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Tuesday, 19 May, 2026
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नोएडा और गुरुग्राम में लोग RWAs को अदालत तक ले जा रहे, अब हर विवाद क्यों पहुंच रहा कोर्ट

वकील सतिंदर दुग्गल ने कहा कि अब हाईराइज सोसायटी के लोग अपने अधिकार समझने लगे हैं और RWA के मनमाने फैसले आसानी से बर्दाश्त नहीं करते.

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नोएडा: नोएडा के सेक्टर 77 स्थित प्रतीक विस्टरिया की निवासी निशा राय ने 2017 में सोसायटी चुनाव लड़ने की इच्छा जताई थी. उनका सीधा सा मानना था कि उन्हें चुनाव लड़ने का पूरा अधिकार है, लेकिन आरडब्ल्यूए ने उनकी उम्मीदवारी खारिज कर दी. कहा गया कि वह फ्लैट की पहली मालिक नहीं, बल्कि दूसरी मालिक हैं, इसलिए चुनाव नहीं लड़ सकतीं. फ्लैट के पहले मालिक उनके पति थे.

राय ने कहा, “मालिक तो मालिक होता है. अगर एक नाम पहले लिखा है और दूसरा बाद में, तो इससे दूसरा मालिक कम मालिक कैसे हो गया या उसके अधिकार कैसे खत्म हो गए?”

हार न मानते हुए उन्होंने कानूनी प्रावधानों की जानकारी मांगी. धीरे-धीरे यह मामला बड़ा विवाद बन गया और दूसरे लोग भी इससे जुड़ने लगे. सोसायटी के निवासी दो हिस्सों में बंट गए—कुछ लोग राय के समर्थन में थे, जबकि कुछ आरडब्ल्यूए के पक्ष में. रेडलॉ लीगल सर्विसेज में एसोसिएट एडवोकेट निशा राय ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए आरडब्ल्यूए अध्यक्ष और निवासियों के सामने अपनी बात रखी.

यूपी अपार्टमेंट एक्ट 2010 और उसके मॉडल बायलॉज 2011 के मुताबिक, सभी रजिस्टर्ड अपार्टमेंट मालिकों को वोट देने और बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट का चुनाव लड़ने का अधिकार है.

बाद में सोसायटी की जनरल बॉडी मीटिंग में सदस्यों ने उनकी दलील मान ली. चुनाव प्रक्रिया में उनकी भागीदारी के समर्थन में वोट भी पड़ा. इसके बाद उन्होंने चुनाव जीता और 2017 से 2019 तक सोसायटी की सचिव रहीं.

लेकिन मामला सिर्फ राय तक सीमित नहीं रहा. नोएडा की दूसरी सोसायटियों के निवासी भी ऐसे ही सवाल उठाने लगे. इसके बाद सात अलग-अलग हाईराइज सोसायटियों के लोगों ने 2021 में इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दायर की, जो अब भी लंबित है.

अब मामला “निवासी बनाम आरडब्ल्यूए” का बन चुका है और अदालतें नई जंग का मैदान बन गई हैं.

राय का मामला इस बात की बड़ी तस्वीर दिखाता है कि अब हाउसिंग सोसायटी के विवाद किस तरह सुलझाए जा रहे हैं. पहले जो मामले आपस में निपट जाते थे—जैसे चुनाव, मेंटेनेंस फंड, नई सुविधाओं का निर्माण, ऑडिट रिकॉर्ड और यहां तक कि निवासी बनाम निवासी विवाद—वे अब तेज़ी से अदालतों तक पहुंच रहे हैं. पूरे एनसीआर में कंज्यूमर कोर्ट, जिला अदालतों और हाई कोर्ट में आरडब्ल्यूए प्रबंधन, बिल्डरों की गड़बड़ियों और कॉमन एरिया के प्रबंधन से जुड़े मामलों में बढ़ोतरी हो रही है. आरडब्ल्यूए विवाद अब भारत में बढ़ते कोर्ट मामलों की नई वजह बनते जा रहे हैं.

