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Wednesday, 20 May, 2026
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आज़ादी के बाद पश्चिम बंगाल में सिर्फ 9 मुख्यमंत्री रहे और राजनीति के 5 दौर देखे गए

राज्य की सबसे बड़ी त्रासदी यह रही कि हर नई सरकार के साथ उसकी आर्थिक ताकत कमजोर होती गई. आज राज्य का राष्ट्रीय GDP में योगदान 6% से भी कम है.

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भारत में अब तक 15 प्रधानमंत्री रहे हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल ने अभी अपने नौवें मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का स्वागत किया है. यही लंबा राजनीतिक चक्र पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन को दूसरे राज्यों की तुलना में ज्यादा महत्वपूर्ण बनाता है.

पड़ोसी राज्यों बिहार, असम और ओडिशा में अब तक क्रमशः 24, 15 और 15 मुख्यमंत्री रह चुके हैं. महाराष्ट्र में 20 मुख्यमंत्री हुए हैं, जबकि उत्तर प्रदेश में 21. यहां तक कि उत्तर प्रदेश से अलग होकर 2000 में बने छोटे राज्य उत्तराखंड में भी पिछले 25 वर्षों में 10 मुख्यमंत्री रह चुके हैं.

अब सवाल यह है कि कभी पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भरोसेमंद सहयोगी रहे शुभेंदु अधिकारी के लिए भविष्य क्या लेकर आएगा. दरअसल, 2006 में नंदीग्राम आंदोलन का चेहरा वही थे. यह आंदोलन इंडोनेशिया के सलीम ग्रुप द्वारा प्रस्तावित 40,000 करोड़ रुपये के स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन (SEZ) और केमिकल हब के खिलाफ हुआ था. यह फैसला और सिंगूर से टाटा के नैनो प्रोजेक्ट का बाहर जाना, दोनों ही बुद्धदेब भट्टाचार्य के उस प्रयास के अंत का संकेत थे, जिसमें वे कृषि प्रधान राज्य को आधुनिक औद्योगिक मैन्युफैक्चरिंग हब बनाना चाहते थे. वह राज्य के आखिरी सीपीआई(एम) मुख्यमंत्री थे और 2000 से 2011 तक पद पर रहे.

हालांकि, यह भी रिकॉर्ड में होना चाहिए कि उद्योगों के प्रति सीपीआई(एम) का नया झुकाव भले ही बुद्धदेव भट्टाचार्य, सोमनाथ चटर्जी और बंगाल के उद्योग मंत्री निरुपम सेनगुप्ता के जरिए दिखाई दिया, लेकिन उनकी अपनी पार्टी के कई नेताओं ने इसका पूरा समर्थन नहीं किया. इनमें ज्योति बसु के करीबी और वफादार असीम दासगुप्ता भी शामिल थे. दासगुप्ता इस बात से नाराज़ थे कि उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया.

यही वह पृष्ठभूमि थी जिसने 2011 में ममता बनर्जी की बड़ी जीत का रास्ता तैयार किया. इसे “परिबर्तन” यानी बदलाव कहा गया, लेकिन टीएमसी के लगातार तीन कार्यकाल 2011 से 2026 के बाद अब यह सच सामने आता है कि जितना कुछ बदलता दिखता है, उतना ही बहुत कुछ वैसा ही बना रहता है.

ममता बनर्जी ने लगभग पूरी तरह लेफ्ट फ्रंट का ही मॉडल अपनाया—लोकलुभावन राजनीति, सड़क की ताकत, विरोध को दबाना और प्रक्रियाओं को औपचारिकता बना देना. उन्होंने इससे एक कदम आगे जाकर सत्ता को पूरी तरह व्यक्तिगत रूप दे दिया. लेफ्ट फ्रंट को फॉरवर्ड ब्लॉक और आरएसपी जैसे सहयोगियों से जूझना पड़ता था, जो हर सुधार प्रयास में रुकावट डालते थे और सत्ता व्यवस्था में अपना हिस्सा चाहते थे.

लेकिन राज्य की सबसे बड़ी त्रासदी यह रही कि 1947 में भारत के औद्योगिक उत्पादन में 27 प्रतिशत से ज्यादा योगदान देने वाला पश्चिम बंगाल, जो देश का सबसे सक्रिय बंदरगाह और स्टॉक एक्सचेंज वाला बड़ा कारोबारी केंद्र था, हर नई सरकार के साथ अपनी आर्थिक ताकत खोता गया. आज राज्य का राष्ट्रीय जीडीपी में योगदान 6 प्रतिशत से भी कम है और प्रति व्यक्ति जीडीपी के मामले में उसकी रैंक 24वीं है.

सवाल यह है कि राज्य की राजनीति के इन पांच दौरों में ऐसा कैसे हुआ?

