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Wednesday, 22 July, 2026
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भारत में नागरिक कौन है? इसी जवाब से तय होगा कि किसे अधिकार मिलेंगे

दस्तावेज़ के आधार पर नागरिकता तय करने का विचार लोगों को बाहर करने वाला है और उनके अधिकार सीमित करता है. इसका मकसद चुनावी समीकरण BJP के पक्ष में करना भी बताया जा रहा है.

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पिछले कई महीनों से भारत निर्वाचन आयोग कह रहा है कि सिर्फ वही लोग वोट डाल सकेंगे, जो अपनी भारतीय नागरिकता साबित कर सकेंगे. यह व्यवस्था पहले से ही अपने बुनियादी स्वरूप में बिहार और पश्चिम बंगाल में लागू की जा चुकी है. अब इसे पूरे देश में लागू करने की बात हो रही है. हाल ही में सरकार ने यह भी कहा कि पासपोर्ट सिर्फ यात्रा करने का दस्तावेज़ है, यह भारतीय नागरिकता का सबूत नहीं है. अगर ऐसा है, तो फिर कौन-सा दस्तावेज़ भारतीय नागरिकता का अंतिम और पक्का प्रमाण माना जाएगा?

नागरिकता पर लिखे गए साहित्य के अनुसार, यहां चार अहम सवाल हैं. नागरिकता का मतलब क्या है? क्या नागरिकता तय करने के कई तरीके हैं और भारत इनमें किस मॉडल को अपनाता है? कौन-कौन से दस्तावेज़ नागरिकता साबित करते हैं? और क्या दस्तावेज़ के आधार पर नागरिकता तय करना लोगों को बाहर करने वाला तरीका है, सभी को साथ लेने वाला तरीका है या पूरी तरह तटस्थ है?

नागरिकता पर लिखने वालों में 20वीं सदी की मशहूर राजनीतिक दार्शनिक हन्ना अरेंड्ट का एक प्रसिद्ध वाक्य है. उन्होंने नागरिकता को “अधिकार पाने का अधिकार” कहा था. नागरिकता एक ऐसा बुनियादी अधिकार है, जिसे कानून मान्यता देता है. नागरिक वह व्यक्ति होता है, जिसे कानून किसी राजनीतिक समुदाय का सदस्य मानता है. नागरिक बनने के बाद उसे कई और अधिकार भी मिलते हैं. खासकर लोकतंत्र में, जैसे बोलने का अधिकार, वोट देने का अधिकार, कहीं भी आने-जाने का अधिकार, धर्म मानने का अधिकार, संगठन बनाने का अधिकार और सरकारी योजनाओं का लाभ पाने का अधिकार.

पुराने समय में ऐसा नहीं था. तब लोग नागरिक नहीं, बल्कि राजा की प्रजा होते थे. उनके अधिकार राजा की इच्छा पर निर्भर करते थे. राजा अलग-अलग लोगों को अलग-अलग अधिकार दे सकता था. यानी उस समय अधिकार नागरिकता से नहीं, बल्कि शासक की इच्छा से मिलते थे.

18वीं सदी के आखिर में जब अमेरिका और फ्रांस में क्रांति हुई और राजशाही खत्म हुई, तब पहली बार नागरिकता पर आधारित व्यवस्था शुरू हुई. पश्चिम के दूसरे देशों में भी धीरे-धीरे नागरिकता की व्यवस्था विकसित हुई. भारत में भी अंग्रेज़ों के शासन के दौरान लोग नागरिक नहीं, बल्कि प्रजा थे. करीब 600 रियासतों में भी यही व्यवस्था थी. भारत में नागरिकता का विचार आज़ादी के बाद ही सच में लागू हुआ.

नागरिकता पर लिखे गए साहित्य के अनुसार, नागरिकता तय करने के दो मुख्य तरीके हैं. पहला जस सोली (Jus Soli), यानी जन्म के आधार पर नागरिकता. इसमें व्यक्ति जिस देश में पैदा होता है, वही उसकी नागरिकता का आधार बनता है. इसमें जाति, धर्म, लिंग या नस्ल मायने नहीं रखते. दूसरा जस सैंग्विनिस (Jus Sanguinis), यानी खून या वंश के आधार पर नागरिकता. Jus Soli को अमेरिका में जन्मसिद्ध नागरिकता कहा गया. 1867 में संविधान के 14वें संशोधन के बाद गुलाम रहे लोगों को भी नागरिकता मिली.

