ग्वालियर, नारनौल, नई दिल्ली: जुमे की दोपहर, दिल्ली के फिरोज़ शाह कोटला कॉम्प्लेक्स में जामी मस्जिद के नीचे लगे लोहे के गेट को नसीरा खातून ने कसकर पकड़ रखा था और उन जिन्नों से दुआ मांग रही थीं जिनके बारे में उनका मानना है कि वे वहीं रहते हैं.
उन्हें जिन्नों से नहीं, बल्कि चमगादड़ों से डर लगता है और आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) के स्मारक चमगादड़ों के पसंदीदा ठिकानों में से एक हैं.
खातून ने कहा, “जब भी घर में कोई परेशानी होती है, तो मैं दुआ मांगने के लिए इस जगह पर आती हूं, लेकिन यहां बैठकर दुआ मांगना बहुत मुश्किल होता है क्योंकि चमगादड़ों की बदबू से मेरा दम घुंटने लगता है. एएसआई को चमगादड़ों से छुटकारा पाने के लिए कुछ करना चाहिए.”
दिल्ली में फिरोज़ शाह कोटला और खिड़की मस्जिद से लेकर महाराष्ट्र में अजंता गुफाओं की पेंटिंग वाली दीवारों तक, गुजरात के मोढेरा में सूर्य मंदिर की नक्काशीदार छतों से लेकर हैदराबाद में गोलकुंडा किले तक भारत की ऐतिहासिक इमारतें अपने सबसे पुराने बाशिंदों में से एक के खिलाफ एक खामोश लड़ाई लड़ रही हैं.

फिर भी, 165 साल पुरानी इस संस्था के पास चमगादड़ों से होने वाले नुकसान से निपटने के लिए कोई खास पॉलिसी या बजट नहीं है–चमगादड़ों की एसिड वाली बीट (गुआनो) से इमारत की दीवारों, चूना-पत्थर और बलुआ पत्थर पर लंबे समय तक रहने वाले दाग पड़ जाते हैं. ऐतिहासिक इमारतों की दीवारों से चिपके चमगादड़ों के बड़े झुंड अक्सर पर्यटकों को दूर भगाते हैं और डराते भी हैं.
इस वजह से एएसआई के अलग-अलग सर्कल और ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले अधिकारियों को हर्बल फ्यूमिगेशन और जालीदार बैरियर से लेकर अल्ट्रासोनिक डिवाइस और केमिकल ट्रीटमेंट जैसे अस्थायी समाधान आज़माने पड़ते हैं.
इसके अलावा, एएसआई के अंदर भी इस बात पर कोई आम सहमति नहीं है कि चमगादड़ों के मामले को कितनी गंभीरता से लिया जाए. उन्हें हमेशा के लिए हटाना भी कोई आसान समाधान नहीं है. ऐसे सवाल भी उठते हैं कि हेरिटेज साइट्स असल में किसकी हैं.
जहां पुरातत्वविद् चेतावनी देते हैं कि चमगादड़ों की बीट सैकड़ों संरक्षित जगहों पर भित्ति-चित्रों, पेंटिंग और पत्थर की सतहों को खराब कर रही है, वहीं वन्यजीव विशेषज्ञों का तर्क है कि चमगादड़ों को पूरी तरह से हटाने से एक नया इकोलॉजिकल संकट पैदा हो सकता है.
एएसआई के औरंगाबाद सर्कल के सुपरिटेंडिंग आर्कियोलॉजिस्ट अरुण मलिक ने कहा, “चमगादड़ों ने भारत के स्मारकों के अंधेरे कोनों और दरारों में अपना बसेरा बना लिया है और ये एएसआई के लिए संरक्षण की सबसे बड़ी चुनौती हैं. इन्हें पूरी तरह से हटाना आसान काम नहीं है और इनसे निपटने का कोई स्थायी समाधान भी नहीं है.”

