पिछले रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मन की बात कार्यक्रम का 135वां एपिसोड आत्मनिर्भरता, अंधविश्वास, आस्था, सादगी जैसे कई विषयों पर केंद्रित रहा. यह अनुमान के मुताबिक ही था, क्योंकि इसमें उन ज्वलंत मुद्दों का जिक्र नहीं किया गया जो इस समय लोगों के मन में सवाल पैदा कर रहे हैं.
जनवरी 2024 में अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के दौरान पीएम मोदी ने कहा था, “राम भारत की आस्था हैं, राम भारत का आधार हैं. राम भारत का विचार हैं, राम भारत का विधान हैं.” राम मंदिर में चढ़ावे और दान की कथित चोरी का मामला उन्हें उतना ही दुख पहुंचा रहा होगा, जितना करोड़ों हिंदुओं को, जो खुद को ठगा हुआ महसूस कर सकते हैं. आखिरकार कितनी रकम का गबन हुआ और इस मामले में किन-किन लोगों को सज़ा मिलती है, यह अलग बात है, लेकिन यह घटना हिंदू समाज की सोच पर एक स्थायी निशान छोड़ सकती है. अगली बार जब कोई मंदिर निर्माण या किसी अन्य धार्मिक उद्देश्य के लिए चंदा मांगने आएगा, तो लोगों के मन में शक पैदा हो सकता है.
पीएम मोदी यह बात शायद किसी और से बेहतर जानते होंगे. वे लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा से भी पहले से अयोध्या मंदिर आंदोलन से जुड़े रहे हैं. अयोध्या में मंदिर निर्माण का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है. मन की बात उनके लिए अपनी पीड़ा और चिंता व्यक्त करने का एक और मंच हो सकता था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया.
घोटाला कैसे सामने आया
1980 और 1990 के दशक में जब लोग हिंदी भाषी राज्यों में सड़क से यात्रा करते थे, तो सबसे आम दृश्य होता था कि कुछ युवा बांस की बैरिकेड लगाकर गाड़ियां रोकते थे और आसपास बन रहे मंदिरों के लिए चंदा मांगते थे. वे विनम्र लेकिन दृढ़ होते थे. लोग भी ज्यादातर अपनी इच्छा से पैसे दे देते थे. वे मंदिर कई सालों तक निर्माणाधीन रहते थे.
मार्च 1990 में इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट, जिसका शीर्षक था “Suspected money bungling threatens to split VHP”, में विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) और संत समाज के भीतर ईंटों के परिवहन पर खर्च हुए पैसे को लेकर चल रही तीखी बहस का जिक्र किया गया था. रिपोर्ट में कहा गया था, “वीएचपी ने रामशिला पूजन में शामिल श्रद्धालुओं से 8.29 करोड़ रुपये का चंदा जुटाया था. जब जनवरी के अंत में हुए इलाहाबाद संत सम्मेलन में उसने दावा किया कि इस राशि में से 1.63 करोड़ रुपये पूजन और अयोध्या में शिलान्यास समारोह पर खर्च किए गए, तो कई लोगों ने सवाल उठाए क्योंकि यह रकम बहुत ज्यादा लग रही थी.” प्रकाशन ने एक महंत के हवाले से लिखा था, “क्या आप मान सकते हैं कि सिर्फ ईंटों को ढोने में इतना पैसा खर्च हो सकता है? आखिर इतना पैसा किस पर खर्च किया गया?”
अयोध्या के राम मंदिर में जो हुआ है, वह इससे कहीं ज्यादा गंभीर है.