बीसी रॉय का दौर

पश्चिम बंगाल के पहले मुख्यमंत्री बीसी रॉय थे. उन्होंने 1948 से लेकर 1962 में अपनी मृत्यु तक 14 साल तक राज्य का नेतृत्व किया. उनके शासन के पहले दो वर्षों में उनका पदनाम “प्रीमियर” था. यह दौर विभाजन के बाद आए शरणार्थियों के पुनर्वास की चुनौती से भरा हुआ था. इसके बावजूद इस समय कई नए औद्योगिक प्रोजेक्ट, शिक्षण संस्थान—आईआईटी खड़गपुर, बिधान नगर कृषि विश्वविद्यालय और दुर्गापुर, कल्याणी, अशोक नगर तथा साल्ट लेक (जिसे अब बिधान चंद्र रॉय नगर कहा जाता है) जैसे नए टाउनशिप बनाए गए. उनके कार्यकाल में पश्चिम बंगाल भूमि सुधार कानून भी पारित किया गया था, हालांकि इसे लागू लेफ्ट फ्रंट सरकार ने करीब दो दशक बाद किया.

डॉ. रॉय ने पूर्वी पाकिस्तान से आए विस्थापित लोगों के पुनर्वास के लिए ईमानदार कोशिशें कीं, लेकिन पंजाब के मुकाबले पश्चिम बंगाल में ज़मीन कम होने की वजह से सभी को राज्य के अंदर बसाना संभव नहीं था. इसलिए कुछ लोगों को अंडमान भेजा गया, कुछ को दंडकारण्य और कुछ को उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र में बसाया गया.

1956 में डॉ. रॉय ने एक बहुत साहसिक और नया सुझाव दिया—पश्चिम बंगाल और बिहार को मिलाकर एक राज्य बनाया जाए. रिकॉर्ड के अनुसार, दोनों राज्यों की विधानसभाओं ने इस विलय के समर्थन में प्रस्ताव भी पारित किया था. इससे कई फायदे हो सकते थे—नया राज्य नए शरणार्थियों के लिए ज़मीन और जल संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल कर सकता था, बिहार के खनिज संसाधन औद्योगिक उत्पादन को बढ़ा सकते थे, संयुक्त राज्य को बंदरगाह का फायदा मिलता और दामोदर वैली कॉरपोरेशन जैसी बड़ी नदी घाटी परियोजनाएं एक ही प्रशासन के तहत आ सकती थीं, लेकिन ऐसा नहीं हो सका. दोनों मुख्यमंत्रियों को कांग्रेस के अंदर से, कम्युनिस्टों, बंगला कांग्रेस और क्षेत्रीय मीडिया से भारी विरोध का सामना करना पड़ा.

यह वास्तव में एक खोया हुआ मौका था, क्योंकि यह संयुक्त द्विभाषी राज्य भारत को भाषाई आधार पर बांटने की सोच को भी चुनौती दे सकता था.

इसी समय पश्चिम बंगाल, देश के बाकी हिस्सों की तरह, बड़े खाद्य संकट से भी जूझ रहा था, लेकिन बंगाल में हालात ज्यादा गंभीर थे. चावल की कीमतें तेज़ी से बढ़ गईं—1955 में 382 रुपये प्रति टन से बढ़कर 1956 के अंत तक 532 रुपये प्रति टन हो गईं. इसके खिलाफ प्राइस इंक्रीज एंड फेमिन रेजिस्टेंस कमेटी (PIFRC) ने बड़े प्रदर्शन किए. इन आंदोलनों को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) और दूसरे वामपंथी संगठनों का समर्थन मिला. उनकी मांग थी कि सस्ता भोजन मिले, राशन व्यवस्था ठीक हो और जमीन का पुनर्वितरण किया जाए.

जब राज्य इन समस्याओं से जूझ रहा था, उसी समय फ्रेट इक्वलाइजेशन नीति ने विकास को और प्रभावित किया. जैसा कि डॉ. रॉय ने कहा था, “रेलवे के अपने आंतरिक रेट के हिसाब से जमशेदपुर से हावड़ा तक एक टन स्टील लाने का खर्च 30 रुपये है. और जमशेदपुर से बॉम्बे तक एक टन स्टील का खर्च 120 रुपये है, यानी दोनों टन स्टील के लिए कुल 150 रुपये. लेकिन केंद्र की नई नीति के तहत कोलकाता वाले को भी 75 रुपये देने पड़ेंगे और बॉम्बे वाले को भी 75 रुपये.”

कोयले के किराए की गणना में भी लगभग यही फॉर्मूला लागू किया गया, जिससे बिहार और बंगाल जैसे कोयला उत्पादक राज्यों को मिलने वाला प्रतिस्पर्धात्मक फायदा खत्म हो गया. इन नीतिगत बदलावों का असर डॉ. रॉय के कार्यकाल में ही दिखाई देने लगा था—1960-61 तक औद्योगिक उत्पादन घटकर 17.20 प्रतिशत रह गया था.

