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Tuesday, 21 July, 2026
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देशों के बीच संबंधों में भरोसे को बढ़ावा देना क्यों जरूरी है?

भारत की विदेश नीति ऐसी साझेदारियों से भरी है जो भरोसे की ज़्यादा व्यावहारिक और यथार्थवादी समझ को दर्शाती हैं.

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दुनिया की राजनीति हाल के समय में लेन-देन वाली कूटनीति के दौर में पहुंच गई है. डॉनल्ड ट्रंप के दोबारा व्हाइट हाउस लौटने के बाद देशों के बीच रिश्ते लंबे समय की प्रतिबद्धताओं के बजाय तुरंत फायदे, सख्त मोलभाव और बराबरी के आधार पर ज्यादा तय होने लगे हैं. लेकिन इससे भी ज्यादा अहम और कम चर्चा वाली बात यह है कि कई रणनीतिक साझेदारियां मुश्किल दौर और मतभेदों के बावजूद बनी हुई हैं. भारत और अमेरिका की साझेदारी इसका एक उदाहरण है.

इन रिश्तों का टिके रहना एक बड़ी सच्चाई दिखाता है. दुनिया के बढ़ते अनिश्चित और अस्थिर माहौल में भरोसा अब भी अंतरराष्ट्रीय रिश्तों का एक अहम आधार बना हुआ है. यही वजह है कि संयुक्त बयानों और आधिकारिक भाषणों में “भरोसा” शब्द बार-बार दिखाई देता है. लेकिन यह भरोसा सिर्फ अच्छे इरादों से नहीं बनता. यह मजबूत वादों, संस्थागत सहयोग, लगातार कामकाजी रिश्तों और दोनों पक्षों को फायदा पहुंचाने वाले सहयोग से बनता है. जब युद्ध, भू-राजनीतिक टकराव और टैरिफ विवाद सबसे करीबी साझेदारों को भी प्रभावित कर रहे हैं, तब भरोसा कोई नैतिक गुण या सिर्फ अच्छे समय की चीज नहीं है. यह एक रणनीतिक ताकत है, जो बार-बार सहयोग करने से बनती है, चाहे हालात कितने भी मुश्किल क्यों न हों.

अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में भरोसे को कोई बहुत जटिल विचार नहीं मानना चाहिए. इसे यथार्थवादी नजरिए से समझना बेहतर है. यानी यह नैतिक आदर्श से ज्यादा, देशों की रणनीति का एक अहम साधन है. इसलिए भरोसे में निवेश करना भावनाओं का नहीं, बल्कि सोच-समझकर लिया गया फैसला है. जैसे-जैसे भरोसा साझेदारियों की भाषा बनता जा रहा है, सबसे बड़ी बात साफ है. भरोसा तभी टिकता है जब देशों के पास साथ काम करने की मजबूत वजह और ठोस फायदे हों. और जब भरोसे वाले रिश्ते लगातार रणनीतिक और आर्थिक लाभ देते रहें.

भरोसा बनाया जाता है, उधार नहीं लिया जाता

भारत की विदेश नीति में कई ऐसी साझेदारियां हैं जो भरोसे की इसी व्यावहारिक और यथार्थवादी सोच को दिखाती हैं. भारत-जापान रणनीतिक साझेदारी बताती है कि भरोसा भाषणों से नहीं, बल्कि रक्षा, आर्थिक सुरक्षा, तकनीक और लोगों के बीच लगातार सहयोग से बनता है. बदलते भू-राजनीतिक माहौल में नियमित 2+2 वार्ता, JAIMEX नौसैनिक अभ्यास, समुद्री सुरक्षा, रक्षा उद्योग में सहयोग, सेमीकंडक्टर, महत्वपूर्ण खनिज और स्वच्छ ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में साझेदारी ने दोनों देशों के बीच लंबे समय के रणनीतिक हित बनाए हैं.

