नई दिल्ली: हाल ही में हुई सर्जरी के बाद 78 साल के कर्नेल सिंह के पेट पर अब भी पट्टियां बंधी थीं और वह ज्यादा देर तक बैठ भी नहीं सकते थे. इसके बावजूद शनिवार को शास्त्री नगर स्थित गुरुद्वारा दशमेश दरबार के लंगर हॉल में हनी त्रेहान की फिल्म सतलुज की स्क्रीनिंग देखने सबसे पहले पहुंचने वालों में वही थे. उन्हें इस स्क्रीनिंग की जानकारी समुदाय के व्हाट्सऐप ग्रुप से मिली थी. कुछ ही देर में हॉल में 150 से ज्यादा लोग पहुंच गए.
फिल्म में दिखाए गए एनकाउंटर के दृश्य देखकर उनकी आंखों में आंसू आ गए. कर्नेल सिंह ने कहा, “मैं पंजाब में नहीं था, लेकिन मेरे रिश्तेदार वहां थे. उन्होंने यह सब देखा है.” कर्नेल सिंह 1966 में पंजाब में सांप्रदायिक तनाव के दौरान दिल्ली आ गए थे. उस समय हरियाणा अभी पंजाब से अलग नहीं हुआ था.
भीषण गर्मी के बीच, ऊपर सिर्फ छत के पंखे चल रहे थे. पुरुष, महिलाएं और बच्चे फर्श पर बिछी चटाइयों पर बैठ गए. जो लोग देर से पहुंचे, वे पीछे या कॉरिडोर में खड़े होकर फिल्म देखने लगे. दिलजीत दोसांझ अभिनीत यह फिल्म जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है. खालड़ा की 1995 में हत्या कर दी गई थी क्योंकि उन्होंने पंजाब पुलिस की ओर से उग्रवाद विरोधी अभियान के दौरान हज़ारों सिखों के कथित गुप्त अंतिम संस्कारों का खुलासा किया था.


समुदाय के बुजुर्गों के लिए यह फिल्म पंजाब में उग्रवाद के दौर और उसके बाद दिल्ली में हुए 1984 के सिख विरोधी दंगों की दर्दनाक यादें फिर से ताजा कर देती है. वहीं, बच्चों, किशोरों और जेन ज़ी के लिए जिन्होंने यह इतिहास सिर्फ परिवार की कहानियों में सुना है, यह फिल्म उनके अतीत को समझने का एक भावनात्मक जरिया बन गई है और उनके मन में उस दौर को लेकर नई जिज्ञासा पैदा कर रही है. जब से यह फिल्म ZEE5 से हटाई गई है, तब से इसे देखने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है. पंजाब के गांवों से लेकर दिल्ली के गुरुद्वारों तक इसकी स्क्रीनिंग हो रही है.
शास्त्री नगर में रहने वाले कई परिवार पंजाब में उग्रवाद के दौर में दिल्ली आए थे. बाद में 1984 के दंगों में उन्होंने अपने परिवार के लोगों को भी खोया. कर्नेल सिंह ने बताया कि जिस लंगर हॉल में फिल्म दिखाई जा रही थी, वहां पहले एक पार्क हुआ करता था. दंगों के दौरान इसी जगह कई बार सिखों और दूसरे समुदाय के लोगों के बीच आमना-सामना हुआ था. उन्होंने पंजाबी में कहा, “पंजाब का वह काला दौर…और दिल्ली दंगों के दौरान मेरे और मेरे परिवार के साथ हुई वैसी ही डरावनी घटना. कुछ लोगों ने पेट्रोल बम से हमारे घर और गाड़ियां जलाने की कोशिश की थी. आसपास की महिलाएं और बच्चे अपनी बालकनियों से उन लोगों पर पत्थर फेंकते थे.”

