दिल्ली पुलिस ने कथित तौर पर जंतर-मंतर पर चेहरे पहचानने (रिकॉग्निशन) और लोगों की प्रोफाइलिंग करने वाले उपकरणों का इस्तेमाल किया. भीड़ की तरफ अपने उपकरण करके वे उन सैकड़ों लोगों के चेहरे रिकॉर्ड कर पाए, जिनका आपराधिक रिकॉर्ड था या जिनके खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे थे. अब इन लोगों की पहचान हो गई है, इसलिए पुलिस आगे उनकी जांच करेगी.
यहां निजता के अधिकार को लेकर कई सवाल उठते हैं. क्या बीजेपी की रैलियों में भी इसी उपकरण का इस्तेमाल किया जाता है? पुलिस अपराधियों की पहचान कैसे तय करती है? और अगर किसी व्यक्ति के खिलाफ दर्ज मामलों को ही इसका आधार माना जाता है, तो क्या यह उपकरण हमारी विधानसभाओं और संसद के प्रवेश द्वार पर ज्यादा काम का नहीं होगा?
लेकिन इन नैतिक सवालों को मैं किसी और समय के लिए छोड़ता हूं क्योंकि इस हफ्ते मेरी चिंता तकनीक और पुलिस को लेकर है. हम पहले से जानते हैं कि खुफिया और कानून लागू करने वाली एजेंसियां पेगासस और ऐसे दूसरे निगरानी वाले तकनीकी सॉफ्टवेयर और उपकरणों के इस्तेमाल में माहिर हैं. चेहरे पहचानने वाले उपकरण नए लगते हैं, लेकिन कौन जानता है? हो सकता है पुलिस इनका इस्तेमाल पहले से ही करती आ रही हो.
तो यहां एक सीधा सवाल है. अगर पुलिस अब तकनीक के मामले में इतनी आगे है, तो किसी ने उन्हें यह क्यों नहीं बताया कि आजकल ज्यादातर लोग कैमरा फोन नाम की चीज़ इस्तेमाल करते हैं? और ये फोन लोगों को पुलिस की गलत हरकतों के वीडियो बनाने और उन्हें तुरंत इंटरनेट पर डालने की सुविधा देते हैं? और यह भी कि यूट्यूब नाम की एक चीज़ है, जिस पर लाखों डरे हुए लोग पुलिसवालों के उन झुंडों को देख सकते हैं, जो बिना हथियार वाले छात्रों को लाठियों से पीट-पीटकर बेहोशी की हालत में पहुंचा रहे हैं?
यह अजीब है कि पुलिस को कैमरा फोन की ताकत का कोई अंदाज़ा नहीं है. इन फोन ने अब भारत को दिखाया है कि उसके पुलिसवाले वास्तव में कैसे काम करते हैं और यह भी कि वे युवाओं पर हमला करने, बच्चों को लाठियों से पीटने और सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं को घमंड के साथ थप्पड़ मारने में कितनी दिलचस्पी रखते हैं.
पुलिस की बर्बरता कोई नई बात नहीं है. सालों से हम पढ़ते आए हैं कि ‘प्रदर्शनकारियों की पुलिस से झड़प हुई’ या ‘पुलिस ने इलाके को खाली कराया.’ कहानी लगभग हमेशा पुलिस के प्रति सहानुभूति वाली होती है. इसमें पुलिस को जनता के सेवक के रूप में दिखाया जाता है, जिन्हें हमारी तरफ से व्यवस्था बनाए रखने के लिए मजबूर होना पड़ा. प्रदर्शनकारी जब यह शिकायत भी करते हैं कि पुलिस ने उनके साथ बहुत बेरहमी से मारपीट की, तब भी हम अक्सर यही सोचते हैं कि “प्रदर्शन करके उन्होंने खुद इसे बुलाया था.”
पुलिस जानती है कि मीडिया और आम लोग आमतौर पर उसके पक्ष में रहते हैं, इसलिए उसे बहुत ज्यादा बेरहमी करने की चिंता नहीं होती. और वह भारतीय मिडिल क्लास को इतना अच्छी तरह जानती है कि उसे पता है कि किसानों, अल्पसंख्यकों या आम तौर पर गरीब लोगों के खिलाफ हिंसा से हमारी नींद नहीं उड़ती. इसलिए गरीबों के लिए एक नियम है और मध्यम वर्ग के लिए दूसरा.
पुलिस के लिए यह भी मददगार है कि मीडिया का एक बड़ा हिस्सा लगभग हमेशा उसका समर्थन करता है. इसकी एक वजह मध्यम वर्ग का झुकाव है और दूसरी वजह यह है कि रिपोर्टरों को रोज खबरों के लिए उन्हीं पुलिसवालों के पास वापस जाना पड़ता है—इसलिए वे अपने सूत्रों को नाराज़ करने से बचने की कोशिश करते हैं. और हां, मीडिया मालिक भी पुलिस के साथ अच्छे संबंध बनाए रखना पसंद करते हैं.
तो फिर पुलिस से इतनी बड़ी गलती क्यों हुई और उसने जंतर-मंतर के प्रदर्शनों में मध्यम वर्ग के बच्चों के सिर पर लाठियां क्यों बरसाईं?
