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Tuesday, 21 July, 2026
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आज़म खान को सजा मिले, लेकिन जौहर यूनिवर्सिटी के छात्रों को इसकी कीमत नहीं चुकानी चाहिए

रामपुर की मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी इस इलाके में उच्च शिक्षा के सबसे महत्वपूर्ण केंद्रों में से एक के रूप में उभरी है.

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मैं आज़म खान की राजनीति से कभी भी सहमत नहीं रही हूं. और न ही मैं उनका बचाव करने के लिए यह लिख रही हूं. मैं एक ऐसे विचार का बचाव करने के लिए लिख रही हूं जो राजनीति से ऊपर होना चाहिए. वह है शिक्षा.

उत्तर प्रदेश के रामपुर में मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी को लेकर विवाद ने एक बार फिर लोगों की राय बांट दी है. रामपुर विकास प्राधिकरण (RDA) ने मंजूरशुदा बिल्डिंग प्लान के बिना निर्माण होने का हवाला देते हुए यूनिवर्सिटी की 40 में से 38 इमारतों को गिराने का आदेश दिया है. साथ ही यूनिवर्सिटी को 15 दिन का समय दिया है कि वह खुद इन इमारतों को हटा ले. इसके बाद इसे गिराए जाने की कार्रवाई शुरू होगी. यूनिवर्सिटी प्रशासन का कहना है कि उसने जरूरी दस्तावेज जमा किए थे और आदेश जारी होने से पहले उसे व्यक्तिगत सुनवाई का मौका भी दिया गया था. अब वह कानूनी रास्ता अपनाने की तैयारी कर रहा है. रिपोर्ट्स के मुताबिक छात्रों को यह भरोसा दिलाने के लिए भी व्यवस्था की जा रही है कि इस मामले के चलते उनकी पढ़ाई, डिग्री और भविष्य पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

कानून को अपना काम जरूर करना चाहिए. अगर नियमों का उल्लंघन हुआ है तो जिम्मेदारी तय करना जरूरी है. कोई भी नेता, संस्था या नागरिक कानून से ऊपर नहीं हो सकता.

मैंने अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा रामपुर में बिताया है और आज भी वहां मेरा परिवार और करीबी दोस्त रहते हैं. इसलिए मैं पूरे भरोसे के साथ कह सकती हूं कि मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी अब सिर्फ एक कैंपस नहीं है. पिछले कुछ सालों में यह इलाके के सबसे बड़े उच्च शिक्षा केंद्रों में से एक है.

रामपुर और आसपास के जिलों के हजारों छात्रों के लिए, जिनमें से कई गांवों और साधारण आर्थिक परिवारों से आते हैं, इस यूनिवर्सिटी ने घर के पास ही प्रोफेशनल और उच्च शिक्षा का मौका दिया है. हर परिवार अपने बच्चे को लखनऊ, दिल्ली, नोएडा या दूसरे बड़े शहरों में पढ़ने नहीं भेज सकता. पढ़ाई की फीस का ही खर्चा नहीं होता है बल्कि रहने, आने-जाने और रोजमर्रा के खर्च भी इतने ज्यादा होते हैं कि कई परिवारों के लिए उच्च शिक्षा पहुंच से बाहर हो जाती है.

जो छात्र अपने परिवार में पहली बार पढ़ाई कर रहे हैं, उनके लिए घर के पास पढ़ना सुविधा नहीं बल्कि मजबूरी होती है. मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी जैसी संस्थाएं उन्हें यह मौका देती है.

इस सच्चाई को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.

‘छात्रों को सजा मत दीजिए’

पिछले कुछ दिनों में जब मैंने रामपुर के लोगों से बातचीत की, तो एक बात मेरे मन में रह गई.

शहर में पूरी जिंदगी बिताने वाले एक शख्स, जिन्हें लोग खान साहब के नाम से जानते हैं, ने मुझसे कहा.