जापान का बढ़ता निवेश और दोनों देशों के बीच बढ़ता व्यापार भी इस रिश्ते को मजबूत कर रहा है. 16वें भारत-जापान वार्षिक शिखर सम्मेलन के संयुक्त बयान “Advancing a Partnership of Strategic Convergence and Trust for Shared Growth, Prosperity and Resilience” (साझा विकास, समृद्धि और मज़बूती के लिए रणनीतिक तालमेल और भरोसे की साझेदारी को आगे बढ़ाना) में भी यही सोच दिखाई देती है. इसमें कहा गया कि टिकाऊ भरोसा साझा क्षमताओं, मजबूत सप्लाई चेन, लंबे समय के निवेश और संस्थागत निरंतरता पर टिका होता है, सिर्फ राजनीतिक घोषणाओं पर नहीं.

इसके अलावा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हाल की इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड यात्रा ने भी यही दिखाया कि अलग-अलग देशों के साथ भारत के रिश्तों की बुनियाद व्यावहारिक सहयोग है. ये साझेदारियां ऐसे समय में बन रही हैं जब हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है. सिर्फ प्रतीकात्मक घोषणाओं के बजाय रक्षा, समुद्री सुरक्षा, महत्वपूर्ण खनिज, मजबूत सप्लाई चेन, स्वच्छ ऊर्जा, तकनीक और व्यापार जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाया जा रहा है.

भारत और इंडोनेशिया ने महत्वपूर्ण खनिज, समुद्री सुरक्षा और रक्षा उद्योग में सहयोग बढ़ाया है. इसमें भारतीय नौसेना के Information Fusion Centre-Indian Ocean Region (IFC-IOR) के जरिए बेहतर तालमेल भी शामिल है. भारत और ऑस्ट्रेलिया ने रक्षा और समुद्री सुरक्षा के नए तंत्र बनाए हैं और महत्वपूर्ण खनिज, साइबर तकनीक और नागरिक परमाणु ऊर्जा में साझेदारी मजबूत की है. भारत और न्यूजीलैंड ने अपने रिश्तों को रणनीतिक साझेदारी का दर्जा दिया, एक ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौता किया और कृषि, स्वच्छ ऊर्जा, कौशल विकास और समुद्री सुरक्षा में सहयोग बढ़ाया. ये सभी रिश्ते दिखाते हैं कि भरोसा सिर्फ कूटनीतिक शब्दों से नहीं, बल्कि संस्थागत सहयोग, आर्थिक फायदे और बढ़ती आर्थिक साझेदारी से मजबूत होता है, जिससे दोनों पक्षों का इस रिश्ते में लंबे समय का हित जुड़ जाता है.

भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच मुक्त व्यापार समझौते की बातचीत पूरी होना दुनिया के सबसे बड़े मुक्त व्यापार क्षेत्रों में से एक के बनने की दिशा में बड़ा कदम है. भारत-EU ट्रेड एंड टेक्नोलॉजी काउंसिल के विस्तार के साथ यह दिखाता है कि आर्थिक एकीकरण, तकनीकी सहयोग, मजबूत सप्लाई चेन और लगातार नीति समन्वय से भरोसा बनता है. कानूनी रूप से बाध्यकारी व्यापार समझौतों के जरिए दोनों पक्षों ने ऐसे मजबूत फायदे बनाए हैं, जिससे यह साझेदारी रणनीतिक और आर्थिक रूप से लाभदायक बनी रहती है. इसे सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, महत्वपूर्ण खनिज, स्वच्छ तकनीक और डिजिटल गवर्नेंस जैसे क्षेत्रों में सहयोग और मजबूत करता है.

इसी तरह रूस के साथ भारत की साझेदारी दिखाती है कि बदलते दुनिया के हालात के बावजूद भरोसा तब तक बना रह सकता है जब तक रणनीतिक जरूरत बनी रहे. रक्षा सहयोग, नागरिक परमाणु सहयोग और ऊर्जा सुरक्षा दोनों देशों को लगातार फायदा पहुंचा रहे हैं. बढ़ता व्यापार और कनेक्टिविटी भी इस रिश्ते की व्यावहारिक नींव को मजबूत करते हैं. भारत जहां पश्चिमी देशों और हिंद-प्रशांत के साझेदारों के साथ रिश्ते मजबूत कर रहा है, वहीं रूस के साथ उसके संबंध यह दिखाते हैं कि रक्षा, ऊर्जा और रणनीतिक लचीलापन बनाए रखना उसके राष्ट्रीय हित में है.