बदलाव का पल
अगर आप यह जानना चाहते हैं कि विरोध प्रदर्शन कब एक राष्ट्रीय आंदोलन में बदल गया, तो वह समय तब नहीं था जब कॉकरोच जनता पार्टी ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की थी. वह तब भी नहीं था जब सोनम वांगचुक ने भूख हड़ताल शुरू की थी. यह तब हुआ जब सरकार ने पुलिस को प्रदर्शन बंद कराने के लिए बल प्रयोग करने को कहा. उस समय से पुलिस ने नागरिकों की सुरक्षा करने और कानून का पालन कराने वाले के रूप में काम करना बंद कर दिया और सरकार के लिए बल प्रयोग करने वाले दस्ते में बदल गई.
मुख्यधारा के मीडिया में दिखाए गए वीडियो और तस्वीरें भी सत्तारूढ़ सरकार के लिए काफी नुकसान पहुंचाने वाली थीं. जब सोनम वांगचुक भूख हड़ताल पर थे, तब पुलिसवालों ने उन्हें जबरदस्ती उठाकर ले गए. जब राहुल गांधी प्रदर्शन कर रहे थे, तब पुलिस की टुकड़ियों ने उन्हें जबरदस्ती वहां से हटाया और उनकी नाक से खून बह रहा था. संसद के पास प्रदर्शन करने की कोशिश कर रहे छात्रों पर पुलिसवालों ने लाठियों से हमला किया.
सरकार के प्रवक्ताओं के बयान भी ऐसे ही थे. कहा गया कि राहुल को हिरासत में लेना पड़ा क्योंकि प्रधानमंत्री के घर के पास उनकी मौजूदगी सुरक्षा के लिए खतरा थी. सच में? इतने सालों में उस इलाके में इतने प्रदर्शन होने के बाद भी? उदाहरण के लिए 2012 में दिल्ली बस गैंगरेप के बाद जब प्रदर्शन सोनिया गांधी के घर तक पहुंच गए थे, तब वह खुद बाहर आई थीं और प्रदर्शनकारियों से मिली थीं, ताकि वे अपनी बात सीधे उन्हें बता सकें. तब किसी ने यह नहीं कहा था कि वे सुरक्षा के लिए खतरा हैं या यह चिंता नहीं जताई गई थी कि वे उनकी हत्या की साजिश कर रहे हैं.
पुलिस की बर्बरता को यह कहकर सही ठहराने की कोशिश की गई कि संसद की तरफ मार्च कर रहे छात्रों को पीटने के अलावा पुलिस के पास कोई रास्ता नहीं था क्योंकि संसद की तरफ मार्च करने पर रोक थी. रोक किसने लगाई थी? पुलिस ने खुद. गुस्साई सरकार ने यह रोक लगाई थी.
यह सब जनता के गुस्से को बढ़ाने के लिए काफी था. लेकिन फोन से बनाए गए वीडियो इंटरनेट पर डाले जाने के बाद गुस्से की छोटी-छोटी चिंगारियां बड़े आग के रूप में फैल गईं. कुछ पुलिसवाले एक प्रदर्शनकारी के सिर पर लाठियां मार रहे थे. एक पुलिसवाला एक महिला की दोनों जांघों के बीच लाठी घुसा रहा था. पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी एक महिला के चेहरे पर थप्पड़ मार रहा था. पुलिस के हथियार से चली पैलेट की गोलियों से घायल हुए छात्र. और भी बहुत कुछ.
पढ़े-लिखे मध्यम वर्ग के लिए यह खास तौर पर चौंकाने वाला था—जिन छात्रों के साथ पुलिस इतनी बेरहमी से मारपीट कर रही थी, वे उनके अपने बच्चे भी हो सकते थे. ‘प्रदर्शन को खत्म करना’ अखबारों में इस्तेमाल होने वाला एक जाना-पहचाना वाक्य था, लेकिन अब वे देख रहे थे कि इसका असली मतलब क्या होता है. और पीड़ित लोग भी उन्हीं जैसे थे, लेकिन दिल्ली पुलिस के पुराने रिकॉर्ड को देखते हुए भी यह बर्बरता चौंकाने वाली थी. कश्मीर और सरकार के हिसाब से ‘अशांत’ माने जाने वाले दूसरे इलाकों में पहले भी पैलेट गन का इस्तेमाल किया गया है, लेकिन दिल्ली के बीचोंबीच बिना हथियार वाले छात्रों पर इसका इस्तेमाल करना? और उसके बाद इतनी खुलकर झूठ बोलना? दिल्ली पुलिस ने वास्तव में यह कहते हुए इनकार कर दिया कि पैलेट गन का इस्तेमाल नहीं किया गया था, जबकि उसी समय अस्पतालों में लोग पैलेट गन से लगी चोटों का इलाज करा रहे थे!
