नलिया (गुजरात): एंट्री पर लगा एक बोर्ड भारत के सबसे छोटे वाइल्ड लाइफ सैंक्चुअरी में से एक के बारे में बताता है. यह 2.02 वर्ग किलोमीटर का घास से घिरा इलाका है, जो दिल्ली की कई कॉलोनियों से भी छोटा है. कुछ मीटर दूर ऊपर से बिजली की लाइन गुजरती है. बीच में हवा में घूमती पवन चक्कियां दिखाई देती हैं.
गुजरात के कच्छ जिले के नलिया के अबडासा तालुका में संरक्षण की तस्वीर कुछ ऐसी दिखती है.
मार्च के आखिर में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने घोषणा की थी कि कच्छ में एक दशक बाद पहली बार ग्रेट इंडियन बस्टर्ड का चूजा पैदा हुआ है. सरकार ने इसे “बड़ी उपलब्धि” बताया था.
Gujarat sees a GIB chick after a decade, through a novel conservation measure – the jumpstart approach, coordinated by the Ministry, State Forest Departments of Rajasthan and Gujarat, and Wildlife Institute of India.
Envisioned by PM Shri @narendramodi ji in 2011 to conserve… pic.twitter.com/oE2DYTZBUF
— Bhupender Yadav (@byadavbjp) March 28, 2026
लेकिन एक महीने के भीतर ही वह चूजा गायब हो गया.
26 मार्च को कच्छ बस्टर्ड सेंचुरी में “जंपस्टार्ट” नाम की एक प्रयोगात्मक तकनीक से निकला यह चूजा, तीन-चार दिन की खोज के बाद भी गुजरात वन विभाग और वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की टीमों को नहीं मिला.
वन विभाग और डब्ल्यूआईआई के अधिकारियों का मानना है कि यह चूजा शिकारी जानवरों का शिकार हो गया होगा. इनमें सियार, लोमड़ी, जंगली बिल्लियां, नेवले, शिकारी पक्षी या मॉनिटर लिजार्ड शामिल हो सकते हैं. अधिकारियों ने कहा कि ऐसे नतीजे असामान्य नहीं हैं और यह कार्यक्रम जारी रहेगा.
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, जिसे स्थानीय कच्छी भाषा में ‘घोरड़’ और वैज्ञानिक भाषा में ‘आर्डियोटिस नाइग्रिसेप्स’ कहा जाता है, कभी भारत के 11 राज्यों में पाया जाता था. वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के मुताबिक 1960 के दशक में इनकी संख्या करीब 1,260 थी. अब यह पक्षी गंभीर रूप से संकटग्रस्त है और इसकी संख्या घटकर करीब 150 रह गई है. इनमें ज्यादातर राजस्थान और गुजरात में हैं, जबकि महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में इनकी संख्या और भी कम है.
कच्छ में, जहां 2007 से 2010 के बीच 48 ग्रेट इंडियन बस्टर्ड थे, अब सिर्फ तीन मादा बची हैं. वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक यहां 2016 के बाद से कोई नर पक्षी दर्ज नहीं किया गया है.
संरक्षण क्षेत्र होने के साथ-साथ अबडासा 1990 के दशक के आखिर से पवन ऊर्जा विकास का बड़ा केंद्र भी रहा है. ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को जिस तरह का खुला और सपाट इलाका चाहिए, वही गुजरात के इस हिस्से को देश के सबसे उत्पादक पवन ऊर्जा क्षेत्रों में भी बदलता है. यहां सैकड़ों पवन चक्कियां लग चुकी हैं और उनके साथ घास के मैदानों के बीच से गुजरती बिजली की सैकड़ों किलोमीटर लंबी लाइनें भी बिछ चुकी हैं.
अबडासा का यही विरोधाभासी दृश्य संरक्षण और विकास के बीच कानूनी संघर्ष का भी हिस्सा बना है. इससे जो तस्वीर सामने आती है, वह किसी संरक्षण की सफलता की कहानी नहीं है. बल्कि यह एक ऐसे पक्षी की कहानी है जिसे तेजी से खत्म होने से रोकने की कोशिश की जा रही है.


ऑपरेशन और उसकी सीमाएं
हालांकि कच्छ में कोई नर ग्रेट इंडियन बस्टर्ड नहीं है, फिर भी तीनों मादा पक्षी पूरा घोंसला बनाने का चक्र पूरा करती हैं. वे कई सालों से बिना निषेचित (इनफर्टाइल) अंडे दे रही हैं.