पूरे देश में एएसआई के अधिकार क्षेत्र में 3,686 केंद्रीय रूप से संरक्षित स्मारक और स्थल हैं. एएसआई के लिए बजट की कोई कमी नहीं है. कैग (कंप्ट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल) की रिपोर्ट और संसद के आंकड़ों से पता चलता है कि एएसआई अपने कुल खर्च बजट का लगभग 40 प्रतिशत संरक्षण, रखरखाव और सार्वजनिक सुविधाओं पर खर्च करता है. इस संस्था ने 2014-21 के सात वर्षों में स्मारकों के संरक्षण पर 2,371.4 करोड़ रुपये खर्च किए हैं.
2013 में ‘स्मारकों और प्राचीन वस्तुओं के संरक्षण और परिरक्षण का प्रदर्शन ऑडिट’ नाम की अपनी रिपोर्ट में, कैग ने इस मुद्दे को उठाया था, फिर भी 2014 में जारी एएसआई की संरक्षण नीति में चमगादड़ों का कोई ज़िक्र नहीं था.
एएसआई के पुरातत्वविद् और क्षेत्रीय निदेशक (उत्तर) वसंत स्वर्णकार ने कहा, “नीति में सब कुछ नहीं लिखा जा सकता. ज़मीन पर काम करने वाले पुरातत्वविदों ने चमगादड़ों से निपटने के लिए अपने स्तर पर कई उपाय अपनाए हैं. आजकल, सोनार (साउंड नेविगेशन एंड रेंजिंग) तकनीक अपनाई जाती है, लेकिन इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल नहीं हो रहा है.” यह तकनीक नेविगेशन, संचार या वस्तुओं का पता लगाने के लिए ध्वनि प्रसार का उपयोग करती है. चमगादड़ अंधेरे में शिकार खोजने के लिए इकोलोकेशन या बायो-सोनार का उपयोग करते हैं.
स्मारक का नुकसान
29 साल के ओम प्रकाश के लिए पिछले साल नोएडा से मध्य प्रदेश के ग्वालियर किले तक की सड़क यात्रा पुरानी यादों को ताज़ा करने वाली यात्रा होनी चाहिए थी. उन्होंने आखिरी बार 2013 में स्कूल ट्रिप के दौरान किले का दौरा किया था. इतने सालों में ज़्यादातर यादें धुंधली हो गई थीं. एक चीज़ के अलावा—चमगादड़.
प्रकाश ने कहा, “तब कुछ ऐसे इलाके थे जहां हम चमगादड़ों की वजह से नहीं जा सकते थे. मुझे उम्मीद थी कि इस बार उन जगहों को देख पाऊंगा. मुझे लगा कि शायद पिछले 13 सालों में हालात बदल गए होंगे.”
मुगल सम्राट बाबर ने छठी सदी के इस पहाड़ी किले को “हिंद के किलों में मोती” बताया था और कहा था कि इसकी भव्यता और शान के कारण “हवाएं भी इसके बुर्जों को नहीं छू सकती थीं”.
हालांकि, सदियों से चमगादड़ों ने न केवल इस ‘मोती’ को दागदार किया है, बल्कि किले के पुराने जेल क्षेत्र और मान मंदिर महल को अपना स्थायी ठिकाना भी बना लिया है.

किले की गहरी, अंधेरी और सीलन भरी कोठरियों और 9वीं सदी के तेली का मंदिर में चमगादड़ों की आबादी फल-फूल रही है.
हालांकि, भारत ग्वालियर किले को यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज लिस्ट में शामिल कराने की कोशिश कर रहा है, लेकिन एएसआई के अधिकारी चमगादड़ों को दूर रखने के लिए प्रयोग कर रहे हैं.
एएसआई के भोपाल सर्कल में पहले तैनात रहे सुपरिटेंडिंग आर्कियोलॉजिस्ट मनोज कुर्मी ने बताया कि संगठन ने किले में पर्यटकों के मुख्य रास्तों पर चमगादड़ों को आने से रोकने के लिए सेफ्टी नेट और जालीदार बैरियर लगाए हैं.
कुर्मी ने कहा, “चमगादड़ अंधेरी जगहों पर अपना बसेरा बनाते हैं. यह कोई नई बात नहीं है, सदियों से यह उनका ठिकाना रहा है. ये दुर्लभ प्रजातियां हैं. हमें सार्वजनिक जगहों पर उनकी मौजूदगी को सीमित करना चाहिए, लेकिन उनके घरों को नष्ट नहीं करना चाहिए.”
