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Saturday, 9 May, 2026
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BJP के लिए मुस्लिम वोटर्स अब ज़रूरी नहीं. हिंदू-नेतृत्व गठबंधन ही मोदी-शाह को दे सकता है चुनौती

इस चुनाव ने भाजपा और सेक्युलर पार्टियों के बीच साफ हिंदू-मुस्लिम बंटवारे को और मजबूत कर दिया है. भाजपा के विरोधी अब मुस्लिम पार्टियों जैसे दिखने लगे हैं. हालांकि, उनके नेता हिंदू हैं.

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करीब सात साल पहले मैंने इस कॉलम में एक लेख लिखा था, जिसका शीर्षक था : ‘क्या मुसलमान मोदी-शाह की भाजपा, या भारत के लिए कोई अहमियत रखते हैं?’ आज इस सवाल को फिर से उठाना ज़रूरी हो गया है.

हाल के राज्यों के चुनाव नतीजे, खासकर पश्चिम बंगाल और असम के, जहां मुस्लिम वोटरों की आबादी 30 फीसदी से ज्यादा है — दिखाते हैं कि यह मुद्दा अब भी मौजूद है, बल्कि शायद और बड़ा हो गया है.

इन सवालों के जवाब और ज्यादा परेशान करने वाले हैं. राजनीतिक तौर पर देखें तो निष्कर्ष यह निकलता है कि मुसलमान वोटर आज मोदी-शाह की भाजपा के लिए 2019 के मुकाबले काफी कम मायने रखते हैं.

पश्चिम बंगाल और असम में भाजपा ने इस बार एक भी मुस्लिम उम्मीदवार उतारे बिना दो-तिहाई सीटें जीत लीं. दूसरी तरफ, असम में विपक्ष के जीते 24 उम्मीदवारों में से 22 मुस्लिम हैं. इनमें कांग्रेस के 19 जीते उम्मीदवारों में से 18 मुस्लिम हैं.

पश्चिम बंगाल में 293 नए विधायकों में 40 मुस्लिम हैं, जिनमें से 34 तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के हैं. यानी टीएमसी के कुल 80 जीते उम्मीदवारों में से 45 फीसदी मुस्लिम हैं.

इसका मतलब यह है कि जिन दो राज्यों में मुस्लिम आबादी सबसे ज्यादा है (जम्मू-कश्मीर अब राज्य नहीं है), वहां मुसलमान सत्ता से बाहर हो चुके हैं. वहां से उनका लगभग सफाया हो गया है और वे भाजपा के सबसे बड़े विरोधी बन गए हैं. विडंबना यह है कि उनके नेता हिंदू हैं और वे सभी भाजपा से हार चुके नेता हैं.

इस चुनाव ने भाजपा और सेक्युलर पार्टियों के बीच हिंदू-मुस्लिम आधार पर साफ बंटवारा पक्का कर दिया है.

उदाहरण के लिए, केरल में UDF के 102 नए विधायकों में 30 मुस्लिम और 29 ईसाई हैं. सेक्युलर खेमे को इस बात से राहत हो सकती है कि कम-से-कम केरल में मुसलमान सत्ता में शामिल हैं, लेकिन यह राहत इस डर से कम हो जाती है कि भाजपा अब इसे “अल्पसंख्यकों की सरकार” बताकर हिंदू वोटरों को प्रभावित करने और केरल के ईसाइयों में फूट डालने की कोशिश करेगी.

राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो 18वीं लोकसभा में कुल 24 मुस्लिम सांसद हैं, यानी सिर्फ 4.42 फीसदी, जबकि देश में मुस्लिम वोटरों की आबादी 15 फीसदी से ज्यादा है.


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16वीं लोकसभा में 22 और 17वीं लोकसभा में 27 मुस्लिम सांसद थे. पहली नज़र में यह बहुत चौंकाने वाला नहीं लगता, लेकिन 1980 में 49 और 1984 में 45 मुस्लिम सांसद चुने गए थे. यानी उनका प्रतिशत क्रमशः 9 और 8.3 था.

लोकसभा में मुस्लिम सांसदों की संख्या अक्सर 5 फीसदी के आसपास रही है, लेकिन केंद्र सरकार में उन्हें हमेशा अच्छा प्रतिनिधित्व मिलता रहा. यहां तक कि वाजपेयी सरकार में सिकंदर बख्त मंत्री थे.

राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, लोकसभा उपसभापति जैसे संवैधानिक पदों से लेकर सेना और खुफिया एजेंसियों के प्रमुख पदों तक मुसलमान पहुंच चुके हैं, लेकिन आज वे किसी भी ऐसे पद पर नहीं हैं.

आज कोई मुस्लिम मुख्यमंत्री नहीं है. जम्मू-कश्मीर अब केंद्रशासित प्रदेश है. सिर्फ एक मुस्लिम राज्यपाल हैं — बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन.

केंद्र सरकार के करीब 100 सचिवों में सिर्फ एक मुस्लिम हैं, कामरान रिजवी, जो हैवी इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के सचिव हैं. सुप्रीम कोर्ट के 32 जजों में भी सिर्फ एक मुस्लिम जज हैं — जस्टिस एहसानुद्दीन अमानुल्लाह.

भारत के आखिरी मुस्लिम मुख्य न्यायाधीश जस्टिस ए.एम. अहमदी थे, जो 24 मार्च 1997 को रिटायर हुए थे.

यह सब देखकर ऐसा लग सकता है कि भारतीय मुसलमानों को किनारे कर दिया गया है, लेकिन इस सोच पर फिर से विचार करने की ज़रूरत है.

डॉक्टरी, कानून, शिक्षा, विज्ञान, सॉफ्टवेयर, बैंकिंग, मनोरंजन और मीडिया जैसे क्षेत्रों में मुसलमानों की संख्या बढ़ रही है. सिविल सेवा और सेना में भी उनका चयन बढ़ा है.

इसलिए समस्या यह नहीं है कि मुसलमान हर क्षेत्र से बाहर हो रहे हैं. असली समस्या यह है कि राजनीति में उनका प्रतिनिधित्व लगातार कम हो रहा है.

मैंने 2019 में इस विषय पर जो पहला लेख लिखा था, उसका शीर्षक भाजपा नेता और पूर्व राज्यसभा सदस्य बलबीर पुंज से हुई बातचीत से लिया गया था.

1996 में वाजपेयी सरकार सिर्फ 13 दिन चली थी और 1999 में एक वोट से गिर गई थी. तब पुंज इस बात से नाराज थे कि मुस्लिम वोटों पर निर्भर पार्टियां भाजपा को स्वीकार नहीं कर रही थीं.

उनका मानना था कि मुसलमान तय कर रहे थे कि भारत पर कौन राज करेगा और कौन नहीं, लेकिन मोदी-शाह के दौर ने इस स्थिति को बदल दिया है.

ये तथ्य तीन बड़े निष्कर्षों की ओर इशारा करते हैं :

  • भाजपा की विरोधी या तथाकथित सेक्युलर पार्टियां अब “मुस्लिम पार्टियों” जैसी दिखने लगी हैं, जबकि उनके नेता हिंदू हैं. भाजपा भी उन्हें इसी तरह पेश करना चाहती है.

इससे “एक हिंदू बनाम बाकी सब” वाला माहौल बनता है, जो 80 फीसदी बनाम 20 फीसदी की राजनीति में बदल जाता है. यह भाजपा के लिए सबसे फायदेमंद स्थिति है.

और भाजपा चुनिंदा इलाकों में ईसाइयों के बीच भी काम करती रहेगी. गोवा और केरल में उसे इसका मौका मिला है. भाजपा के पास धैर्य भी है और समय भी.

उत्तर-पूर्व में उसने ईसाई जनजातियों के साथ सुविधाजनक रिश्ता बना लिया है. वहां उसने कभी गोमांस पर प्रतिबंध की मांग नहीं की. इसी पर असदुद्दीन ओवैसी ने तंज कसते हुए कहा था: “यूपी में गाय मम्मी, गोवा में गाय यम्मी.”

अब भी कुछ सेक्युलर पार्टियां मुस्लिम वोटों पर निर्भर हैं, लेकिन वे इतनी सतर्क हो गई हैं कि मुसलमानों के समर्थन में खुलकर बोलने से भी बचती हैं.

जैसे दिल्ली में आम आदमी पार्टी सरकार ने शाहीन बाग आंदोलन और उसके बाद हुए दंगों के दौरान चुप्पी बनाए रखी. “मुस्लिम समर्थक” कहलाने के डर ने उन्हें दूर रखा.