फिल्म शुरू होने से पहले हॉल में रखे एक प्रोजेक्टर, जिसे एक बाल्टी के ऊपर रखा गया था, के जरिए जसवंत सिंह खालड़ा का एक भाषण चलाया गया. गुरुद्वारा दशमेश दरबार के प्रवेश द्वार पर स्वयंसेवक अंदर आने वाले लोगों के जूते जमा कर रहे थे. वहीं कुछ अन्य स्वयंसेवक आने वालों को पानी और शरबत पिला रहे थे. सेवा करने वालों में करीब 40 साल के सुखबीर भी थे.
फिल्म शुरू होने के 10-15 मिनट के भीतर ही वह जूतों के लिए 150 टोकन बांट चुके थे. कई लोगों ने बिना टोकन लिए ही अपने जूते अलमारी में रख दिए थे. सुखबीर यह फिल्म पहले ही यूट्यूब पर देख चुके थे. उन्होंने कहा, “यह फिल्म सिर्फ इस बात का दस्तावेज़ है कि हमारे बुजुर्गों ने क्या झेला. अब जब हम इसे गुरुद्वारे में देखते हैं, तो हमें भी वही दर्द महसूस करने के लिए मजबूर होना पड़ता है.”

‘ऐसा लग रहा है जैसे सब कुछ फिर से हो रहा हो’
फिल्म शुरू होने से पहले गुरुद्वारा के सचिव हरजीत सिंह ने वहां मौजूद लोगों को बताया कि यह स्क्रीनिंग क्यों रखी गई है. उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि युवा पीढ़ी भी जाने कि जसवंत सिंह खालड़ा और दूसरे लोगों ने क्या-क्या सहा था, ताकि आने वाली पीढ़ियां आज जैसी जिंदगी जीने का महत्व समझ सकें.
जैसे ही फिल्म शुरू हुई, पूरा हॉल “फतेह” के सिख अभिवादन से गूंज उठा. वहां मौजूद सभी लोगों ने एक साथ “फतेह” का जयकारा लगाया, जिससे पूरे हॉल में जोश भर गया.

जेन ज़ी और मिलेनियल पीढ़ी के ज्यादातर लोग पहले ही यह फिल्म देख चुके थे. वे एक-दूसरे को बता रहे थे कि उन्होंने यह फिल्म किस प्लेटफॉर्म से डाउनलोड की. कई लोगों ने कहा कि उन्हें यह फिल्म व्हाट्सऐप के जरिए मिली थी. हालांकि, उन्होंने पंजाब में उग्रवाद का दौर खुद नहीं देखा था, लेकिन उन्होंने बताया कि उनके दादा-दादी और माता-पिता अक्सर उस समय की कहानियां सुनाते थे. उनका कहना था कि फिल्म देखते समय बचपन में सुनी गई हर कहानी फिर से याद आ गई.
उनमें से एक ने कहा, “ऐसा लग रहा है जैसे सब कुछ फिर से हो रहा हो (Déjà vu).”
करीब 20 साल के गगनदीप ने कहा कि वह बचपन से अपने परिवार से यही इतिहास सुनते हुए बड़े हुए हैं. उस समय उनका परिवार दिल्ली में अपना घर और कारोबार फिर से खड़ा करने की कोशिश कर रहा था.
उन्होंने कहा, “फिल्म को कई साल तक रोका गया, क्योंकि अधिकारियों को पता है कि इसमें सच्चाई है.”

गगनदीप ने बताया कि लोगों ने दिलजीत दोसांझ का एक पुराना लाइवस्ट्रीम देखा था, जिसमें उन्होंने कहा था कि फिल्म को ZEE5 से हटाया जा सकता है. इसलिए कई लोगों ने पहले ही इसे अपने मोबाइल में डाउनलोड कर लिया था. उनके परिवार ने भी फिल्म को ZEE5 पर उपलब्ध रहते हुए देख लिया था. उन्होंने कहा कि यह फिल्म पंजाब के इतिहास का एक दस्तावेज़ है और इससे युवा पीढ़ी उस दौर के बारे में ज्यादा जान रही है.
उनके पास बैठे 15 साल के इकम ने बताया कि उन्होंने यह फिल्म अपने पिता के साथ ZEE5 पर देखी थी. उन्होंने कहा कि इससे पहले उन्हें इस विषय के बारे में कुछ भी पता नहीं था. इकम ने बताया कि उनके पिता ने उनसे कहा था, “अभी फिल्म देख लो, इसे जरूर हटा दिया जाएगा.”