1990 के मामले में पैसे के दुरुपयोग के केवल आरोप और संदेह थे, लेकिन मौजूदा मामले में अयोध्या मंदिर में चढ़ावे और दान की चोरी साबित हो चुकी है. आठ लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है और 80 लाख रुपये से ज्यादा की रकम बरामद की गई है. मंदिर के संचालन का दायरा देखते हुए यह केवल हिमखंड का ऊपरी हिस्सा भी हो सकता है. गिरफ्तार किए गए लोग छोटे स्तर के आरोपी हो सकते हैं. अगर पूरी और गहराई से जांच की जाए तो मामला बड़े लोगों तक पहुंच सकता है. वीएचपी का कहना है कि उसने 12.5 करोड़ परिवारों से 3,300 करोड़ रुपये जुटाए थे. सोचिए, 60 करोड़ से ज्यादा लोग यह जानना चाहेंगे कि भगवान राम के मंदिर के लिए उन्होंने जो मेहनत की कमाई दान में दी थी, वह आखिर किसने हड़प ली. सरकार ट्रस्ट के रोजमर्रा के कामकाज में शामिल नहीं थी, लेकिन जब लाखों हिंदू इस मामले में जवाबदेही मांग रहे हैं, तो वह इससे मुंह नहीं मोड़ सकती. राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन मोदी सरकार ने ही किया था और उसके 12 सदस्यों को नामित भी किया था. प्रधानमंत्री मोदी के पूर्व प्रधान सचिव नृपेंद्र मिश्रा को निर्माण समिति का प्रमुख बनाया गया था. ट्रस्ट के एक अन्य सदस्य आईएएस अधिकारी प्रशांत लोखंडे को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का करीबी माना जाता है. हाल ही में सीबीएसई का अध्यक्ष बनाए जाने से पहले वह गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव और अतिरिक्त सचिव रह चुके हैं. उत्तर प्रदेश के दो अन्य आईएएस अधिकारी भी 14 सदस्यीय ट्रस्ट का हिस्सा हैं.
ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय हैं, जो वीएचपी के उपाध्यक्ष हैं और उन्हें मोदी-शाह का करीबी माना जाता है. राय ने पद छोड़ने की पेशकश की है, लेकिन इस पर अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है. जब भारत सरकार ने ट्रस्ट के सदस्यों को नामित किया था, तो फिर मोदी और शाह इस मामले से कैसे दूरी बना सकते हैं, जबकि मंदिर के चंदे के पैसे में कथित गड़बड़ी उन्हीं लोगों के कार्यकाल में हुई है?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े संगठन वीएचपी पर भी सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि चंपत राय पहले आरएसएस के प्रचारक रह चुके हैं और अशोक सिंघल के समय से वीएचपी से जुड़े रहे हैं. तथ्य यह भी है कि आठ साल पहले मोदी के आलोचक प्रवीण तोगड़िया को परिषद से बाहर किए जाने के बाद से वीएचपी और मोदी-शाह सरकार के बीच काफी करीबी संबंध रहे हैं. यहां तक कहा जाता है कि वीएचपी के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने केंद्रीय मंत्री हर्ष मल्होत्रा को दिल्ली बीजेपी इकाई का अध्यक्ष बनाए जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.
पीएम मोदी विवादित मुद्दों पर तुरंत प्रतिक्रिया देने के लिए नहीं जाने जाते. लाखों छात्रों को प्रभावित करने वाले नीट-यूजी पेपर लीक विवाद के दौरान भी वह पूरी तरह चुप रहे. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव और उनके परिवार द्वारा बड़ी मात्रा में जमीन खरीदे जाने के आरोपों पर उठे विवाद पर भी उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है.
हालांकि, विवादित मुद्दों पर पीएम मोदी की चुप्पी कोई नई बात नहीं है. चाहे मणिपुर संकट हो, दिल्ली दंगे हों, गलवान झड़प हो या कोई और बड़ा मामला, जिसमें उनकी सरकार मुश्किल में घिरी हो, शुरुआती प्रतिक्रिया अक्सर चुप्पी ही रहती है. वे आमतौर पर तब बोलते हैं, जब सरकार हालात और चर्चा पर फिर से नियंत्रण हासिल कर लेती है. पहले दो कार्यकालों में प्रधानमंत्री के लिए यह रणनीति कारगर रही. जनता की नज़र में उनसे कोई गलती नहीं हो सकती थी. उनकी छवि आलोचना और दाग से परे मानी जाती थी, लेकिन तीसरे कार्यकाल में पीएम मोदी के लिए यही रणनीति हमेशा काम करेगी, यह ज़रूरी नहीं है.
