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Thursday, 18 June, 2026
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दुनिया के संघर्षों की बुनियाद आज भी जियोग्राफी पर टिकी है, ग्लोबलाइजेशन का असर सीमित रहा

डिजिटल इकॉनमी अभी भी जियोग्राफी में ही अटकी हुई है. डेटा सेंटर, सेमीकंडक्टर फैसिलिटी, समुद्र के नीचे बिछी केबल, सैटेलाइट ग्राउंड स्टेशन और ज़रूरी मिनरल की सप्लाई चेन कुछ खास जगहों पर ही केंद्रित हैं.

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भूगोल (जियोग्राफी) अंतरराष्ट्रीय संबंधों की ठोस आधार बना हुआ है. सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कोई देश कहां स्थित है. युद्ध और शांति के दौर में तमाम देशों का व्यवहार पहाड़ों, मैदानों, नदियों, समुद्रतटों, और समुद्रों की ज्योग्राफिकल स्थिति से ही तय होता है. युद्ध, और सैन्य टेक्नोलॉजी में नाटकीय परिवर्तन हुए हैं, लेकिन देशों के बीच लड़ाई के मूल मसलों में बहुत बदलाव नहीं हुआ है. मसले आज भी ये ही होते हैं: क्षेत्र, संप्रभुता और पहचान. इन संघर्षों में जियोग्राफी की अहम भूमिका बनी रहती है.

देश, और नागरिकता विहीन तत्व रणनीति बनाते रहते हैं, लड़ते रहते हैं, और जियोग्राफी से पैदा हुए अवसरों और बंधनों के हिसाब से अपनी बढ़त बनाने की कोशिश करते रहते हैं. रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध अगर क्षेत्र तथा पहचान के विस्फोटक घालमेल के कारण चल रहा है, तो पश्चिम एशिया में जंग यह दिखाता है कि जियोग्राफी कैसे एक रणनीतिक थाती का काम कर सकती है और ईरान जैसा देश अपने से ज्यादा समृद्ध प्रतिद्वंद्वियों को कैसे चुनौती दे सकता है. जियोग्राफी को ग्लोबलाइजेशन की वेदी पर बलि चढ़ाना तो दूर रहा, वह नई ताकत के साथ अपना दावा कर रही है. इलाके का स्वरूप, संसाधनों के रूप में देन, अहम खनिज, एनर्जी कॉरीडोर, और जमीन तथा समुद्र के मार्फत परिवहन आदि रणनीतिक गणित निर्धारित कर रहे हैं और देशों के आचरण तय कर रहे हैं.

जियोग्राफी का दांव

दुनिया की महाशक्तियों से प्रतिस्पर्द्धा की वापसी बाज़ारों, इन्फ्रास्ट्रक्चर, रणनीतिक दबावों, प्रवास की गति, और संसाधनों तक पहुंच के लिए शुरू हुई नई होड़ से करीबी रूप से जुड़ी है. एनर्जी के मामले में सुरक्षा विशेष भूभागों में संकट से गहरे प्रभावित हो रही है, जबकि जलवायु परिवर्तन अलग-अलग क्षेत्रों को विषमतापूर्ण तरह से प्रभावित कर रहा है. आज जहां-जहां संघर्ष चल रहा है वहां-वहां ज्योग्राफिकल कमजोरियों और मजबूतियों की मौके पर ही परीक्षा हो रही है.

इस प्रवृत्ति का एक स्पष्ट उदाहरण यह है कि अर्थनीति और भू-राजनीति के बीच नजदीकियां बढ़ती जा रही हैं. बड़े देश व्यापार समझौते लागू करके, इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए वित्त उपलब्ध करा के, निवेश बढ़ाकर, टेक्नोलॉजी में सहभागिता बढ़ाकर, और सप्लाई चेन के जरिए अपना दबदबा बढ़ा रहे हैं. चीन का ‘बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव’ (बीआरआई) इसकी मिसाल है, जो बंदरगाहों, रेलवे, सड़क, और पाइपलाइन के जाल के साथ यूरेरेशिया और उससे आगे अपना पैर फैला रहा है. इसके जवाब में अमेरिका, यूरोपीय संघ और समान विचार वाले सहयोगी देशों ने जुड़ाव की वैकल्पिक पहल की है, खासकर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में.