राजनीतिक अस्थिरता का दौर

पश्चिम बंगाल का दूसरा दौर—1962 में बीसी रॉय की मृत्यु से लेकर सिद्धार्थ शंकर रे के कार्यकाल की शुरुआत तक—राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक गिरावट, पूंजी के पलायन, नक्सलवाद के उभार और तीन बार राष्ट्रपति शासन का दौर था. इस समय राज्य में मुख्यमंत्री तेज़ी से बदले—प्रफुल्ल चंद्र सेन, अजय मुखर्जी (जिनके साथ ज्योति बसु तीन बार उपमुख्यमंत्री रहे) और प्रफुल्ल चंद्र घोष. कृषि संकट, गहरी सामाजिक-आर्थिक असमानताएं और भूमिहीन किसानों को राजनीतिक व्यवस्था द्वारा धोखा दिए जाने की भावना—जिसमें अब यूनाइटेड फ्रंट सरकार का हिस्सा बनने वाली कम्युनिस्ट पार्टियां भी शामिल थीं, की वजह से शहरों के युवा और बुद्धिजीवी चे ग्वेरा, फिदेल कास्त्रो, माओ त्से तुंग और हो ची मिन्ह जैसे क्रांतिकारी नेताओं की ओर आकर्षित होने लगे. फिल्मकार ऋत्विक घटक और मृणाल सेन तथा साहित्यकार महाश्वेता देवी, सरोज दत्ता और शंख घोष ने क्रांति के पक्ष में बौद्धिक माहौल तैयार किया.

एसएस रे का दौर

जब राज्य लगभग टूटने की कगार पर पहुंच गया था और 90 लाख शरणार्थियों के बोझ से जूझ रहा था, तब कांग्रेस के मुख्यमंत्री के रूप में सिद्धार्थ शंकर रे सत्ता में आए. वह 1971 के युद्ध में इंदिरा गांधी की बड़ी जीत की लहर पर सवार थे, जिसके बाद बांग्लादेश बना था. करीब 10 लाख शरणार्थी पश्चिम बंगाल आए और रे ने उनके पुनर्वास के लिए कदम उठाए. इसके तुरंत बाद उन्होंने राज्य में माओवादी उग्रवादियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की. तरीके बेहद कठोर थे, लेकिन प्रभावी भी थे. शायद यही वजह थी कि बाद में जब पंजाब में उग्रवाद चरम पर था, तब उन्हें वहां का राज्यपाल भी बनाया गया. The Lowland में नक्सली हिंसा और राज्य की कठोर कार्रवाई, दोनों की निरर्थकता का विस्तार से वर्णन किया गया है.

रे ने 1973 में पश्चिम बंगाल पंचायत अधिनियम पारित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इस कानून ने पुराने 4-स्तरीय पंचायत सिस्टम को बदलकर मौजूदा 3-स्तरीय पंचायत व्यवस्था लागू की, जिसे बाद में 1992 में भारत के संविधान के 73वें संशोधन के जरिए पूरे देश में लागू किया गया.

उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक उनके कार्यकाल में कोलकाता मेट्रो के निर्माण की शुरुआत थी. इससे कोलकाता देश का पहला शहर बना, जहां भूमिगत रेल प्रणाली शुरू हुई.

हालांकि, सब कुछ अच्छा नहीं था. राजनीतिक हिंसा की संस्कृति की वजह से कलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज (सीएसई) लगातार गिरावट की ओर चला गया. इसका असर यह हुआ कि कई बड़े भारत-ब्रिटेन कारोबारी समूह शहर छोड़कर चले गए. अंतरराष्ट्रीय पूंजी और कारोबार अब लायंस रेंज—जो सीएसई का अनौपचारिक नाम था—की बजाय हांगकांग और सिंगापुर को ज्यादा पसंद करने लगे.

इसलिए कहा जा सकता है कि उन्होंने राज्य की औद्योगिक और व्यावसायिक गिरावट को रोकने की कोशिश जरूर की, लेकिन राज्य का पूरा माहौल अब भी उद्यमिता के लिए अनुकूल नहीं था.

यह पश्चिम बंगाल की राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर आधारित तीन-पार्ट की सीरीज का पहला लेख है.ॉ

संजीव चोपड़ा एक पूर्व आईएएस अधिकारी हैं और वैली ऑफ वर्ड्स साहित्य महोत्सव के निदेशक हैं. हाल तक वे LBSNAA के निदेशक रहे हैं और लाल बहादुर शास्त्री मेमोरियल (एलबीएस म्यूज़ियम) के ट्रस्टी भी हैं. वे सेंटर फॉर कंटेम्पररी स्टडीज़, पीएमएमएल के सीनियर फेलो हैं. उनका एक्स हैंडल @ChopraSanjeev है. यह लेख लेखक के निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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