लखनऊ: ऐसे समय में जब समाजवादी पार्टी (सपा) पूरे उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण सम्मेलन कर रही है और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट देने का वादा कर रही है, योगी आदित्यनाथ की अगुआई वाली उत्तर प्रदेश सरकार ने शाहजहांपुर की जलालाबाद तहसील का नाम बदलकर भगवान परशुराम पुरी करने का ऐलान किया है.
सोमवार को राज्य कैबिनेट ने इस फैसले को मंजूरी दे दी. इसे आने वाले चुनावों से पहले प्रभावशाली ब्राह्मण समुदाय को अपने पक्ष में लाने के लिए भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की बड़ी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.
दिप्रिंट को जानकारी मिली है कि नाम बदलने की प्रक्रिया पिछले साल ही शुरू हो गई थी. उस समय शाहजहांपुर के जिलाधिकारी धर्मेंद्र प्रताप सिंह ने राज्य सरकार को प्रस्ताव भेजकर जलालाबाद का नाम बदलने की सिफारिश की थी. विपक्ष लगातार योगी आदित्यनाथ सरकार पर ब्राह्मण समुदाय की अनदेखी करने का आरोप लगाता रहा है. ऐसे में कई ब्राह्मणों द्वारा पूजे जाने वाले भगवान परशुराम के नाम पर जलालाबाद तहसील का नाम रखने के फैसले को बीजेपी की ओर से इस आरोप का जवाब देने की कोशिश माना जा रहा है.
लखनऊ विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर एस. के. द्विवेदी ने कहा, “जगहों के नाम बदलने की राजनीति पहले की सरकारों के समय भी होती रही है. किसी जगह का नाम भगवान परशुराम के नाम पर रखना, कुछ हद तक ब्राह्मण समुदाय को अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश है. राज्य की राजनीति में इस समुदाय को काफी महत्वपूर्ण माना जाता है. सिर्फ नाम बदलने से सब कुछ नहीं बदल जाएगा, लेकिन चुनावी साल में इससे एक राजनीतिक संदेश जरूर जाता है.”
यूपी में ब्राह्मण राजनीति
ब्राह्मण उत्तर प्रदेश की कुल आबादी का लगभग 10 से 12 प्रतिशत माने जाते हैं. राज्य की कई विधानसभा सीटों पर वे कुल मतदाताओं के पांचवें हिस्से से भी ज्यादा हैं. राज्य के कई ब्राह्मण संगठन दावा करते हैं कि अगर उनसे जुड़े दूसरे सवर्ण समुदायों, जैसे त्यागी और भूमिहार, को भी शामिल किया जाए तो उनकी आबादी का हिस्सा और भी ज्यादा हो जाता है.
अखिल भारतीय ब्राह्मण संगठन महासंघ के अध्यक्ष असीम पाण्डेय ने दिप्रिंट से कहा कि ब्राह्मण राज्य की आबादी का 13 प्रतिशत से ज्यादा हैं और आज भी सबसे प्रभावशाली जाति समूह हैं.
पांडे ने कहा, “उत्तर प्रदेश में कौन सत्ता में आएगा, यह ब्राह्मण तय करते हैं और सरकार गिराने की ताकत भी रखते हैं. राज्य का चुनावी इतिहास यही बताता है.”
पिछले महीने सपा ने ऐलान किया था कि वह पूरे उत्तर प्रदेश के सभी 18 मंडलों में प्रबुद्ध सम्मेलन आयोजित करेगी. इन सम्मेलनों का मुख्य फोकस ब्राह्मण समुदाय रहेगा. पार्टी 5 अगस्त को अपने सह-संस्थापक जनेश्वर मिश्र की जयंती पर एक बड़ी रैली भी करने जा रही है.