सिद्धांत रूप में जंपस्टार्ट आसान लगता है. बिना निषेचन वाले अंडे को चुपचाप राजस्थान के कैप्टिव ब्रीडिंग सेंटर से लाए गए निषेचित अंडे से बदल दिया जाता है, ताकि मादा ग्रेट इंडियन बस्टर्ड बिना जाने उसे सेती रहे. लेकिन असल में अंडे को बदलना और उससे सफलतापूर्वक चूजा निकलना बेहद मुश्किल प्रक्रिया है.
अगस्त 2025 में वन विभाग और वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने एक मादा ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की पहचान कर उसे टैग किया था, जिसने बिना निषेचन वाला अंडा दिया था. उसके बदले लाया गया निषेचित अंडा राजस्थान के जैसलमेर जिले के सम से अबडासा तक 770 किलोमीटर सड़क मार्ग से लाया गया. यह यात्रा 19 घंटे में बिना रुके एक हाथ में पकड़े जाने वाले पोर्टेबल इनक्यूबेटर में पूरी हुई.
प्रोजेक्ट जीआईबी के तहत जंपस्टार्ट का नेतृत्व करने वाले कच्छ के वन संरक्षक धीरज मित्तल ने बताया कि इसमें कितनी समन्वय की जरूरत होती है. उन्होंने कहा, “पहले पक्षी को घोंसला बनाना चाहिए. फिर किसी को यह देखना होगा कि उसने अंडा दिया है. और जब उसने अंडा दिया हो, उसी समय जैसलमेर केंद्र में भी एक उपलब्ध निषेचित अंडा होना चाहिए, जिसकी उम्र या समय एक जैसा हो.”
यह सब एक साथ होना जरूरी था. उन्होंने कहा, “यहां पक्षी पर नजर रखी जा रही थी और WII की टीम को वहां एक मेल खाता अंडा मिला. तभी उस अंडे को यहां लाया गया.”
अंडा बदलने के बाद मां पक्षी उसे स्वीकार करेगी, इसकी कोई गारंटी नहीं होती. ग्रेट इंडियन बस्टर्ड यह पहचान सकते हैं कि घोंसले के साथ छेड़छाड़ हुई है या इंसान का असर अंडे या आसपास के इलाके पर पड़ा है. अगर मादा को हस्तक्षेप का एहसास हो जाए, तो वह अंडा छोड़ सकती है.
मित्तल ने कहा, “हम भाग्यशाली रहे कि ग्रेट इंडियन बस्टर्ड ने अंडे को सेया. हम भाग्यशाली रहे कि उससे चूजा निकला. हम भाग्यशाली रहे कि मां उसे अपने साथ लेकर चली और चूजा उसके साथ चलता रहा. यह लगभग एक महीने तक चलता रहा.”
मित्तल ने इस प्रक्रिया की जटिलता समझाने के लिए सैटेलाइट का उदाहरण दिया. उन्होंने कहा, “आपने सैटेलाइट लॉन्च कर दिया. अगला चरण होता है कि वह अपनी कक्षा में स्थापित हो जाए. इसी तरह हम चूजे को अंडे से निकालने में सफल रहे, लेकिन उसे जीवित नहीं रख पाए.”
इसके कई कारण हो सकते हैं. जैसे ऐसी मां पक्षी जिसने पहले कभी बच्चे नहीं पाले हों, और ऐसा सैंक्चुअरी जो सिर्फ बाड़ से घिरा हो, जिसके भीतर छोटे शिकारी आसानी से घुस सकते हैं.
गुजरात वन विभाग के अपने बयान में, जो अप्रैल के आखिर में चूजे के गायब होने के बाद जारी किया गया, माना गया कि “हालांकि यह तरीका यानी जंपस्टार्ट अंडों को शिकारियों से बचाने में असरदार है, लेकिन इससे चूजे के जन्म के बाद उसके जीवित रहने की संभावना जरूरी नहीं बढ़ती.”
बयान में कहा गया कि वैसे भी इसके बचने की संभावना बहुत ज्यादा नहीं थी. जंगल में दिए गए जीआईबी के सिर्फ करीब 40 प्रतिशत अंडों से ही सफलतापूर्वक चूजे निकलते हैं. और जब चूजे निकल भी जाते हैं, तब भी करीब 60 प्रतिशत दो महीने से ज्यादा जीवित नहीं रह पाते.
