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Saturday, 1 August, 2026
होमफीचरमुंबई का पीने का पानी घट रहा है: मैनोरी डीसैलिनेशन प्लांट से समाधान तलाश रही BMC

मुंबई का पीने का पानी घट रहा है: मैनोरी डीसैलिनेशन प्लांट से समाधान तलाश रही BMC

मुंबई को अपना पहला डिसेलिनेशन प्लांट (खारे पानी को मीठा बनाने वाला प्लांट) मिलने वाला है. यह प्लांट अरब सागर के खारे पानी को पीने लायक पानी में बदलेगा, और ऐसा इतने बड़े पैमाने पर किया जाएगा जैसा शहर में पहले कभी नहीं किया गया.

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मुंबई: हर मानसून में मुंबई की नजर अपनी झीलों पर रहती है. शहर की पीने के पानी की सुरक्षा इस बात पर निर्भर करती है कि ठाणे, पालघर और नासिक में फैली सात झीलों में कितनी बारिश होती है. अगर मानसून अच्छा रहता है तो जलाशय पूरे साल के लिए भर जाते हैं. लेकिन अगर बारिश कम हो या देर से आए तो पानी की कटौती का खतरा फिर बढ़ जाता है.

मुंबई को अभी भात्सा, अपर वैतरणा, मिडिल वैतरणा, मोडक सागर, तानसा, विहार और तुलसी झील पर बने बांधों से हर दिन करीब 4,100 मिलियन लीटर पीने का पानी मिलता है. इसके बावजूद शहर में रोज 500 से 600 मिलियन लीटर पानी की कमी रहती है. बीएमसी के मुताबिक मुंबई को हर दिन 4,664 मिलियन लीटर पानी की जरूरत होती है.

यह पानी की कमी आगे और बढ़ने की उम्मीद है क्योंकि पुराने कम मंजिला मकानों और हाउसिंग कॉलोनियों की जगह ऊंची इमारतें बन रही हैं, जिनमें उसी जमीन पर ज्यादा घर होते हैं. इससे रहने वाले लोगों की संख्या और व्यापारिक गतिविधियां बढ़ती हैं, जिससे पानी की मांग भी बढ़ जाती है. शहर की आबादी भी प्राकृतिक रूप से और दूसरे राज्यों से आने वाले लोगों की वजह से लगातार बढ़ रही है.

इस गर्मी में यह खतरा फिर साफ दिखाई दिया. 11 मई को मुंबई के सात जलाशयों में इस्तेमाल लायक पानी शहर की सालाना जरूरत का सिर्फ 23.5 प्रतिशत रह गया था. इसके बाद बीएमसी ने 15 मई से पूरे शहर में 10 प्रतिशत पानी की कटौती लागू कर दी.

16 जून तक इस्तेमाल लायक पानी घटकर कुल क्षमता का सिर्फ 10.35 प्रतिशत रह गया. मानसून में देरी होने के कारण बीएमसी ने उद्योगों, व्यापारिक संस्थानों और खेल सुविधाओं के लिए 20 प्रतिशत अतिरिक्त पानी कटौती लागू की. वहीं निर्माण परियोजनाओं और स्विमिंग पूलों की पानी सप्लाई पूरी तरह बंद कर दी गई.

अब बीएमसी बारिश पर निर्भर जलाशयों के अलावा दूसरे विकल्पों पर काम कर रही है ताकि मुंबई की पीने के पानी की कमी दूर की जा सके. मुंबई और महाराष्ट्र का पहला डिसैलिनेशन प्लांट मनोरी में बनाया जाएगा. यह मुंबई के उत्तरी हिस्से में समुद्र किनारे स्थित गांव है. इस प्लांट का मकसद अरब सागर के खारे पानी को साफ करके 400 मिलियन लीटर रोज पीने का पानी तैयार करना है. मुंबई में इस स्तर का प्रोजेक्ट पहली बार होगा.

