scorecardresearch
Saturday, 16 May, 2026
होममत-विमतनेशनल इंट्रेस्टपाकिस्तान टैक्टिकल रूप से मजबूत, पर स्ट्रैटेजिक तौर पर खुद को नुकसान पहुंचाता है. इसलिए बार-बार चूक करता है

पाकिस्तान टैक्टिकल रूप से मजबूत, पर स्ट्रैटेजिक तौर पर खुद को नुकसान पहुंचाता है. इसलिए बार-बार चूक करता है

भारत के खिलाफ हर युद्ध में हारने के बावजूद पाकिस्तान जीत का दावा करता रहा है. आगे वह क्या कर सकता है, इसका अंदाज़ा लगाने के लिए हम सबूतों पर नज़र डालेंगे.

Text Size:

अब जबकि 87 घंटे की मुठभेड़ की सालगिरह मनाने की होड़ खत्म हो चुकी है, हम देख सकते हैं कि भारत के साथ पाकिस्तान के युद्ध का इतिहास कैसा रहा है. सामरिक रूप से शानदार, लेकिन रणनीतिक रूप से नुकसानदायक. यह इस लेख का अच्छा शीर्षक भी हो सकता है. यही वजह है कि वह पूरी ताकत के साथ और कभी-कभी नाटकीय शुरुआत करने के बावजूद हर युद्ध हारता रहा है.

लेकिन यह तय मानिए कि 1971 और कारगिल युद्ध को छोड़कर उसने ज्यादातर युद्धों में अपनी जीत का दावा किया है. करीब 1200 शब्दों के इस कॉलम में जितने सबूतों का आकलन संभव है, उतना हम यहां करने की कोशिश करते हैं.

हर युद्ध या मुठभेड़ को बार-बार दोहराना इस उपमहाद्वीप की लोकप्रिय आदत रही है. पाकिस्तान के मामले में फर्क सिर्फ इतना है कि वहां इसे उद्योग के स्तर पर चलाया जाता है, जिसमें कोर्सबुक्स भी शामिल हैं.

87 घंटे की मुठभेड़ को ही देख लीजिए. फील्ड मार्शल आसिम मुनिर से लेकर पाकिस्तान की राजनीति के सबसे निचले स्तर तक पूरा पाकिस्तान यह मानता है कि इस बार जीत उसकी हुई; कि इसके बाद, जिस ऐतिहासिक ‘करीबी साथी’ अमेरिका ने उसे छोड़ दिया था, उसके डॉनल्ड ट्रंप ने उसे फिर गले लगाया और इसे उसकी खुद की घोषित ‘जीत’ की मंजूरी माना गया.

हकीकत यह है कि मुनीर और उनके साथियों ने इस योजना को पहले ही लागू करने की तैयारी कर ली थी. पहलगाम हत्याकांड के सिर्फ चार दिन पहले और ऑपरेशन सिंदूर के करीब दो हफ्ते पहले स्टीव विटकॉफ के बेटे ज़ाक का दौरा और क्रिप्टो सौदा (जिसमें ‘टेक’ के मामले में माहिर एक पाकिस्तानी युवा, एक कोर कमांडर का दामाद और अब क्रिप्टो कारोबारी शामिल था) हो चुका था.

मुनीर ने जब पहलगाम का इंतज़ाम कर दिया था, तब ही उन्हें मालूम था कि भारत जवाब देगा. इसलिए उन्होंने ट्रंप परिवार के लालच का फायदा उठाने की चाल पहले ही तैयार कर ली थी. दुनिया में अधिकतर लोगों से पहले इस बात को समझने के लिए आप मुनीर की तारीफ कर सकते हैं या हो सकता है कि सऊदी अरब ने उन्हें पहले ही सावधान कर दिया हो.

कोई लड़ाई शुरू होने से पहले ही उन्होंने ट्रंप के ‘सिस्टम’ को अपने पक्ष में कर लिया था. एक हफ्ते पहले, 16 अप्रैल 2025 को विदेश में बसे पाकिस्तानियों को दिए गए उनके भाषण ने इसका संकेत दे दिया था. वह हत्याकांड भारत की जवाबी कार्रवाई देखने की उनकी योजना का हिस्सा था. ट्रंप को अपने पक्ष में लाकर कश्मीर मुद्दे को उठाना उनका रणनीतिक लक्ष्य था. पहली चाल पूरी तरह सफल रही, लेकिन दूसरी नाकाम रही.

अब हम सैन्य पहलू पर आते हैं. पाकिस्तान ने यह जानते हुए भारत को उकसाया था कि भारत जवाब में सैन्य कार्रवाई करेगा, इसलिए उसने यह भी अंदाज़ा लगाया होगा कि किन जगहों को निशाना बनाया जाएगा.

वे यह भी जानते थे कि भारत कौन से हथियार इस्तेमाल करेगा. इसलिए भारतीय वायुसेना (IAF) ने 7 मई की रात 1 बजकर 7 मिनट पर जब उड़ान भरी, तब वे तैयार थे. अपने अंदरूनी इलाकों में निशानों पर हमलों को वे रोक नहीं पाए, लेकिन यह उनका मकसद भी नहीं था. वे जवाब को हवाई मुठभेड़ तक सीमित रखना चाहते थे.