विद्वानों के अनुसार, अमेरिका और फ्रांस जन्म के आधार पर नागरिकता वाले देशों के सबसे अच्छे उदाहरण हैं. वहीं जर्मनी और जापान रक्त के आधार पर नागरिकता वाले देशों के उदाहरण माने जाते हैं. जब सोवियत संघ टूटा, तब वहां रहने वाले 10 लाख से ज्यादा जातीय जर्मन, जो सोवियत नागरिक थे, जर्मनी जाकर वहां के नागरिक बन गए. इसी तरह, पेरू के राष्ट्रपति अल्बर्टो फुजीमोरी ने 2000 में अपनी सरकार गिरने के बाद जापान जाकर नागरिकता ले ली, क्योंकि उनके पूर्वज जापानी थे.

अब सवाल है कि भारत किस मॉडल का पालन करता है? नीरजा गोपाल जयाल की किताब “Citizenship and its Discontents: An Indian History” (हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2003) बताती है कि संविधान सभा ने साफ तौर पर जन्म के आधार पर नागरिकता (Jus Soli) को चुना था, न कि वंश के आधार पर नागरिकता (Jus Sanguinis) को. संविधान सभा ने इस सिद्धांत के आधार पर कानून बनाने की जिम्मेदारी संसद को दी. 1955 के मूल नागरिकता कानून में कहा गया कि भारत में जन्म लेने वाला हर व्यक्ति भारतीय नागरिक होगा, जब तक कि वह पाकिस्तान या किसी दूसरे देश की नागरिकता न चुन ले. उस समय कैरेबियन, मलाया, केन्या, युगांडा, दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों को भारतीय नागरिकता नहीं दी गई. उन्हें कहा गया कि वे जिस देश में रहते हैं, वहीं की नागरिकता लें.

1980 के दशक से, खासकर असम आंदोलन के बाद, भारत की नागरिकता व्यवस्था बदलने लगी. अब सिर्फ भारत में जन्म लेना ही नागरिकता के लिए काफी नहीं रहा. नीरजा जयाल लिखती हैं कि “1987 से पहले भारत में जन्म लेने वाला हर व्यक्ति कानूनी रूप से भारतीय नागरिक है, लेकिन 1987 से 2003 के बीच जन्म लेने वालों को तभी नागरिकता मिलेगी, जब उनके कम से कम एक माता या पिता भारतीय नागरिक हों. 2004 के बाद भारत में जन्म लेने वाले ऐसे बच्चों को जन्म से नागरिकता नहीं मिलेगी, जिनके माता-पिता में से एक अवैध प्रवासी हो. असम में बांग्लादेश से आने वाले कई प्रवासी मुसलमान थे. इसलिए ‘अवैध प्रवासी’ की यह श्रेणी, जन्म के आधार पर नागरिकता के सिद्धांत में धर्म के आधार पर एक छिपा हुआ अपवाद बन गई.” दिसंबर 2019 में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) आने के बाद यह प्रक्रिया और आगे बढ़ गई. सीएए में पड़ोसी मुस्लिम बहुल देशों से आए मुस्लिम प्रवासियों को भारतीय नागरिकता देने से बाहर रखा गया, जबकि गैर-मुस्लिम प्रवासियों को नागरिकता पाने का रास्ता दिया गया.

इसी पृष्ठभूमि में आज नागरिकता और वोट देने के अधिकार पर चल रही बहस को समझना चाहिए. यह विवाद नहीं है कि सिर्फ भारतीय नागरिकों को ही वोट देने का अधिकार होना चाहिए. विवाद इस बात पर है कि नागरिकता साबित करने के लिए कौन-कौन से दस्तावेज़ जरूरी होंगे? और अगर किसी का वोट देने का अधिकार चला जाता है, तो क्या उसके सरकारी योजनाओं और दूसरे अधिकारों पर भी असर पड़ेगा?

सही दस्तावेज़ कौन-सा?

भारत में ऐसा कोई एक दस्तावेज़ नहीं है, जो हर व्यक्ति की नागरिकता साबित करता हो. अमेरिका में तीन दस्तावेज़ नागरिकता का प्रमाण माने जाते हैं—जन्म प्रमाण पत्र, पासपोर्ट और नागरिकता प्रमाण पत्र जो उन प्रवासियों को दिया जाता है जो वहां की नागरिकता लेना चाहते हैं.