सेक्टर-77 की प्रतीक विस्टरिया निवासी और वकील निशा राय ने माना कि गेटेड सोसायटियों में निवासी बनाम निवासी मामलों में बढ़ोतरी हुई है. उन्होंने कहा कि कई बार बिल्डर या आरडब्ल्यूए से जुड़े लोग अपना प्रभाव दिखाने के लिए दूसरे निवासियों पर केस कर देते हैं | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट
सेक्टर-77 की प्रतीक विस्टरिया निवासी और वकील निशा राय ने माना कि गेटेड सोसायटियों में निवासी बनाम निवासी मामलों में बढ़ोतरी हुई है. उन्होंने कहा कि कई बार बिल्डर या आरडब्ल्यूए से जुड़े लोग अपना प्रभाव दिखाने के लिए दूसरे निवासियों पर केस कर देते हैं | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट

हरियाणा में सोसायटी रजिस्ट्रेशन और कानूनी अनुपालन से जुड़े वकील सतिंदर दुग्गल ने कहा, “पहले लोग आरडब्ल्यूए के मामलों में ज्यादा दखल नहीं देते थे, क्योंकि बहुत से लोगों को बायलॉज और कानूनी नियमों की जानकारी नहीं थी. अब लोग अपने अधिकार समझने लगे हैं और मनमाने फैसले सहने को तैयार नहीं हैं.”

पिछले 10 साल में दिल्ली-एनसीआर में तेज़ी से हाईराइज सोसायटियां बढ़ी हैं. इसके साथ ही आरडब्ल्यूए भी एक प्रभावशाली संस्था बन गई है, जिसे राज्य के अपार्टमेंट कानूनों और सोसायटी बायलॉज का समर्थन मिला हुआ है. लेकिन जैसे-जैसे लोगों में नाराजगी बढ़ रही है, विवाद अब सिर्फ गेटेड सोसायटी तक सीमित नहीं रह गए हैं और न ही आरडब्ल्यूए दफ्तरों में सुलझ रहे हैं.

दुग्गल ने कहा, “अब लोग आरडब्ल्यूए से सिर्फ इंसाफ मांग नहीं रहे, बल्कि अदालत में जाकर उसे हासिल करने की मांग कर रहे हैं. इससे साफ है कि निवासी अब अपने अधिकारों को कितनी गंभीरता से लेने लगे हैं.”

‘वेलफेयर से वॉरफेयर तक’

एडवोकेट सतिंदर दुग्गल अपने फरीदाबाद स्थित ऑफिस में बैठे फोन पर बात कर रहे थे. फोन करने वाला व्यक्ति अपनी सोसाइटी में निवासियों और आरडब्ल्यूए के बीच पार्किंग विवाद पर सलाह मांग रहा था. दुग्गल ने उसे कानूनी कार्रवाई से पहले आरडब्ल्यूए के साथ ठीक से बैठक करने की सलाह दी. जैसे ही उन्होंने फोन रखा, तुरंत दूसरी कॉल आ गई. एक और आरडब्ल्यूए से जुड़ा मामला.

अलग-अलग राज्यों के सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट, एफआईआर दर्ज करने से जुड़ी किताबों और आपराधिक कानून की पुस्तकों से घिरी मेज के बीच दुग्गल लगातार फोन पर एक के बाद एक मामले सुनते रहते हैं. बीच-बीच में वह कुछ टाइप करने के लिए फोन स्पीकर पर रखते हैं और वेटिंग एरिया की तरफ देखते हैं, जहां कई लोग अपनी सोसाइटी से जुड़े विवाद या आरडब्ल्यूए और बिल्डर से जुड़ी समस्याएं लेकर उनसे मिलने का इंतज़ार कर रहे होते हैं.

सतिंदर दुग्गल ने कहा, “आरडब्ल्यूए अपने असली मकसद को भूल चुके हैं और वेलफेयर से वॉरफेयर की तरफ बढ़ गए हैं. निवासी आरडब्ल्यूए से लड़ रहे हैं, कई बार आपस में भी लड़ रहे हैं और बिल्डरों तथा आरडब्ल्यूए के बीच की लड़ाई सबसे लंबी और सबसे बड़ी है.”