कोविड-19 महामारी, आर्थिक प्रतिबंधों, और बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों के कारण पड़ी बाधाओं ने इस वास्तविकता को मजबूत किया है. जिन ग्लोबल ‘वैल्यू चेनों’ को कभी मुख्यतः कुशलता बढ़ाने के लिए मजबूत किया गया  उन्हें मजबूती और सुरक्षा की कसौटियों पर परखा जा रहा है. सरकारें और कॉर्पोरेशन सप्लायरों में विविधता ला रहे हैं, उत्पादन के नए ठिकाने बना रहे हैं, और भू-राजनीति संबंधी जोखिमों के मद्देनजर सप्लाई चेनों को पुनर्गठित कर रहे हैं. जियोग्राफी तय कर रही है कि उत्पादन कहां होगा, माल कैसे आगे जाएगा, और कौन देश रणनीतिक रूप से मजबूत होगा.

इंडो-पैसिफिक का एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक मंच के रूप में उभरना भूगोल के महत्व को और अधिक रेखांकित करता है. इस होड़ के मूल में है अहम समुद्र मार्गों, खासकर साउथ चाइना सी तक पहुंच हासिल करने और उन पर अपना वर्चस्व स्थापित करने का संघर्ष. अधिकतर ग्लोबल ट्रेड समुद्री रास्तों से ही हो रहा है, जिसकी वजह से बंदरगाहों और जहाजों के मार्ग बनाना और संकरे समुद्री मार्गों का निर्माण दुनियाभर की अर्थव्यवस्था के लिए अनिवार्य हो गया है. रणनीतिक जलमार्गों को कौन सुरक्षा प्रदान कर सकता है और कौन उन्हें भंग कर सकता है, इन सवालों के जवाब वैश्विक परिणामों वाला विशाल क्षेत्रीय प्रभाव जताने में निर्णायक साबित हो सकता है. इसलिए, नौसेना का आधुनिकीकरण, समुद्री सहभागिता, और समुद्री दायरे के बारे में जागरूकता राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीतियों के केंद्रीय स्तंभ बन गए हैं. खाड़ी और लाल सागर क्षेत्र में अस्थिरता, और इसके साथ जलवायु परिवर्तन के बीच आर्कटिक का बढ़ता रणनीतिक महत्व जियोग्राफी की ताकत को और रेखांकित करता है.

एनर्जी सुरक्षा का मसला इस वास्तविकता को और मजबूत करता है. तेल, प्राकृतिक गैस, अहम खनिज, और बिजली के नेटवर्क को भौतिक भूगोल (फिजिकल जियोग्राफी) से अलग नहीं किया जा सकता है. पाइपलाइनें, एलएनजी टर्मिनल, तेलशोधक कारखाने, पावर ग्रिड, और जहाजों के मार्ग अपनी ज्योग्राफिकल स्थिति के कारण निश्चित संपत्ति के रूप में रणनीतिक मूल्य हासिल करते हैं. यूक्रेन और पश्चिम एशिया के युद्ध ने एनर्जी नेटवर्क की कमजोरी को उजागर कर दिया है और उनके सप्लाइ स्रोत तथा ढुलाई कॉरीडोर में विविधता लाने की कोशिशों में तेजी ला दी है. जियोग्राफी अहम खनिजों और ‘रेयर अर्थ’ तक पहुंच को भी प्रभावित करती है, जो आधुनिक तकनीकों और ग्लोबल एनर्जी परिवहन को मजबूती देता है.

ग्लोबलाइजेशन और जियोग्राफी

ग्लोबलाइजेशन और नई संचार टेक्नोलॉजी के कारण कई लोग यह मानने लगे हैं कि जियोग्राफी अपनी प्रासंगिकता खो  रही है. सूचनाएं, पूंजी, माल, और लोग अभूतपूर्व तेजी से सीमाएं पार करने लगे, तब दुनिया ‘सपाट’ दिखने लगी. बढ़ती आर्थिक आजादी, और संस्थागत सहयोग शांति के लिए काफी प्रोत्साहन देता दिखा तो कुछ लोग कहने लगे कि जियोग्राफी के कारण जो पारंपरिक सीमाएं थीं उन्हें पार कर लिया गया है. लेकिन आज की सच्चाई अलग कहानी कहती है.

