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Wednesday, 22 July, 2026
होममत-विमतमोदी सरकार को आत्मविश्वास और घमंड में फर्क नहीं दिख रहा

मोदी सरकार को आत्मविश्वास और घमंड में फर्क नहीं दिख रहा

बात अब सिर्फ NEET पेपर लीक की नहीं रही. बात सिर्फ धर्मेंद्र प्रधान की भी नहीं है. इतनी बड़ी भीड़ उन छोटी-छोटी नाराज़गियों का नतीजा है, जो लंबे समय से जमा होती जा रही थीं.

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2016 में आई फिल्म ‘सुल्तान’ में अनुष्का शर्मा का किरदार अपने पहलवान पति सुल्तान जिसका किरदार सलमान खान ने निभाया था—को एक तीखी बात कहती हैं, “मैंने तुझे इज्ज़त कमाने को कहा था. तू तो गुरूर कमा के आ गया सुल्तान.” आज कई भारतीय खुद को इस बात से जोड़कर देख सकते हैं.

सोमवार को सरकार की ताकत साफ दिखाई दी, जब पुलिस ने मेडिकल प्रवेश परीक्षा में हुई गड़बड़ियों के खिलाफ और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर संसद की ओर मार्च कर रहे हज़ारों युवाओं को रोकने के लिए लाठीचार्ज किया और आंसू गैस छोड़ी. तीन हफ्तों से अनशन कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भी इस प्रदर्शन में शामिल नहीं हो सके. उनका कहना था कि उन्हें सफदरजंग अस्पताल में ‘गैरकानूनी हिरासत’ में रखा गया है.

जब हज़ारों छात्र संसद तक पहुंचने के लिए पुलिस की बैरिकेडिंग पार करने की कोशिश कर रहे थे, उसी समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संसद सत्र शुरू होने से पहले अपना तय संबोधन दे रहे थे. उन्होंने वहां से कुछ ही सौ मीटर दूर युवाओं के साथ जो हो रहा था, उसका कोई ज़िक्र नहीं किया. जैसे उनकी कोई अहमियत ही न हो. हैदराबाद की एक कंपनी की ओर से रॉकेट के सफल लॉन्च की तारीफ करते हुए उन्होंने राहुल गांधी पर बिना नाम लिए तंज कसा. उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि 28 साल की औसत उम्र वाले लोगों ने हासिल की है, “किसी 56 साल के नौजवान ने नहीं.” यह बात उस समय के संदर्भ से जुड़ी हुई नहीं थी. यह मज़ाक लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और 56 साल के राहुल गांधी पर था, लेकिन जिस समय राजधानी में छात्रों और युवाओं के खिलाफ सरकार की सख्ती दिखाई दे रही थी, उस समय यह बयान 56 इंच के सीने वाले उस प्रतीक की याद दिलाता था, जिसे एक मजबूत और फैसले लेने वाली सरकार की पहचान बताया जाता है.

मनमोहन सिंह की ‘गलती’?

पहले मैं दूसरी तरफ की दलील रखता हूं. डॉक्टर बनने की तैयारी कर रहे छात्रों और आम युवाओं को यह समझना चाहिए कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी सरकार से जुड़ी किसी भी नकारात्मक बात पर नहीं बोलते. वे पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उस समय की यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी की तरह वही गलती नहीं दोहराना चाहते. उन दोनों ने विपक्ष के दबाव और जनता के गुस्से के आगे आसानी से झुककर कई नेताओं से इस्तीफा लिया था. याद कीजिए, कितने केंद्रीय मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों की कुर्बानी दी गई थी. ऑयल-फॉर-फूड घोटाले के बाद विदेश मंत्री नटवर सिंह ने इस्तीफा दिया. 26/11 मुंबई आतंकी हमले के बाद केंद्रीय गृह मंत्री शिवराज पाटिल को हटाया गया. असल में उनकी आलोचना संकट के दौरान बार-बार कपड़े बदलने को लेकर भी हुई थी. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख को हमले से निपटने में खराब कामकाज के लिए हटाया गया. असल में असली कारण यह था कि क्योंकि उन्होंने हमले के बाद अपने अभिनेता बेटे रितेश देशमुख और फिल्म निर्माता राम गोपाल वर्मा को ताज होटल का दौरा कराया था. देशमुख के बाद मुख्यमंत्री बने अशोक चव्हाण को आदर्श घोटाले के बाद इस्तीफा देना पड़ा. केंद्रीय कानून मंत्री अश्विनी कुमार को CBI जांच में कथित दखल के आरोपों के बाद पद छोड़ना पड़ा. ऐसे कई और उदाहरण भी हैं.

