पटना: बिहार की राजधानी पटना के एक बड़े बस डिपो के अंदर 21 साल की रागिनी कुमारी, जींस, गुलाबी कुर्ती और चप्पल पहने, भीड़भाड़ वाली पार्किंग से एक पिंक बस निकाल रही थीं, जबकि कई पुरुष ड्राइवर उन्हें देख रहे थे. रागिनी बिहार की पहली महिला बस ड्राइवरों में शामिल हैं, जिन्हें राज्य की प्रमुख ‘पिंक बस’ योजना के तहत नियुक्त किया गया है. यह योजना महिलाओं को बिहार की सबसे पुरुष-प्रधान सार्वजनिक जगहों में से एक सड़कों पर लाने की कोशिश कर रही है.
एक सहकर्मी ने उनसे पूछा, “पार्किंग से निकाल पाओगी ना गाड़ी को?”. रागिनी ने स्टीयरिंग से अपनी नज़रें नहीं हटाईं.
उन्होंने जवाब दिया, “आप लोगों को हम लड़कियों पर भरोसा कब होगा? कम से कम भरोसा करने की कोशिश तो कीजिए.”
कुछ ही देर बाद बस डिपो से निकलकर गांधी मैदान की ओर बढ़ गई. यह उन रेगुलर रूट्स में से एक है, जहां अब रागिनी बस चलाती हैं. वह बिहार की पहली खेप की छह महिला बस ड्राइवरों में से एक हैं.
इस महीने बिहार राज्य पथ परिवहन (बीएसआरटीसी) द्वारा नियुक्त की गईं सभी छह महिलाएं मुसहर समुदाय से आती हैं, जो बिहार के सबसे वंचित और हाशिये पर रहने वाले दलित समूहों में से एक है. पिछले महीने नीतीश कुमार सरकार द्वारा उनकी नियुक्ति को महिलाओं की आवाजाही और सशक्तिकरण के लिए एक बड़ी उपलब्धि बताया गया, लेकिन इन महिलाओं के लिए असली संघर्ष अब शुरू हुआ है. डिपो के बाहर जाति, गरीबी और पितृसत्ता का बोझ था. वहीं अंदर अविश्वास, महिलाओं के प्रति भेदभाव और ऐसा परिवहन तंत्र उनका इंतज़ार कर रहा था, जो अब भी उन्हें पूरी तरह स्वतंत्र होकर बस चलाने देने को तैयार नहीं है.
पिछले साल शुरू की गई बिहार की ‘पिंक बस’ योजना को पूरी तरह महिला-केंद्रित व्यवस्था के रूप में सोचा गया था — महिला यात्री, महिला कंडक्टर, महिला नोडल अधिकारी और महिला ड्राइवर. छह शहरों में शुरू की गई इन बसों का मकसद महिलाओं को सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन देना था, लेकिन एक साल बाद भी परिवहन विभाग 100 बसों के लिए सिर्फ छह महिला ड्राइवर ही भर्ती कर पाया है. ज्यादातर बसें अब भी पुरुष चला रहे हैं.
बिहार के सबसे पुरुष-प्रधान पेशों में से एक में कदम रखने की कोशिश कर रहीं मुसहर महिलाओं के सामने रुकावटें घर से ही शुरू हो जाती हैं और डिपो तक चलती रहती हैं. परिवार नौकरी से ज्यादा शादी पर जोर देता है, पुरुष सहकर्मी उनकी क्षमता पर सवाल उठाते हैं और परिवहन कार्यालय अब भी महिला कर्मचारियों के हिसाब से तैयार नहीं हैं.
पीढ़ियों से चूहा खाने वाले मुसहर समुदाय जिन्हें 2007 में बिहार में महादलित वर्ग में रखा गया था जाति व्यवस्था के सबसे निचले स्तर पर फंसे रहे. उन्हें ऐतिहासिक रूप से गांवों के किनारों पर भूमिहीन मजदूरों की तरह रहने को मजबूर किया गया और तथाकथित ऊंची जातियों द्वारा अछूत माना गया. बिहार की जाति सर्वेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक, यह समुदाय राज्य की आबादी का करीब 3.08 प्रतिशत है, लेकिन सरकारी नौकरियों में इनकी हिस्सेदारी सिर्फ 0.4 प्रतिशत है. लगभग 79 प्रतिशत मुसहर परिवारों की मासिक आय 6,000 रुपये से कम है.
अब लंबे समय तक बिहार के हाशिये पर धकेले गए इस समुदाय की छह युवा महिलाएं राज्य की सड़कों की कमान संभालने की कोशिश कर रही हैं.
सामाजिक कार्यकर्ता और पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित सुधा वर्गीज़, जिन्होंने मुसहर समुदाय के साथ लंबे समय तक काम किया है, उन्होंने कहा, “बिहार के पितृसत्तात्मक समाज में इन लड़कियों का इस पुरुष-प्रधान पेशे में आना एक क्रांतिकारी कदम है. इन लड़कियों ने हिम्मत दिखाई है और इससे राज्य की कई युवा महिलाओं को पितृसत्तात्मक सोच को चुनौती देने की प्रेरणा मिलेगी.”
उन्होंने कहा, “इस सोच को तभी बदला जा सकता है, जब मुसहर युवाओं को रोजगार मिलेगा.”

