इतिहास खुद को दोहराता है, इस बारे में हम कार्ल मार्क्स के विचार को तरजीह दें या मार्क ट्वैन के विचार को, इस पर मतभेद हो सकता है. मार्क्स ने कहा था कि इतिहास खुद को पहले एक त्रासदी के रूप में दोहराता है, फिर एक तमाशे के रूप में. ट्वैन ने कहा था कि इतिहास खुद को दोहराता नहीं है बल्कि अक्सर वह अपनी तुकबंदी के रूप में सामने आता है. आज जो कुछ हो रहा है उस पर गंभीरता से नजर डालें तो लगेगा कि 1973 में जो ऐतिहासिक संकट आया था उसकी वापसी के संकेत मिल रहे हैं. अब आप चाहें तो मार्क्स के विचार को मान लें या ट्वेन के विचार को, आपकी मर्जी.
मैं मार्क्स के बदले ट्वैन के विचार को तरजीह दूंगा, ताकि अगर मैं गलती करने का जोखिम उठाऊं तो आशावाद के साथ उठाऊं. सो, आज जो कुछ घट रहा है वह अगर 1973 की घटनाओं की तुकबंदी है तो यह कोई सौम्य, मधुर, रोमानी धुन नहीं प्रस्तुत कर रही है. इसका स्वर एक भावी मातम का संकेत देने जैसा है, वैसे, अभी इसे हम कयामत की आहट नहीं कहेंगे. इसकी वजह यह है कि पिछले 53 वर्षों में भारत काफी मजबूत हुआ है.
आइए, हम 1973 पर नजर डालें. इंदिरा गांधी ने 1971 का आम चुनाव भारी बहुमत से जीता था, अपने सहयोगियों CPI और DMK के साथ मिलकर 80 फीसदी सीटें जीत ली थी. उसी साल बाद में उन्होंने पाकिस्तान को हराया था और बांग्लादेश का जन्म हुआ था. इसके अगले साल 19 राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों में हुए चुनावों में 15 राज्यों में उन्होंने निर्णायक जीत हासिल की थी. जिन चार राज्यों—मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, गोवा—में वे चूक गईं वे छोटे राज्य थे. मिजोरम और गोवा तो उस समय केंद्रशासित प्रदेश ही थे. इंदिरा गांधी उस समय अपनी सत्ता और गौरव के शिखर पर थीं. पार्टी, मंत्रिमंडल, और संसद उनकी मुट्ठी में थी. ऐसी चुनौतीहीन सत्ता किसी भारतीय नेता को नहीं हासिल हुई है. नरेंद्र मोदी उनकी बराबरी के करीब हैं, और यह भी 1973 से एक समानता का उदाहरण है.
लेकिन हालात नाटकीय रूप से बदले. पहले, भारत में मॉनसून लगातार दो साल 1972-73 में फेल हो गया. मॉनसून लगातार शायद ही फेल होता है, लेकिन भारत 1965-66 में भी इसे झेल चुका है. तब तक मुख्यतः कृषि प्रधान रही अर्थव्यवस्था में हरित क्रांति से हुए लाभ को इसने पोछ दिया. इसके बाद 1973 में ही योम किप्पूर युद्ध और पश्चिम एशियाई इस्लामिक देशों ने पहली बार तेल को हथियार के रूप में इस्तेमाल करके तेल संकट को जन्म दे दिया. तेल की कमी और बढ़ती कीमतों ने सूखे के संकट को और गहरा कर दिया. भारत के युवाओं का आक्रोश उबलने लगा, जो सबसे पहले गुजरात में फूटा.
उनका नवनिर्माण आंदोलन राजनीतिक नेतृत्व में नहीं चला था. आर्थिक संकट से हर कोई प्रभावित था: बेरोजगारी, किराया और बढ़ती महंगाई. इस मामले में चिनगारी कॉलेज हॉस्टलों के मेस की फीस में वृद्धि के चलते भड़की. इसने मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल के खिलाफ ‘चिमन चोर’ के नारे के साथ भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का रूप ले लिया. और जल्दी ही बिहार में लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार सरीखे छात्र नेताओं ने ‘छात्र संघर्ष समिति’ के गठन के साथ महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ जबरदस्त आंदोलन खड़ा कर दिया. उन्होंने जयप्रकाश नारायण (जेपी) को आंदोलन का नेतृत्व सौंप दिया.