Manori Desalination Plant, project location at a seaside village in Manori, in Mumbai’s northwestern suburbs | By special arrangement
मनोरी डिसैलिनेशन प्लांट, प्रोजेक्ट की जगह मुंबई के उत्तर-पश्चिमी उपनगरों में मनोरी के समुद्र तटीय गांव में है | विशेष व्यवस्था

डिसैलिनेशन प्लांट

बीएमसी के अतिरिक्त नगर आयुक्त (प्रोजेक्ट्स) अभिजीत बांगर ने दिप्रिंट को बताया, “पहले चरण पर करीब 3,900 करोड़ रुपये खर्च होंगे. इससे 2029 तक 200 मिलियन लीटर रोज पानी मिलेगा.” उन्होंने कहा कि अगर अगले छह महीने में अतिरिक्त 200 मिलियन लीटर वाले हिस्से का वर्क ऑर्डर जारी हो जाता है, तो पूरा प्रोजेक्ट 2029 के अंत तक या 2030 के मध्य तक पूरा हो सकता है. यह प्रोजेक्ट 12 एकड़ में फैला है और इजरायल के डिसैलिनेशन प्लांट से प्रेरित है.

इजरायल की आईडीई टेक्नोलॉजीज को रिवर्स ऑस्मोसिस (RO) तकनीक उपलब्ध कराने, डिसैलिनेशन सिस्टम बनाने और 20 साल तक प्लांट चलाने की जिम्मेदारी दी गई है. वहीं सिविल इंफ्रास्ट्रक्चर हैदराबाद की जीवीपीआर इंजीनियर्स बनाएगी.

हालांकि सिर्फ इज़राइल ही डिसैलिनेशन तकनीक का इस्तेमाल नहीं करता. सऊदी अरब, यूएई, ऑस्ट्रेलिया और सिंगापुर भी इसका उपयोग करते हैं. लेकिन इजरायल अपने पीने के पानी की जरूरत का बड़ा हिस्सा समुद्र के पानी को साफ करके पूरा करता है.

इस प्रोजेक्ट को 7 अप्रैल को महाराष्ट्र कोस्टल जोन मैनेजमेंट अथॉरिटी से मंजूरी मिली. यह मंजूरी मैंग्रोव, ज्वार-भाटा, मछुआरों की आजीविका और ज्यादा नमक वाले पानी के सुरक्षित निपटान जैसी शर्तों के साथ दी गई.

28 अप्रैल को केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने अंतिम कोस्टल रेगुलेशन जोन (CRZ) मंजूरी भी दे दी. मंत्रालय ने बीएमसी को निर्देश दिया कि समुद्र में छोड़े जाने वाले नमकीन पानी के असर पर लगातार निगरानी रखी जाए, समुद्र के नीचे पाइपलाइन बिछाने के लिए टनल बनाई जाए, मनोरी क्रीक की सुरक्षा की जाए और प्लांट की कुछ बिजली जरूरत नवीकरणीय ऊर्जा से पूरी की जाए.

बांगर ने कहा, “सभी जरूरी मंजूरियां मिल चुकी हैं. मानसून के बाद जमीन पर पूरा काम शुरू होगा.”

मनोरी बीएमसी की उन तीन परियोजनाओं में से एक है जिनके जरिए मुंबई की पानी सप्लाई बढ़ाई जाएगी. दूसरी परियोजना 440 मिलियन लीटर क्षमता वाला गर्गई बांध है, जो अभी निर्माण से पहले की स्थिति में है और पर्यावरण मंजूरी का इंतजार कर रहा है. तीसरी परियोजना वर्सोवा में 200 मिलियन लीटर क्षमता वाला डिसैलिनेशन प्लांट है, जो अभी शुरुआती योजना के चरण में है.

इन तीनों परियोजनाओं से कुल 1,040 मिलियन लीटर अतिरिक्त पानी मिलेगा और शहर की मानसून पर निर्भरता कम होगी.

मुंबई जलाशयों से आगे क्यों सोच रही है

भारत के ज्यादातर शहरों में पानी की सप्लाई बढ़ाने का मतलब अब तक नया बांध बनाना ही रहा है.