पुलिस को उम्मीद थी कि वह इस झूठ से बच जाएगी, क्योंकि इन बंदूकों का इस्तेमाल दिल्ली पुलिस के अधिकारियों ने नहीं, बल्कि एक अर्धसैनिक बल ने किया था. लेकिन अर्धसैनिक बल को शायद इसका अंदाजा था. उन्होंने दिल्ली पुलिस के एक डिप्टी कमिश्नर से इन बंदूकों के इस्तेमाल की मंजूरी ले ली थी. जब द हिंदू की विजेता सिंह ने पुलिस के झूठ का खुलासा किया, तो पुलिस के पास कोई जवाब नहीं था.
अब तक पुलिस ने यह नहीं बताया है कि सादे कपड़ों में भारी-भरकम शरीर वाले वे लोग कौन थे, जो लाठियां और बाहर की तरफ कीलें लगी हुई डंडियां लेकर घूम रहे थे. इन लोगों ने दिल्ली पुलिस के जवानों के साथ मिलकर छात्रों पर हमला किया था. क्या वे पैसे देकर बुलाए गए गुंडे थे? या फिर वे सादे कपड़ों में पुलिसवाले ही थे? अगर दूसरा सच था, तो इसका अपना एक संदेश था: पुलिसवाले की वर्दी उतार दें, तो गुंडे और पुलिसवाले में फर्क करना मुश्किल हो जाता है.
कुछ भी करने से पीछे न हटने वाली कार्रवाई
इसके अलावा भी बहुत कुछ हुआ. काफी समय से यह शक था कि पुलिस प्रदर्शन को बिगाड़ने के लिए ऐसे लोगों को भेज रही थी जो जानबूझकर प्रदर्शनकारियों को उकसाते थे. न्यूज़लॉन्ड्री के अवधेश कुमार ने प्रदर्शनों के पास खड़े पत्थरों से भरे एक ट्रक के बारे में पता लगाया. पता चला कि दिल्ली पुलिस ने कुछ दिन पहले ही इस ट्रक को जब्त किया था. दिल्ली पुलिस ने इस पर सफाई देने की कोशिश की, लेकिन वह भरोसे के लायक नहीं लगी और किसी ने उसकी बात नहीं मानी.
यह याद रखना ज़रूरी है कि एक दशक से ज्यादा पहले दिल्ली में बड़े प्रदर्शन हुए थे—2012 के दिल्ली बस गैंगरेप के खिलाफ युवाओं ने प्रदर्शन किया था और उससे पहले इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन में हर उम्र के लोगों ने प्रदर्शन किया था. उस समय भी पुलिस की कुछ आलोचना हुई थी. लेकिन उस समय इस तरह की हिंसा बिल्कुल नहीं हुई थी. न पैलेट गन का इस्तेमाल हुआ था और न ही पुलिस ने प्रदर्शन को बिगाड़ने के लिए ऐसे लोगों को भेजा था जो जानबूझकर लोगों को उकसाएं.
आखिर वही पुलिस बल सरकार की अपनी निजी गेस्टापो जैसी ताकत में कैसे बदल गया?
सीधा जवाब यह है कि पुलिस वही करती है जो सरकार उसे करने के लिए कहती है. अगर बड़े अधिकारी खुले तौर पर गैरकानूनी आदेशों का पालन नहीं करते, तो उनका तबादला कर दिया जाता है. किसी को उनके लिए दुख नहीं होता. मुख्यधारा का मीडिया उनके तबादलों के पीछे की परिस्थितियों को नजरअंदाज कर देता है और नए अधिकारियों की तारीफ करने पर ध्यान देता है.
यहां जो हुआ, वह काफी साफ लगता है. पुलिस कमिश्नर का तबादला कर दिया गया. एक नए अधिकारी को यह जिम्मेदारी दी गई और उससे कहा गया कि वह किसी भी हद तक जाकर प्रदर्शन पर कार्रवाई करे. उस समय सरकार की रणनीति साफ थी—डटे रहना और प्रदर्शन को कुचल देना. वह धर्मेंद्र प्रधान को हटाने के बारे में सोचने के लिए भी तैयार नहीं थी. यह बर्बरता भी उसी रणनीति का हिस्सा थी.
जब बर्बरता काम नहीं आई और छात्रों के खिलाफ हुई हिंसा के कैमरा फोन से बनाए गए वीडियो पूरे भारत में फैल गए, तो सरकार को अपनी रणनीति बदलनी पड़ी. उसे प्रदर्शनकारियों से बातचीत करनी पड़ी और प्रधान को हटाना पड़ा. अब, जब हालात शांत हो जाएंगे, तो सरकार बदला लेने के लिए प्रदर्शनों में शामिल लोगों के खिलाफ धीरे-धीरे कार्रवाई शुरू करेगी. क्या यह काम करेगा? मुझे नहीं लगता. इस बार बर्बरता नाकाम रही. बदला लेने की कोशिश भी सफल नहीं होगी. सिर्फ तकनीक ही नहीं बदल रही है. भारत खुद बदल रहा है. और यह बदलाव इन लोगों की सोच से कहीं ज्यादा तेजी से हो रहा है.
वीर सांघवी एक प्रिंट और टेलीविज़न पत्रकार और टॉक शो होस्ट हैं. वे @virsanghvi पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.
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