“रामपुर के बहुत से लोगों के मन में आज़म खान की पहचान एक ऐसे नेता की रही है जिन पर घमंड और जमीन कब्जाने के आरोप लगे. आज वह जेल में हैं और अपने कारनामों का सामना कर रहे हैं. कानून को अपना काम करने दीजिए. लेकिन जिस यूनिवर्सिटी में इतने सारे बच्चे पढ़ते हैं, उसे गिराना बिल्कुल सही नहीं है.”

उन्होंने आगे कहा, “अगर सरकार नहीं चाहती कि यह मौजूदा प्रबंधन के तहत चले, तो इसे अपने कब्जे में ले ले. इसे महात्मा ज्योतिबा फुले रोहिलखंड यूनिवर्सिटी के अधीन कर दे, इसे राज्य यूनिवर्सिटी बना दे या स्वतंत्र राज्य यूनिवर्सिटी के रूप में चलाए. सरकार चाहे तो इसका नाम भी बदल सकती है, जय श्री राम यूनिवर्सिटी रख सकती है. लेकिन हजारों युवाओं की पढ़ाई का केंद्र बन चुकी इस संस्था को मत गिराइए.”

अब दुबई में काम कर रहे यूनिवर्सिटी के पूर्व छात्र अमनप्रीत ने अपनी बात कुछ इस तरह रखी.

“मेरे पिता बीमार रहते थे. यह यूनिवर्सिटी पास थी, इसलिए मैं पढ़ाई भी कर पाया और उनकी देखभाल भी करता रहा. यह जगह मेरे जैसे बहुत से बच्चों को अपने सपने पूरे करने का मौका देती है. हमें फर्क नहीं पड़ता कि इसे कौन चलाता है. जिसने गलती की है उसे सजा दीजिए. जरूरत हो तो नया प्रबंधन ले आइए. लेकिन छात्रों को सजा मत दीजिए.”

शहर के बुजुर्ग बाबू भाई ने एक सीधा सवाल पूछा.

“अगर यह यूनिवर्सिटी गिरा दी जाएगी, तो क्या हमारे बच्चों के लिए दूसरी यूनिवर्सिटी बनाई जाएगी?”

इन बातों ने मुझे इसलिए सोचने पर मजबूर किया क्योंकि रामपुर के बहुत से लोग एक फर्क साफ तौर पर देख रहे हैं. वे किसी व्यक्ति को कानून से छूट देने की मांग नहीं कर रहे हैं. वे सिर्फ यह चाहते हैं कि एक शैक्षणिक संस्था को उसके संस्थापक के कथित कामों से अलग करके देखा जाए.

शैक्षणिक संस्थाएं सिर्फ ईंट और सीमेंट की इमारतें नहीं होतीं. वे सपनों, उम्मीदों और अवसरों का केंद्र होती हैं. वे सिर्फ अपने संस्थापकों की नहीं होतीं, बल्कि हर उस छात्र की होती हैं जो यह भरोसा लेकर उनके दरवाजे पर आता है कि शिक्षा उसकी जिंदगी बदल सकती है.

अगर जमीन, निर्माण या प्रशासन में कोई गड़बड़ी हुई है, तो जिम्मेदार लोगों पर कानून के तहत पूरी कार्रवाई होनी चाहिए. पूरी जांच हो. सरकारी नुकसान की भरपाई कराई जाए. जो दोषी हों, उनके खिलाफ मुकदमा चले.

लेकिन क्या न्याय का मतलब यह भी है कि उस संस्था को ही खत्म कर दिया जाए, जहां आज भी हजारों छात्र पढ़ रहे हैं?

एक विरोधाभास

सरकार के पास दूसरे रास्ते भी हैं. अगर आरोप आखिर में सही साबित होते हैं, तो सरकार यूनिवर्सिटी का प्रशासन अपने हाथ में ले सकती है. एक स्वतंत्र प्रबंधन समिति बना सकती है. कानून के मुताबिक संस्था का पुनर्गठन कर सकती है. या फिर नियमों का पालन सुनिश्चित करते हुए पढ़ाई को बिना रुके जारी रख सकती है. दोषियों पर मुकदमा भी चल सकता है. सरकारी नुकसान की भरपाई भी हो सकती है. जवाबदेही भी तय हो सकती है, बिना हजारों छात्रों के कैंपस को इसकी कीमत बनाए.