इंदिरा गांधी ने इसके जवाब में कई तरह के कदम उठाए. चिमनभाई पटेल को हटा दिया. बिहार में अब्दुल गफूर 1974 तक तो कुर्सी से चिपके रहे लेकिन अप्रैल 1975 में उन्हें जाना पड़ा. 1974 की गर्मियों में इंदिरा गांधी ने पहला परमाणु परीक्षण, ‘पोकरण-1’ कर डाला. उन्होंने अपनी सरकार को अस्थिर करने की विदेशी ताकतों, खासकर CIA की साज़िशों की बातें उठाईं. लेकिन वे किसी तरह से जनता का मूड नहीं बदल पाईं. मूड बदला भी नहीं जा सकता था क्योंकि बेरोजगारी अपने चरम पर पहुंच गई थी और 1974 में मुद्रास्फीति 29 (28.60) फीसदी के आंकड़े को छू रही थी. उस साल सितंबर में यह आंकड़ा 34.68 फीसदी पर पहुंच गया था. ऐसी सूनामी को कौन उलट सकता था?
लेकिन इंदिरा गांधी ने मानो ‘जनसंहार के हथियार’ का इस्तेमाल अपने ही लोगों के खिलाफ कर दिया. इमरजेंसी हमारे लोकतंत्र पर एक स्थायी धब्बे की तरह बना हुआ है, और यह भी उन्हें नहीं बचा पाया. 1977 में एक निष्पक्ष चुनाव और उसमें शर्मनाक हार ही उनके लिए ‘गंगा-स्नान’ साबित हुई.
अब पिछले 18 महीने की घटनाओं पर गौर कीजिए और भविष्य पर नजर डालिए. पश्चिम एशिया में युद्ध के साथ हमें तेल संकट एक बार फिर झटका दे रहा है. विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक जिस बड़े पैमाने पर बाहर जा रहे हैं उसके कारण 20 अरब डॉलर देश से बाहर जा चुका है. कई बड़ी भारतीय कंपनियां जिस तरह विदेश में निवेश कर रही हैं उसके कारण ‘एफडीआइ’ का आंकड़ा कुलमिलाकर शून्य ही है. इस सबके कारण, विडंबना यह है कि कमजोर पड़ते डॉलर के बावजूद रुपये पर दबाव बढ़ा है.
UPA सरकार के आखिरी वर्षों में रुपये की ‘मजबूती’ को मुद्दा बनाकर भाजपा ने बड़ी गलती की. अब उसे यह उलटा पड़ रहा है और वह क्रिकेट के बल्लेबाज की ‘नर्वस नाइंटीज़’ वाली बेचैनी महसूस कर रही है. अब वह उसी बल्लेबाज की तरह घबराई हुई है जिसे एक-दो रन से शतक चूकने का डर लगा रहता है, सरकार को डर है कि डॉलर के मुक़ाबले रुपये की कीमत कहीं 100 के आंकड़े को पार न कर जाए. लेकिन आपकी मुद्रा की सेहत तो ग्लोबल मार्केट के तर्कों और आपकी अर्थव्यवस्था की सेहत के मुताबिक ही बनेगी. मुद्रा को लेकर राष्ट्रवाद अतर्कपूर्ण है, और हमेशा रहेगा. हमें कम-से-कम चीन से तो सबक लेना ही चाहिए था, जिसने बहुत पहले ही समझ लिया था कि अपनी मुद्रा को कमजोर रखने में ही फायदा है.
तेल ने जो झटका दिया है वह 1973 की ही पुनरावृति है. सरकार इसकी कीमतों में वृद्धि का बोझ अंततः उपभोक्ताओं के ऊपर डालेगी. मुद्रास्फीति बढ़ेगी, और बेरोजगारी और ज्यादा चुभेगी. 1973 में जो मॉनसून फेल हुआ था उसकी बात करें तो इस चेतावनी पर भी गौर करना होगा कि यह अल-नीनो वाला साल है और हम नहीं जानते कि यह क्या रूप लेगा. 1973 में हमारी जीडीपी में खेती का जितना बड़ा हिस्सा होता था उसके मुक़ाबले आज वह काफी कम है लेकिन कृषि संकट से जितने ज्यादा लोग प्रभावित होते हैं उतने किसी और संकट से नहीं होते. इसलिए, लोगों और खासकर युवाओं के मूड पर नजर रखिए.