मुंबई ने भी कई सालों तक यही तरीका अपनाया. बढ़ती आबादी की जरूरत पूरी करने के लिए शहर ने अपने जल नेटवर्क को पड़ोसी जिलों तक बढ़ाया. शहर से करीब 120 किलोमीटर उत्तर में गर्गई नदी पर बनने वाला बांध भी इसी योजना का हिस्सा है.

लेकिन बांध बनाने की भी सीमाएं हैं. उपयुक्त जगहें कम होती जा रही हैं. पानी लाने के लिए लंबी पाइपलाइन बिछानी पड़ती है और आखिरकार यह भी बारिश पर ही निर्भर रहता है. इसी अनिश्चितता ने मुंबई के योजनाकारों को जलाशयों के अलावा दूसरे विकल्पों पर सोचने के लिए मजबूर किया है.

Tansa Dam, a masonry dam on Tansa Lake in Thane district, 100 kms from Mumbai site in northwest suburban Mumbai, contributing about 455 MLD water per day, or 11 per cent of Mumbai’s daily water supply | BMC
मुंबई के उत्तर-पश्चिम उपनगरों में स्थित ठाणे ज़िले की तान्सा झील पर बना तान्सा बांध, रोज़ाना लगभग 455 MLD पानी देता है, जो मुंबई की रोज़ाना पानी की सप्लाई का 11 प्रतिशत है | BMC

बांगर ने कहा, “शहर अब तक ज्यादातर जलाशयों पर निर्भर रहा है. उपनगरों की आबादी हर दशक में करीब 50 प्रतिशत बढ़ जाती है. इसलिए मुंबई को पानी के अतिरिक्त स्रोतों की जरूरत है. हमें गर्गई बांध और मनोरी डिसैलिनेशन प्लांट दोनों से अच्छी मात्रा में पानी मिलेगा.”

IDE टेक्नोलॉजीज इंडिया के सेल्स डायरेक्टर नयन शाह का कहना है कि अब डिसैलिनेशन सिर्फ इंजीनियरिंग का विकल्प नहीं बल्कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की रणनीति का हिस्सा बन गया है.

शाह ने दिप्रिंट से कहा, “पहले चरण में मिलने वाला 200 मिलियन लीटर पानी मुंबई की मौजूदा रोज की जरूरत का सिर्फ करीब 5 प्रतिशत होगा.” उन्होंने कहा कि 400 मिलियन लीटर क्षमता होने के बाद भी यह शहर की कुल जरूरत का 10 प्रतिशत से कम होगा. “लेकिन यही इसका मकसद है. यह प्रोजेक्ट मौजूदा जलाशयों की जगह लेने के लिए नहीं बल्कि पानी के स्रोतों को विविध बनाने के लिए है.”

शाह का मानना है कि भविष्य में मुंबई की पानी सुरक्षा कई स्रोतों के साथ मिलकर ही संभव होगी. जैसे जलाशय, डिसैलिनेशन और बड़े स्तर पर ट्रीट किए गए गंदे पानी का दोबारा इस्तेमाल, जिसे सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) कहा जाता है.

मुंबई सीवेज डिस्पोजल प्रोजेक्ट (MSDP)-स्टेज II के तहत बीएमसी वर्ली, बांद्रा, धारावी, वर्सोवा, मालाड, भांडुप और घाटकोपर में सात बड़े सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बना रही है. इनकी कुल क्षमता 2,464 मिलियन लीटर होगी. 2022 में वर्क ऑर्डर जारी होने के बाद इनका निर्माण चल रहा है और ये 2026 से 2028 के बीच चरणबद्ध तरीके से पूरे होंगे.

फिलहाल ये एसटीपी पीने का पानी नहीं बनाएंगे. मुंबई में इनका इस्तेमाल उद्योग, निर्माण और बागवानी जैसे गैर-पीने योग्य कामों के लिए होगा, जिससे ताजे पानी की मांग कम होगी. इस पानी को पीने योग्य बनाने के लिए अतिरिक्त एडवांस ट्रीटमेंट, कई स्तर की डिसइन्फेक्शन प्रक्रिया, लगातार निगरानी और अलग नियमों की जरूरत होगी.