एएसआई के चंडीगढ़ सर्कल में तैनात अधिकारी ने आगे कहा कि चमगादड़ों को हटाना सही नहीं है क्योंकि वे इकोलॉजिकल बैलेंस (पारिस्थितिक संतुलन) के लिए ज़रूरी हैं.
हर जगह चमगादड़ों की समस्या
पूरे भारत में, चमगादड़ संरक्षण से जुड़ी सबसे मुश्किल चुनौतियों में से एक बनकर उभरे हैं. फिर भी, एएसआई के पास इनसे निपटने के लिए कोई एक जैसी पॉलिसी, आदेश, बजट या तरीका नहीं है. समाधान अक्सर पुरातत्वविदों की अपनी सूझ-बूझ और देसी तरीकों पर निर्भर करते हैं.
जयपुर के पास आमेर में 17वीं सदी का जगत शिरोमणि मंदिर अपनी बारीक वास्तुकला और छतों पर बनी पारंपरिक भित्ति-चित्रों (म्यूरल और फ्रेस्को) के लिए जाना जाता है, लेकिन चमगादड़ों ने इसके प्रवेश द्वार पर कब्ज़ा कर लिया है. और ये भित्ति-चित्र आम जनता के लिए पहुंच से बाहर हैं.
जयपुर में तैनात एएसआई के एक अधिकारी ने याद करते हुए कहा, “मैंने इस जगह को जनता के लिए खोलने की कोशिश की, लेकिन नाकाम रहा क्योंकि वहां बड़ी संख्या में चमगादड़ डेरा जमाए हुए थे.”
नाम न बताने की शर्त पर उन्होंने कहा, “चमगादड़ों की बीट से पेंटिंग खराब हो रही हैं.” उनसे पहले भी दूसरों ने कोशिश की थी, लेकिन किसी को भी कोई पक्का समाधान नहीं मिला.

2017 में, गुजरात के मोढेरा में 11वीं सदी के सूर्य मंदिर में चमगादड़ों की समस्या खतरनाक स्तर तक पहुंच गई थी. पालन करने के लिए कोई तय तरीका न होने पर अधिकारियों ने अपने तरीके अपनाए.
अरुण मलिक, जो पहले वड़ोदरा सर्कल में तैनात थे और अब एएसआई के औरंगाबाद सर्कल में सुपरिटेंडिंग आर्कियोलॉजिस्ट हैं, ने याद करते हुए कहा, “कई महीनों तक हमने मंदिर में गुग्गुल की धूनी दी और चमगादड़ों को भगाने के लिए तेज़ रोशनी वाली टॉर्च का इस्तेमाल किया.”
मलिक ने कहा कि इस देसी तरीके से इन उड़ने वाले स्तनधारियों को सफलतापूर्वक हटा दिया गया.
जुगाड़, लेकिन सफलता की कोई गारंटी नहीं
एएसआई सर्कल अधिकारियों को चमगादड़ों की समस्या से निपटने के लिए ट्रेनिंग देने की कोई औपचारिक प्रक्रिया नहीं है. इसमें व्यक्तिगत पहल और सोच काम आती है.
एएसआई की संयुक्त महानिदेशक और प्रवक्ता नंदिनी भट्टाचार्य साहू ने कहा, “एएसआई स्मारकों पर चमगादड़ों की समस्या से निपटने के लिए आम तरीकों का इस्तेमाल कर रहा है जैसे तार की जाली लगाना, पत्थर की सतह को साफ करना और कभी-कभी धूनी देना.”
हालांकि, साहू ने ज़ोर देकर कहा कि ये चमगादड़ों के झुंड को हटाने के पक्के तरीके नहीं हैं.
उन्होंने कहा कि यह समस्या “मौजूद है, लेकिन इन तरीकों से इसे काफी हद तक कम कर दिया गया है.”