यह कहते हुए उन्होंने उन कागजों, शिकायतों और जवाबों के ढेर की ओर इशारा किया, जो आरडब्ल्यूए मामलों से जुड़े थे और जिन पर वह काम कर रहे थे.

हाल ही में दुग्गल के पास एक मामला आया, जिसमें फरीदाबाद सेक्टर 86 के 150 ईडब्ल्यूएस निवासी, जिनमें एक ऑटो-रिक्शा चालक भी शामिल है, अपनी सोसाइटी के आरडब्ल्यूए के खिलाफ मामला दर्ज कराना चाहते थे. आरोप है कि आरडब्ल्यूए ईडब्ल्यूएस और निम्न-आय वर्ग के निवासियों को पार्क और दूसरी साझा सुविधाओं का इस्तेमाल नहीं करने देता और उन्हें सोसाइटी चुनावों में भाग लेने का मौका भी नहीं दिया गया.

मास्टर प्लान दिल्ली (एमपीडी-2021) और हरियाणा टाउन एंड कंट्री प्लानिंग नियमों जैसी नीतियों के तहत, निजी ग्रुप हाउसिंग परियोजनाओं में कुल यूनिट्स या एफएआर (फ्लोर एरिया रेशियो) का 15 प्रतिशत हिस्सा ईडब्ल्यूएस और निम्न-आय वर्ग के लिए आरक्षित रखना ज़रूरी है.

ऑटो चालक ने पहचान गुप्त रखने की शर्त पर कहा, “हमें रहने के लिए जगह तो दी गई है, लेकिन वहां हर दिन भेदभाव का सामना करना पड़ता है. हमारे बच्चों को तो कॉमन पार्क में जाने तक की अनुमति नहीं है.”

अब इस मामले में हरियाणा के रजिस्ट्रार जनरल ऑफ सोसाइटीज और स्टेट रजिस्ट्रार ऑफ सोसाइटीज के पास शिकायत दर्ज कराई गई है, जिसमें ईडब्ल्यूएस निवासियों को वोट देने के अधिकार से वंचित किए जाने का मुद्दा उठाया गया है.

अपील में कहा गया है, “हरियाणा अपार्टमेंट ओनरशिप एक्ट, 2012 के तहत ईडब्ल्यूएस फ्लैट मालिकों (जिनमें एससी और ओबीसी मतदाता भी शामिल हैं) को अवैध रूप से मतदान अधिकारों से वंचित किए जाने के खिलाफ 16.05.2026 से पहले तुरंत हस्तक्षेप की मांग की जाती है. साथ ही 17.05.2026 के लिए तय चुनाव कार्यक्रम पर तुरंत रोक लगाने की प्रार्थना की गई है.”

एडवोकेट सतिंदर दुग्गल अपने फरीदाबाद ऑफिस में. दुग्गल के पास हाल ही में एक केस आया है जिसमें फरीदाबाद सेक्टर 86 के 150 EWS लोग शामिल हैं, जिसमें एक ऑटो-रिक्शा ड्राइवर भी शामिल है. वे सोसाइटी की RWA के खिलाफ केस करना चाहते थे, जिस पर आरोप है कि वह EWS और कम इनकम वाले लोगों को पार्क, कॉमन फैसिलिटी इस्तेमाल करने की इजाज़त नहीं देती है और उन्हें सोसाइटी के चुनाव में हिस्सा लेने का मौका भी नहीं देती है | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट
एडवोकेट सतिंदर दुग्गल अपने फरीदाबाद ऑफिस में. दुग्गल के पास हाल ही में एक केस आया है जिसमें फरीदाबाद सेक्टर 86 के 150 EWS लोग शामिल हैं, जिसमें एक ऑटो-रिक्शा ड्राइवर भी शामिल है. वे सोसाइटी की RWA के खिलाफ केस करना चाहते थे, जिस पर आरोप है कि वह EWS और कम इनकम वाले लोगों को पार्क, कॉमन फैसिलिटी इस्तेमाल करने की इजाज़त नहीं देती है और उन्हें सोसाइटी के चुनाव में हिस्सा लेने का मौका भी नहीं देती है | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट

ऑटो चालक ने कहा, “अगर उन्हें पता चल गया कि शिकायत मैंने की है, तो वे मेरा ऑटो जला देंगे.”