बांगर ने कहा, “फिलहाल एसटीपी से मिलने वाला पानी गैर-पीने वाले कामों के लिए इस्तेमाल होगा. लेकिन आगे चलकर इसे पीने योग्य बनाने की भी योजना है. कोलाबा के मौजूदा एसटीपी को एडवांस ट्रीटमेंट देकर पीने का पानी तैयार करने लायक बनाया जाएगा. इसी तरह निर्माणाधीन 500 मिलियन लीटर क्षमता वाले वर्ली एसटीपी को भी अपग्रेड किया जाएगा.”

भारतीय कंपनी, इजरायली तकनीक

मनोरी प्रोजेक्ट में दो कंपनियां अलग-अलग जिम्मेदारियां निभाएंगी.

इस प्रोजेक्ट का इंफ्रास्ट्रक्चर हैदराबाद की जीवीपीआर इंजीनियर्स बनाएगी. यह कंपनी 1997 में शुरू हुई थी और पानी सप्लाई, सिंचाई, सीवेज ट्रीटमेंट, बिजली और निर्माण के क्षेत्र में काम करती है. कंपनी मुंबई में 337 मिलियन लीटर क्षमता वाला घाटकोपर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट भी बना रही है. इसके अलावा गुजरात, तेलंगाना और कर्नाटक में सिंचाई और पेयजल परियोजनाओं पर भी काम कर रही है.

मनोरी के समुद्री तट के नीचे टनल बोरिंग के जरिए तीन सुरंगें बनाई जाएंगी. इनमें से दो समुद्र का पानी प्लांट तक लाने के लिए होंगी और एक में ट्रीटमेंट के बाद बचा ज्यादा नमक वाला पानी वापस समुद्र में छोड़ा जाएगा. सामान्य समुद्री पाइपलाइन की तरह इन्हें समुद्र तल पर नहीं बल्कि उसके नीचे बनाया जाएगा ताकि मछुआरों के रास्ते और समुद्री पर्यावरण पर असर न पड़े.

शाह ने कहा, “ब्राइन यानी वही समुद्री पानी जिसमें नमक की मात्रा दोगुनी हो जाती है.” उन्होंने कहा, “इसे समुद्र के गहरे हिस्से में खास तरीके से बनाए गए डिफ्यूजर के जरिए छोड़ा जाएगा, जहां पानी का बहाव तेज होता है. इससे नमकीन पानी जल्दी फैल जाएगा और किसी एक जगह पर नमक की मात्रा नहीं बढ़ेगी.”

Marine survey and sample collection by IDE Technologies India | By special arrangement
IDE टेक्नोलॉजीज़ इंडिया द्वारा समुद्री सर्वे और नमूना संग्रह | विशेष व्यवस्था

आईडीई के मुताबिक इस डिजाइन को तैयार करने में करीब दो साल लगे. इस दौरान समुद्र की गहराई, सोनार सर्वे, ज्वार-भाटा और समुद्र के नीचे की भूगर्भीय जांच जैसी स्टडी की गई.

शाह ने बताया कि समुद्र की सतह खोदने के बजाय टनल बोरिंग मशीनें नीचे से काम करेंगी. “मकसद यह है कि मछुआरों की रोजमर्रा की गतिविधियों पर कम से कम असर पड़े. मछली पकड़ने वाली नावें बिना किसी पाइप या बार्ज से टकराए सामान्य तरीके से चल सकें और जाल डाल सकें.”

इन तीनों सुरंगों की कुल लंबाई करीब सात किलोमीटर होगी. हर सुरंग का व्यास करीब 2.8 मीटर होगा.

समुद्र का पानी प्लांट तक पहुंचने के बाद आईडीई की तकनीक काम करेगी. कंपनी रिवर्स ऑस्मोसिस (RO) तकनीक का इस्तेमाल करेगी, जिसमें समुद्र के पानी को बहुत ज्यादा दबाव के साथ खास मेम्ब्रेन से गुजारा जाएगा ताकि उसमें मौजूद नमक और दूसरी अशुद्धियां अलग हो जाएं. इसके बाद तैयार साफ पानी मुंबई की नगर निगम की पानी सप्लाई व्यवस्था में भेजा जाएगा.