मित्तल ने कहा कि दो महीने के बाद इनके जीवित रहने की संभावना काफी बढ़ जाती है.
मित्तल ने कहा कि जंपस्टार्ट की कोशिश में समय इसलिए लगा क्योंकि “इसके लिए पर्याप्त अंडे होना जरूरी है.”
भारत में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की संख्या घटने के पीछे तीन बड़े कारण माने जाते हैं. शिकार, आवास का खत्म होना और हाल के वर्षों में बिजली की लाइनों से टकराना.
उन्होंने कहा, “राजस्थान में भी इनकी संख्या घट रही है. ऐसा नहीं है कि आप बाजार से जाकर अंडे खरीद लें. राजस्थान को अंडे साझा करने पर सहमत होना पड़ता है और उनके केंद्रों में पर्याप्त अंडे भी होने चाहिए.”
गुजरात भेजा गया हर अंडा जैसलमेर के कैप्टिव ब्रीडिंग कार्यक्रम के लिए एक अंडा कम कर देता है. उन्होंने कहा, “यह देरी नहीं है. यह बेहद सटीकता वाला काम है.”
अब कच्छ में सिर्फ एक नहीं बल्कि दो टैग की गई मादा पक्षी हैं. मित्तल ने कहा कि अगली कोशिश इस अनुभव के आधार पर की जाएगी. उन्होंने कहा, “पहली बार यह करने में हमने बहुत कुछ सीखा है. अगली बार हम इसे और बेहतर तरीके से करेंगे.”
अगली कोशिश की कोई तय समय सीमा नहीं है क्योंकि घोंसला बनाने का सही समय और निषेचित अंडों की उपलब्धता बदलती रहती है.
शिकारियों से बचाने के लिए अब 30 किलोमीटर लंबी नई शिकारी-रोधी बाड़ बनाने की योजना है. यह एक इंच की जाली वाली, छह से सात फुट ऊंची और ऊपर की ओर मुड़ी हुई बाड़ होगी. मित्तल ने कहा, “हमें पूरा भरोसा है कि हम इसे इसी साल करेंगे.”
हालांकि अभी तक काम शुरू नहीं हुआ है.

अब ग्रेट इंडियन बस्टर्ड का भविष्य क्या है?
जंपस्टार्ट तरीका इसलिए संभव हो पाया क्योंकि भारत का कैप्टिव ग्रेट इंडियन बस्टर्ड ब्रीडिंग प्रोग्राम 2019 में 16 पक्षियों से बढ़कर 2026 की शुरुआत तक दो केंद्रों में 86 पक्षियों तक पहुंच गया. 2019 में जैसलमेर के सम संरक्षण केंद्र की स्थापना हुई थी. इन केंद्रों में कृत्रिम गर्भाधान से पैदा हुआ पहला चूजा अक्टूबर 2024 में निकला था.
#WATCH | Jaisalmer, Rajasthan: In a major milestone for Great Indian Bustard (GIB) conservation, two new chicks have hatched at Ramdevra and Sudasari breeding centres using Artificial Insemination (AI) technology. With this, the total GIB population across facilities managed by… pic.twitter.com/Cj7bjk5w52
— ANI (@ANI) May 13, 2026
आने वाले महीनों में कैप्टिव ब्रीडिंग से तैयार किए गए ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को राजस्थान में धीरे-धीरे जंगल में छोड़ा जाएगा. इस प्रक्रिया में पक्षियों को पूरी तरह आजाद करने से पहले अर्ध-जंगली माहौल में ढाला जाता है. सुप्रीम कोर्ट में जमा विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट के मुताबिक 2028 तक ऐसे पक्षियों को अबडासा में भी छोड़े जाने की योजना है.
लेकिन असली समस्या उसके बाद शुरू होती है.
विशेषज्ञ समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि हर ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को 100 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा क्षेत्र की जरूरत होती है. रिपोर्ट में कहा गया कि यह प्रजाति तभी बच पाएगी जब इसके इलाके के 25 प्रतिशत से ज्यादा हिस्से में सालभर घास के मैदान मौजूद हों.
फिलहाल अबडासा में यह स्थिति पूरी नहीं हो रही है.
इसके पीछे एक वजह प्रोसोपिस जुलीफ्लोरा नाम की झाड़ी भी है. इसे कई दशक पहले सरकारी वृक्षारोपण अभियान के तहत कच्छ में लाया गया था. अब यह झाड़ी नलिया के बड़े हिस्सों में फैल चुकी है.