दूसरी ओर, दुग्गल ने उस चालक और दूसरे ईडब्ल्यूएस निवासियों को अपनी कानूनी लड़ाई जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया.

दुग्गल को सोसाइटी के अंदरूनी विवादों को सुलझाने को लेकर भी लोगों के फोन आते हैं—चाहे मामला चुनाव का हो, बिजली समस्या का या बिल्डरों से विवाद का.

सतिंदर दुग्गल ने कहा, “अब लोग पार्किंग विवादों के लिए भी वकीलों को फोन करते हैं. आज आरडब्ल्यूए मामलों की स्थिति यही हो गई है.”

यह कहते हुए वह एक और क्लाइंट के साथ व्यस्त हो गए, जो पिछले साल से चल रहे पार्किंग विवाद में उलझा हुआ था.

गेटेड सोसाइटियों में होने वाले सबसे आम विवादों पर बात करते हुए, Noida Federation of Apartment Owners Associations (NOFAA) के अध्यक्ष राजीव सिंह ने कहा कि निवासी बनाम निवासी विवादों में आमतौर पर पार्किंग झगड़े, पालतू जानवरों से जुड़ी शिकायतें, सीपेज की समस्याएं, बिना अनुमति बालकनी में बदलाव और व्हाट्सऐप ग्रुप पर शुरू हुए विवाद शामिल होते हैं, जो बाद में कानूनी लड़ाई में बदल जाते हैं.

उन्होंने कहा, “वहीं निवासी बनाम आरडब्ल्यूए/एओए मामलों में ज्यादातर विवाद वित्तीय पारदर्शिता की कमी, छिपाकर बढ़ाए गए मेंटेनेंस शुल्क, सिंकिंग फंड के गलत इस्तेमाल, पुनर्विकास विवाद, बैचलर्स या पालतू जानवर रखने वालों पर लगाए गए प्रतिबंध और अपार्टमेंट एक्ट के पालन न होने से जुड़े होते हैं.”

राजीव सिंह ने कहा, “दुर्भाग्य से, कॉन्डोमिनियम्स के भीतर होने वाले कानूनी विवाद आधुनिक शहरी जीवन का हिस्सा बन चुके हैं. जैसे-जैसे ज्यादा लोग इन ‘वर्टिकल विलेजेज’ में रहने लगे हैं, व्यक्तिगत अधिकारों और सामूहिक प्रशासन के बीच टकराव पिछले कुछ वर्षों में एक बड़ा कानूनी मुद्दा बन गया है.”

निवासी बनाम निवासी

गुरुग्राम के निवासी 80-वर्षीय सुभाष तलवार का 2019 में अपनी सोसाइटी की एक महिला निवासी के साथ पार्किंग को लेकर विवाद हो गया. यह विवाद बढ़ता गया और बाद में सोसाइटी में तय पार्किंग स्थानों के बड़े मुद्दे को लेकर बिल्डर और कई दूसरे निवासी भी इसमें शामिल हो गए.

कुछ दिनों बाद तलवार को एक नोटिस मिला और यह जानकर वह हैरान रह गए कि उसी महिला ने उनके खिलाफ छेड़छाड़ का एफआईआर दर्ज कराया है. महिला ने आरोप लगाया कि तलवार ने उनके साथ गलत व्यवहार किया.

घटना के समय मौजूद एक दूसरे निवासी ने कहा, “बिल्डरों और निवासियों का अहंकार इतना बढ़ गया है कि अगर कोई गलत काम के खिलाफ आवाज उठाता है, तो वे अपने पड़ोसियों पर भी छेड़छाड़ के मामले दर्ज करा देते हैं.”

उन्होंने आगे कहा, “ऐसी शिकायतों का इस्तेमाल कई बार निजी बदला लेने के लिए भी किया जाता है.”

