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Monday, 27 July, 2026
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सड़क की वापसी: क्यों यह छात्र आंदोलन भारत की राजनीति में एक नया मोड़ है

सत्ता में बैठे किसी भी व्यक्ति में इतनी समझ नहीं थी कि वे यह देख पाते कि अगर छात्रों का विरोध आपके अहंकार के कारण हो रहा है, तो उसका जवाब और भी ज़्यादा अहंकार के साथ देना सबसे बुरा तरीका है.

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छात्रों या कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के आंदोलन की सफलता आज के भारत के बारे में हमें क्या बताती है? इस बारे में किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुंचने में अभी समय लगेगा. लेकिन फिलहाल कुछ शुरुआती बातें कही जा सकती हैं.

यह मानने से इनकार किए बिना कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश में लोकप्रिय हैं. सर्वे लगातार दिखाते हैं कि वह भारत के सबसे लोकप्रिय नेता हैं. अब यह मानने का समय आ गया है कि उनकी ताकत दो अलग-अलग स्रोतों से आती है.

हां, बहुत से लोग उन्हें पसंद करते हैं. लेकिन जो लोग उन्हें पसंद नहीं करते, वे उनसे डरते हैं. सही या गलत, लोगों के बीच यह धारणा है कि जो भी व्यक्ति या समूह सरकार का विरोध करेगा, उसे भारी कीमत चुकानी पड़ेगी. गिरफ्तारी, छापे, बिना जमानत जेल, नौकरी देने वालों की नाराजगी, पुलिस की सख्ती और ऐसी दूसरी कार्रवाई.

अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह धारणा खत्म हो गई है. लेकिन एक बात साफ है कि देर-सवेर हर गोलियथ को अपना डेविड मिलता है. इन प्रदर्शनों की सफलता, जिनमें हर दिन प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री के खिलाफ नारे और अपमानजनक टिप्पणियां करते रहे, यह दिखाती है कि चीजें बदल रही हैं. यहां तक कि वे अखबार भी, जो आमतौर पर सावधानी से चलते हैं और सरकार के प्रति नरम रहते हैं, उन्होंने भी इन प्रदर्शनों को बड़े स्तर पर जगह दी और अपने संपादकीय में सरकार की आलोचना की.

डेढ़ दशक पहले यह कोई खास बात नहीं होती. दिल्ली के प्रदर्शन और अन्ना आंदोलन मीडिया की बड़ी खबरें थे. लेकिन आज के समय में इस तरह खुले तौर पर विरोध प्रदर्शन कम देखने को मिलते हैं.

ऐसा नहीं है कि मीडिया मालिक अब सरकार से डरना छोड़ चुके हैं या उनसे फायदे लेना नहीं चाहते. बात सिर्फ इतनी है कि कभी-कभी कोई आंदोलन लोगों के मन पर इतना गहरा असर डाल देता है कि कोई भी मीडिया मालिक उसे पूरी तरह नजरअंदाज नहीं कर सकता.

मुद्दे

इन प्रदर्शनों को ताकत दो अलग-अलग वजहों से मिली. पहली वजह पेपर लीक का मुद्दा था, जो खुलकर सामने था. लेकिन आंदोलन के भीतर एक दूसरी भावना भी चल रही थी. लोग सरकार के उस रवैये का विरोध कर रहे थे जिसे वे घमंड मानते थे. उन्हें लगता था कि सरकार सोचती है कि वह जो चाहे कर सकती है, क्योंकि उसके साथ पुलिस और अर्धसैनिक बल हैं.

कई दिनों तक सरकार अपने सख्त रुख से पीछे हटने को तैयार नहीं हुई. उसे भरोसा था कि पुलिस कुछ लोगों पर लाठी चला देगी, तो प्रदर्शनकारी हार मानकर घर चले जाएंगे. आखिर सरकार का एक बड़ा दावा यही रहा है कि वह प्रदर्शनों से प्रभावित नहीं होती.

लेकिन सत्ता में बैठे किसी भी व्यक्ति ने यह नहीं समझा कि अगर प्रदर्शन आपकी अहंकारी सोच के खिलाफ हैं, तो उसका सबसे खराब जवाब और ज्यादा अहंकार दिखाना होता है.