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने एक बार मुझे सोनिया गांधी के साथ हुई अपनी बातचीत के बारे में बताया. उनके मुताबिक, सोनिया गांधी ने माना था कि केंद्रीय मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों से इस्तीफा लेना एक गलती थी, क्योंकि इससे विपक्ष और ज्यादा आक्रामक हो गया. हालांकि, मैं इसे गलती नहीं मानता. लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार को जनता की भावनाओं का जवाब देना चाहिए, चाहे इसके लिए उसे राजनीतिक कीमत ही क्यों न चुकानी पड़े, लेकिन मोदी सरकार साफ तौर पर इसे इस नजरिए से नहीं देखती.

लाखों छात्र और उनके परिवार नीट-यूजी पेपर लीक और दूसरी परीक्षाओं में हुई गड़बड़ियों से गुस्से में होंगे, लेकिन मोदी सरकार शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की उनकी मांग नहीं मानेगी, क्योंकि ऐसा करना उसे अपनी कमजोरी दिखाना लगेगा. आखिर जनता की भावनाओं का सम्मान दिखाने से मनमोहन सिंह सरकार को क्या फायदा हुआ था? इससे लोग और ज्यादा मांग करने लगे. इससे यूपीए सरकार लगातार कमजोर दिखने लगी. अन्ना हजारे के आमरण अनशन को मिले जनता के समर्थन के आगे यूपीए सरकार सिर्फ 12 दिनों में झुक गई और उनकी मांग मान ली. यही आगे चलकर यूपीए सरकार के सत्ता से बाहर होने की नींव बनी. वैसे, क्या आपको आज याद भी है कि लोकपाल मौजूद है या नहीं?

खैर, शायद इसी वजह से मोदी सरकार ने कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रदर्शन और सोनम वांगचुक के तीन हफ्ते लंबे अनशन को स्वीकार तक नहीं किया. जब यह प्रदर्शन संसद के सामने सरकार के लिए परेशानी बनता दिखा, तो पुलिस सोनम वांगचुक को उठाकर अस्पताल ले गई. उनकी पत्नी उन्हें किसी प्राइवेट अस्पताल में ले जाना चाहती हैं, लेकिन अधिकारी इसकी अनुमति नहीं दे रहे हैं.

सोमवार को सरकार साफ तौर पर चौंक गई. शायद उसे उम्मीद नहीं थी कि देशभर से छात्र और युवा सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि हज़ारों की संख्या में राजधानी पहुंचकर वांगचुक और सीजेपी के समर्थन में प्रदर्शन करेंगे. जब पुलिस लाठीचार्ज कर रही थी और आंसू गैस छोड़ रही थी, तब भी युवा प्रदर्शनकारियों का हौसला नहीं टूटा. ऐसे में स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा को सीजेपी के एक प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात करनी पड़ी. इससे पहले मोदी सरकार सिर्फ एक बार झुकी थी, जब दिल्ली की सीमाओं पर किसानों के लंबे आंदोलन के बाद उसे कृषि कानून वापस लेने पड़े थे. अभी यह कहना मुश्किल है कि क्या सरकार को सोमवार का प्रदर्शन चुनावी नज़रिए से इतना बड़ा खतरा लगा है कि वह दूसरी बार भी कोई अपवाद करेगी.

मोदी सरकार को इस पूरे मामले पर दोबारा सोचने की जरूरत है. उसे इन युवा प्रदर्शनकारियों की बात सुननी चाहिए. अब बात सिर्फ नीट पेपर लीक की नहीं रही. बात सिर्फ धर्मेंद्र प्रधान की भी नहीं है. प्रदर्शन में ऐसे किशोर भी शामिल थे, जिन्होंने राजधानी के नामी सरकारी स्कूलों से पढ़ाई की थी और दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिला भी ले लिया था. वे पेपर लीक से प्रभावित नहीं थे, लेकिन वे जंतर-मंतर इसलिए आए क्योंकि उनका कहना था कि यह उनका “नैतिक कर्तव्य” है. सरकार का प्रदर्शन कर रहे छात्रों और सोनम वांगचुक से बात तक न करना ही इन किशोरों और युवाओं के गुस्से की सबसे बड़ी वजह बना. कुछ राजनीतिक दलों से जुड़े छात्र संगठनों ने इस प्रदर्शन का समर्थन किया और कुछ पार्टियां अपने समर्थकों को भी लेकर आईं, लेकिन अगर सरकार दिल्ली की सड़कों पर जुटी इस भीड़ को सिर्फ राजनीतिक विपक्ष का प्रदर्शन मानती है, तो यह उसकी गलती होगी.