आज भारत खुद को दुनिया की ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था बनाने की बात करता है. नई शिक्षा नीति का लक्ष्य खास तौर पर बड़े शहरों से बाहर उच्च शिक्षा का विस्तार करना है. हर सरकार युवाओं को सशक्त बनाने, शिक्षा में असमानता कम करने और दूर-दराज के इलाकों तक अच्छी शिक्षा पहुंचाने की बात करती है.

लेकिन यही बातें उस समय विरोधाभासी लगती हैं जब पहले से हजारों छात्रों को शिक्षा दे रही एक संस्था को गिराने की बात होती है.

यह बहस सिर्फ मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी की नहीं है.

पूरे भारत में कई शैक्षणिक संस्थान नेताओं, उद्योगपतियों, चैरिटेबल ट्रस्ट्स और धार्मिक संगठनों ने बनाए हैं. अगर कल किसी दूसरी यूनिवर्सिटी के संस्थापक पर भी आरोप लगते हैं, तो क्या उस संस्था को भी गिरा देना चाहिए? या फिर जो संस्था समाज की सेवा कर रही है उसे बचाया जाए और जिम्मेदार लोगों को उनके कामों की सजा दी जाए?

आज जो मिसाल बनेगी, वही तय करेगी कि कल भारत अपने शैक्षणिक संस्थानों के साथ कैसा व्यवहार करेगा.

जब छात्रों को भरोसा दिलाया जा रहा है कि इस अनिश्चितता के बावजूद दाखिले और पढ़ाई जारी रहेंगे, तब हमें यह समझना चाहिए कि असली दांव पर क्या लगा है. हर क्लासरूम के पीछे एक ऐसा छात्र है जो अपने परिवार का पहला ग्रेजुएट बनने का सपना देख रहा है. हर डिग्री के पीछे ऐसे माता-पिता हैं जिन्होंने अपने बच्चे के बेहतर भविष्य के लिए अपनी बचत खर्च की, संपत्ति गिरवी रखी या कर्ज लिया.

उनके सपनों की रक्षा होनी चाहिए.

कानून का राज और शिक्षा का अधिकार एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं. एक मजबूत लोकतंत्र दोनों की एक साथ रक्षा कर सकता है.

मैं कभी भी आज़म खान की राजनीति से सहमत नहीं रही हूं. और मैं किसी से यह नहीं कह रही कि कानून को नजरअंदाज किया जाए.

मैं सिर्फ इतना कह रही हूं कि एक व्यक्ति और एक संस्था में फर्क किया जाए.

जहां भी दोष साबित हो, दोषियों को सजा दीजिए.

लेकिन उन संस्थाओं को बचाइए जो आज भी भारत के भविष्य को शिक्षा दे रही हैं.

क्योंकि एक तरफ हम शिक्षा के जरिए समाज को आगे बढ़ाने की बात करते हैं. देश के हर जिले के युवाओं को बड़े सपने देखने और आगे पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं. दूसरी तरफ हम ऐसी संस्था को खत्म करने की बात कर रहे हैं जिसने हजारों लोगों को उच्च शिक्षा का मौका दिया, जिन्हें शायद यह अवसर कभी नहीं मिलता.

यह विरोधाभास जश्न मनाने का नहीं, बल्कि पूरे देश में गंभीरता से सोचने का विषय है.

अम्बरीन जैदी एक अवॉर्ड-विनिंग मिलिट्री राइटर और एक्टिविस्ट हैं, जिन्हें भारत के प्रेसिडेंट ने वॉर विडोज़ और डिसेबल्ड सैनिकों पर उनके काम के लिए सम्मानित किया है. विचार निजी हैं. 

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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