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Tuesday, 19 May, 2026
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दिल्ली दंगा केस में उमर खालिद को अंतरिम ज़मानत नहीं, कोर्ट ने कहा-दिए गए आधार ‘उचित नहीं’

कड़कड़डूमा कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश समीर बाजपेयी ने यह आदेश स्टेट बनाम ताहिर हुसैन (उमर खालिद अंतरिम जमानत) मामले में दिया. यह मामला क्राइम ब्रांच द्वारा दर्ज एफआईआर से जुड़ा है.

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नई दिल्ली: दिल्ली की एक अदालत ने मंगलवार को 2020 दिल्ली दंगा साजिश मामले में पूर्व जेएनयू छात्र नेता उमर खालिद की अंतरिम जमानत याचिका खारिज कर दी. अदालत ने कहा कि अस्थायी रिहाई के लिए दिए गए कारण “उचित नहीं” हैं.

कड़कड़डूमा कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश समीर बाजपेयी ने यह आदेश स्टेट बनाम ताहिर हुसैन (उमर खालिद अंतरिम जमानत) मामले में दिया. यह मामला क्राइम ब्रांच द्वारा दर्ज एफआईआर से जुड़ा है.

याचिका भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 483 और सीआरपीसी की धारा 439 के तहत दायर की गई थी. इसमें उमर खालिद ने 15 दिन की अंतरिम जमानत मांगी थी, ताकि वह अपने चाचा की 40वीं की रस्म (चेहलुम) में शामिल हो सकें और अपनी मां की सर्जरी के दौरान उनकी देखभाल कर सकें.

आदेश में कहा गया कि राज्य की ओर से विशेष लोक अभियोजक अनिरुद्ध मिश्रा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश हुए. उनके साथ लीगल असिस्टेंट अयोध्या प्रसाद, इंस्पेक्टर अनिल और एसआई राज बहादुर गिल भी मौजूद थे. वहीं उमर खालिद की ओर से अधिवक्ता साहिल घई पेश हुए.

याचिका के मुताबिक, उमर खालिद के चाचा खुर्शीद अहमद खान का 10 अप्रैल को निधन हो गया था और 24 मई को दिल्ली में चेहलुम की रस्म होनी थी. इसमें यह भी कहा गया कि मेडिकल जांच के बाद उनकी मां को 2 जून को अलशिफा मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल में गांठ हटाने की सर्जरी कराने की सलाह दी गई है.

बचाव पक्ष ने कहा कि उमर खालिद परिवार के सबसे बड़े और इकलौते बेटे हैं, इसलिए मां की सर्जरी से पहले और बाद में उनकी देखभाल के लिए उनका मौजूद रहना जरूरी है. यह भी कहा गया कि उनके पिता 71 साल के हैं और पांच बहनों में से चार अपने मायके से बाहर रहती हैं. बचाव पक्ष ने यह भी बताया कि उमर खालिद को पहले भी कई बार अंतरिम जमानत मिली है और उन्होंने हर बार अदालत की सभी शर्तों का पालन किया.

वहीं, जमानत का विरोध करते हुए विशेष लोक अभियोजक मिश्रा ने कहा कि अदालत द्वारा दिखाई गई नरमी का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है और इस बार दिए गए आधार उचित नहीं हैं. अभियोजन पक्ष ने कहा कि चाचा के चेहलुम में शामिल होना जरूरी नहीं है और परिवार के दूसरे सदस्य भी यह रस्म निभा सकते हैं. मां की सर्जरी को लेकर भी कहा गया कि उनकी बहनें और पिता देखभाल कर सकते हैं और यह एक छोटी सर्जरी है, जिसमें केवल लोकल एनेस्थीसिया दिया जाएगा.

दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद अदालत ने कहा कि हर अंतरिम जमानत याचिका को उसके अपने तथ्यों के आधार पर देखा जाता है. अदालत ने कहा कि चेहलुम में शामिल होने की मांग अंतरिम जमानत का पर्याप्त आधार नहीं है. कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर रिश्ता इतना करीबी था तो चाचा की मृत्यु के समय ही जमानत मांगी जाती.

मेडिकल आधार पर अदालत ने कहा कि खुद उमर खालिद ने बताया है कि उनकी पांच बहनें हैं, जो मां की मदद कर सकती हैं, और पिता भी देखभाल के लिए मौजूद हैं. अदालत ने यह भी कहा कि सर्जरी सामान्य प्रक्रिया लगती है और इसमें उमर खालिद की विशेष जरूरत दिखाई नहीं देती.

अदालत ने कहा, “दिए गए कारणों को उचित न मानते हुए कोर्ट राहत देने को उचित नहीं समझती. आवेदन खारिज किया जाता है.”


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