पिछले कुछ सालों में, एएसआई ने अल्ट्रासोनिक साउंड डिवाइस के साथ प्रयोग किए हैं, जो इंसानों के सुनने की क्षमता से ज़्यादा फ्रीक्वेंसी वाली तरंगें छोड़ते हैं. आंध्र प्रदेश में लेपाक्षी मंदिर में, एएसआई के एक अधिकारी ने दरवाज़ों और खिड़कियों पर जाली लगाने के साथ-साथ 10 वर्ग मीटर के इलाके के लिए यह डिवाइस लगाया था. साहू ने बताया कि 2024 में आगरा के ताजमहल में चमगादड़ों को भगाने के लिए नेफथलीन की ईंटों और हैलोजन लैंप जैसे सफल प्रयोग भी किए गए.
ज़्यादा टूरिस्ट=कम चमगादड़?
एक साल बाद यह लड़ाई दिल्ली में आ गई.
14वीं सदी की खिड़की मस्जिद में, चमगादड़ स्मारक के चार खुले आंगनों से झुंड में घुस आए और उसकी गुंबददार छतों पर बस गए. 2018 में, उस समय के सुपरिंटेंडेंट आर्कियोलॉजिस्ट एनके पाठक ने उनकी एंट्री रोकने के लिए लकड़ी के स्ट्रक्चर और स्टील-वायर फ्रेम लगाने का ऑर्डर दिया.
पाठक को उम्मीद थी कि इस दखल से मस्जिद की पहचान बन चुकी बदबू खत्म हो जाएगी. पर ऐसा नहीं हुआ.

जैसे-जैसे साल बीतते गए, खिड़की मस्जिद में विज़िटर्स से ज़्यादा चमगादड़ आने लगे—एक ऐसी बात जिसने हिस्ट्री व्लॉगर्स का ध्यान खींचा.
इस साल अप्रैल में, व्लॉगर रहमत अली ने कहा, “अब यह इबादत की जगह कम, चमगादड़ों का बसेरा ज़्यादा लगती है.”
जेएनयू के पीएचडी स्टूडेंट जय वर्धन सिंह ने 2024 में खिड़की मस्जिद जाने के बाद एक्स पर लिखा, “मस्जिद के अंदर, चमगादड़ों की बहुत ज़्यादा बीट की वजह से उल्टी जैसा महसूस हो रहा था.”
आर्कियोलॉजिस्ट फणीकांत मिश्रा ने पूरे भारत में कई एएसआई सर्कल को हेड किया और माना कि एएसआई ने कभी गंभीर कदम नहीं उठाए.
उन्होंने कहा, “चमगादड़ मॉन्यूमेंट्स के लिए कैंसर की तरह हैं और बदकिस्मती से हमारे पास उनका कोई पक्का इलाज नहीं है. चमगादड़ किसी मॉन्यूमेंट की ज़िंदगी पर बुरा असर डालते हैं. अक्सर, वे अपने साथ पौधे लाते हैं, जिनकी जड़ें निकल आती हैं और दीवारों और छतों में दरारें आ जाती हैं. इससे हमारी विरासत को बड़ा नुकसान होता है. जब कंज़र्वेशन पॉलिसी बनाई गई थी, तो चमगादड़ों पर फोकस नहीं किया गया था. यह एक गंभीर कमी है.”
मिश्रा ने याद किया कि जब भी वह इंस्पेक्शन के लिए भोपाल और चंडीगढ़ के मॉन्यूमेंट्स में जाते थे, तो स्थानीय अधिकारी उन्हें कहते थे, “सर उधर मत जाइए, वहां बहुत सारे चमगादड़ हैं.”
एएसआई के कई अधिकारियों और संरक्षण के जानकारों का कहना है कि ऐतिहासिक मॉन्यूमेंट्स पर चमगादड़ों के रहने की समस्या का सबसे अच्छा इलाज टूरिज्म है. जितने ज़्यादा टूरिस्ट होंगे, चमगादड़ों की आबादी उतनी ही कम होगी.
भारत में आगा खान ट्रस्ट फॉर कल्चर (एकेटीसी) के कंजर्वेशन आर्किटेक्ट और प्रोजेक्ट्स डायरेक्टर रतीश नंदा ने कहा, “मेरे ऑब्जर्वेशन के आधार पर, चमगादड़ उन मॉन्यूमेंट्स पर ज़्यादा पनपते हैं जहां कम विज़िटर होते हैं. दिल्ली में हुमायूं के मकबरे पर हज़ारों विज़िटर आते हैं. इसलिए, जब हमने कंजर्वेशन का काम शुरू किया तो मकबरे पर कोई चमगादड़ नहीं था.”