2024 के लोकसभा चुनावों ने दिखाया कि उनकी लोकप्रियता में भले बड़ी गिरावट न आई हो, लेकिन शासन से जुड़ी कमियों की भरपाई केवल उनकी छवि और करिश्मे के सहारे हमेशा नहीं की जा सकती. बाद में हुए विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की जीत को केवल पीएम मोदी या उनके शासन के समर्थन का प्रमाण मानना भी एक गलती होगी.
भरोसे में कमी
आइए सी-वोटर के कुछ त्वरित सर्वेक्षणों पर नज़र डालते हैं. दान की चोरी से जुड़े सर्वे में 86 प्रतिशत लोगों ने इसे एक गंभीर मुद्दा बताया. सर्वे में शामिल लगभग दो-तिहाई लोगों ने कहा कि अयोध्या मंदिर में दान के प्रबंधन को लेकर लोगों का भरोसा कम हुआ है. जब पूछा गया कि क्या इस मामले की निष्पक्ष जांच होगी और सच सामने आएगा, तो 49 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्हें ऐसा लगता है, जबकि 44 प्रतिशत लोगों ने इससे असहमति जताई.
नीट-यूजी पेपर लीक विवाद पर सी-वोटर के पहले किए गए सर्वे में 59 प्रतिशत लोगों ने शिक्षा मंत्री और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) को जिम्मेदार ठहराया था. सर्वे में शामिल अधिकांश लोगों, यानी 52 प्रतिशत, ने कहा कि उन्हें भारत की प्रतियोगी और प्रवेश परीक्षाओं की निष्पक्षता पर भरोसा नहीं है. जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें शिक्षा व्यवस्था और सरकार पर भरोसा है कि वह लाखों छात्रों के साथ निष्पक्ष व्यवहार करेगी, तो 51.7 प्रतिशत लोगों ने कहा, “बिल्कुल भी भरोसा नहीं है.” 22.7 प्रतिशत लोगों ने कहा, “भरोसा धीरे-धीरे कम हो रहा है.” 8.1 प्रतिशत लोगों ने कहा, “कुछ संदेहों के साथ भरोसा है.”
एक अन्य सवाल में पूछा गया कि क्या नीट और सीबीएसई परीक्षा में हुई कथित गड़बड़ियों से प्रभावित लोग भविष्य के चुनावों में अपनी वोटिंग पसंद बदल सकते हैं. इस पर 71.7 प्रतिशत लोगों ने “हां” में जवाब दिया. ये सर्वे छोटे नमूनों पर आधारित हैं और केवल कुछ मुद्दों तक सीमित हैं. फिर भी ये मौजूदा हालात को लेकर बढ़ती निराशा और असंतोष की ओर इशारा करते हैं. 12 साल बाद भी पीएम मोदी एक नेता के रूप में लोकप्रिय हो सकते हैं, लेकिन उनके शासन को लेकर जनता की जांच-परख और सवाल पहले से ज्यादा बढ़ रहे हैं. सत्तारूढ़ पार्टी इस बात पर बहुत ज्यादा निर्भर दिख रही है कि विपक्ष के पास ऐसा कोई नेता नहीं है जो पीएम मोदी जैसी जनअपील रखता हो, लेकिन 2004 में भी ऐसा ही था, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जैसी लोकप्रियता वाला कोई विपक्षी नेता नहीं था.
भारतीय राजनीति के इतिहास में ऐसे कई और उदाहरण और सबक मौजूद हैं. बेशक, पीएम मोदी यह बात हमसे कहीं बेहतर जानते होंगे.
डीके सिंह दिप्रिंट के पॉलिटिकल एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @dksingh73 है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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