कुछ संकेत तो बिलकुल साफ हैं. ‘NEET’ को लेकर विवाद इस आक्रोश को उजागर करता है. हमारी सरकार कारोबार करने की सुविधा की दुहाई देती है. लेकिन गिनती की नौकरियों या रोजगार दिलाने वाली पढ़ाई के मौकों के लिए होड़ करने की क्रूरता पर जरा गौर कीजिए. CAT, NEET, JEE, CLAT, UPSC से लेकर NDA, IMA, और अग्निवीर तक न जाने कितनी कोर्स की परीक्षाओं, और अब आम कॉलेजों में दाखिले के लिए CUET तक के कारण भारतीय युवा कोचिंग सेंटर्स के चक्रव्यूह में बुरी तरह फंसा है.
यह पहले से ही परेशान मध्यवर्ग की जमा-पूंजी पर पोछा लगा रहा है और निम्न मध्यवर्ग को कर्ज के दलदल में फंसा रहा है. और, अंत में आप पाते हैं कि कुछ ठगों ने पूरी व्यवस्था से खेल कर दिया है, परीक्षाएं रद्द की जा रही हैं, और आपको फिर से सारी मशक्कत करनी है.
कल्पना कीजिए, ये युवा और उनके माता-पिता कितने गुस्से में होंगे. खासकर तब जब वे पाते हैं कि सरकार का जवाब उबाऊ है— कि हम उन ठगों को जेल में डाल देंगे और परीक्षा फिर से कराएंगे. लोग बार-बार दोहराए जाते इस भद्दे चक्र के आगे बेबस हैं. यह आक्रोश क्या उतना ही तीखा है जितना 1973-74 में गुजरात के कॉलेजों के मेस की बढ़ती फीस या बिहार में महंगाई के खिलाफ आक्रोश तीखा था? यह बता पाना मुश्किल है. लेकिन भारत के मुख्य न्यायाधीश की एक असावधानी भरी टिप्पणी के जवाब में ‘कॉक्रोच जनता पार्टी’ के रूप में जो एक लावा -सा फूटा था उसके समर्थन में जो भारी उभार उठा है वह कुछ संकेत देता है. एक सप्ताह के अंदर लाखों युवाओं ने इस पार्टी के सोशल मीडिया हैंडल पर उसे अपना समर्थन जाहिर कर दिया, और सरकार ने इस हैंडल को ब्लॉक कर दिया. लेकिन यह लेख लिखने के समय तक इंस्टाग्राम पर 2.1 करोड़ समर्थन आ चुका था, जो कि भाजपा के समर्थकों की संख्या से ढाई गुना ज्यादा है. वैसे, प्रधानमंत्री 10.1 करोड़ के आंकड़े के साथ बहुत आगे बने हुए हैं.
जैसा कि हम पहली ही कह चुके हैं, आज का भारत बदला हुआ, कहीं ज्यादा मजबूत भारत है. मुद्रास्फीति जरूर बढ़ेगी, आर्थिक वृद्धि की रफ्तार धीमी होगी, और सरकारी खजाना कमजोर होगा. फिर भी कुछ आर्थिक वृद्धि तो होगी, होर्मुज़ जलमार्ग फिर खुल जाएगा. मोदी सरकार के लिए चुनौतियां इस कारण भी कम होंगी क्योंकि आज का जो विपक्ष है और उसके जो नेता हैं उनकी वैसी साख नहीं है जैसी 1973 के विपक्षी नेताओं की थी.
उनके जीवन परिचय में आंदोलनों की बड़ी संख्या दर्ज थी, संसद में उनके कौशल के ब्योरे भरे थे, मजदूर और किसान आंदोलनों का नेतृत्व करने के उनके किस्से दर्ज थे. और सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि उनमें से अधिकतर को सत्ता का स्वाद नहीं मिला था, सिवाय साठ वाले दशक में संयुक्त विधायक दल वाले संक्षिप्त दौर के. उन पर यह आरोप नहीं लगता था कि ‘वे सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं’.
इन अंतरों की वजह से हमने मार्क्स की जगह ट्वेन को चुना. आज का समय 1973 वाली धुन को दोहरा रहा है. हमने जिन कारकों का जिक्र किया है वे मोदी सरकार को भी राहत पहुंचाते हैं. लेकिन राहत का अर्थ मुक्ति नहीं है. अगर वह राहत का बुद्धिमानी से इस्तेमाल नहीं करती, खुद को साफ-सुथरी साबित नहीं करती, और वास्तविक सुधारों (उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी) को लागू नहीं करती तो यह राहत भी लुप्त हो जाएगी. ‘मैं भी कॉक्रोच हूं’ वाले मूड को कोयला खदान में खतरे की घंटी बजाने वाला कैनरी पक्षी ही नहीं मानना चाहिए. बल्कि हम केवल भारतीय पक्षी की ही बात करें तो यह गुस्से से भरे मोर की हांक जैसी है.
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