नंदा ने आगे कहा कि चमगादड़ों के इकोलॉजी के लिए ज़रूरी होने के बारे में जागरूकता बढ़ रही है.
नंदा ने कहा, “आगा खान ट्रस्ट फॉर कल्चर, चमगादड़ों के लिए सुरक्षित जगहें देने के लिए सेंटर फॉर वाइल्डलाइफ स्टडीज के साथ एक रिसर्च प्रोग्राम शुरू करने की उम्मीद कर रहे हैं.”
हालांकि, टाटा ट्रस्ट्स, जिसने रेस्टोरेशन के काम के लिए फंड दिया था, ने 2013 में एक बयान जारी किया था, जिसमें स्मारक पर चमगादड़ों की मौजूदगी का ज़िक्र था.
बयान में लिखा है, “कबूतरों की बीट से ढके गुंबदों और चमगादड़ों और चूहों से भरे कब्रों को साफ करके ठीक किया गया, टूटे हुए दरवाज़ों को बदला गया और मेहराबों और चबूतरे पर नक्काशी और सजावटी काम को बेहतर बनाया गया.”
हरियाणा की हेरिटेज साइट से निकलीं ‘चमगादड़ों की बीट से भरी 25 ट्रॉली’
पूरे भारत में ऐसी ही दुखद स्थिति बार-बार देखने को मिलती है.
हरियाणा के नारनौल में, जो यहां से सैकड़ों किलोमीटर दूर है, अधिकारियों को कुछ ऐसा ही नज़ारा तब देखने को मिला जब 2022 में 17वीं सदी के ‘छत्ता राय बाल मुकुंद दास पैलेस’ की मरम्मत का काम शुरू हुआ. इमारत इतनी जर्जर हो चुकी थी कि उस पर पूरी तरह से चमगादड़ों का कब्ज़ा हो गया था.
नारनौल में मध्यकालीन युग की कई इमारतें हैं, जिनमें बावड़ियां (सीढ़ीदार कुएं) और मकबरे से लेकर दीवानों का शानदार महल भी शामिल है, दीवानों को मुगल बादशाहों ने शासन चलाने के लिए नियुक्त किया था.
हरियाणा पुरातत्व विभाग द्वारा कुछ साल पहले संरक्षण का काम शुरू करने से पहले इनमें से ज़्यादातर इमारतें खंडहर हो चुकी थीं.
हालांकि, नारनौल में मिर्ज़ा अलीज़ान बावड़ी, छत्ता राय बाल मुकुंद दास पैलेस और पीर तुर्कमान मकबरे पर चमगादड़ों का कब्ज़ा हो गया था.
जब हरियाणा पुरातत्व विभाग की पूर्व डिप्टी डायरेक्टर बनानी भट्टाचार्य ने 2022 में छत्ता राय बाल मुकुंद दास पैलेस का दौरा किया, तो उनका पैर चमगादड़ों की बीट के एक बड़े ढेर में फंस गया.
भट्टाचार्य ने कहा, “उस जगह से बीट से भरी पच्चीस ट्रॉली हटाई गईं.”


हरियाणा पुरातत्व विभाग द्वारा नियुक्त दानिश, जो अभी नारनौल में मरम्मत के काम की देखरेख कर रहे हैं, ने बताया कि महल के ग्राउंड फ़्लोर पर लाखों चमगादड़ रहते थे, जिससे उस इलाके में घुसना मुश्किल हो गया था. उन्होंने एक कैटरिंग कंपनी से तेज़ रोशनी वाली हैलोजन लाइटें किराए पर लीं और उन्हें उन सभी जगहों पर लगाया जहां चमगादड़ों का डेरा था.
दानिश ने कहा, “चमगादड़ रोशनी से दूर भागते हैं, इसलिए वे वहां से चले गए.” उन्होंने बताया कि यह काम कई शामों तक किया गया.
दानिश ने बताया कि चमगादड़ों को हटाने के तुरंत बाद विभाग के लोगों ने इमारत के दरवाज़े बंद कर दिए, लेकिन उनकी बीट की तीखी गंध अभी भी वहां बनी हुई है.