शाह ने कहा, “आईडीई के लिए मनोरी सिर्फ एक निर्माण प्रोजेक्ट नहीं है. कंपनी अगले 20 साल तक इस प्लांट का संचालन और रखरखाव भी करेगी. इसलिए इसके लंबे समय तक अच्छे प्रदर्शन की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी इसका निर्माण.”

इजरायल से सीख

मुंबई ने इजरायल की कंपनी को यूं ही नहीं चुना है. दुनिया में बहुत कम देशों को पानी की सुरक्षा को लेकर इजरायल जितनी बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा है.

सीमित मीठे पानी के स्रोत और सूखी जलवायु वाले इजरायल ने डिसैलिनेशन को महंगे विकल्प से बदलकर अपनी शहरी पानी सप्लाई की रीढ़ बना दिया.

भारत में इजरायल की वॉटर अटैची नोआ अम्सालेम ने दिप्रिंट से कहा, “करीब 20 साल पहले इजरायल मुख्य रूप से प्राकृतिक जल स्रोतों पर निर्भर था. हमारे पास एक मीठे पानी की झील थी, जिससे पूरे देश को पानी मिलता था.”

उन्होंने कहा कि उस समय इजरायली सरकार को एहसास हुआ कि देश भूमध्य सागर के किनारे स्थित है. “फिर सरकार ने एक बड़ी मास्टर प्लान बनाई, जिसके तहत समुद्र के पानी को मीठा बनाने वाले प्लांट बनाए गए. अब 20 साल से यह काम करने के बाद हमें डिसैलिनेशन के फायदे और चुनौतियां दोनों अच्छी तरह समझ आ गई हैं.”

आज इजरायल के शहरों में इस्तेमाल होने वाले 70 प्रतिशत से ज्यादा पानी की सप्लाई बड़े समुद्री डिसैलिनेशन प्लांट से होती है. इस पानी को गैलीली झील और भूमिगत जलभंडार के पानी के साथ राष्ट्रीय नेटवर्क में मिलाकर घरों और कारोबारों तक पहुंचाया जाता है. इजरायल अपने ट्रीट किए गए 87 प्रतिशत से ज्यादा गंदे पानी का दोबारा इस्तेमाल करता है, ज्यादातर खेती के लिए. इससे पीने के पानी पर दबाव कम होता है.

इस बदलाव में आईडीई टेक्नोलॉजीज की बड़ी भूमिका रही है. 1965 में बनी इस कंपनी ने इजरायल के कई बड़े डिसैलिनेशन प्लांट बनाए हैं, जिनमें अश्केलोन, हदेरा और सोरेक शामिल हैं. इनमें से कई प्रोजेक्ट्स ने कम जमीन, कम बिजली खपत और हर 1,000 लीटर पानी पर कम कार्बन उत्सर्जन जैसे मामलों में अंतरराष्ट्रीय मानक तय किए हैं.

यह कंपनी भारत में भी नई नहीं है. पिछले 30 साल में आईडीई ने भारत के कई औद्योगिक और नगर निगम परियोजनाओं के लिए डिसैलिनेशन सिस्टम लगाए हैं. इनमें गुजरात के जामनगर में रिलायंस इंडस्ट्रीज और नायरा एनर्जी की रिफाइनरी, कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा परियोजना, चेन्नई का पूरी तरह चालू 110 एमएलडी नेम्मेली डिसैलिनेशन प्लांट और तमिलनाडु में एसआईपीसीओटी का चल रहा प्रोजेक्ट शामिल हैं.

लेकिन मनोरी का डिसैलिनेशन प्लांट अलग है. जामनगर प्लांट जहां एक औद्योगिक रिफाइनरी को पानी देता है, वहीं मनोरी प्लांट मुंबई के नगर निगम के नेटवर्क के लिए पीने का पानी तैयार करेगा और यह शहर की सीमा के भीतर होगा. यह मुंबई की मानसून पर निर्भर झीलों पर भारी निर्भरता कम करने की पहली बड़ी कोशिश भी है.