सबसे छोटे बच्चे स्क्रीन के सबसे पास बैठे थे. उनकी उम्र करीब 7 से 15 साल के बीच थी. वे उतने ध्यान से फिल्म नहीं देख रहे थे, जितनी उनके साथ बैठी महिलाएं देख रही थीं, लेकिन कुछ बच्चे आपस में यह कहते सुनाई दिए कि “हमारे समुदाय के साथ ही ऐसा क्यों हुआ?”
एक कोने में गुरमीत अपनी ढाई साल की बच्ची के साथ खड़ी थीं. दिल्ली में पली-बढ़ी गुरमीत ने कहा कि वह अपने परिवार के बुजुर्गों की बताई उस डरावनी कहानी को कभी पूरी तरह समझ नहीं पाई थीं.
उन्होंने कहा, “फिल्म देखने के बाद और दिलजीत दोसांझ की शानदार एक्टिंग की वजह से अब मुझे समझ आया कि वास्तव में क्या हुआ था और मेरा परिवार पंजाब लौटने के नाम से इतना डरता क्यों था.”

पुलिस का डर
जहां युवा फिल्म पर चर्चा कर रहे थे, वहीं बुजुर्ग उस दौर में अपने साथ हुई दर्दनाक घटनाओं को याद कर रहे थे.
फिल्म में सतलुज नदी पर बने एक बांध जैसी जगह से शवों को फेंकने वाले दृश्य पर कुछ लोगों ने कहा कि वे उस जगह को जानते हैं और वे तथा उनके पिता उसी रास्ते से कई बार गुज़र चुके हैं. एक व्यक्ति अपने परिवार को पंजाब छोड़ने के लिए मजबूर होने की याद करते हुए रो पड़ा. कई लोगों ने बताया कि बाद में उनके रिश्तेदार कनाडा चले गए, जबकि वे खुद दिल्ली में ही रह गए.

वहीं मौजूद इंद्रबाल ने बताया कि उन्होंने खुद हिंसा का सामना नहीं किया, लेकिन उस दौर में उनके एक चचेरे भाई को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था और एक हफ्ते बाद छोड़ा था.
उस घटना का डर परिवार के मन में कई सालों तक बना रहा.
उन्होंने कहा, “उन्होंने एक जिप्सी गाड़ी खरीद ली थी, क्योंकि वह पुलिस या सरकारी अधिकारी की गाड़ी जैसी दिखती थी. परिवार पंजाब में रहता था और किसी तरह के टकराव से बचना चाहता था.”
फिल्म शुरू होने के करीब एक घंटे बाद लंगर हॉल पूरी तरह भर चुका था. हालात ऐसे थे कि खड़े होने की भी जगह नहीं बची थी. जो लोग अंदर नहीं जा सके, वे बाहर सेवा कर रहे स्वयंसेवकों के पास इकट्ठा हो गए. उनमें से ज्यादातर लोग पहले ही फिल्म देख चुके थे, लेकिन वे अपने दोस्तों, पड़ोसियों और बुजुर्गों से मिलने आए थे, जिनसे काम की वजह से कई महीनों से मुलाकात नहीं हुई थी. उनका कहना था कि समुदाय के लोग आमतौर पर इस तरह एक साथ बहुत कम इकट्ठा होते हैं.