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को भोजन तलाशने, अपने प्रदर्शन और शिकारियों को पहचानने के लिए खुली जमीन चाहिए. लेकिन प्रोसोपिस इन तीनों चीजों को खत्म कर देती है. इसे हटाने का काम कई सालों से चल रहा है, लेकिन इसका फैलाव अभी भी बहुत ज्यादा है.

पवन चक्कियां, बिजली की लाइनें और लागू न हुआ अदालत का आदेश
भुज से नलिया तक करीब 120 किलोमीटर की सड़क के रास्ते में बिजली की लाइनें सड़क को काटती हुई या उसके साथ-साथ चलती दिखाई देती हैं. इनमें 33 केवी की वितरण लाइनें शामिल हैं. साथ ही 66 केवी की लाइनें भी हैं जो पवन ऊर्जा से बनी बिजली को मुख्य ग्रिड तक पहुंचाती हैं. कुछ हिस्सों में खुले घास के मैदानों के बीच ऊंचे टावरों वाली हाई-वोल्टेज लाइनें भी दिखाई देती हैं.
संरक्षण कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों का कहना है कि बिजली की लाइनों से टकराना आज भारत में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के लिए सबसे बड़ा खतरा है.
इसकी वजह यह है कि ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की सामने देखने की क्षमता कमजोर होती है. उसकी आंखें सिर के किनारों पर होती हैं और जमीन देखने के लिए बनी होती हैं. तेज रफ्तार और ऊंचाई पर उड़ते समय यह पक्षी बिजली की लाइनों को समय रहते नहीं देख पाता और उनसे टकरा जाता है.
वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने कई अध्ययनों में अनुमान लगाया है कि पूरे देश में हर साल 18 ग्रेट इंडियन बस्टर्ड बिजली की लाइनों से टकराकर मर जाते हैं. जिस प्रजाति की संख्या कुछ सौ तक सीमित हो, उसके लिए हर मौत अहम होती है.
राजस्थान और गुजरात में बिजली की लाइनों को हटाने या दूसरी जगह ले जाने का मामला 2019 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था. वन्यजीव कार्यकर्ता और पूर्व नौकरशाह एम.के. रणजीतसिंह झाला ने जनहित याचिका दायर कर कहा था कि ऊपर से गुजरने वाली बिजली की लाइनें ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की घटती आबादी को और तेजी से खत्म कर रही हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में पहली बार इस मामले में दखल देते हुए राजस्थान और गुजरात में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के 99,000 वर्ग किलोमीटर आवास क्षेत्र में मौजूद सभी ओवरहेड बिजली लाइनों को जमीन के नीचे ले जाने का आदेश दिया था. इसमें कच्छ सेंचुरी भी शामिल थी. गुजरात और राजस्थान में करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये की 50 गीगावॉट क्षमता वाली नवीकरणीय ऊर्जा कंपनियों को इसका खर्च उठाना पड़ता.
केंद्र सरकार ने तुरंत इस आदेश को चुनौती दी. पर्यावरण और बिजली मंत्रालय ने मिलकर कहा कि सभी ओवरहेड बिजली लाइनों को जमीन के नीचे ले जाना “व्यावहारिक रूप से असंभव” है.
मार्च 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने अपना आदेश बदलते हुए संरक्षित क्षेत्र को 99,000 वर्ग किलोमीटर से घटाकर 13,163 वर्ग किलोमीटर कर दिया.
साथ ही पहले बनाई गई तीन सदस्यीय विशेषज्ञ समिति को बढ़ाकर नौ सदस्यीय कर दिया गया और उसे मौजूदा बिजली ढांचे पर लाइन-दर-लाइन समाधान निकालने का काम सौंपा गया.
19 दिसंबर 2025 को जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और ए.एस. चंदूरकर ने नया फैसला सुनाया. इसमें संरक्षित क्षेत्र को फिर बदलकर 14,753 वर्ग किलोमीटर कर दिया गया. इसमें 14,013 वर्ग किलोमीटर राजस्थान में और 740 वर्ग किलोमीटर गुजरात में है. अदालत ने दोहराया कि ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की सुरक्षा “समझौता न करने वाला मुद्दा” है.