एक जैसी व्यवस्था, बस जगह अलग
इन महिलाओं के लिए ड्राइवर की सीट तक पहुंचना सिर्फ शुरुआत थी. हर सुबह 6 बजे 21 साल की रागिनी कुमारी बिहार स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (BSRTC) के बस डिपो पहुंच जाती हैं, जब पटना का ज्यादातर हिस्सा अभी सो रहा होता है.
रागिनी ने कहा, “जब मैं बस का स्टीयरिंग पकड़ती हूं, तो मुझे आत्मविश्वास मिलता है और मैं खुद को आत्मनिर्भर महसूस करती हूं. हर बार बस स्टार्ट करते समय संघर्ष से भरा अपना पूरा सफर आंखों के सामने आ जाता है.”
रागिनी यह बात एक्सीलेरेटर दबाते हुए कह रही थीं.
सभी छह भर्ती महिलाएं — रागिनी कुमारी, गायत्री कुमारी, आरती कुमारी, सरस्वती कुमारी, बेबी कुमारी और अनीता कुमारी को 2025 में योजना शुरू होने के दौरान औरंगाबाद के इंस्टीट्यूट ऑफ ड्राइविंग एंड ट्रैफिक रिसर्च (IDTR) में ट्रेनिंग दी गई थी.
इस योजना का टैगलाइन था — “महिलाओं को सुरक्षा और सम्मान देने को तत्पर बिहार सरकार”. इसे पटना, गया, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, भागलपुर और पूर्णिया समेत छह शहरों में शुरू किया गया था, जहां महिला कंडक्टर जल्दी भर्ती हो गईं, वहीं महिला ड्राइवर ढूंढना काफी मुश्किल साबित हुआ.
औरंगाबाद केंद्र में 16 महिलाओं को हल्के और भारी मोटर वाहन लाइसेंस की ट्रेनिंग दी गई. उनकी शुरुआत ट्रैफिक नियम, दुर्घटना रोकथाम और सड़क सुरक्षा की क्लास से होती थी, जिसके बाद संस्थान के बड़े ट्रेनिंग मैदान में ड्राइविंग की प्रैक्टिस कराई जाती थी.

सभी 16 महिलाएं परीक्षा में पास हो गईं, लेकिन आखिर में सिर्फ छह ने नौकरी जॉइन की.
रागिनी ने कहा, “बाकी लड़कियों को उनके परिवार वालों ने रोक दिया या उनकी शादी हो गई.” रागिनी को इस कार्यक्रम के बारे में बिहार में मुसहर समुदाय के साथ काम करने वाले एनजीओ ‘नारी गुंजन’ के जरिए जानकारी मिली थी.
कई लोगों के लिए संघर्ष सड़क पर उतरने से पहले ही शुरू हो गया था.
पटना के पुनपुन इलाके के अलाउद्दीनचक गांव से आने वाली रागिनी के पिता ने शुरुआत में उन्हें करीब 150 किलोमीटर दूर औरंगाबाद ट्रेनिंग के लिए भेजने से मना कर दिया था.
रागिनी ने कहा, “मेरे पिता ने मुझे जाने की इजाजत नहीं दी. फिर भी मैं ट्रेनिंग के लिए घर छोड़कर चली गई. यह आसान सफर नहीं था.”
गांव में पड़ोसी उनके माता-पिता को ताने देते थे कि उन्होंने बेटी को घर से बाहर रहने दिया. लोग उन्हें रागिनी की शादी कराने की सलाह देते थे.
रागिनी की मां सोनी देवी ने बताया कि लोग बार-बार कहते थे, “कैसी मां है कि बेटी घर से बाहर रहती है.”
भीड़भाड़ वाली गली में बने अपने छोटे और कम रोशनी वाले घर में बैठी सोनी देवी ने कहा कि उन्होंने फिर भी अपनी बेटी का साथ दिया.

