मोदी सरकार और सीजेपी (कॉक्रोच जनता पार्टी) नेताओं के बीच बातचीत शुरू हो गई है, सोनम वांगचुक ने अपना अनशन खत्म कर दिया है, और प्रदर्शनकारियों को खुश करने के लिए सरकार ने देर रात एक कदम भी उठा लिया है, गुरुवार की रात उच्च शिक्षा विभाग के सेक्रेटरी को हटा दिया गया.
लेकिन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांग रहे प्रदर्शनकारी, जाहिर है, संतुष्ट नहीं हुए हैं. यही वजह है कि मुझे अपने दफ्तर में लगे एक छोटे-से पोस्टर की याद आ गई. यह पोस्टर मेरी बेटी ने मुझे दिया है, जिसे पता है कि मैं 1942 की फिल्म ‘कासाब्लांका’ को कितना ज्यादा पसंद करता हूं. आपने यह फिल्म नहीं भी देखी हो तो कोई फर्क नहीं पड़ता, आप उस जुमले से जरूर परिचित होंगे जिसे इस फिल्म ने अमर बना दिया. यह जुमला है— ‘जाने-पहचाने संदिग्धों को हिरासत में लो”. फिल्म में यह हुक्म एक पात्र कैप्टन लुइस रेनॉल्ट एक बार में गोलीबारी की वारदात के बाद अपने सिपाहियों को देता है. मोदी सरकार ने सेक्रेटरियों को हटाने का जो कदम उठाया है वह ‘जाने-पहचाने संदिग्धों’ के खिलाफ की गई कार्रवाई जैसा ही है.
जब भी ऐसा संकट आता है, सरकारी बाबुओं को आसान शिकार बनाया जाता है. इससे पहले भी, 2024 में जब ‘NEET’ के पेपर लीक हुए थे तब नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) के महानिदेशक सुबोध कुमार सिंह (चंडीगढ़ काडर के IAS) समेत कुछ प्रमुख अधिकारियों को हटा दिया गया था. नेताओं को इस तरह की कार्रवाई आसान लगती है. उच्च शिक्षा विभाग के सेक्रेटरी विनीत जोशी को अब पंचायती राज विभाग का सेक्रेटरी बना दिया गया है. वे NTA के पहले महानिदेशक थे. यह ‘जाने-पहचाने संदिग्धों’ को म्यूजिकल चेयर वाला खेल खेलने के लिए मजबूर करने जैसा है.
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफा देने के बाद अब उम्मीद है कि प्रदर्शनकारी खुश होकर अपने घर लौट जाएं. लेकिन भारत के युवाओं की परेशानियां अभी खत्म नहीं होंगी. आज के समय में भारतीय बच्चों का बचपन हमारे इतिहास का सबसे ज्यादा तनाव भरा, सबसे ज्यादा प्रतियोगिता वाला और सिर्फ एक ही दिशा में आगे बढ़ने वाला बन गया है.
‘NEET’ को ही ले लीजिए. इस साल 22 लाख बच्चों ने इसकी परीक्षा दी. उनमें से पांच फीसदी को MBBS की 1,39,489 सीटों के लिए चुना गया. इनके अलावा 25-35 हजार बच्चे MBBS की पढ़ाई के लिए विदेश जाएंगे— खासतौर से रूस के पूर्व राज्यों, फिलिपींस, और बांग्लादेश तक. ये अगर लौटकर भारत में डॉक्टरी करना चाहेंगे तो उन्हें NEET की परीक्षा में 50 प्रतिशत-अंक के कट-ऑफ से ज्यादा नंबर लाने होंगे. यह बताता है कि हमारे यहां डॉक्टरों की कमी की समस्या क्यों है.
इसके बाद 20 लाख बच्चे बचे रहते हैं. उनमें से कई ने CUET (कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट) भी दिया होगा ताकि वे केंद्रीय विश्वविद्यालयों और उनके कॉलेजों में दाखिला ले सकें, जिनमें आगे की अपनी चुनौतियां हैं. इनके अलावा कई लाख दूसरे बच्चे इंजीनियरिंग कॉलेजों में दाखिले के लिए JEE की परीक्षा दे रहे होंगे. लेकिन इस पहली सीढ़ी को पार कर लेने के बाद भी प्रतियोगी परीक्षाओं से मुक्ति नहीं मिलती, चाहे पोस्ट-ग्रेजुएशन करना हो या पीएचडी, या टीचिंग के जॉब हों या दूसरा कुछ.