बसपा ने भी ब्राह्मण समुदाय तक पहुंच बढ़ा दी है. पार्टी प्रमुख मायावती ने ऐलान किया है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में ब्राह्मण उम्मीदवारों को बड़ी संख्या में टिकट दिए जाएंगे. कांग्रेस भी ब्राह्मण मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है. हाल ही में वाराणसी में युवा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने राहुल गांधी के 56वें जन्मदिन पर उन्हें भगवान परशुराम के रूप में दिखाते हुए पोस्टर लगाए, जिससे राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया. इन पोस्टरों में राहुल गांधी के हाथ में फरसा और संविधान की एक प्रति दिखाई गई थी. ये पोस्टर गंगा किनारे आयोजित पूजा के दौरान लगाए गए थे.
साल 2020 से ही योगी सरकार को ब्राह्मण समुदाय के साथ अपने संबंधों को लेकर विपक्ष के निशाने पर रहना पड़ा है. खासकर गैंगस्टर विका दुबे के पुलिस एनकाउंटर के बाद यह मुद्दा और ज्यादा उठा.
इसके बाद ब्राह्मण आरोपियों से जुड़े कई पुलिस एनकाउंटर भी विवाद में रहे. विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि योगी आदित्यनाथ सरकार ब्राह्मण समुदाय के लोगों को निशाना बना रही है.
राज्य सरकार ने इन आरोपों को हमेशा खारिज किया है. अब जलालाबाद का नाम बदलकर भगवान परशुराम पुरी करने जैसे फैसलों के जरिए वह ब्राह्मण समुदाय को अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रही है.
लंबे समय से चल रही थी तैयारी
दिप्रिंट को जानकारी मिली है कि जलालाबाद का नाम बदलने की कोशिश काफी समय से चल रही थी. इस साल की शुरुआत में उत्तर प्रदेश सरकार ने इसके लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय से अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) मांगा था. गृह मंत्रालय ने इसकी मंजूरी दे दी. इसके बाद प्रस्ताव को शहरी विकास विभाग के पास भेजा गया और फिर अंतिम मंजूरी के लिए राज्य कैबिनेट के सामने रखा गया.
ऐतिहासिक रूप से माना जाता है कि जलालाबाद का नाम अकबर के पूरे नाम जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर के नाम पर पड़ा था. ‘जलालाबाद’ का मतलब है ऐसा शहर, जिसे उनके नाम पर बसाया गया हो या विकसित किया गया हो. स्थानीय ऐतिहासिक जानकारियों के मुताबिक, मुगल काल से पहले इस जगह का नाम धर्मपुरी था. बाद में मुगल शासन के दौरान इसका नाम बदलकर जलालाबाद कर दिया गया.
राज्य सरकार ने इस फैसले के पीछे धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व का भी हवाला दिया है. कई हिंदू मान्यताओं के अनुसार, इस शहर को भगवान परशुराम की जन्मस्थली माना जाता है. साल 2022 में उत्तर प्रदेश सरकार ने इस जगह को आधिकारिक तौर पर परशुराम जन्मभूमि घोषित किया था. स्थानीय लोगों का मानना है कि यहां का मंदिर और तीर्थ स्थल हजारों साल पुराना है.
इस फैसले का स्वागत करते हुए केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद ने इसे ऐतिहासिक दिन बताया. उन्होंने कहा, “मैं प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृह मंत्री और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का धन्यवाद करता हूं. यह लाखों लोगों की लंबे समय से चली आ रही मांग थी, जो अब पूरी हो गई है. यह डबल इंजन सरकार की ताकत को दिखाता है. अब हमारा ध्यान इस क्षेत्र के विकास पर रहेगा और मुझे विश्वास है कि यह फैसला एक मील का पत्थर साबित होगा.”
जितिन प्रसाद पिछले कई वर्षों से जलालाबाद का नाम बदलने की मांग कर रहे थे. इसी साल उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री योगी से मुलाकात कर नाम बदलने की प्रक्रिया को आसान बनाने का अनुरोध किया था.
जितिन प्रसाद पीलीभीत से सांसद हैं और उनका संबंध शाहजहांपुर जिले से है. ऐसे में इस फैसले से उन्हें ब्राह्मण नेतृत्व के प्रमुख चेहरे के रूप में पेश करने में भी मदद मिलेगी.
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