अजंता की गुफाओं में बनी पेंटिंग्स चमगादड़ों की बीट से खराब हो रही हैं
2013 की कैग रिपोर्ट में बताया गया था कि महाराष्ट्र के औरंगाबाद में अजंता की गुफाओं के रखरखाव पर 7.19 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे.
लेकिन चमगादड़ अभी भी इस प्राचीन गुफा की कीमती बौद्ध पेंटिंग्स को नुकसान पहुंचा रहे थे.
2013 की कैग रिपोर्ट में कहा गया है, “पहले पेंटिंग्स को बचाने के लिए जो सुरक्षात्मक परत लगाई गई थी, उस पर धूल, कालिख और चमगादड़ों की बीट आदि जमा हो गई थी, जिससे पेंटिंग्स पर एक धुंधली परत बन गई थी.”

भारत की ऐतिहासिक इमारतों पर चमगादड़ों का असर आज़ादी के बाद की कोई नई बात नहीं है.
इतिहासकारों और पुरातत्वविदों ने 19वीं सदी से ही स्मारकों की सतहों पर इनके असर को दर्ज किया है.
1819 में जब ब्रिटिश सेना के अधिकारी कैप्टन जॉन स्मिथ ने बाघ के शिकार के दौरान अजंता की गुफाओं की खोज की थी, तभी से चमगादड़ों की बीट से होने वाले नुकसान को संरक्षण से जुड़ी बड़ी समस्याओं में से एक माना गया था.
अलग-अलग समय पर अजंता की गुफाओं का दौरा करने वाले विद्वानों ने पेंटिंग्स के खराब होने या मिटने का ब्योरा दर्ज किया है.
जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स के प्रिंसिपल जॉन ग्रिफिथ्स यह देखकर दुखी हुए कि 1872 में उन्होंने जो पेंटिंग्स देखी थीं, उनमें से बहुत सी 1885 तक खत्म हो चुकी थीं.
ग्रिफिथ्स ने ‘द पेंटिंग्स इन द बुद्धिस्ट केव-टेम्पल्स ऑफ अजंता’ (1896) में लिखा, “जब मैंने पहली बार 1872 में इस जगह का दौरा किया, तो नीले कबूतर, मेसन-बीज़ (एक तरह की मधुमक्खी), अबाबील पक्षी और हज़ारों चमगादड़ वहां बेरोकटोक मौजूद थे और पेंटिंग्स को खराब करने में काफी हद तक योगदान दे रहे थे, जबकि चट्टान की दरारों से पानी रिस रहा था.”
ग्रिफिथ्स ने चमगादड़ों को अंदर आने से रोकने और गुफा की पेंटिंग्स को और नुकसान से बचाने के लिए लकड़ी के दरवाज़े और शटर लगाने की सलाह दी थी.
जब उन्होंने 1885 में दोबारा उस जगह का दौरा किया, तो दरवाज़े और शटर खराब हो चुके थे, जिससे गुफाएं चमगादड़ों के लिए खुली हुई थीं.
ग्रिफिथ्स ने लिखा, “चमगादड़ जो सबसे ज़्यादा नुकसान पहुंचाने वाले जीव थे—फिर से वहां मौजूद थे, कई तस्वीरें इतनी खराब हो चुकी थीं कि उन्हें पहचाना भी नहीं जा सकता था, जबकि वहां तैनात सिपाही शायद यह मानते थे कि गुफाओं में जाकर सिर्फ सोने से ही उन्होंने अपना फ़र्ज़ पूरा कर लिया है.”
1920-21 में, अजंता की गुफाओं में काम करते समय, इटली के विशेषज्ञों ने भी अजंता की पेंटिंग्स के खराब होने की वजह चमगादड़ की बीट को ही माना था.
1953 में, जब गुफा को एएसआई के अधिकार क्षेत्र में लाया गया, तो चमगादड़ों को अंदर आने से रोकने के लिए दरवाजों और खिड़कियों पर छोटी जाली वाले लकड़ी के फ्रेम लगाए गए.