  • इससे भारत में धर्मनिरपेक्षता बचाने की जिम्मेदारी पूरी तरह मुसलमानों पर आ गई है. यह न सिर्फ मुश्किल और अव्यवहारिक है, बल्कि गलत भी है.

आज मुसलमानों से कहा जाता है कि वे उसी उम्मीदवार को वोट दें जो भाजपा को हरा सके. इसके पीछे सिर्फ यह उम्मीद होती है कि इससे उन्हें सुरक्षा मिल जाएगी.

एक मजबूत धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के लिए यह बहुत कमजोर सोच है. सच्चर कमेटी की रिपोर्ट भी बताती है कि इससे मुसलमानों को ज्यादा फायदा नहीं हुआ.

असल में यही रिपोर्ट ममता बनर्जी के लिए नारा बन गई थी, क्योंकि इससे पता चला था कि पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा सरकार के दौरान मुसलमानों की हालत कितनी खराब थी.

अब सेक्युलर दलों को हिंदुओं के साथ इतना बड़ा गठबंधन बनाना होगा, जो जीत दिलाने वाला वोट प्रतिशत जुटा सके.

पहले हिंदी पट्टी की पार्टियां जाति के आधार पर हिंदुओं को बांटकर जीत हासिल करती थीं, लेकिन मोदी-शाह ने उस राजनीति को तोड़ दिया है.

अब सवाल है — क्या किसी के पास कोई नया आइडिया है? कांग्रेस के पास तो बिल्कुल नहीं दिखता. वह हाईवे पर खड़े ऐसे डरे हुए खरगोश जैसी लगती है, जिसकी आंखें तेज रफ्तार ट्रकों की रोशनी से चौंधिया गई हों.

  • ओवैसी ने एक अलग रास्ता सुझाया है — मुसलमान अपनी अलग पार्टी बनाएं और अपने नेता चुनें, लेकिन यह आइडिया शायद काम न करे, क्योंकि पूरा भारत हैदराबाद नहीं है.

अगर मुसलमान अपनी अलग पार्टी बनाएंगे, तो उससे भाजपा को ही फायदा होगा और उसकी ताकत बढ़ेगी.

जिन्ना के बाद भारत के मुसलमानों ने कभी किसी मुस्लिम नेता को अपना सबसे भरोसेमंद नेता नहीं माना. वे नेहरू-गांधी परिवार, यूपी-बिहार के यादव नेताओं, ममता बनर्जी और कई जगहों पर वाम दलों जैसे हिंदू नेताओं पर भरोसा करते रहे हैं.

क्या इससे उन्हें फायदा हुआ? पूरी तरह नहीं. लेकिन वे पहले कभी इस तरह सत्ता से बाहर नहीं हुए थे, जैसे आज हैं.

भारत के मुसलमानों, हिंदुओं और सेक्युलर लोगों — सभी को नए तरीके से सोचने की ज़रूरत है.

कम संख्या वाले अल्पसंख्यकों की राजनीति का दौर सर सैयद अहमद के समय का था, जिसका अंत पाकिस्तान बनने में हुआ. उससे किसे फायदा हुआ और किसे नहीं, इस पर बहस फिर कभी.

मुसलमानों को एक जैसा मानना गलत है, लेकिन समझने के लिए पाकिस्तान और इजरायल का उदाहरण देख सकते हैं.

एक इस्लामी गणराज्य है, दूसरा यहूदी गणराज्य. दोनों में समानुपातिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था है और अल्पसंख्यकों के लिए कुछ सीटें तय रहती हैं. यानी “जितनी आबादी, उतना हक” जैसी व्यवस्था.

भारत एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य है, जहां सबसे ज्यादा वोट पाने वाला जीतता है. यहां पूरी तरह समानुपातिक प्रतिनिधित्व की उम्मीद व्यावहारिक नहीं है, लेकिन इससे असंतुलन जरूर पैदा होता है.

इसे ठीक करने का एक ही तरीका है — ऐसा समझदार नेतृत्व उभरे, जो बड़ी संख्या में हिंदुओं को साथ लेकर नया गठबंधन बनाए.

भारत के हिंदुओं ने ही संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता को चुना था, इसलिए उसे बचाने की जिम्मेदारी भी उन्हीं की है. भाजपा को वही चुनौती दे पाएगा, जो हिंदुओं के साथ भरोसे का रिश्ता बना सके.

(नेशनल इंट्रेस्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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