अदालत ने यह भी आदेश दिया कि इस क्षेत्र में नई पवन चक्कियां या बड़े सोलर पार्क नहीं लगाए जाएंगे और न ही मौजूदा परियोजनाओं का विस्तार होगा. अबडासा का खास जिक्र करते हुए अदालत ने संरक्षित क्षेत्र के भीतर मौजूद कुल 79.2 किलोमीटर लंबी चार 33 केवी बिजली लाइनों को तुरंत जमीन के नीचे ले जाने या दूसरी जगह शिफ्ट करने का निर्देश दिया.
अब तक इन ओवरहेड लाइनों को हटाया नहीं गया है. इस बारे में पूछने पर वन विभाग ने पूरा हुआ काम बताने वाला कोई डेटा नहीं दिया.
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के पालन पर मित्तल ने कहा कि मौजूदा बिजली लाइनों को लेकर अदालत के निर्देश तीन हिस्सों में बंटे थे. कुछ लाइनें पूरी तरह हटानी हैं, कुछ को दूसरी दिशा में ले जाना या जमीन के नीचे करना है और कुछ लाइनें केस-दर-केस आधार पर सुरक्षा उपायों के साथ बनी रह सकती हैं.
उन्होंने कहा कि गुजरात एनर्जी ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन यानी जीईटीसीओ की एक लाइन के लिए वन विभाग डब्ल्यूआईआई से सुरक्षा उपायों पर सलाह ले रहा है. उन्होंने कहा, “हम अपनी तरफ से सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक सब कुछ कर रहे हैं. माननीय अदालत के आदेश का पालन न करने का सवाल ही नहीं उठता.”
दिसंबर के फैसले में अदालत ने केंद्र सरकार से यह भी कहा था कि वह तीन महीने के भीतर निगरानी और पालन समिति बनाए. मार्च में इसकी समय सीमा खत्म हो गई, लेकिन अभी तक समिति नहीं बनी.
द प्रिंट को यह भी पता चला कि 2024 में बढ़ाई गई विशेषज्ञ समिति ने इसी महीने गुजरात पर आधारित एक रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपी है. इसमें डॉ. देवेश गढ़वी का एक औपचारिक असहमति नोट भी शामिल था. उन्होंने चेतावनी दी कि अबडासा के लिए अपनाई गई सिफारिशें “मौजूदा ग्रेट इंडियन बस्टर्ड और लेसर फ्लोरिकन की आबादी के लिए ज्यादा खतरा बन सकती हैं और 2028 तक छोड़े जाने वाले कैप्टिव ब्रीडिंग पक्षियों के लिए तो और भी ज्यादा.”
इस असहमति नोट में 400 केवी भचुंडा-वरसाना लाइन का भी जिक्र था. यह हाई-वोल्टेज ट्रांसमिशन लाइन है जिसके टावर पहले ही ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के आवास क्षेत्र में लगाए जा चुके हैं, जबकि पहले बनी तीन सदस्यीय समिति ने पक्षियों से टकराने के खतरे के कारण इस रूट को मंजूरी नहीं दी थी.
डॉ. देवेश गढ़वी ने कहा कि इस लाइन को या तो मौजूदा 220 केवी कॉरिडोर के साथ दूसरी दिशा में ले जाया जाए या फिर इसमें बर्ड फ्लाइट डाइवर्टर लगाए जाएं. ये घूमने या हिलने वाले उपकरण होते हैं जो तारों पर तय दूरी पर लगाए जाते हैं ताकि पक्षियों को लाइनें साफ दिखाई दें.
ज्यादा व्यापक तौर पर नोट में कहा गया कि संरक्षित ग्रेट इंडियन बस्टर्ड क्षेत्र में 33 केवी और उससे ऊपर की सभी ओवरहेड लाइनों को जमीन के नीचे किया जाए या पूरी तरह दूसरी जगह ले जाया जाए. सिर्फ डाइवर्टर लगाकर उन्हें वहीं बनाए न रखा जाए.
नोट में कहा गया, “हमें कुछ इलाकों और आसमान को पक्षियों के लिए पवित्र छोड़ना होगा ताकि वे जीवित रह सकें और आने वाली पीढ़ियां हमारे देश की इस प्राकृतिक धरोहर को देख सकें.”