उन्होंने कहा, “मैंने उसे अपनी पसंद का काम करने की पूरी आज़ादी दी. मैंने पूरी ज़िंदगी गरीबी में बिताई है, लेकिन मैं नहीं चाहती कि उसकी जिंदगी भी ऐसी हो.”
मसौढ़ी के एक कॉलेज से इतिहास ऑनर्स की पढ़ाई करने वाली रागिनी अब अपनी दूसरी साथियों के साथ बस डिपो से कुछ मिनट की दूरी पर 3,000 रुपये महीने किराए के घर में रहती हैं. उनकी मां को बेटी के करियर पर पूरा भरोसा है.
उन्होंने कहा, “मुझे पता है कि मेरी बेटी इतिहास बदल रही है और हमें गरीबी से बाहर निकालेगी.”
रागिनी के पिता स्कूल शिक्षक हैं, लेकिन बाकी लड़कियों के माता-पिता दिहाड़ी मजदूर हैं.
मुसहर समुदाय का लंबे समय से चूहा पकड़ने और खेतों में मजदूरी करने से जुड़ाव रहा है. यह समुदाय सामाजिक और राजनीतिक रूप से लंबे समय तक अलग-थलग रहा. टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के प्रोफेसर गौरांग सहाय की 2019 की स्टडी Substantially Present but Invisible, Excluded and Marginalised: A Study of Musahars in Bihar में कहा गया था कि यह समुदाय जन्म से ही “सामाजिक उपेक्षा, शक और प्रताड़ना” का सामना करता रहा है.
मुसहर महिला ड्राइवरों के लिए सड़कें अब सिर्फ एक नया संघर्ष का मैदान हैं.

‘यह मर्दों का काम है’
पटना में BSRTC दफ्तर की दीवारों पर इन छह महिला ड्राइवरों की तस्वीरें लगी हैं. एक पोस्टर पर लिखा है — “महिलाओं की शक्ति, देश की शक्ति.” दूसरे पोस्टर में पिंक बस सेवा को “महिलाओं के लिए, महिलाओं द्वारा और महिलाओं के संचालन वाली” सेवा बताया गया है.
लेकिन पोस्टर लग जाने से उन्हें स्वीकार नहीं किया गया.
ज्यादातर सुबह उनकी शुरुआत सूरज निकलने से पहले बस डिपो में होती है, जहां वे सुबह करीब 6 बजे ड्यूटी पर पहुंचती हैं और कई बार रात 8 या 9 बजे घर लौटती हैं.
नौकरी मिलने के बाद भी उन्हें व्यस्त रूटों पर अकेले बस चलाने की अनुमति बहुत कम दी जाती है.
बिहार में शुरू की गई 100 पिंक बसों में फिलहाल सभी में महिला ड्राइवरों के साथ पुरुष ड्राइवर भी लगाए गए हैं. अधिकारियों का कहना है कि महिलाएं अभी पटना की भीड़भाड़ वाली सड़कों पर बस चलाना सीख रही हैं.
लेकिन महिलाएं इसे अलग तरह से देखती हैं.
पटना से 60 किलोमीटर दूर भोजपुर जिले की 21-साल की आरती कुमारी ने कहा, “विभाग को बस इस बात पर भरोसा नहीं है कि हम बस चला सकती हैं.”
उनके शरीर भी जांच और टिप्पणी का विषय बन गए. पुरुष ड्राइवर अक्सर उनकी शारीरिक क्षमता पर सवाल उठाते हैं.

