्वारे आता है, उसका खुले दिल से स्वागत किया जाता है. सभी घायलों को प्राथमिक उपचार दिया गया.”
संगमरमर का फर्श साफ कर रहे एक दूसरे सेवादार ने कहा, “रात में प्रदर्शनकारियों को भूख लगी थी. उन्होंने पूरे दिन कुछ नहीं खाया था. हमने खाना पैक करके प्रदर्शन स्थल पर ले जाने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने हमें जाने नहीं दिया. इसके बाद सभी लोग गुरुद्वारे आ गए. सभी ने पेट भरकर खाना खाया. सबके लिए पर्याप्त भोजन था.”
देर रात प्रदर्शनकारियों को गुरुद्वारे में सोने की भी जगह मिली.
एक युवा सेवादार ने मंगलवार को कहा, “हमारे पास पर्याप्त गद्दे, तकिए और चटाइयां हैं, ताकि सभी लोग आराम से रह सकें. अब भी प्रदर्शनकारियों को जो भी ज़रूरत होगी, हम उसे पूरा करने के लिए तैयार हैं. गुरुद्वारे हमेशा सभी की मदद के लिए होते हैं, खासकर हमारे बच्चों के लिए. कल बहुत से बच्चे घायल हो गए थे. उन्हें उस हालत में देखकर बहुत दुख हुआ.”

हेमकुंड फाउंडेशन के हरतीर्थ सिंह आहलूवालिया ने दिप्रिंट से कहा कि दिल्ली के गुरुद्वारे सभी प्रदर्शनकारियों और समर्थकों के लिए खुले रहेंगे.
उन्होंने कहा, “हमने अपने स्वयंसेवकों को तैनात किया है. गुरुद्वारा एक सामुदायिक जगह है. यह पहला प्रदर्शन नहीं है जिसमें हमने मदद की है. किसान आंदोलन के दौरान भी हमने सभी की मदद की थी. हमारे लंगर तैयार हैं, कंबल उपलब्ध हैं और लंगर हॉल में सभी के बैठने की व्यवस्था है.”
उन्होंने कहा, “बहुत बरकत है.”
आहलूवालिया ने बताया कि आसपास के गुरुद्वारे भी मदद कर रहे हैं.
उन्होंने कहा, “बहुत से लोग खुद आगे आकर पूछ रहे हैं कि वे कैसे मदद कर सकते हैं. दवाइयां हों, पानी हो, खाना हो या कोई और जरूरत. हमारी तरह कई दूसरी संस्थाएं भी यह सुनिश्चित कर रही हैं कि किसी को खाने की कमी न हो.”
दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के हरमीत सिंह कालका ने दिप्रिंट को बताया कि सभी गुरुद्वारे सभी लोगों के लिए खुले हैं और लंगर में सभी को भोजन दिया जा रहा है.
उन्होंने कहा, “सिख धर्म का नैतिक कर्तव्य है कि हर व्यक्ति की मदद की जाए. जिसे भी रहने की जगह चाहिए, वह गुरुद्वारे आ सकता है. हमने कई घायल प्रदर्शनकारियों को इलाज में भी मदद दी है.”
उन्होंने आगे कहा, “अब जब ज्यादा समर्थक आ रहे हैं, तो हम भोजन और मेडिकल सामान की मात्रा भी बढ़ाएंगे.”
कुछ मस्जिदें भी प्रदर्शनकारियों की मदद के लिए आगे आई हैं.
वकील इमाम और मान सिंह रोड मस्जिद के संरक्षक आसन खान फलाही ने दिप्रिंट से कहा कि मस्जिद में सभी के लिए 24 घंटे पानी की व्यवस्था की गई है.
उन्होंने कहा, “यहां पर्याप्त पानी और शौचालय की सुविधा है. हम धर्म, जाति या लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करते. यहां सभी का स्वागत है.”
खाना, दोस्त और अब एक परिवार
सीजेपी का प्रदर्शन और जंतर-मंतर का प्रदर्शन स्थल अब पहली बार प्रदर्शन में आए लोगों और पहले भी प्रदर्शन कर चुके लोगों के लिए दोस्ती और परिवार जैसा बन गया है.
इस प्रदर्शन में स्कूल के छात्र, कॉलेज के छात्र, नौकरी करने वाले लोग, यहां तक कि माता-पिता और दादा-दादी भी शामिल हैं. सभी एक-दूसरे का ध्यान रख रहे हैं.
इन्हीं में 22 साल के मनीष कुमार भी हैं. हरियाणा के करनाल के रहने वाले मनीष ने बी.कॉम किया है और सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे हैं.
मनीष ने सोशल मीडिया पर एक रील देखी और प्रदर्शन में शामिल होने का फैसला किया. जेब में सिर्फ 400 रुपये थे. वह बस से कश्मीरी गेट पहुंचे और वहां से 7 किलोमीटर पैदल चलकर प्रदर्शन स्थल तक आए.
उन्होंने कहा कि उन्हें यहां और गुरुद्वारे में ऐसे दोस्त मिले हैं, जो ज़िंदगी भर साथ रहेंगे, “मेरे दोस्त मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और असम से हैं. इनमें डॉक्टर, इंजीनियर और बैंक कर्मचारी भी हैं. चाय पर मेरी ऐसे लोगों से बातें हुईं, जिनसे शायद कभी मुलाकात नहीं होती.”
रात में सभी प्रदर्शनकारी छोटे-छोटे समूहों में बैठते हैं और पूरे दिन की घटनाओं पर चर्चा करते हैं—कौन-सी खबर छूट गई, पुलिस ने क्या कार्रवाई की और नेताओं ने क्या कहा.
प्रदर्शन स्थल नहीं छोड़ेंगे
जहां ज्यादातर प्रदर्शनकारी गुरुद्वारों में रुक रहे हैं, वहीं कुछ लोगों ने जंतर-मंतर छोड़ने से साफ इनकार कर दिया है. उन्हें डर है कि अगर जगह खाली छोड़ दी, तो पुलिस फिर आकर उनके टेंट तोड़ सकती है.
इन्हीं में फरीदाबाद के रहने वाले यश भी हैं, जो पिछले 25 दिनों से प्रदर्शन में शामिल हैं.
यश ने कहा, “मैंने अपनी आंखों से देखा कि हमें यहां से हटाया गया. जब हम वापस आए तो हमारे टेंट टूटे हुए थे. गुरुद्वारे से खाना आता है और हम यहीं सबमें बांटते हैं.”
उन्होंने कहा, “लेकिन मैं यहां से नहीं जाऊंगा. मैं यहीं रहूंगा.”
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