इसी समिति में विशेष सरकारी आमंत्रित सदस्य के रूप में शामिल बिजली क्षेत्र के एक अधिकारी ने इस असहमति नोट पर जवाबी टिप्पणी दी. अधिकारी ने कहा कि वह “66 केवी और उससे ज्यादा वोल्टेज वाली ओवरहेड बिजली लाइनों को जमीन के नीचे करने से सहमत नहीं हैं.” उन्होंने कहा कि बिजली लाइनों को जमीन के नीचे करना “किसी भी पक्षी की आबादी बढ़ाने का समाधान नहीं है.”
इसी विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि नलिया के 677 वर्ग किलोमीटर के बफर जोन में से 95 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को “अतिरिक्त महत्वपूर्ण क्षेत्र” की सूची से हटा दिया गया है. यह इलाका संरक्षित आवास के आसपास ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के आवाजाही कॉरिडोर के रूप में चिन्हित था. इसे पहले से मौजूद ऊर्जा ढांचे को जगह देने के लिए हटाया गया.

30 किलोमीटर दूर, एक ऐसा प्रोजेक्ट जो काम कर रहा है
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड सेंचुरी से करीब 30 किलोमीटर दूर कनकपुर गांव में द कॉर्बेट फाउंडेशन 2009 से एक अलग तरह का संरक्षण काम कर रही है. यह ऐसा काम नहीं है जो बड़ी सुर्खियां बनाता हो. इसमें अंडों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना या पोर्टेबल इनक्यूबेटर इस्तेमाल करना शामिल नहीं है. इसके बजाय इसमें प्रोसोपिस हटाना, घास के बीज बोना और गांव वालों के साथ लगातार बातचीत करना शामिल है, ताकि करीब 81 हेक्टेयर यानी लगभग एक वर्ग किलोमीटर बंजर पड़ी सामुदायिक जमीन को बदला जा सके.
इसका मकसद सीधा नहीं लेकिन बहुत अहम था. पंचायत की यह जमीन ग्रेट इंडियन बस्टर्ड का आवास नहीं है. लेकिन इस बंजर जमीन को मवेशियों के चरने के लिए चरागाह में बदलने से उस दबाव को कम किया जा सकता है जो वरना सेंचुरी के आसपास की खुली झाड़ियों वाली जमीन पर पड़ता, जहां ये पक्षी रहते हैं. जब गांव के मवेशियों के लिए यहां पर्याप्त चारा मिल जाता है, तो वे उन इलाकों में नहीं जाते जहां मादा ग्रेट इंडियन बस्टर्ड घोंसले बनाती हैं. इससे उन जगहों पर दखल कम रहता है जहां इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है.
देवेश गढ़वी, जो द कॉर्बेट फाउंडेशन में डिप्टी डायरेक्टर और पक्षी विज्ञान, रिसर्च व सस्टेनेबिलिटी विभाग के प्रमुख हैं, ने इसकी प्रक्रिया समझाई. डॉ. गढ़वी करीब दो दशकों से अबडासा इलाके में काम कर रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई विशेषज्ञ समिति में शामिल एकमात्र स्वतंत्र वन्यजीव संरक्षण विशेषज्ञ हैं. उन्हें ग्रेट इंडियन बस्टर्ड और उसके आवास पर काम करने का लंबा अनुभव है.
उन्होंने कहा, “घोरड़ को खुले घास के मैदान चाहिए. जब हम यहां गौचर विकसित करते हैं, तो उन मुख्य इलाकों पर मवेशियों का दबाव कम हो जाता है.”
कनकपुर लौटकर खेती करने वाले सिविल इंजीनियर वडीलाल भाई परबत भाई पोकार ने बताया कि गांव इस प्रक्रिया से कैसे जुड़ा. उन्होंने कहा, “गांव में एक एकड़ भी गौचर जमीन नहीं थी.”
उन्होंने कहा कि पंचायत और गौचर समिति ने फाउंडेशन और सरकार के साथ मिलकर बंजर सामुदायिक जमीन को साझा चरागाह में बदला. आज यहां 350 देसी कांकराज गायें चरती हैं. इसके साथ जैव विविधता भी लौट आई है. पक्षी, छोटे जीव-जंतु और आसपास के इलाकों में घोरड़ को वह खुला इलाका मिलने लगा है जिसकी उन्हें जरूरत होती है.
उन्होंने कहा, “गौचर मवेशियों को सहारा देता है. मवेशी समुदाय को सहारा देते हैं. और खुली जमीन जैव विविधता को बचाए रखती है.”