आखिर में सरकार को जिस तरह पीछे हटना पड़ा, उससे उसकी कहीं ज्यादा बेइज्जती हुई, जितनी तब होती अगर उसने पहले ही कुछ मांगें मान ली होती. असली समस्या यह नहीं थी कि पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा देने से इनकार किया. वह अनुभवी नेता हैं. उन्हें पता है कि देर-सवेर उनकी वापसी हो जाएगी. समस्या यह थी कि प्रधानमंत्री को लगा कि अगर उन्होंने प्रधान को हटाया, तो वह कमजोर दिखाई देंगे.

कभी-कभी ज़िद से ज़्यादा समझदारी काम आती है. आखिरकार इस सरकार ने भी यह सबक सीख लिया.

छात्रों की भूमिका

जब राजनीतिक पार्टियां आंदोलन करती हैं, तो हम अक्सर उनके इरादों पर शक करते हैं और हर प्रदर्शन को सिर्फ एक राजनीतिक दिखावा मानते हैं. लेकिन जब प्रदर्शन राजनीति से दूर रहने वाले युवा करते हैं, तो हम उन्हें बिल्कुल अलग नजर से देखते हैं. कहीं न कहीं हमें लगता है कि ये हमारे अपने बच्चे, छोटे भाई या बहन भी हो सकते हैं. हम उन्हें उसी शक की नजर से नहीं देखते, जिससे राजनीतिक कार्यकर्ताओं को देखते हैं. हमें उनके मुद्दों, उनकी भलाई और उनकी सुरक्षा की ज्यादा चिंता होती है.

इन प्रदर्शनों ने लोगों के दिल को इसलिए छुआ क्योंकि हम प्रदर्शनकारियों के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानते थे. वहां बहुत कम जाने-पहचाने चेहरे थे और लगभग कोई पेशेवर आंदोलनकारी नहीं था. इससे इन प्रदर्शनों में आम लोगों जैसा एहसास आया. ऐसा लगा कि ये साधारण युवा अपने भविष्य के लिए लड़ रहे हैं, जिसे सरकार उनसे छीनने पर तुली हुई है.

गलतियां

जगह बहुत मायने रखती है. कश्मीर में पेलेट गन चलाकर शायद बचा जा सकता है. मणिपुर को जलने के लिए छोड़ देने के बाद भी शायद काम चल सकता है. लेकिन दिल्ली के बीचों-बीच जो भी होता है, उस पर सबकी नजर जाती है. वहां सरकार के पास मनमर्जी करने की गुंजाइश बहुत कम होती है. मुझे नहीं लगता कि सरकार ने यह बात समझी.

सोशल मीडिया के नियम भी बदल चुके हैं. दस साल पहले आप ट्विटर पर तरह-तरह के कीबोर्ड गुंडों को लोगों को गाली देने और डराने के लिए लगा सकते थे. अब ट्विटर की पहले जैसी अहमियत नहीं रही. उसका नाम भी अब ट्विटर नहीं है. और कंट्रोल रूम से चलाए जाने वाले ट्वीट्स से अब कोई डरता भी नहीं है.

इससे सोशल मीडिया पर बीजेपी की पुरानी ताकत का असर भी कुछ कम हो गया है. यहां तक कि लोगों को हर दिन व्हाट्सऐप पर संदेश भेजने वाली पुरानी रणनीति भी अब काम नहीं कर रही, क्योंकि उन संदेशों में इतने झूठ होते हैं कि लोगों ने उन पर ध्यान देना ही छोड़ दिया है.

जैसा कि इन प्रदर्शनों से साफ दिखाई देता है, पुराने तरीके हमारी सोच से भी ज्यादा तेजी से खत्म हो रहे हैं. एक उदाहरण देखिए. नेता सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक से बातचीत करने गए, क्योंकि वह उनके लिए एक जाना-पहचाना चेहरा थे और उनसे बातचीत की जा सकती थी.

मुझे समझ नहीं आता कि वांगचुक, जिनके लिए मेरे मन में बहुत सम्मान था, नेताओं से बातचीत करने के लिए क्यों तैयार हो गए. जबकि इससे पहले उन्होंने आंदोलन का समर्थन करने वाले लोगों की कई कोशिशों को ठुकरा दिया था, जो उनसे अनशन खत्म करने की अपील कर रहे थे.