AEW विमानों, और J-10C, JF-17 के साथ PL-15 मिसाइलों को आगे रखकर इस खास कार्रवाई का पहले से अभ्यास किया गया था. उन्हें कुछ सफलता मिली और वे इसका जश्न मना रहे थे. भारत में उच्च स्तर पर कुछ विमानों के नुकसान की बात मानी गई है. पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) ने इसे ‘सामरिक गलती’ बताया, लेकिन IAF ने हिसाब बराबर करने की योजना बनाई.

सबसे पहले पाकिस्तान के एयर डिफेंस को दबाव में लाने के लिए एंटी-रेडिएशन ड्रोनों से हमला किया गया. और आखिर में PAF के सबसे सुरक्षित हवाई अड्डों पर लगातार हवाई हमले किए गए. PAF का कोई भी विमान, या कितनी भी दूरी तक मार करने वाली मिसाइल क्यों न हो, जवाब देने के लिए उड़ान नहीं भर सकी.

जब तक पाकिस्तान ने संघर्षविराम की मांग की, तब तक सिर्फ एक पक्ष के पास सबूत थे कि दूसरे पक्ष को कितना नुकसान हुआ है: व्यावसायिक उपग्रहों से मिली तस्वीरें बता रही थीं कि PAF के कम-से-कम 13 हवाई अड्डे और तीन रडार नष्ट हो चुके थे. इसके बावजूद पाकिस्तान अपनी जीत का जश्न सिर्फ इसलिए मना रहा है क्योंकि उसने हमारे कुछ विमान गिरा दिए. एक भारतीय कमांडर ने इसे ज्यादा संतुलित तरीके और खेल भावना के साथ कहा कि यह ऐसा ही था जैसे भारत ने पाकिस्तान को हॉकी मैच में 3-1 से हरा दिया हो.

बात सिर्फ इतनी थी कि उनके सेंटर फॉरवर्ड ने फील्ड गोल किया और हमारे खिलाड़ियों ने तीन पेनल्टी कॉर्नर को गोल में बदल दिया.

हमें नुकसान पहुंचाने के उनके दावों का कोई सबूत नहीं है. भारत के सभी हवाई अड्डों के पास शहर बसे हुए हैं, कुछ भी छिपा नहीं है, लेकिन कोई उपग्रह तस्वीर सामने नहीं आई है. पाकिस्तान के सभी दावे बेकार हैं. मैं नहीं कह सकता कि इस ‘विशेषण’ को दूसरे शब्दों से कम कड़वा और छापने लायक क्यों माना जाता है.

बहरहाल, यहां मैं हाल के इतिहास को दोहराने की कोशिश नहीं कर रहा हूं बल्कि अपनी मुख्य बात पर जोर दे रहा हूं. वह यह है कि पाकिस्तानी फौजी दिमाग अच्छी तरह सोचता है, लेकिन सिर्फ सामरिक चालों के हिसाब से सोचता है. वह यह अंदाज़ा नहीं लगा पाता कि भारत किस तरह जवाब देगा. यह अंदरूनी कमजोरी, भारतीय सेना के प्रति अनादर या दोनों का मेल हो सकता है. यह विचार हमें पाकिस्तानी लेखक शुजा नवाज़ की किताब Crossed Swords से मिलता है.

कारगिल युद्ध की बात करते हुए उन्होंने लिखा है कि भारत के साथ ‘वार गेम’ खेल रही पाकिस्तानी टीम ने बिल्कुल सही अनुमान लगाया था कि अटल बिहारी वाजपेयी सरकार किस तरह जवाब देगी. अगर उसे गंभीरता से लिया जाता, तो पाकिस्तान हार, पीछे हटने और बेइज्जती से बच सकता था, लेकिन उसका मज़ाक उड़ाया गया. सामरिक दृष्टि से कारगिल युद्ध शानदार था. धोखा, योजना, गोपनीयता, इलाके का चुनाव और जगह का महत्व, हर लिहाज़ से यह शानदार था, लेकिन किसी ने यह नहीं सोचा कि ‘अगर ऐसा नहीं हुआ तो…’, भारत ने अगर मुकाबला किया तो? इसके लिए रणनीतिक सोच चाहिए, जिसकी पाकिस्तान में कमी है. इसलिए हमने कहा : सामरिक रूप से शानदार, लेकिन रणनीतिक रूप से नुकसानदायक.

भारतीय सेना में कोई यह नहीं कहता कि पाकिस्तानी किसी काम के नहीं हैं, लेकिन उनकी सोच बड़ी तस्वीर नहीं देखती, बल्कि कुछ गर्व के पलों में ही खुश होती रहती है.

