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Monday, 13 July, 2026
होममत-विमतराहुल की कांग्रेस में प्रियंका गांधी की भूमिका इतनी सीमित क्यों?

राहुल की कांग्रेस में प्रियंका गांधी की भूमिका इतनी सीमित क्यों?

प्रियंका गांधी वाड्रा को बड़ी जिम्मेदारी देने से बीजेपी की उस कमजोरी का फायदा उठाया जा सकता है, जो मोदी के बाद महिलाओं से जुड़ाव बनाए रखने के लिए बड़े चेहरों की कमी के रूप में सामने आ सकती है.

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कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह समझ नहीं पा रहे हैं कि उनकी पार्टी प्रियंका गांधी वाड्रा की “बेहद शानदार राजनीतिक क्षमता” के बावजूद उन्हें संगठन में कोई बड़ी जिम्मेदारी क्यों नहीं दे रही.

उन्होंने पिछले हफ्ते मेरी सहयोगी ईशा मिश्रा को दिए इंटरव्यू में कहा, “प्रियंका गांधी निश्चित तौर पर बड़ी जिम्मेदारी की हकदार हैं. आज वह महासचिव तो हैं, लेकिन उनके पास संगठन की कोई तय जिम्मेदारी नहीं है. मैं समझ नहीं पा रहा कि ऐसा क्यों है. उन्हें AICC में कोई बड़ी जिम्मेदारी दी जानी चाहिए.”

कांग्रेस के लाखों कार्यकर्ताओं और नेताओं के मन में भी यही सवाल है, लेकिन वे इसे सार्वजनिक रूप से नहीं कहते, क्योंकि ऐसा करने को राहुल गांधी पर भरोसे की कमी माना जा सकता है. हालांकि, 55 साल से कांग्रेस और गांधी परिवार के वफादार रहे दिग्विजय सिंह को ऐसी चिंता नहीं है. वैसे भी, जब पार्टी नेतृत्व ने राज्यसभा उपचुनाव में उन्हें नहीं, बल्कि मीनाक्षी नटराजन को उम्मीदवार बनाया, तब उन्हें साफ संदेश मिल गया था.

प्रियंका गांधी का कांग्रेस में कम इस्तेमाल होने को लेकर दिग्विजय सिंह की टिप्पणी ने उस बड़े सवाल को फिर सामने ला दिया है, जिसका जवाब पार्टी नेता भी नहीं ढूंढ पा रहे हैं. गांधी परिवार को हमेशा एकजुट परिवार माना जाता है और भाई-बहन की नजदीकी भी अक्सर सार्वजनिक तौर पर दिखाई देती है. ऐसे में पार्टी में प्रियंका की अस्पष्ट भूमिका और भी हैरान करती है. जब प्रियंका ने जनवरी 2019 में औपचारिक रूप से राजनीति में कदम रखा, तब उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) का महासचिव बनाकर पूर्वी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी दी गई. इसी इलाके में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकसभा सीट वाराणसी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गढ़ गोरखपुर आता है. उनके सामने सफलता की संभावना बहुत कम थी. लोकसभा चुनाव सिर्फ 10 हफ्ते दूर थे. जैसा अनुमान था, कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद खराब रहा. इसके बाद भी प्रियंका को 2022 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए पूरे राज्य की जिम्मेदारी दे दी गई. नतीजा फिर वही रहा.

सवाल यह है कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने प्रियंका को उत्तर प्रदेश में ऐसी चुनौती क्यों दी, जहां हार लगभग तय थी? साल 2006 से 2007 के बीच राहुल गांधी खुद उत्तर प्रदेश कांग्रेस का काम देख रहे थे. 2007 विधानसभा चुनाव से पहले मैं उन उम्मीदवारों से मिला था, जिनका इंटरव्यू राहुल गांधी ने लिया था. इंटरव्यू के बाद वे हैरान नज़र आते थे.

वे कहते थे, “मुझे कैसे पता होगा कि मेरे विधानसभा क्षेत्र में कितने परिवारों के पास LPG सिलेंडर है और कितनों के पास बिजली का कनेक्शन है? राजनीति ऐसे नहीं चलती.” वे लगभग इसी तरह की बातें कहते थे.

राहुल गांधी की “नई राजनीति” को लेकर चाहे जितनी चर्चा हुई हो, लेकिन 2007 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ 22 सीटें मिलीं, जो पिछले चुनाव से तीन सीट कम थीं. इसके बाद 2012 विधानसभा चुनाव में भी राहुल गांधी ने चुनाव प्रचार की कमान संभाली. 403 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस को सिर्फ 28 सीटें मिलीं. तब राहुल गांधी ने इसकी वजह पार्टी की कमजोर बुनियाद को बताया और संगठन मजबूत करने का वादा किया, लेकिन 2017 तक आते-आते उन्होंने इस कोशिश को लगभग छोड़ दिया और अखिलेश यादव के साथ गठबंधन का रास्ता चुना.