अंदर ही अंदर बढ़ रही नाराज़गी

नीट पेपर लीक तो सिर्फ ताजा वजह है. इतनी बड़ी भीड़ दरअसल उन छोटी-छोटी नाराज़गियों का नतीजा लगती है, जो लंबे समय से जमा होती जा रही थीं. जब प्रदर्शनकारी कहते हैं कि सरकार युवाओं से बात ही नहीं करती, तो वे सिर्फ उस व्यवस्था को लेकर अपनी नाराज़गी जाहिर कर रहे हैं, जिसमें उनकी कोई बात नहीं सुनी जाती.

उदाहरण के लिए सीबीएसई स्कूलों में तीन-भाषा नीति को ही देख लीजिए. सरकार के नियम के मुताबिक, छात्रों को दो भारतीय मातृभाषाएं पढ़नी होंगी और अंग्रेज़ी लगभग एक विदेशी भाषा बनकर रह जाएगी. मैंने कई छात्रों और उनके माता-पिता से बात की है. इनमें मोदी समर्थक भी शामिल हैं. वे इस फैसले से नाराज़ हैं. उन्हें लगता है कि यह संस्कृत को बढ़ावा देने और विदेशी भाषाओं को बाहर करने का तरीका है. मान लीजिए, कोई बच्चा दिल्ली के स्कूल में पढ़ता है. वह एक भारतीय भाषा के तौर पर हिंदी और तीसरी भाषा के तौर पर अंग्रेजी चुन सकता है, लेकिन दूसरी भारतीय भाषा के विकल्प बहुत सीमित हैं. छात्र दूसरी भारतीय भाषा के तौर पर कन्नड़, तमिल, तेलुगु, बंगाली, गुजराती या मराठी पढ़ना चाह सकते हैं, लेकिन किसी स्कूल के लिए इन सभी भाषाओं के शिक्षक रखना आसान नहीं होगा. ऐसे में दूसरी भारतीय भाषा की शर्त पूरी करने के लिए संस्कृत का शिक्षक रखना ज्यादा आसान होगा और अगर छात्र और उनके माता-पिता चाहते हैं कि स्कूल में कोई विदेशी भाषा पढ़ाई जाए, तो वे ऐसा नहीं कर सकते, क्योंकि सरकार की नीति इसके लिए गुंजाईश नहीं छोड़ती है.

क्या सरकार ने इन छात्रों और उनके माता-पिता से पूछा कि वे क्या चाहते हैं? नहीं. अगर कोई डॉक्टर बनना चाहता है और लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी में दाखिला लेना चाहता है, तो उसे पहले शाकाहारी बनना होगा क्योंकि उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल शाकाहारी हैं. दूसरी तरफ, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा नेताओं ने खूब नॉन-वेज खाया, लेकिन सत्ता में आने के बाद पार्टी ने सबसे पहले स्कूलों के मिड-डे मील से अंडे हटा दिए. क्या इसके लिए माता-पिता से पूछा गया? नहीं. एक के बाद एक भाजपा शासित राज्य लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर कानून बना रहे हैं. इन कानूनों में रजिस्ट्रेशन नहीं कराने पर जुर्माना और जेल की सजा का प्रावधान है. क्या युवाओं या उनके माता-पिता से पूछा गया कि क्या वे चाहते हैं कि सरकार उनके निजी रिश्तों में दखल दे? नहीं. लोगों की और भी कई शिकायतें हैं. सिर्फ एक उदाहरण लें. सरकार ने अचानक पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने का फैसला कर दिया. इससे लोगों की गाड़ियों का माइलेज कम हो गया है और गाड़ियों को नुकसान पहुंचने का भी खतरा है.

युवाओं की ऐसी बहुत-सी शिकायतें हैं, लेकिन उन्हें सरकार से सिर्फ एक ही जवाब सुनने को मिलता है. “मैं तुम्हारा भला करता हूं. मैं तुम्हारे माता-पिता को मुफ्त राशन देता हूं, मुफ्त इलाज देता हूं, नकद पैसे देता हूं और न जाने क्या-क्या देता हूं. सवाल मत पूछो. हमें पता है कि तुम्हारे लिए क्या अच्छा है. यह मत पूछो कि सरकार तुम्हारे लिए क्या करे, बल्कि यह सोचो कि तुम हमारे लिए क्या कर सकते हो.”

प्रधानमंत्री मोदी को शायद इस तरह के संदेश पर दोबारा सोचने की ज़रूरत है.

डीके सिंह दिप्रिंट के पॉलिटिकल एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @dksingh73 है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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