लेकिन उन्होंने सिर्फ सरकार की बात नहीं मानी, बल्कि कैमरे के सामने मंत्रियों की मौजूदगी में अपना अनशन भी खत्म कर दिया. इतना ही नहीं, उन्होंने अपनी शुरुआती ज्यादातर मांगें छोड़ दीं और बहुत कम बातों पर समझौता कर लिया.

सरकार की उम्मीद के उलट इसका प्रदर्शनकारियों पर कोई असर नहीं पड़ा. उन्होंने धैर्य बनाए रखा और एक-दो दिन के अंदर अपनी बात मनवा ली. लेकिन इससे यह दावा पूरी तरह गलत साबित हो गया कि वांगचुक प्रदर्शनकारियों के नेता थे. इससे यह भी सामने आया कि इस आंदोलन में उनकी कोई खास भूमिका नहीं थी.

बाद में स्थिति संभालने की कोशिश में उनकी पत्नी ने हिंदुत्व और विश्वगुरु के खिलाफ पोस्ट करना शुरू किया. उनकी भाषा इन प्रदर्शनों से बिल्कुल अलग और अजीब लगी, क्योंकि इस आंदोलन में धर्म कभी मुद्दा नहीं था.

X पर वांगचुक का समर्थन करने वाले लोगों ने उनका बचाव किया. लेकिन हैरानी की बात यह थी कि उनके सबसे मजबूत समर्थकों में कई बीजेपी हैंडल भी शामिल थे. मेरा मानना है कि यह अपने आप में बहुत कुछ बताता है.

राज्य की हिंसा

प्रदर्शनों के बारे में आपकी जो भी राय हो, एक बात साफ है कि पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने जरूरत से ज्यादा हिंसा का इस्तेमाल किया.

इस बर्बरता के लिए अब तक किसी को जिम्मेदार नहीं ठहराया गया है. शायद इसलिए क्योंकि लोगों को लाठियों और डंडों से बेरहमी से पीटने और उनके चेहरों पर पेलेट गन चलाने के आदेश नेताओं की तरफ से आए थे.

यह हिंसा सरकार की सबसे बड़ी गलती साबित हो सकती है. लोग युवा प्रदर्शनकारियों के साथ हुए व्यवहार को नहीं भूलेंगे. खासकर वे महिलाओं के साथ किए गए अपमानजनक व्यवहार को कभी नहीं भूलेंगे.

इसके सबूत वीडियो में सबके सामने मौजूद हैं. फिर भी कैमरे में युवा महिलाओं को थप्पड़ मारते दिखाई देने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ भी कोई कार्रवाई नहीं हुई.

यह बात हमेशा के लिए सरकार की छवि पर दाग छोड़ देगी. भारत में लोग महिलाओं के साथ बदसलूकी या उनका अपमान करने वालों को आसानी से माफ नहीं करते. 2012 के दिल्ली बस गैंगरेप मामले ने UPA को नुकसान पहुंचाया था और RG Kar मामले ने ममता बनर्जी की हार का रास्ता बनाया.

मीडिया

मैं इस विषय में ज्यादा अंदर नहीं जाना चाहता, लेकिन प्रदर्शनकारियों की तरफ से जिसे गोदी मीडिया कहा गया, उसके प्रति गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था.

न्यूज टीवी चैनलों की दर्शक संख्या और प्रभाव दोनों इतने कम हो गए हैं कि जब वे हर रात अपनी कहानी सुनाते हैं, तो ऐसा लगता है कि अब उन्हें सिर्फ सरकार से जुड़े लोग ही देख रहे हैं.

उन्हें शायद आगे भी उसी छोटे से दर्शक वर्ग को खुश करना पड़ेगा, क्योंकि बाकी भारत अब आगे बढ़ चुका है.

मैं सरकार के भविष्य को लेकर बहुत बड़े दावे नहीं करना चाहता, लेकिन कुछ बातें साफ नजर आती हैं. सरकार चुनाव आयोग को अपना पालतू बना सकती है. वह बिना सिद्धांत वाले सांसदों और विधायकों को खरीद सकती है. वह संसद को नजरअंदाज कर सकती है.

लेकिन विरोध की अपनी अलग ताकत होती है. अगर सरकारी दफ्तरों और संसद में नहीं, तो सड़कों पर जरूर.

और नेताओं को आखिरकार उसकी बात सुननी ही पड़ेगी.

वीर सांघवी एक प्रिंट और टेलीविज़न पत्रकार और टॉक शो होस्ट हैं. वे @virsanghvi पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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