बाहर खड़े लोग फिल्म में किए गए कट्स पर चर्चा कर रहे थे. कुछ लोगों ने कहा कि अगर फिल्म ZEE5 से नहीं हटाई जाती, तो शायद वे इसे कभी नहीं देखते. कई लोगों को तो यह भी नहीं पता था कि ऐसी कोई फिल्म बन रही है.
गुरुद्वारे के प्रवेश द्वार के पास 30 साल के कंवरपाल सिंह खड़े थे. बीच-बीच में वह लोगों को मीठा पानी भी पिला रहे थे. उन्होंने बताया कि 2022 में फिल्म का पोस्टर रिलीज होने के बाद से ही वह इसका इंतज़ार कर रहे थे क्योंकि इसकी कहानी उनके परिवार के इतिहास से जुड़ी हुई थी.
उन्होंने कहा, “मैं बचपन से 1984 की कहानियां सुनता आया हूं. मेरी मां के परिवार के कई लोगों की उस समय हत्या कर दी गई थी.” उन्होंने बताया कि उनके परिवार के ज्यादातर लोग अब कनाडा में रहते हैं.
कंवरपाल का कहना था कि जैसे फैशन दोबारा लौट आता है, वैसे ही इतिहास भी खुद को दोहराता है.
उन्होंने कहा, “बेल-बॉटम पैंट फिर से फैशन में आ गई हैं और इस स्क्रीनिंग के जरिए हमारा समुदाय भी फिर से याद कर रहा है कि हमारे लोगों के साथ क्या हुआ था.”
उन्होंने बताया कि उनका परिवार मूल रूप से तरनतारन का रहने वाला है. वहीं जसवंत सिंह खालड़ा रहते थे और फिल्म के कई दृश्य भी वहीं शूट किए गए हैं.
उन्होंने कहा, “जब तक आपने खुद ऐसा डर नहीं झेला हो, तब तक उसे पूरी तरह समझाया नहीं जा सकता. जिसने यह सब झेला है, वही बता सकता है कि उस समय कैसा महसूस होता है.”
कंवरपाल ने बताया कि फिल्म का पोस्टर देखने से पहले उन्हें जसवंत सिंह खालड़ा के बारे में बहुत कम जानकारी थी. इसके बाद उन्होंने उनके बारे में पढ़ना शुरू किया. हालांकि, उनके परिवार के लोग ऐसे कई लोगों को जानते थे, जिन्हें उस दौर में पुलिस उठाकर ले गई थी.
उन्होंने कहा, “मेरे पिता को भी एक बार पुलिस ने हिरासत में लिया था, लेकिन किसी तरह वह वहां से निकल आए.”
उन्होंने करीब 10 साल पुरानी एक और घटना भी याद की.
उन्होंने बताया कि उनकी बुआ एक शादी में शामिल होने के लिए बठिंडा जा रही थीं. उसी दौरान पुलिस ने पूरे परिवार को रोककर हिरासत में ले लिया था. हालांकि, कुछ घंटों बाद उन्हें छोड़ दिया गया, लेकिन इस घटना ने उन पुरानी यादों को फिर से ताजा कर दिया, जिन्हें परिवार लंबे समय से भूलने की कोशिश कर रहा था.
अब कंवरपाल उन यादों को भूलना नहीं चाहते. वह अब पंजाब में उग्रवाद के दौर से जुड़ी किताबें और घटनाएं पढ़ते हैं और उस विषय पर बनी फिल्मों जैसे हवाएं (2003) और पंजाब 1984 (2014) भी देखते हैं.
‘हम डरते नहीं हैं’
जैसे ही फिल्म खत्म हुई, पूरा हॉल “वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह” के जयकारों से गूंज उठा. इसके बाद गुरुद्वारा के सचिव हरजीत सिंह फिर सामने आए. उनके हाथ में जसवंत सिंह खालड़ा की एक फ्रेम की हुई तस्वीर थी.
उन्होंने कहा, “यहां मौजूद हर व्यक्ति को अपने घर और दफ्तर में जसवंत सिंह खालड़ा की एक तस्वीर ज़रूर रखनी चाहिए.”

हरजीत सिंह ने बताया कि स्थानीय पुलिस थाने से स्क्रीनिंग को लेकर कई बार फोन आया था. बाद में सादे कपड़ों में एक पुलिस अधिकारी भी गुरुद्वारे पहुंचे और फिल्म देख रहे लोगों की तस्वीरें खींचीं.
उन्होंने कहा, “लेकिन हम यह फिल्म दिखाने से नहीं डरते. यह हमारा इतिहास है. यह एक काला अध्याय है, जिसके बारे में नई पीढ़ी को जरूर पता होना चाहिए.”
इसके बाद समुदाय का एक और सदस्य सामने आया. फिल्म को पहली बार देखने का अनुभव बताते हुए वह भावुक हो गया और रो पड़ा. उसने कहा कि वह उन लोगों को जानता था, जिनकी उस दौर में हत्या कर दी गई थी.
उसके मुताबिक, इस फिल्म ने उन जख्मों को फिर से हरा कर दिया, जो कभी पूरी तरह भर ही नहीं पाए थे. भाषण खत्म होने के बाद हॉल में बैठे सभी लोगों को लंगर परोसा गया.
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