आरती ने बताया, “वे लोग हमारी लंबाई, वजन और शरीर को लेकर ताने मारते रहते हैं. कहते हैं — ‘शरीर में जान नहीं है, गियर कैसे लगाओगी?’”
डिपो में ड्राइवर राहुल राय का कहना है कि महिलाओं को अनुभव की कमी के कारण अकेले बस चलाने की अनुमति नहीं दी जाती.
उन्होंने कहा, “पटना की सड़कें मुश्किल हैं. ये मर्दों का काम है. इसमें ये लड़कियां नहीं टिक पाएंगी.”
परिवहन विभाग के अधिकारियों ने भेदभाव से इनकार किया, लेकिन माना कि महिलाओं की अभी निगरानी की जा रही है.
BSRTC की सहायक क्षेत्रीय प्रमुख और पिंक बस योजना की नोडल अधिकारी ममता कुमारी ने कहा, “वे सक्षम हैं, लेकिन नई हैं. इसलिए हमने उनके साथ एक पुरुष ड्राइवर भेजा है, जो उन्हें रास्ता दिखाता है. जब उन्हें ज्यादा अनुभव हो जाएगा, तब वे अकेले बस चलाएंगी.”
हालांकि, यह कब होगा इसकी अभी कोई समय-सीमा तय नहीं है. बिहार ने महिला ड्राइवर तो भर्ती कर लीं, लेकिन महिलाओं को ड्राइवर के रूप में पूरी तरह स्वीकार अभी नहीं किया है.

लेकिन महिलाएं पीछे हटने वाली नहीं हैं.
आरती ने कहा, “जो लोग हमें कम समझते हैं, हम उन्हें गलत साबित करेंगे. हम हार मानने वालों में से नहीं हैं.”
महिलाओं का यह भी आरोप है कि शुरुआत में उन्हें काम की जगह पर बुनियादी सुविधाएं भी नहीं दी गईं.
रागिनी ने कहा, “हम घर से पानी लेकर आती थीं और टॉयलेट इस्तेमाल करने के लिए घर लौटने तक इंतज़ार करती थीं.”
बाद में सुधा वर्गीज़ के दखल के बाद यह मामला वरिष्ठ अधिकारियों के सामने उठाया गया.
सुधा ने कहा, “मैंने विभाग से साफ कहा था कि छुआछूत और इस तरह के भेदभाव करके इन लड़कियों को हटाने की कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी.”
मुसहर महिलाओं के लिए यह नौकरी भी उन्हें भेदभाव की व्यवस्था से पूरी तरह बाहर नहीं निकाल सकी. वे बचपन से जातिगत भेदभाव और गरीबी का सामना करती आई थीं. डिपो के अंदर उन्हें एक और पुरानी व्यवस्था मिली — सार्वजनिक जगहों पर पुरुषों का नियंत्रण.

‘हमारी अपनी जगह’
डिपो के अंदर के तनाव और भेदभाव से दूर, ये बसें बिहार के पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम में एक ऐसी चीज़ बना रही हैं जो महिलाओं के लिए अब तक बहुत कम देखने को मिली थी—एक ऐसी जगह जिसे महिलाएं सच में अपना मानती हैं.
पिंक बस का एक रूट गांधी मैदान से दानापुर जंक्शन के बीच चलता है, जो पटना की सबसे व्यस्त सड़कों में से होकर गुज़रता है. 22 सीट वाली इन बसों में सीसीटीवी कैमरे, पैनिक बटन और सैनिटरी पैड किट लगी हुई हैं. ये बसें सिर्फ महिला यात्रियों के लिए आरक्षित हैं.
बस के अंदर का माहौल उन भीड़भाड़ वाली सिटी बसों से बिल्कुल अलग है, जिनकी महिलाएं अब तक आदी रही हैं.
पिछले हफ्ते 15 किलोमीटर का सफर करने वाली यात्री श्रुति झा ने कहा, “सामान्य बसों में पुरुषों की बहुत भीड़ होती है. जब महिलाएं बस चलाती हैं तो मैं खुद को ज्यादा सुरक्षित महसूस करती हूं. यहां लगता है कि यह हमारी अपनी जगह है.”
जब महिला यात्री किसी महिला ड्राइवर को बस चलाते देखती हैं, तो वे अक्सर सेल्फी और वीडियो बनाती हैं.