हालांकि, पिछली कुछ सदियों से छतों और उनके जोड़ों पर जमा चमगादड़ की बीट इतनी ज़्यादा थी कि आज भी यह एक समस्या बनी हुई है. दर्ज की गई समस्याओं में पेंट किया हुआ प्लास्टर उखड़ना, वास्तुकला से जुड़ी चीज़ों को नुकसान पहुंचना, पेंटिंग्स के पास की दीवारों से पेंट की परतें निकलना और तीखी बदबू आना शामिल है.
अरुण मलिक ने कहा, “हमने अब गुफाओं के सभी प्रवेश द्वारों पर जालियां लगा दी हैं.”
“बारिश के मौसम में चमगादड़ों की बीट धीरे-धीरे अगल-बगल और नीचे की ओर फैल रही है और यह अजंता के लिए बहुत चिंता का विषय है. काली परत में कार्बनिक पदार्थ ज़्यादा होते हैं और ये सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों के लिए पोषक तत्व का काम करते हैं, जिससे भित्ति-चित्रों (म्यूरल) को जैविक नुकसान पहुंचता है. भारत की अजंता गुफा की सजावटी सतहों से चमगादड़ की बीट (गुआनो) की सफाई संरक्षण से जुड़ी एक बड़ी चिंता है.” यह बात एएसआई में असिस्टेंट एसए केमिस्ट डीए गुप्ता और एमआर सिंह द्वारा लिखे गए और 2020 में प्रकाशित पेपर ‘टेम्परेरी हाइड्रोफोबिक कोटिंग का उपयोग करके पानी में घुलनशील दीवार पेंटिंग्स से चमगादड़ की बीट हटाना’ में कही गई है.
इस समस्या से निपटने के लिए, एएसआई केमिस्टों ने सफाई के अनोखे तरीके अपनाए. उन्होंने नाजुक पेंट की गई सतहों को नुकसान पहुंचाए बिना सख्त हो चुकी परत को ढीला करने के लिए अमोनियम कार्बोनेट और हाइड्रोजन पेरोक्साइड जैसे यौगिकों का इस्तेमाल किया.
औरंगाबाद सर्कल के डिप्टी सुपरिटेंडिंग आर्कियोलॉजिस्ट (केमिस्ट) एस. विनोद ने बताया, “हमने उस सतह को साफ करने के लिए एंजाइम-आधारित घोल का इस्तेमाल किया जो चमगादड़ों से बुरी तरह प्रभावित थी और फिर ब्रश से कचरा हटा दिया.”
लेकिन चमगादड़ कहां जाएंगे?
चमगादड़ों के ख़िलाफ लड़ाई पर भी मतभेद हैं. एएसआई के अंदर और बाहर के कुछ लोगों का कहना है कि ये स्मारक चमगादड़ों का प्राकृतिक घर हैं और उन्हें परेशान नहीं किया जाना चाहिए.
नवंबर 2025 में, इकोलॉजिस्ट सुमित डूकिया ने साकेत की खिड़की मस्जिद में ‘बिहेवियर ऑफ़ बैट्स’ (चमगादड़ों का व्यवहार) नाम की एक अनोखी वॉक पर नौ लोगों को ले गए.
नई दिल्ली की गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर (एनिमल इकोलॉजी और वाइल्डलाइफ बायोलॉजी) डूकिया ने कहा, “कोई भी इकोसिस्टम में चमगादड़ों की भूमिका के बारे में बात नहीं कर रहा है, जबकि समाज इस स्तनधारी जीव को नकारात्मक नज़रिए से देखता है. हम लोगों को उन जगहों पर ले गए जहां चमगादड़ रहते हैं ताकि वे शहरी माहौल में उनकी इकोलॉजिकल भूमिकाओं को जान सकें.”
उन्होंने बताया कि चमगादड़ कीड़ों को कंट्रोल करने में मदद करते हैं.

हालांकि डूकिया ने माना कि चमगादड़ स्मारकों में बसेरा करते हैं और हेरिटेज साइट्स पर उनकी मौजूदगी को सीमित किया जा सकता है, लेकिन उन्होंने उन्हें पूरी तरह हटाने के ख़िलाफ चेतावनी दी और कहा कि इससे इकोलॉजिकल संतुलन बिगड़ जाएगा.