कारगिल इसलिए रणनीतिक हार साबित हुई क्योंकि इसने नियंत्रण रेखा (LOC) की वैश्विक मान्यता को मजबूत कर दिया. इस्लामाबाद हवाई अड्डे पर थोड़ी देर रुकते हुए बिल क्लिंटन ने पाकिस्तान को कैमरे पर कहा था कि इस उपमहाद्वीप के नक्शे पर खींची गई सीमाओं को अब खून से नहीं बदला जा सकता.

आइए, हम पुलवामा के बाद की कहानी पर नज़र डालें. चूंकि, पाकिस्तान के पास उकसाने वाली आतंकी कार्रवाई का विकल्प हमेशा रहता है, उसे मालूम था कि बड़े आतंकी हमले का जवाब देने के लिए IAF का इस्तेमाल होगा. इसलिए शायद वर्षों से ‘ऑपरेशन स्विफ्ट रिटॉर्ट’ की योजना बनाई जा रही थी और उसका अभ्यास किया जा रहा था. इस ऑपरेशन में PAF के 26 विमानों का इस्तेमाल करके IAF को उस इलाके तक लाया गया जो उनकी रेंज से बाहर था और जहां उनकी संख्या भी कम थी. वे IAF के मिग-21 को गिराने का जश्न आज भी मनाते हैं. वह सामरिक दृष्टि से भले उपलब्धि रही हो, लेकिन रणनीतिक दृष्टि से भारत ने जो डर पैदा किया, वह सात साल तक बना रहा, पहलगाम कांड तक.

यह कहानी पहले भी पुरानी लड़ाइयों में दोहराई जा चुकी है. छंब पर कब्ज़ा करने के लिए ऑपरेशन जिब्राल्टर (जिसमें सादे कपड़ों में करीब 10,000 सैनिकों ने कश्मीर घाटी में घुसपैठ की थी) और इसके बाद अखनूर पर कब्जा करने के लिए ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम चलाया गया, ताकि कश्मीर को भारत से काट दिया जाए और उस पर आसानी से कब्ज़ा हो सके.

सामरिक दृष्टि से यह शानदार कार्रवाई थी, लेकिन पाकिस्तानी सेना के मुख्यालय GHQ में किसी बेहद मूर्ख व्यक्ति ने यह सोच लिया कि भारत घुटने टेक देगा और कश्मीर छोड़ देगा और युद्ध को पंजाब के मैदानों तक नहीं पहुंचने देगा. भारत की संभावित जवाबी कार्रवाई पर ठीक से विचार नहीं किया गया. उसी युद्ध में खेमकरण में टैंकों से किया गया अप्रत्याशित हमला इस उपमहाद्वीप के सबसे साहसी हमलों में गिना जाता है. उसके लक्ष्य बहुत बड़े थे. लेकिन आज तक सुर्खियां यही बनी हुई हैं कि वह बुरी तरह नाकाम हमला साबित हुआ. भारत की जवाबी कार्रवाई का अंदाजा किसी ने नहीं लगाया था. उस युद्ध की सबसे बड़ी लड़ाई पाकिस्तान की हार और उसके बेहतरीन टैंकों के नष्ट होने की थी.

पाकिस्तान ने उस युद्ध में अपनी जीत का दावा किया था, लेकिन विडंबना यह है कि वह 6 सितंबर को ‘डिफेंस ऑफ पाकिस्तान डे’ के रूप में मनाता है. उसके संशोधनवादी इतिहासकार उस युद्ध में उसके रक्षात्मक मुद्रा में जाने को अपनी गौरवगाथा के रूप में दर्ज करके खुश होते हैं, जबकि उसने साफ लक्ष्य के साथ हमला किया था. वह कश्मीर को सैन्य ताकत से लेने का उसका आखिरी मौका था, लेकिन उसने उसे गंवा दिया.

ऑपरेशन सिंदूर की चाहे जो भी सच्चाई हो, पाकिस्तान ने उससे गलत सबक लिया है. यह प्रवृत्ति उसके कूटनीतिक कद में बढ़त के भ्रम के कारण और बढ़ती जाएगी. भारत को इसका ध्यान रखना होगा और पाकिस्तान की अगली उकसाने वाली कार्रवाई का अंदाजा उससे भी पहले लगाना होगा, जितना हमने छह महीने पहले लगाया था.

पाकिस्तान ने ऑपरेशन सिंदूर के बाद किए गए प्रचार को सामूहिक रूप से अपना लिया है और अब वह यह सोचने लगा है कि दुनिया या तो उस पर निर्भर है, या फिर दिशाहीन है. इतिहास हमें बताता है कि जब पाकिस्तानी सत्ता ऐसी स्थिति में पहुंचती है, तब वह सबसे खराब, और आखिर में खुद को नुकसान पहुंचाने वाले राजनीतिक और रणनीतिक फैसले करती है, चाहे वे सामरिक रूप से कितने भी अच्छे क्यों न दिखें.

(नेशनल इंट्रेस्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: BJP के लिए मुस्लिम वोटर्स अब ज़रूरी नहीं. हिंदू-नेतृत्व गठबंधन ही मोदी-शाह को दे सकता है चुनौती


 

share & View comments