निशा राय ने भी माना कि गेटेड सोसाइटियों में निवासी बनाम निवासी मामलों में बढ़ोतरी हुई है, जहां बिल्डर या आरडब्ल्यूए से जुड़े लोग कई बार दूसरे निवासियों पर अपना प्रभाव और ताकत दिखाने के लिए मामले दर्ज कराते हैं.

तलवार का मामला अगले दो साल तक पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में चलता रहा. बाद में सबूतों और गवाहों की कमी के कारण मामला खारिज कर दिया गया और एफआईआर रद्द कर दी गई.

सुभाष तलवार ने कहा, “सोसाइटी में हर चीज पर नियंत्रण रखने वाला बिल्डर सिर्फ मुझे अपनी ताकत दिखाना चाहता था, क्योंकि वह मुझे कभी पसंद नहीं करता था. इसी वजह से उन्होंने मेरे खिलाफ झूठा मामला बनाया.”

2021 में निवासियों के एक समूह ने गुरुग्राम में सोसाइटी की पूर्व वेलफेयर बॉडी ALARWA (Ambience Lagoon Apartment Residents Welfare Association) के सदस्यों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई. आरोप था कि 2014 से 2017 के बीच उन्होंने फर्जी दस्तावेजों और बदले हुए डीड ऑफ डिक्लेरेशन के जरिए Lagoon Apartments, Ambience Island के प्रबंधन पर अवैध कब्जा कर लिया.

शिकायतकर्ताओं, जो कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त संस्था LRACA (Lagoon Residents Apartment Condominium Association) का हिस्सा थे, ने आरोप लगाया कि ALARWA ने निवासियों को गुमराह किया, अवैध रूप से मेंटेनेंस शुल्क वसूला और बिना अधिकार के सोसाइटी के फंड का गलत इस्तेमाल किया.

ALARWA के एक सदस्य ने कहा, “यह सिर्फ ताकत की लड़ाई है. जब नए लोग ताकत हासिल करना चाहते हैं, तो चुनाव लड़ने और बैठकों में शामिल होने के बजाय वे झूठे आरोप लगाने लगते हैं.”

यह विवाद सोसाइटी के प्रबंधन और वित्तीय नियंत्रण को लेकर दोनों समूहों के बीच शक्ति संघर्ष से पैदा हुआ. मामले की जांच गुरुग्राम पुलिस कर रही है.

लंबित मामले

गुरुग्राम के मयफील्ड गार्डन्स निवासी और वकील संजय गुप्ता हमेशा से सोसाइटी से जुड़े मुद्दों और आरडब्ल्यूए के कामकाज को लेकर खुलकर बोलते रहे हैं. उनके सुझाव, आरोप और शिकायतें अक्सर व्हाट्सऐप आरडब्ल्यूए और अपार्टमेंट फेडरेशन समूहों में पढ़ी जाती हैं.

गुप्ता लंबे समय से आरडब्ल्यूए फंड के कथित गलत इस्तेमाल और सोसाइटी के भीतर अवैध कब्जों जैसे मुद्दों को उठाते रहे हैं.

आरडब्ल्यूए व्हाट्सऐप समूहों में निवासी और पदाधिकारी उनसे सबूत भी मांगते हैं. वहीं कुछ दूसरे लोग अपने अनुभव साझा करते हुए उनका समर्थन भी करते हैं.

10 अक्टूबर 2024 को गुप्ता ने अपनी सोसाइटी एन-ब्लॉक आरडब्ल्यूए के खिलाफ गुरुग्राम के जिला रजिस्ट्रार, फर्म्स एंड सोसाइटीज के पास शिकायत दर्ज कराई.

अपनी शिकायत में उन्होंने सोसाइटी में वित्तीय और प्रशासनिक गड़बड़ियों के मुद्दे उठाए. इनमें “कबाड़ीवाले और अवैध सुरक्षा व्यवस्था से अवैध धन वसूली”, “MLA रोड फंड का गलत इस्तेमाल”, “सड़कों के लिए अवैध वसूली और धमकियां” जैसे आरोपों के साथ आरडब्ल्यूए प्रशासन से जुड़े कई सवाल शामिल थे.