भारतीय मध्यवर्ग या इससे नीचे के परिवारों के बच्चे 15 साल की उम्र से ही कोचिंग क्लासों, कॉम्पिटिशन, पेपर लीक, और फिर से परीक्षा देने के अंतहीन जाल में उलझ जाते हैं. अब आप समझ सकते हैं कि इतनी बड़ी तादाद में बच्चे, और कई तो अपने अभिभावक समेत जंतर-मंतर पर क्यों इकट्ठे हो रहे हैं. बच्चों के पास पढ़ाई के अलावा दूसरी गतिविधियों, हॉबीज़, खेलकूद तक के लिए समय नहीं है. फिर भी हम सवाल करते हैं कि खेलों में हम इतने पीछे क्यों हैं? खेलकूद में समय ‘जाया’ करने वाले बच्चे के माता-पिता को तो लगता है कि खुद मर जाएं या बच्चे को ही मार डालें.
इस पेंच को समझने के लिए ज़रा उस खेल के खिलाड़ियों के स्वरूप पर नजर डालिए जिसमें हमें विश्व स्तरीय प्रतिभाएं मिल रही हैं. जी हां, मैं क्रिकेट की बात कर रहा हूं. इसमें हर फॉर्मेट के अलावा IPL से लेकर दर्जनों दूसरी स्थानीय लीगों में प्रायः हर फ्रेंचाइजी में आपको कॉलेज की ग्रेजुएट की पढ़ाई कर चुका कोई खिलाड़ी शायद ही मिलेगा. ये प्रतिभाएं दसवीं क्लास के स्तर पर ही चुन ली जाती हैं. वैभव सूर्यवंशी इसके ज्वलंत उदाहरण हैं.
हमारी शिक्षा व्यवस्था बच्चों पर रटंत विद्या का बोझ डालकर और फिर प्रतियोगी परीक्षाओं में ‘बाजी मारने’ के लिए धकेलकर तमाम प्रतिभाओं का गला घोंट देती है. इस तरह हम बेवकूफ पढ़ाकुओं की या ऐसे आक्रोशितों की पीढ़ियां तैयार कर रहे हैं जो खुद को उपेक्षित और पीड़ित महसूस करती हैं. किसी मंत्री को बदलने से इस सामूहिक दमन का समाधान नहीं होने वाला है. इसे जड़ से समाप्त करने की जरूरत है लेकिन यह नहीं होने वाला, क्योंकि यह ‘ताकतवर’ सरकार वाले विचार से मेल नहीं खाता. आखिर, दिल्ली में ‘ताकतवर’ सरकार का क्या फायदा, जबकि यह हर चीज को अपने नियंत्रण में नहीं ले सकती!
आप हैरान हो सकते हैं कि मोदी से पहले के दौर में NEET पेपर लीक कोई समस्या क्यों नहीं बनी. इसकी वजह यह है कि तब NEET था ही नहीं. UPA सरकार ने भी मेडिकल कॉलेजों में दाखिले की प्रक्रिया को एक जैसा (केंद्रीकृत) बनाने की कोशिश की थी. लेकिन 2013 में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने 2-1 के फैसले से उस समय के NEET को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया.
बदनाम मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) ने 2010 में नीट का गठन निजी मेडिकल कॉलेजों में दाखिले की प्रक्रिया को परोक्ष रूप से अपने कब्जे में लेने के इरादे से किया था. लेकिन 2013 के फैसले को चुनौती दी गई और 2016 में पांच जजों की पीठ ने इसे रद्द कर दिया. अब NEET न्यायपालिका के आदेश से गठित संस्था बन गई.
UPA दौर में, केंद्रीकरण पर ज़ोर कई निजी मेडिकल कॉलेजों में कैपिटेशन फीस पर रोक लगाने के समाजवादी चिंतन के तहत दिया गया. जब वे दाखिला देने के बारे में फैसला नहीं कर पाएंगे तो जबरन फीस वसूली कैसे करेंगे? इस लिहाज से, यह मेडिकल शिक्षा के राष्ट्रीयकरण जैसा है. और चूंकि मेडिकल शिक्षा पर दक्षिणी राज्यों और महाराष्ट्र का वर्चस्व था, इसलिए MCI और केंद्रीय सत्ता ने आबादी के आधार पर नए मेडिकल कॉलेज के लिए लाइसेंस देने का आदेश देकर इस उद्योग का गला घोंटने की कोशिश की. इस तरह, प्रति 10 लाख की आबादी पर एक मेडिकल कॉलेज के लिए लाइसेंस देने का फैसला किया गया. दक्षिणी राज्यों और महाराष्ट्र ने इसके खिलाफ दबाव डाला और इस फैसले को खारिज कर दिया गया. इसमें इस तथ्य ने भी मदद की कि कई राजनीतिक नेता, खासकर शासक दल और उसके सहयोगी दलों के नेता कई मेडिकल कॉलेजों के मालिक हैं.