भारत में अनुमान है कि सिर्फ करीब 8 प्रतिशत लोगों के पास पासपोर्ट है, जबकि अमेरिका में यह संख्या करीब 50 प्रतिशत है. इसलिए भारत में पासपोर्ट को सभी लोगों की नागरिकता का आधार नहीं बनाया जा सकता. वैसे भी सरकार पहले ही कह चुकी है कि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है.

अब बात जन्म प्रमाण पत्र की. यह मामला थोड़ा ज्यादा जटिल है. जितनी ज्यादा उम्र के लोग हैं, उतनी ही संभावना है कि उनका जन्म घर पर हुआ हो और उनके पास जन्म प्रमाण पत्र न हो. हाल के वर्षों में जन्म पंजीकरण और जन्म प्रमाण पत्र बनवाने वालों की संख्या बढ़ी है, लेकिन अमीर और गरीब के बीच बड़ा फर्क अब भी है. उदाहरण के लिए, 2015-16 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (NFHS) के मुताबिक, 5 साल से कम उम्र के 62.3 प्रतिशत बच्चों का जन्म पंजीकरण और जन्म प्रमाण पत्र था, लेकिन सबसे अमीर परिवारों में यह संख्या 82.3 प्रतिशत थी, जबकि सबसे गरीब परिवारों में सिर्फ 40.7 प्रतिशत.

भारत में सबसे ज्यादा गरीब किन समुदायों से आते हैं? जैसा कि सभी जानते हैं, इनमें दलित, निचले ओबीसी और मुसलमान बड़ी संख्या में शामिल हैं. अगर वोट देने के लिए जन्म प्रमाण पत्र को ज़रूरी बना दिया गया तो इन समुदायों के मतदाताओं की संख्या वोटर लिस्ट में कम हो जाएगी. ऊंची जातियों के जिन लोगों के पास दस्तावेज़ नहीं होंगे, वे भी बाहर होंगे, लेकिन उनकी हटाने की संख्या कम होगी.

अब सवाल है कि ये समुदाय वोट किसे देते हैं? अगर 2019 और 2024 के चुनावों के लोकनीति के आंकड़े देखें, तो BJP को वोट देने वालों की तस्वीर कुछ ऐसी है— ऊंची जातियां: 52-53 प्रतिशत, ओबीसी: 42-43 प्रतिशत, दलित: 31-33 प्रतिशत, मुसलमान: 8 प्रतिशत. यानी अगर नागरिकता के दस्तावेज़ों के आधार पर वोटर लिस्ट दोबारा बनाई जाती है, तो चुनावी फायदा BJP को बहुत मिल सकता है. इसका असर सबसे ज्यादा उन समुदायों पर पड़ेगा, जो आम तौर पर BJP को कम वोट देते हैं.

अब Naturalisation (नागरिकता प्राप्त करने) की बात करें, यानी किसी दूसरे देश से आकर भारत की नागरिकता लेना. इसका असर इन सभी समुदायों पर नहीं पड़ेगा, लेकिन मुस्लिम प्रवासियों को इससे बाहर रखा जाएगा. वहीं सीएए के जरिए हिंदू प्रवासियों को भारतीय नागरिकता मिल सकेगी.

अब यह भी देखना चाहिए कि नागरिकता का यह विचार दूसरे अधिकारों को कैसे प्रभावित कर सकता है. उदाहरण के लिए, पश्चिम बंगाल की नई सरकार ने कहा कि अगर आपका नाम वोटर लिस्ट में नहीं है, तो आपका राशन भी बंद कर दिया जाएगा. यही वह बात है, जिसे हन्ना अरेंड्ट ने “दूसरे अधिकार पाने का अधिकार” कहा था. यानी नागरिकता सिर्फ एक अधिकार नहीं है, बल्कि दूसरे अधिकार पाने की भी नींव है.

दस्तावेज़ों के आधार पर नागरिकता तय करने का यह विचार लोगों को नागरिकता से बाहर करने वाला है और उनके अधिकारों को सीमित करता है. साथ ही, इसका मकसद भारत के दिल्ली और 21 राज्यों में सत्ता में मौजूद पार्टी के पक्ष में चुनावी पड़ला भारी करना भी है.

आशुतोष वार्ष्णेय इंटरनेशनल स्टडीज़ और सोशल साइंसेज़ के सोल गोल्डमैन प्रोफेसर और ब्राउन यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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