डूकिया के पेपर ‘द मॉन्यूमेंटल मिस्टेक ऑफ इविक्टिंग बैट्स फ्रॉम आर्कियोलॉजिकल साइट्स – ए रिफ्लेक्शन फ्रॉम न्यू दिल्ली’ में लिखा है, “चमगादड़ों के मल-मूत्र से स्मारकों का खराब होना और उन पर दाग पड़ना तो होता है, लेकिन गंभीर रूप से खराब होने (वेदरिंग) के असर असामान्य हैं और ये मुख्य रूप से इमारत बनाने वाले मटीरियल के केमिकल कंपोज़िशन पर निर्भर करते हैं.”
डूकिया ने दावा किया कि हुमायूं के मकबरे में मरम्मत का काम पूरा होने के बाद, दिल्ली में चमगादड़ों की कुछ प्रजातियां दोबारा कभी नहीं देखी गईं.
डूकिया ने बताया कि हैदराबाद के गोलकुंडा किले में, स्थानीय अधिकारियों ने चमगादड़ों के लिए एक एरिया छोड़ दिया था जहां लोगों का आना-जाना कम था. उन्होंने तर्क दिया, “स्मारकों के अंदर कम आने-जाने वाली जगहों को चमगादड़ों के रहने के लिए तय किया जा सकता है. यह तरीका हर जगह अपनाया जा सकता है.”
पिछले दो दशकों में, एएसआई अधिकारियों ने गोलकुंडा किले के परिसर में रानी महल से चमगादड़ों को हटाने के लिए कई कोशिशें की हैं, जैसे फॉगिंग, मिस्टिंग और यहां तक कि सूखी नीम की पत्तियों और हल्दी के मिश्रण को जलाना.
एएसआई के हैदराबाद सर्कल के सुपरिटेंडिंग आर्कियोलॉजिस्ट एन निहिलदास ने कहा, “मेरे पहले के अधिकारियों ने भी रानी महल से चमगादड़ों को हटाने की कोशिश की थी, लेकिन पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध किया. रानी महल में अभी भी चमगादड़ों की बड़ी आबादी है.”
हालांकि, जानकारों का कहना है कि अगर चमगादड़ों को स्मारक से हटाया गया, तो उनके पास जाने के लिए कोई दूसरी जगह नहीं होगी.
सेंटर फ़ॉर वाइल्डलाइफ स्टडीज़ के बैट रिसर्चर रोहित चक्रवर्ती ने कहा, “पुरातत्वविदों और चमगादड़ इकोलॉजिस्ट को मिलकर ऐसे समाधान खोजने होंगे जो दोनों के लिए फ़ायदेमंद हों. जहां कम समय के समाधान स्मारक के ढांचे को होने वाले नुकसान को कम करने पर केंद्रित हो सकते हैं, वहीं लंबे समय के समाधानों का लक्ष्य चमगादड़ों के लिए कृत्रिम गुफाएं बनाना हो सकता है ताकि इन स्तनधारियों के पास रहने के लिए वैकल्पिक जगह हो.”
चक्रवर्ती ने ज़ोर देकर कहा कि चमगादड़ों को पूरी तरह से हटाने का कोई भी कदम तब तक एक अस्थायी उपाय ही रहेगा, जब तक कि उनके प्राकृतिक आवासों को बहाल नहीं किया जाता या कृत्रिम आवास नहीं बनाए जाते.
डूकिया ने कहा कि एक समस्या यह है कि भारत की समृद्ध लोक-कथाओं में चमगादड़ों को अक्सर बुरी नज़र से देखा जाता है और उन्हें राक्षसों से जोड़ा जाता है, जिससे स्वाभाविक रूप से लोगों के मन में डर पैदा होता है.
डूकिया ने कहा, “लोगों को चमगादड़ों और इकोसिस्टम में उनकी भूमिका के बारे में जागरूक करके इस डर को उत्साह में बदला जा सकता है. ‘बैट वॉक’ ऐसी ही एक पहल हो सकती है, जिसमें लोग चमगादड़ों को बहुत करीब से देख और अनुभव कर सकते हैं.”
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