भारत-अमेरिका संबंध इस सोच का सबसे बड़ा उदाहरण हैं क्योंकि यह रिश्ता सबसे जटिल भी है. टैरिफ, बाजार तक पहुंच और व्यापारिक बातचीत को लेकर बार-बार मतभेद होने के बावजूद यह साझेदारी मजबूत बनी हुई है. अगर यह रिश्ता सिर्फ राजनीतिक सद्भाव या विचारों की समानता पर टिका होता, तो ऐसे विवाद इसे कमजोर कर देते. लेकिन दोनों देशों ने आपसी फायदे वाला इतना मजबूत सहयोग ढांचा तैयार किया है कि अब रणनीतिक दूरी बनाना दोनों के लिए महंगा पड़ सकता है.

फरवरी 2025 में शुरू किया गया India-US COMPACT (Catalyzing Opportunities for Military Partnership, Accelerated Commerce & Technology) इसी सोच का उदाहरण है. इसका मकसद रक्षा सहयोग, उन्नत तकनीक, मजबूत सप्लाई चेन और बढ़ते व्यापार के जरिए भरोसे को ठोस नतीजों में बदलना है. व्यापारिक विवाद जारी रहने के बावजूद रणनीतिक बातचीत कभी नहीं रुकी. मई 2026 में विदेश मंत्री एस. जयशंकर और अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की बैठक में आतंकवाद विरोध, ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री सुरक्षा और जल्द द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर हुई प्रगति दोहराई गई. यह साफ दिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में टिकाऊ भरोसा राजनीतिक रिश्तों से ज्यादा संस्थागत सहयोग और साझा रणनीतिक हितों पर टिका होता है. जब दोनों देशों की जरूरतें एक-दूसरे से जुड़ जाती हैं, तो मतभेदों को संभालने की कोशिश होती है, क्योंकि यह साझेदारी इतनी अहम बन जाती है कि इसे टूटने देना किसी के हित में नहीं होता.

यथार्थवाद का मतलब नकारात्मक सोच नहीं है

ये उदाहरण पूरी सूची नहीं हैं, लेकिन भारत की विदेश नीति और आज की प्रतिस्पर्धी दुनिया में देशों के व्यवहार का एक बड़ा पैटर्न जरूर दिखाते हैं. यथार्थवाद सहयोग को खारिज नहीं करता. वह कहता है कि सहयोग तभी टिकता है जब वह लंबे समय के राष्ट्रीय हितों पर आधारित हो. एक ऐसी दुनिया में जहां कोई सर्वोच्च वैश्विक व्यवस्था नहीं है और जहां लेन-देन की राजनीति बढ़ रही है, वहां व्यवस्था तभी बनी रह सकती है जब देश अपने वादे निभाएं. देशों को भरोसा होना चाहिए कि आज हुआ समझौता कल भी निभाया जाएगा. वरना हर समझौता कमजोर रहेगा. इसलिए भरोसा अंधविश्वास नहीं, बल्कि बार-बार निभाए गए वादों का नतीजा होता है.

यही वजह है कि नियमित और लगातार सहयोग सबसे ज्यादा मायने रखता है. रक्षा, व्यापार, तकनीक, ऊर्जा और सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में जब सहयोग रोजमर्रा का हिस्सा बन जाता है, तब भरोसा और मजबूत होता है. सैन्य अभ्यास, निवेश, सप्लाई चेन, लॉजिस्टिक्स समझौते, कनेक्टिविटी परियोजनाएं और संकट से निपटने के तंत्र देशों को साथ बने रहने के ठोस फायदे देते हैं. इससे रिश्ता तोड़ने की कीमत बढ़ जाती है और साथ काम करने का फायदा भी. यानी देश पहले भरोसा नहीं करते और फिर सहयोग शुरू नहीं करते. वे बार-बार सहयोग करते हैं और उसी प्रक्रिया से भरोसा बनता है. मजबूत वादे, साझा फायदे और संस्थागत सहयोग ही भरोसे को असली आधार देते हैं. इनके बिना भरोसे की बातें सिर्फ कूटनीतिक बयान बनकर रह जाती हैं, जिन्हें कहना आसान है और छोड़ देना भी उतना ही आसान.

मोनीष तौरंगबाम, चिंतन रिसर्च फाउंडेशन (CRF), नई दिल्ली में फेलो हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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