तिरुवनंतपुरम: केरल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष पिनाराई विजयन ने न्यूज़क्लिक मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को बीजेपी के लिए बड़ा झटका बताते हुए इसे लोकतांत्रिक अधिकारों और प्रेस की स्वतंत्रता की जीत करार दिया है.
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए विजयन ने आरोप लगाया कि बीजेपी राजनीतिक विरोध को दबाने के लिए केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग करती है. उन्होंने कहा कि न्यूज़क्लिक और उसके संस्थापक-संपादक प्रबीर पुरकायस्थ के खिलाफ की गई कार्रवाई आलोचनात्मक पत्रकारिता और लोकतांत्रिक आवाज़ों को दबाने का प्रयास थी.
विजयन ने लिखा, “न्यूज़क्लिक मामले में दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला राजनीतिक असहमति को दबाने के लिए केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल करने वाली बीजेपी के लिए बड़ा झटका है. यह फैसला लोकतांत्रिक अधिकारों और प्रेस की आजादी की जीत है.”
उनकी यह प्रतिक्रिया ऐसे समय आई है जब दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को न्यूज़क्लिक और उसके संस्थापक-संपादक प्रबीर पुरकायस्थ के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया. यह मामला विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) से जुड़े आरोपों पर आधारित था.
न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने अपने विस्तृत फैसले में कहा कि एफआईआर में लगाए गए आरोपों से धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात या आपराधिक साजिश जैसे अपराध साबित नहीं होते. इसी आधार पर अदालत ने एफआईआर को रद्द कर दिया.
अदालत ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा इसी एफआईआर के आधार पर दर्ज ईसीआईआर को भी निरस्त कर दिया.
आर्थिक अपराध शाखा (EOW) ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की शिकायत पर यह मामला दर्ज किया था. शिकायत में आरोप लगाया गया था कि न्यूज़क्लिक को अमेरिका स्थित कंपनी वर्ल्डवाइड मीडिया होल्डिंग्स एलएलसी (WWMH) से वर्ष 2018 में करीब 9.59 करोड़ रुपये का एफडीआई मिला था और कंपनी ने कथित तौर पर प्रति शेयर 11,510 रुपये के प्रीमियम पर शेयर जारी किए थे.
जांच एजेंसियों का दावा था कि विदेशी निवेश संबंधी नियमों को दरकिनार करने के लिए यह मूल्यांकन किया गया और धन का एक बड़ा हिस्सा वेतन, परामर्श शुल्क और किराए पर खर्च किया गया.
हालांकि, न्यूज़क्लिक ने अदालत में कहा कि यह निवेश वैध था और अधिकृत बैंकिंग चैनलों के माध्यम से प्राप्त किया गया था. कंपनी ने यह भी बताया कि उसने 2017 में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से ऑनलाइन समाचार प्लेटफॉर्म में एफडीआई को लेकर स्पष्टीकरण मांगा था, जिसके जवाब में मंत्रालय ने कहा था कि ऑनलाइन समाचार प्रकाशन “प्रिंट मीडिया” की श्रेणी में नहीं आते.
अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 420 और 406 के प्रावधानों की समीक्षा करते हुए पाया कि एफआईआर में इन अपराधों के लिए जरूरी तत्व मौजूद नहीं हैं. इसी आधार पर अदालत ने एफआईआर और उससे जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले को भी रद्द कर दिया.