विधि मोदी, जो द कॉर्बेट फाउंडेशन में सीनियर रिसर्च फेलो हैं, ने गांव के साथ मिलकर तैयार की गई बहाली की प्रक्रिया समझाई. उन्होंने कहा, “हमने गांव वालों को मॉनसून के दौरान ‘नो ग्रेजिंग’ यानी चराई न करने की व्यवस्था अपनाने की ट्रेनिंग दी है. इससे घास के बीज उग पाते हैं और अपना पूरा जीवन चक्र पूरा कर लेते हैं. यह तरीका घास के गुच्छों को विकसित होने में मदद करता है और लंबे समय तक इस काम को टिकाऊ बनाता है.”
उन्होंने आगे कहा, “मॉनसून के बाद, आमतौर पर नवंबर में, जब घास के बीज गिर जाते हैं, तब हम घास काटते हैं, छोटे गट्ठर बनाते हैं और उन्हें धूप में सुखाते हैं. जनवरी में हम इन सूखे गट्ठरों को इकट्ठा करके गांव के गोदाम में रखते हैं ताकि गर्मियों या सूखे के समय इस्तेमाल किया जा सके, जब घास कम होती है.”
अलग-अलग जमीनों पर इस्तेमाल की जाने वाली तकनीकों के बारे में उन्होंने कहा, “घास उगाने की तकनीक जमीन की खराब स्थिति पर निर्भर करती है. अगर इलाके में घास के गुच्छे मौजूद हैं और सिर्फ ज्यादा चराई हुई है, तो जुताई या खेती की जरूरत नहीं होती. सिर्फ मॉनसून के दौरान सुरक्षा देना काफी होता है.
“अगर प्रोसोपिस जुलीफ्लोरा बहुत ज्यादा फैल चुका है, तो उसे मशीन से जड़ सहित हटाना पड़ता है. अगर जमीन पहले खेती के लिए इस्तेमाल हो चुकी है, तो जुताई करनी पड़ सकती है. वरना बीज छिड़कने या सॉसर-पिट तरीका अपनाया जाता है. कभी-कभी नर्सरी में घास के पौधे उगाकर उन्हें यहां लगाया जाता है, लेकिन यह बारिश पर निर्भर करता है. कुल मिलाकर हम इंसानी दखल को कम से कम रखना चाहते हैं.”
मोदी ने कहा, “अब गांव अपने मवेशियों के चारे के मामले में आत्मनिर्भर हो गया है. हमें यह देखकर गर्व होता है कि इस खास प्रोजेक्ट को लेकर गांव वालों में मालिकाना भावना कितनी मजबूत हो गई है. अब वही आगे बढ़कर हमें बताते हैं कि घास काटने का सही समय आ गया है. हम कुछ दिनों में यह काम शुरू करेंगे.”
कनकपुर में करीब 180 एकड़ जमीन बहाल की जा चुकी है, जबकि वडापद्धर गांव में करीब 200 एकड़ जमीन बहाल हुई है. इसके अलावा रापर गढ़वाली गांव में अभी 100 एकड़ जमीन पर बहाली का काम चल रहा है.
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड का आगे क्या होगा?
विशेषज्ञ समिति की अबडासा रिपोर्ट में 33 पक्षी प्रजातियों का जिक्र किया गया है. इनमें दो गंभीर रूप से संकटग्रस्त, चार संकटग्रस्त और 13 संवेदनशील प्रजातियां शामिल हैं, जिनका आवास ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के साथ मिलता है. रिपोर्ट में कहा गया कि कच्छ भारत की इकलौती जगह है जहां तीन बस्टर्ड प्रजातियां एक साथ पाई जाती हैं. इनमें ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, लेसर फ्लोरिकन और एशियन हौबारा शामिल हैं.
जब मित्तल से पूछा गया कि अगला कदम क्या होगा, तो उन्होंने कहा कि इस साल शिकारी-रोधी बाड़ बनाई जाएगी और डब्ल्यूआईआई की सलाह से आवास कार्य योजना को अंतिम रूप दिया जाएगा. जंपस्टार्ट की और कोशिशें भी होंगी. उन्होंने कहा, “अब हम इसे दो पक्षियों के साथ कर सकते हैं, जब भी मौका मिलेगा.”
जब यही सवाल डॉ. देवेश गढ़वी से पूछा गया, तो उनका जवाब अलग था. उन्होंने कहा, “ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को बचाने का पूरा प्रोजेक्ट इस बात पर निर्भर करता है कि 2028 तक माननीय सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को कैसे लागू किया जाता है.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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