20 जुलाई को जंतर-मंतर पर जो हुआ, वह एक बड़ी घटना बन गया. ऐसा लगा कि नरेंद्र मोदी सरकार देशभर में बढ़ रहे प्रदर्शनों से निपटने में असमर्थ दिखी. पूरे भारत से हज़ारों युवा दिल्ली पहुंचे. वे बार-बार हो रहे प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक और सरकार के इसे रोकने में नाकाम रहने के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे. दिल्ली पुलिस और आरएएफ की भारी तैनाती और मजबूत बैरिकेड भी युवाओं को संसद की ओर बढ़ने से नहीं रोक सके.
मई के आखिर में जब कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) अचानक सामने आई, तभी से इस पर सवाल उठने लगे. सीजेपी से जुड़े लोगों की मंशा पर शक जताया गया क्योंकि यह संगठन अचानक सामने आया और इसके प्रमुख लोगों का पहले आम आदमी पार्टी से संबंध रहा था. एक संभावना यह भी बताई गई कि यह आंदोलन सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के समर्थन से शुरू हुआ, ताकि कांग्रेस के पेपर लीक के खिलाफ चल रहे अभियान और उसे मिल रहे समर्थन का असर कम किया जा सके. अब यह शक और मजबूत होता दिख रहा है, क्योंकि सोनम वांगचुक ने दावा किया है कि लद्दाख के उपराज्यपाल ने उन्हें सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके से संपर्क करने के लिए मजबूर किया था.
सीजेपी की मांग सिर्फ शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक सीमित थी. इससे भी यह संकेत मिलता है कि युवाओं के गुस्से को एक तय दिशा में ले जाने और उसे सीमित रखने की कोशिश की गई. साथ ही, उन विपक्षी दलों का असर भी कम करने की कोशिश हुई, जो पूरे देश में रैलियां और प्रदर्शन करके इन मुद्दों को उठा रहे थे और जिन्हें लोगों का अच्छा समर्थन मिल रहा था.
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पहले ही ऐसी दो रैलियां कर चुके हैं. इन रैलियों में बड़ी संख्या में युवा पहुंचे और सरकार की निष्क्रियता के खिलाफ नाराजगी दिखाई. राहुल गांधी ने इन रैलियों में बार-बार हो रहे पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था के गिरते स्तर जैसे मुद्दों को विस्तार से उठाया, जिस पर लोगों का काफी ध्यान गया और उन्हें अच्छा समर्थन मिला. कुछ दिन पहले तक धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की सीजेपी की मांग को ज्यादा समर्थन नहीं मिल रहा था, लेकिन सोनम वांगचुक के लंबे अनशन और संसद मार्च के आह्वान के बाद बड़ी संख्या में युवा देशभर से दिल्ली पहुंचे. इसके बाद आंदोलन का दायरा बढ़ गया. युवाओं को अपनी नाराज़गी जाहिर करने और सरकार के कामकाज से जुड़ी कई समस्याओं और अपनी परेशानियों को खुलकर सामने रखने का मौका मिला.
CJP के नियंत्रण से बाहर
जंतर-मंतर पर जो घटनाएं हुईं और दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ जिस तरह बल का इस्तेमाल किया, उसके बाद यह आंदोलन सीजेपी के नेताओं के नियंत्रण से बाहर चला गया. जिन लोगों ने इसे पर्दे के पीछे से शुरू किया था—ताकि छात्रों में बढ़ती नाराजगी और उसे मिल रहे राजनीतिक समर्थन से लोगों का ध्यान हटाया जा सके, अब वे भी इस आंदोलन पर नियंत्रण में नहीं दिख रहे हैं.
20 जुलाई की घटनाएं बताती हैं कि सरकार के काम न करने के खिलाफ शुरू हुआ यह आंदोलन अब अपने आप बढ़ने वाला आंदोलन बन गया है. इसमें हर वर्ग और हर उम्र के लोग जुड़ रहे हैं और यह पूरे देश में फैल रहा है. अब सोनम वांगचुक और अभिजीत दीपके भी इस आंदोलन में ज्यादा अहम नहीं दिखते. उनके बिना भी सरकार की नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन और तेज होने की संभावना है. खास बात यह रही कि संसद मार्च के दौरान सीजेपी का कोई भी बड़ा नेता दिखाई नहीं दिया.
अगर किसी बड़ी परीक्षा का पेपर एक बार लीक हो जाए, तो उसे व्यवस्था की एक गलती माना जा सकता है, लेकिन जब बार-बार पेपर लीक होने लगें और जिम्मेदार अधिकारी कोई ठोस कदम न उठाएं, तो उनकी मंशा पर सवाल उठते हैं. ऐसे पेपर लीक से योग्य छात्रों का नुकसान होता है और उन लोगों को फायदा मिलता है, जो बड़ी रकम देकर पेपर खरीद सकते हैं. इससे अयोग्य लोगों को फायदा मिलता है और व्यवस्था कमजोर होती है. इससे मेहनत करने वाले छात्रों का मनोबल भी टूटता है. नीट पेपर लीक के बाद 20 से ज्यादा छात्रों की आत्महत्या इसका एक दुखद उदाहरण है.
सोमवार को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन को जिस तरह संभाला गया, उसके बाद समाज के हर वर्ग के लोग इस मुद्दे पर एक साथ आते दिख रहे हैं. सरकार की नीतियों को लेकर लोगों में जो नाराज़गी पहले से थी, वह अब इन प्रदर्शनों के जरिए सामने आ रही है. साथ ही, सरकार जो वादे करती है और उन्हें लागू करने के बीच का फर्क भी लोगों को साफ दिखाई दे रहा है.
जिन नीतियों को लोग गरीब और मध्यम वर्ग के खिलाफ मानते हैं, उनके खिलाफ प्रदर्शन आगे भी जारी रहने की संभावना है.
भारत के दो पड़ोसी देशों नेपाल और बांग्लादेश में भी जेन ज़ी के ऐसे ही आंदोलनों के बाद सरकार बदल गई थी. भारत में ऐसा होना मुश्किल लगता है, क्योंकि देश बहुत बड़ा और विविधता वाला है. फिर भी, मोदी सरकार को बढ़ती बेरोज़गारी, कम और रुकी हुई तनख्वाह, महंगाई, जवाब न देने वाली सरकारी व्यवस्था और सामाजिक भेदभाव जैसे मुद्दों पर जल्द कदम उठाने चाहिए.
आज के युवा बड़े सपने देखते हैं और उनके पास जानकारी आसानी से पहुंचती है. अगर उनकी समस्याओं का जल्द समाधान नहीं किया गया, तो लंबे समय तक अशांति बनी रह सकती है.
संजीव कृष्ण सूद सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक (एडीजी) रहे हैं. उनका एक्स हैंडल @sood_2 है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
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