राहुल गांधी को यह समझने में करीब 10 साल लग गए कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को फिर से खड़ा करना आसान नहीं है. 2019 तक उन्हें अपनी लोकसभा सीट अमेठी को लेकर भी भरोसा नहीं था और उन्होंने केरल से दूसरी सीट पर भी चुनाव लड़ने का फैसला किया. ऐसे में सवाल उठता है कि चुनाव से सिर्फ 10 हफ्ते पहले उन्होंने प्रियंका गांधी को पूर्वी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी क्यों दी? और हार के बाद भी उन्हें अगले विधानसभा चुनाव तक उसी भूमिका में क्यों बनाए रखा? क्या यह उनकी राजनीतिक परीक्षा थी? या राहुल गांधी को भरोसा था कि प्रियंका 10 हफ्तों या तीन साल में वह कर देंगी, जो वह खुद 10 साल से ज्यादा समय में नहीं कर पाए? हालांकि, उत्तर प्रदेश में लगातार चुनावी हार से प्रियंका गांधी की राजनीतिक चमक कुछ कम जरूर हुई और उन लोगों का उत्साह भी घटा, जो उनके नेतृत्व में कांग्रेस की वापसी की उम्मीद कर रहे थे.

कांग्रेस में बढ़ रही हैं फुसफुसाहटें

दिसंबर 2023 में प्रियंका गांधी से उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी वापस ले ली गई. उन्हें महासचिव तो बनाए रखा गया, लेकिन “बिना किसी तय जिम्मेदारी” के. यानी संगठन में उनकी स्थिति कुछ ऐसी हो गई, जैसे सरकार में बिना विभाग वाला मंत्री.

दिग्विजय सिंह ने दिप्रिंट को दिए इंटरव्यू में इसी बात का ज़िक्र करते हुए पूछा कि प्रियंका गांधी को संगठन में कोई तय जिम्मेदारी क्यों नहीं दी गई. इससे उनकी राजनीतिक छवि मजबूत नहीं होती. उल्टा यह संदेश जाता है कि उनके पास ताकत तो है, लेकिन जिम्मेदारी नहीं. या फिर ऐसा लगता है कि उत्तर प्रदेश में हार के बाद उन्हें बचाकर रखा जा रहा है. दोनों ही स्थितियां उनके लिए अच्छी नहीं हैं. पार्टी में कई लोगों को हैरान करने वाले एक फैसले में प्रियंका गांधी को असम के लिए स्क्रीनिंग कमेटी का चेयरपर्सन बनाया गया. यानी उनकी जिम्मेदारी सिर्फ पार्टी उम्मीदवारों के नाम तय करने की थी. शायद वह गांधी परिवार की पहली सदस्य थीं, जिन्हें किसी राज्य की स्क्रीनिंग कमेटी में शामिल किया गया. वह भी असम जैसे राज्य के लिए. इस फैसले के पीछे कोई साफ वजह समझ नहीं आई. आखिर में उनके नाम के साथ एक और चुनावी हार जुड़ गई.

सवाल यह है कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी प्रियंका की राजनीतिक छवि को इस तरह कमजोर क्यों होने दे रहे हैं, जबकि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में उनके विरोधी भी उन्हें मजबूत प्रतिद्वंद्वी मानते हैं? बीजेपी के नेता उनके शांत स्वभाव, साफ बोलने के अंदाज़ और राजनीतिक सूझबूझ की तारीफ करते हैं. उन्हें लगता है कि प्रियंका एक परिपक्व नेता हैं, जो लोकसभा में गृह मंत्री अमित शाह को भी अपनी बातों से मुस्कुराने पर मजबूर कर सकती हैं. एक बार जब नाराज़ अमित शाह ने राहुल गांधी से कहा था कि “अपनी बहन से कुछ सीखिए,” तो ऐसा लगा कि उन्होंने यह बात सचमुच गंभीरता से कही थी. प्रियंका लोगों से आसानी से जुड़ जाती हैं. राहुल गांधी की टीम के युवा नेताओं के पुराने नेताओं पर निशाना साधने के दौरान भी प्रियंका लगातार अहमद पटेल जैसे वरिष्ठ नेताओं से संपर्क बनाए रखती थीं.

राहुल गांधी संगठन चलाने वाले नेता नहीं माने जाते. वह पिछले 20 साल से सीधे या परोक्ष रूप से पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं, लेकिन संगठन लगातार कमजोर होता गया है. मेरी सहयोगी अपूर्वा मंधानी के विश्लेषण के मुताबिक, 2008 में कांग्रेस के 1,204 विधायक थे, जो 2026 में घटकर करीब 676 रह गए हैं.

राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या गृह मंत्री अमित शाह की तरह 24 घंटे राजनीति करने वाले नेता नहीं हैं. उन्हें अक्सर अपने लिए समय निकालने के लिए लंबे ब्रेक की जरूरत पड़ती है. भला कौन-सा नेता छात्रों के साथ तीन शहरों में तय कार्यक्रम रद्द करके लंबे समय के लिए विदेश चला जाता है? राहुल गांधी ने ऐसा किया है. और यह पहली बार नहीं है. इससे पहले भी वह विदेश यात्राओं के कारण कई अहम कार्यक्रम छोड़ चुके हैं.

अब देश और कांग्रेस दोनों इस बात के आदी हो चुके हैं कि उन्हें पूर्णकालिक नेता प्रतिपक्ष नहीं मिलेगा. पार्टी के कई नेताओं का कहना है कि जब राहुल गांधी भारत में भी होते हैं, तब भी उनसे मिलना आसान नहीं होता और वह दूरी बनाए रखते हैं. अब किसी को उनसे बदलने की उम्मीद भी नहीं है. यही वजह है कि कांग्रेस में धीरे-धीरे यह चर्चा बढ़ रही है कि प्रियंका गांधी की क्षमता का सही इस्तेमाल नहीं हो रहा है. दिग्विजय सिंह ने सिर्फ वही बात खुलकर कही है, जो पार्टी के ज्यादातर नेता मन ही मन महसूस करते हैं.

तीन जवाब

प्रियंका गांधी को पार्टी संगठन को फिर से खड़ा करने की जिम्मेदारी क्यों नहीं दी जाती? यह जिम्मेदारी कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से उम्मीद की जा रही थी, लेकिन वह अपने ही छोटे राजनीतिक परिवार में व्यस्त हो गए. वह अब भी कांग्रेस अध्यक्ष हैं और साथ ही राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष भी हैं. उनके बेटे प्रियांक खरगे कर्नाटक सरकार में बड़े मंत्री हैं और उनके दामाद राधाकृष्ण डोड्डामणि 2024 में गुलबर्गा से कांग्रेस सांसद बने. 84 साल की उम्र में खरगे ने पिछले महीने फिर से राज्यसभा जाने का फैसला किया. बेशक, प्रियंका खरगे की जगह नहीं ले सकतीं. अगर गांधी परिवार का कोई सदस्य फिर से पार्टी की कमान संभालेगा, तो वह सिर्फ राहुल गांधी होंगे. इसी वजह से कांग्रेस के कई नेताओं का मानना है कि प्रियंका गांधी AICC महासचिव (संगठन) के पद के लिए सबसे उपयुक्त हैं. फिलहाल यह जिम्मेदारी केसी वेणुगोपाल के पास है. अगर प्रियंका को यह जिम्मेदारी मिलती है, तो संगठन से जुड़े सभी मामलों में उनकी भूमिका होगी. इससे राहुल गांधी देशभर में घूमकर अपनी “मोहब्बत की दुकान” फैलाने पर ध्यान दे सकेंगे. प्रियंका “पार्टी जोड़ो” पर ध्यान दें और राहुल अपनी “भारत जोड़ो” यात्रा जारी रखें.

राहुल गांधी को बीजेपी को उसके ही मजबूत मुद्दों—हिंदुत्व, मोदीत्व (हिंदुत्व + विकास/कल्याणकारी योजनाएं) और राष्ट्रीय सुरक्षा—पर घेरना पसंद है, लेकिन अगर प्रियंका गांधी की भूमिका बड़ी होती है, तो वह बीजेपी की एक बड़ी कमजोरी पर निशाना साध सकती हैं. यह कमजोरी है कि मोदी के बाद महिलाओं के बीच पार्टी की पकड़ बनाए रखने वाले बड़े महिला चेहरे बहुत कम हैं. केंद्र में बीजेपी के 30 कैबिनेट मंत्रियों में सिर्फ दो महिलाएं हैं—निर्मला सीतारमण और अन्नपूर्णा देवी. यह कहना मुश्किल है कि वे कितनी महिला वोटरों को प्रभावित कर पाएंगी. बीजेपी के 17 मुख्यमंत्रियों में सिर्फ दिल्ली की रेखा गुप्ता ही महिला हैं. इसके अलावा राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में बीजेपी के 36 प्रदेश अध्यक्षों में सिर्फ दो महिलाएं हैं—मणिपुर और हरियाणा में. मुफ्त राशन और दूसरी कल्याणकारी योजनाओं की वजह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को महिला वोटरों का बड़ा समर्थन मिलता है, लेकिन बीजेपी महिलाओं को बड़े नेतृत्व के रूप में आगे बढ़ाने में सफल नहीं रही है. ऐसे में मोदी के बाद इस महिला वोट बैंक को बनाए रखना पार्टी के लिए मुश्किल हो सकता है. अगर प्रियंका गांधी कांग्रेस में ज्यादा सक्रिय और बड़ी भूमिका निभाती हैं, तो इससे बीजेपी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं.