BSRTC के आंकड़ों के मुताबिक, जून 2025 से अप्रैल 2026 के बीच पटना में करीब 5.74 लाख महिलाओं ने पिंक बसों का इस्तेमाल किया, जिससे लगभग 1.25 करोड़ रुपये की कमाई हुई. इसी अवधि में छह शहरों में करीब 10 लाख यात्रियों ने इस सेवा का इस्तेमाल किया.
हालांकि, शुरुआत में इन बसों को संघर्ष करना पड़ा.
परिवहन अधिकारियों ने कहा कि शुरुआती कुछ महीनों में यात्रियों की संख्या कम रही क्योंकि कई महिलाओं को इस सेवा के बारे में जानकारी ही नहीं थी. बाद में विभाग ने स्कूलों और कॉलेजों में जागरूकता अभियान चलाए और शहरों में बैनर लगाकर इस योजना का प्रचार किया.
पिंक बस की नोडल अधिकारी ममता कुमारी ने महिलाओं के कॉलेजों और कई स्कूलों में जाकर इस योजना के बारे में जानकारी दी, जिससे यात्रियों की संख्या बढ़ने लगी.
अधिकारियों का कहना है कि अब ये बसें “ना मुनाफा, ना नुकसान” के आधार पर चल रही हैं.

संदेह, अविश्वास और सपने
डिपो में कई लोगों के लिए पिंक बस ही मंजिल है, लेकिन इन बसों को चला रही महिलाओं के लिए यह सिर्फ शुरुआत है.
इन छह महिलाओं के लिए सबसे गर्व का पल इस साल तब आया, जब पिंक बस योजना पर आधारित झांकी ने पटना के गांधी मैदान में गणतंत्र दिवस समारोह के दौरान पहला पुरस्कार जीता.
रागिनी ने कहा, “उस दिन जब मैंने बस चलाई, तो मेरा सारा डर खत्म हो गया. अब मुझे पिंक बस से बहुत लगाव हो गया है.”
इसके तुरंत बाद उनकी तस्वीरें स्थानीय अखबारों और सोशल मीडिया पर फैल गईं. हेडलाइनों में उन्हें बिहार की ऐसी बेटियां बताया गया जो रुकावटें तोड़ रही हैं.
एक हेडलाइन में लिखा था — “बिहार में पिंक बस की कमान संभालेंगी महिलाएं.”
लेकिन कई महिलाओं के लिए बस चलाना अंतिम मंजिल नहीं है.

प्रोग्राम में शामिल होने से पहले भूगोल ऑनर्स की पढ़ाई करने वाली आरती ने कहा कि वह शादी से पहले काम करना और घूमना चाहती हैं.
उन्होंने कहा, “मुझे प्राइवेट नौकरी करनी है. मैंने कभी सरकारी नौकरी नहीं चाही.”
फिलहाल ये महिलाएं एक आउटसोर्सिंग एजेंसी के जरिए करीब 17,000 रुपये महीने कमा रही हैं. यह वेतन भले छोटा हो, लेकिन उन परिवारों के लिए बहुत बड़ा बदलाव है जो पीढ़ियों से समाज के किनारे पर रहे हैं.
इस नौकरी ने महिलाओं की खुद को देखने की सोच भी बदल दी है.
आरती ने कहा, “अब लोग हमें पहचानते हैं. हमारी फोटो गूगल पर है.”
फिर भी इनमें से कोई भी ड्राइविंग को अपनी अंतिम मंजिल नहीं मानती.
रागिनी का फिलहाल सबसे बड़ा सपना बहुत साधारण है—पटना की सड़कों पर बिना किसी पुरुष सुपरवाइजर के साथ बस चलाना.
उन्होंने कहा, “मैं पूरी ज़िंदगी एक ही जगह सड़ना नहीं चाहती. मैं पूरी दुनिया घूमना चाहती हूं और नई चीज़ें सीखना चाहती हूं. यह तो सिर्फ शुरुआत है.”
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