NEET से पहले तमाम राज्यों ने दाखिले की अपनी परीक्षाएं और प्रक्रियाएं लागू कर रखी थीं और तमाम स्कूली बच्चों को इस राष्ट्रीय दबाव से निजात मिली हुई थी, और केंद्र सरकार भी इतने बड़े पैमाने पर परीक्षाएं आयोजित करने के खतरों से बची हुई थी. लेकिन इस सरकार को सब कुछ अपनी मुट्ठी में कर लेना ही पसंद है. वह देश भर में उच्च शिक्षा को अपने और कड़े नियंत्रण में लेने के लिए नया कानून बनाने को तैयार बैठी है. गूगल पर देख लीजिए कि ‘विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, 2025’ क्या कहता है. इसमें कहा गया है कि उच्च शिक्षा आयोग और तीन नियमन परिषदों का गठन किया जाएगा जिनमें UGC, AICTE और NCTE आदि को समाहित कर दिया जाएगा और ये विश्वविद्यालयी, तकनीकी तथा शिक्षक आदि की शिक्षा की निगरानी करेंगे. शुक्र मनाइए कि संसद की स्थायी कमिटी ने इस पर फिलहाल रोक लगा दी है.
NEET की बात करें, तो मोदी सरकार ने ‘सोसाइटीज़ रजिस्ट्रेशन एक्ट’ के तहत एनटीए के गठन के साथ केंद्रीकरण करने में जो सफलता हासिल की थी उसे मुकम्मिल करने के लिए नीट का गठन किया गया. माना जाता है कि NTA ही NEET, JEE, UGC-NET (रिसर्च), और केंद्रीय विश्वविद्यालयों में अंडर-ग्रेजुएट तथा पोस्ट-ग्रेजुएट कोर्स में दाखिले के लिए CUET परीक्षाओं का आयोजन करेगा.
यह महज एक ‘सोसाइटी’ को बहुत भारी अधिकार देने का मामला है, भले ही उसकी मुखियागीरी विचारधारा के प्रति निष्ठावान प्रदीप कुमार जोशी को क्यों न सौंपी गई हो. उनके बारे में यह भी जान लीजिए कि वे 2006 से 2011 तक मध्य प्रदेश लोकसेवा आयोग के, 2011 से 20015 तक छत्तीसगढ़ लोकसेवा आयोग के, 2020 से 2022 तक संघ लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष रहे. अब वे NTA के अध्यक्ष हैं. इस तरह की सत्ता और राजनीतिकरण का नतीजा घालमेल होना ही था. मोदी सरकार आज इसी घालमेल में फंस गई है.
यह कॉलम समाप्त करते-करते सूचना मिली कि एनटीए ने 47 अधिकारियों को बर्खास्त कर दिया है. सत्ता के अति-केंद्रीकरण की यह कीमत मोदी सरकार को चुकानी पड़ रही है. जब भी कोई संकट पैदा होता है, सरकार एक नया कानून लॉलीपॉप की तरह पकड़ा देती है. NEET की परीक्षा में चोरी के खिलाफ अलग से एक कानून है. मानो चोरी के खिलाफ जो मूल कानून है वह काम नहीं करेगा. या विशेष अदालतों के मामले को ही ले लीजिए, जो दूसरी अदालतों की तरह अनंत काल तक काम करती रहती हैं. शायद इसीलिए हम कभी इसे ‘लॉ-लीपॉप’ (lawlipop) राजनीति कहते थे.
मंत्री तो आते-जाते रहेंगे, लेकिन अगर आप समस्या का जड़ से इलाज करना चाहते हैं तो NEET से शुरू कीजिए. सभी तकनीकी शिक्षा में दाखिले का विकेंद्रीकरण कीजिए और राज्यों को उनकी स्वायत्तता वापस दीजिए. NTA को खत्म कीजिए. हमारे संघीय परिवार में राज्यों को वयस्कता का दर्जा दीजिए. शिक्षा संस्थानों के मुनाफे को वैधता दीजिए और सैकड़ों और कॉलेजों को स्थापित होने दीजिए. और मैं तो इमरजेंसी दौर के 42वें संविधान संशोधन को रद्द करने तक की बात करूंगा, जिसने शिक्षा को समवर्ती विषयों की सूची में डाल दिया था. इस तरह राज्यों की स्वायत्तता बहाल कीजिए. हम कह सकते हैं कि यह सब नहीं किया जाएगा, लेकिन सुझाव देने में क्या हानि है?
नोट: धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफा देने के बाद इस लेख में संशोधन किया गया है.
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