अब फिर वही सवाल सामने आता है—कांग्रेस प्रियंका गांधी की क्षमता का पूरा इस्तेमाल क्यों नहीं कर रही? पिछले कुछ महीनों में मैंने इस सवाल का जवाब खोजने के लिए कम से कम 50 कांग्रेस नेताओं से बात की, लेकिन अब तक कोई साफ जवाब नहीं मिला. कुछ नेता इसकी वजह सोनिया गांधी का “पुत्र मोह” यानी बेटे राहुल के प्रति उनका लगाव बताते हैं. कई लोग राहुल गांधी की असुरक्षा को इसकी वजह मानते हैं, लेकिन मुझे तीसरे समूह के नेताओं की बात ज्यादा सही लगती है. उनका कहना है कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी दोनों प्रियंका के हित के बारे में सोचते हैं और जानबूझकर उनकी क्षमता को सीमित नहीं कर रहे. उनके मुताबिक, राहुल गांधी को प्रियंका से कोई असुरक्षा नहीं है, लेकिन “राहुल के आसपास के लोग” जरूर ऐसा नहीं चाहते.

उन नेताओं में से एक ने मुझसे कहा, “अगर प्रियंका गांधी को महासचिव (संगठन) जैसी बड़ी जिम्मेदारी मिल गई, तो राहुल गांधी के आसपास मौजूद कई लोगों की ताकत और पकड़ खत्म हो जाएगी. इसलिए वे उन्हें आगे नहीं आने देंगे. आपको लग सकता है कि राहुल गांधी उन लोगों को नियंत्रित करते हैं, लेकिन सच यह है कि वही लोग राहुल गांधी को नियंत्रित करते हैं. वे उन्हें वही बताते हैं, जो वह सुनना चाहते हैं और उन्हें एक कल्पनाओं की दुनिया में रखते हैं. कमजोर कांग्रेस और कमजोर गांधी परिवार इन्हीं लोगों के हित में है.”

तो अब प्रियंका गांधी का अगला कदम क्या होगा? कांग्रेस नेताओं की इस बात पर एक राय है कि प्रियंका कभी भी अपने भाई राहुल गांधी के खिलाफ नहीं जाएंगी. अगर हालात बहुत निराशाजनक हो गए, तो शायद वह हॉलीवुड गायिका डोरिस डे का मशहूर गीत याद करें—

“Que sera, sera… Whatever will be, will be… The future is not ours to see… Que sera, sera… What will be, will be.”

(“जो होगा, सो होगा…भविष्य हमारे हाथ में नहीं है…जो होना है, वह होकर रहेगा.”)

पोस्टस्क्रिप्ट: शनिवार शाम मैं नेहरू पार्क में टहल रहा था और सोच रहा था कि बीजेपी की युवा महिला नेताओं में भविष्य की सुष्मा स्वराज या वसुंधरा राजे बनने की क्षमता किसमें है. तभी मुझे जोर से प्यास लगी. मैंने सोचना छोड़ दिया और पानी ढूंढ़ने लगा, लेकिन 2.8 किलोमीटर लंबे रास्ते पर लगे तीनों वाटर कूलर सूखे पड़े थे. मुझे दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता का वह बयान याद आया, जिसमें उन्होंने कहा था कि दिल्ली में पानी उड़ (वाष्पित) जाता है. अगले दिन, रविवार को मुझे बताया गया कि उन कूलरों में अक्सर पानी नहीं रहता. यह हाल दक्षिण दिल्ली के उस पार्क का है, जहां मंत्री और बड़े सरकारी अधिकारी भी घूमने आते हैं. वहां “डबल इंजन” या “ट्रिपल इंजन” सरकार ढूंढ़ने का कोई फायदा नहीं था. स्कूल में विज्ञान की पढ़ाई के दौरान मैंने पानी के वाष्पीकरण (Evaporation) के बारे में ज़रूर पढ़ा था, लेकिन उसका असर महसूस करने में कई दशक लग गए. आखिरकार मैंने अपनी सैर बीच में ही छोड़ दी और जल्दी घर लौट आया. अच्छी बात यह रही कि मेरी कार का इंजन ठीक से काम कर रहा था.

डीके सिंह दिप्रिंट के पॉलिटिकल एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @dksingh73 है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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