फेडरेशन ऑफ अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन की वकील और लीगल एडवाइजर ऋतु भरियोक ने कहा कि इन मामलों को पांच साल तक खींचने की ज़रूरत नहीं है. हालांकि, डिस्ट्रिक्ट रजिस्ट्रार ऑफिस में केस फाइल होने के बाद, स्टेट रजिस्ट्रार ऑफिस तक पहुंचने में लगभग दो साल लग सकते हैं | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट
फेडरेशन ऑफ अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन की वकील और लीगल एडवाइजर ऋतु भरियोक ने कहा कि इन मामलों को पांच साल तक खींचने की ज़रूरत नहीं है. हालांकि, डिस्ट्रिक्ट रजिस्ट्रार ऑफिस में केस फाइल होने के बाद, स्टेट रजिस्ट्रार ऑफिस तक पहुंचने में लगभग दो साल लग सकते हैं | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट

नवंबर 2024 में जिला रजिस्ट्रार ने आधिकारिक रूप से जांच के आदेश दिए और महादेव शर्मा (सेवानिवृत्त सहायक रजिस्ट्रार, सहकारी समितियां) को जांच अधिकारी नियुक्त किया. उन्हें शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों की सच्चाई की जांच कर 45 दिनों के भीतर रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया, जो HRRS एक्ट 2012 और सोसाइटी के बायलॉज के तहत किया जाना था.

जिला रजिस्ट्रार द्वारा जारी जांच आदेश में कहा गया, “N-Block RWA, Mayfield Gardens, Sector-51, Gurugram में कई गड़बड़ियां दिखाई देती हैं और शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए सभी आरोपों की जांच जरूरी है.” दिप्रिंट के पास इस आदेश की कॉपी मौजूद है.

मामला अभी भी जांच के अधीन है.

गुप्ता को जिला रजिस्ट्रार ऑफिस में कानूनी शिकायत दर्ज किए हुए दो साल हो चुके हैं. तब से वह लगातार मामले की निगरानी कर रहे हैं और फॉलो-अप शिकायतें भी जमा कर रहे हैं. हालांकि, मामला अब भी जिला और राज्य रजिस्ट्रार कार्यालयों के बीच घूमता रहा है.

लंबे समय तक चलने वाले कानूनी विवादों पर बात करते हुए, Federation of Apartment Owners Association की कानूनी सलाहकार और अधिवक्ता ऋतु भरियोक ने कहा, “गुरुग्राम में 2016 से लंबित कई मामले अब तक सुलझ नहीं पाए हैं.”

उन्होंने कहा, “इन मामलों को पांच साल तक नहीं खिंचना चाहिए. लेकिन जिला रजिस्ट्रार कार्यालय में मामला दर्ज होने के बाद उसे राज्य रजिस्ट्रार कार्यालय तक पहुंचने में लगभग दो साल लग जाते हैं. कई मामलों में जब फाइल राज्य रजिस्ट्रार कार्यालय पहुंचती है, तो उसे वापस भेज दिया जाता है, जिससे फिर कई और साल लग जाते हैं. इसी तरह मामले एक चक्र में फंस जाते हैं और आखिरकार फिर वहीं पहुंच जाते हैं जहां से शुरू हुए थे.”

रेडलॉ लीगल सर्विसेज में निशा राय और उनकी टीम, जो मुख्य रूप से आरडब्ल्यूए और सोसाइटी से जुड़े मामलों को संभालती है, ने देखा है कि इस तरह की कानूनी लड़ाइयों में विशेषज्ञता रखने वाले वकीलों की संख्या बढ़ रही है.

निशा राय ने कहा, “लोग इन सोसाइटियों में रहने के लिए लाखों रुपये खर्च करते हैं, इसलिए अगर कोई उनके जीवन को किसी भी तरह असहज बनाता है, तो उसके खिलाफ मामला दर्ज कराने के लिए वे हजारों रुपये और खर्च करने से भी पीछे नहीं हटेंगे.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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