ग्लोबलाइजेशन से यह फर्क पड़ा होगा कि जियोग्राफी किसी देश के आचरण को किस तरह प्रभावित करती है. 21वीं सदी के पहले दशक में, बेकाबू ग्लोबलाइजेशन पर भरोसा कमजोर पड़ने लगा था. 2008-09 के वैश्विक वित्तीय संकट ने आर्थिक एकीकरण की कमजोरी को उजागर कर दिया था, जबकि अफगानिस्तान और इराक में अमेरिका की लंबी जंग ने अभूतपूर्व जुड़ाव (कनेक्टिविटी) के इस दौर में भी जियोग्राफी के स्थायी महत्व को रेखांकित कर दिया था. रूस-यूक्रेन युद्ध के संकेत 2014 के क्रीमिया संकट में दिखने लगे थे. उस संकट में भूभाग पर नियंत्रण, रणनीतिक गहराई, और गठबंधन के विस्तार ने महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता के जियोग्राफी को उजागर कर दिया था.

इसके बाद इंडो-पैसिफिक जब रणनीतिक रचना के रूप उभरा और पूर्वी यूरोप में जब बड़े पैमाने पर जमीनी युद्ध फिर हुआ तब समुद्री और महादेशीय भू-राजनीति का भी उभार शुरू हुआ. तकनीकी आविष्कारों ने युद्ध के तरीके को तो बदल दिया है लेकिन इनकी जड़ें भूगोल-भूभाग, संप्रभुता, सीमा, संसाधन और पहचान में ही गहरे धंसी हुई  हैं. पुरानी लड़ाइयों के ये समकालीन संस्करण टेक्नोलॉजी के विरोध में नहीं आकार ले रहे हैं बल्कि टेक्नोलॉजी, अर्थनीति, सुरक्षा, और राजनीति के साथ संपर्कों के जरिए आकार ले रहे हैं.

सूचनाएं दूरी का ख्याल किए बिना सीमाओं को पार करके आगे बढ़ रही हैं लेकिन जमीन, समुद्र, हवा, और अंतरिक्ष की भौतिक वास्तविकताएं लोगों, सामान, एनर्जी, और बिजली की गति को स्वरूप प्रदान कर रही हैं.

यहां तक कि डिजिटल अर्थव्यवस्था भी जियोग्राफी से जुड़ी है. डाटा सेंटर, सेमीकंडक्टर सुविधाएं, समुद्र के अंदर के केबल, उपग्रहों के ग्राउंड स्टेशन, और अहम खनिजों के सप्लाइ चेन विशेष स्थानों पर केंद्रित हैं, नयी निर्भरताएं और ज्यादा कमजोरियां पैदा कर रही हैं. जलवायु परिवर्तन स्थान और जमीन के रणनीतिक महत्व को बढ़ा रहा है. आर्कटिक का पिघलती बर्फ नये समुद्री मार्ग तैयार कर रही है और संसाधनों तथा वर्चस्व को लेकर होड़ को तीखा कर रही है, जबकि समुद्र का चढ़ता स्तर संप्रभुता, प्रवास, सैन्य आदों, और आर्थिक मजबूती से जुड़े जटिल सवाल उभार रहा है.

जिन तकनीकी तरक्कियों ने लंबी दूरीवाली मिसाइलों, ड्रोनों, उपग्रहों, और साइबर क्षमताओं का निर्माण किया है उन्होंने जियोग्राफी के महत्व को मिटाया नहीं है. वे सब भौतिक इन्फ्रास्ट्रक्चर, इलाकों के स्वरूप, और पहुंच के मुकामों पर निर्भर हैं. एंटी-ऐक्सेस/एरिया डिनायल, रणनीतिक गहराई, द्वीपों की कड़ी, समुद्रतटवर्ती ऑपरेशन्स, और संकरे समुद्री मार्ग जैसी अवधारणाएं सैन्य योजना में केंद्रीय महत्व रखती हैं.

यानी फैसला साफ है: जियोग्राफी अभी भी महत्व रखती है और आगे भी रखेगी. इसलिए, आने वाले समय में पहली चुनौती यह होगी कि कोई देश अपनी ज्योग्राफिकल बढ़त का कितने प्रभावी ढंग से लाभ उठाता है और दुनिया में बढ़ती होड़ के बीच भी अपनी कमजोरियों को किस तरह दूर करता है.

मोनीष तौरंगबाम चिंतन रिसर्च फाउंडेशन (CRF), नई दिल्ली में फेलो हैं. ये उनके निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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