शाह ने कहा कि मनोरी में चुनौती सिर्फ डिसैलिनेशन प्लांट बनाना नहीं है. “शहर अब अनियमित मानसून, ज्यादा गर्मी और दूर स्थित बारिश पर निर्भर जलाशयों पर लगातार निर्भरता जैसी समस्याओं का सामना कर रहा है. इसका मतलब है कि शहर अब सिर्फ एक जल स्रोत पर निर्भर नहीं रह सकते. भविष्य में पानी की सुरक्षा अलग-अलग जल स्रोत विकसित करने पर निर्भर करेगी.”

200 एमएलडी क्षमता पर मनोरी प्लांट मुंबई की मौजूदा जरूरत का सिर्फ 4 से 5 प्रतिशत पानी देगा. क्षमता बढ़कर 400 एमएलडी होने पर यह 8 से 10 प्रतिशत तक पहुंचेगा. शाह ने कहा कि इसके बाद भी शहर को रीसायकल किया गया पानी, पानी की मांग पर बेहतर नियंत्रण और वास्तविक कीमत तय करने की जरूरत होगी. उन्होंने कहा कि दोबारा इस्तेमाल होने वाले पानी को “पीने योग्य” स्तर तक साफ करना जरूरी होगा ताकि पानी की कमी या गलती से इस्तेमाल होने पर स्वास्थ्य संबंधी खतरे न हों. “असल सवाल पानी की कीमत नहीं, बल्कि पानी न होने की कीमत है. भरोसेमंद जल ढांचे के लिए लगातार निवेश जरूरी है.”

क्या डिसैलिनेशन पर्यावरण के अनुकूल बन सकता है?

डिसैलिनेशन को लेकर हमेशा एक बड़ी आलोचना रही है कि इसमें बहुत ज्यादा बिजली खर्च होती है.

समुद्र के पानी को रिवर्स ऑस्मोसिस मेम्ब्रेन से गुजारने के लिए बहुत ताकतवर पंप चलाने पड़ते हैं. इसलिए बिजली इसकी सबसे बड़ी परिचालन लागत और पर्यावरण संबंधी चिंता मानी जाती है.

लेकिन बीएमसी का मानना है कि उसने इस समस्या का समाधान निकाल लिया है. मनोरी प्लांट को बिजली ग्रिड से मिलेगी, लेकिन यह बिजली नवीकरणीय ऊर्जा से तैयार की जाएगी.

बांगर ने कहा, “सौर ऊर्जा से बनी बिजली का इस्तेमाल किया जाएगा. ठेकेदार अलग से सोलर बिजली उत्पादन क्षमता बनाएगा, उस बिजली को ग्रिड में डालेगा और प्लांट जितनी बिजली इस्तेमाल करेगा, उतनी ही ग्रीन पावर से उसकी भरपाई की जाएगी.” आईडीई इस मॉडल को और आगे ले जाना चाहती है.

कंपनी सिर्फ सौर ऊर्जा पर निर्भर नहीं रहेगी. वह सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और बैटरी स्टोरेज को मिलाकर प्लांट की 24 घंटे बिजली की जरूरत पूरी करने की योजना बना रही है.

नयन शाह के मुताबिक, “सिर्फ सौर ऊर्जा से रात के समय या लंबे समय तक बादल रहने पर डिसैलिनेशन प्लांट लगातार नहीं चल सकता.”

उन्होंने कहा कि सिर्फ सौर और पवन ऊर्जा मिलाने के बाद भी कुछ समय ऐसा आता है जब पर्याप्त बिजली नहीं बनती. इसलिए बैटरी स्टोरेज इस सिस्टम का तीसरा अहम हिस्सा होगा, जिससे प्लांट को लगातार नवीकरणीय ऊर्जा मिलती रहेगी.

शाह ने कहा, “अगर योजना के मुताबिक सब कुछ लागू हुआ, तो मनोरी प्लांट पूरी तरह नवीकरणीय ऊर्जा से चलने वाला भारत का पहला डिसैलिनेशन प्लांट होगा.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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