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Monday, 27 July, 2026
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40 की उम्र के बाद डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर साथ होने का खतरा बढ़ता है: 56 हजार भारतीयों पर स्टडी

शोधकर्ताओं ने पाया कि 40 साल की उम्र के बाद डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर साथ होने के मामले तेज़ी से बढ़ते हैं. यह बढ़ोतरी 50 के दशक के आखिर तक जारी रहती है और करीब 70 साल की उम्र के बाद स्थिर हो जाती है. स्टडी में हर 20 में से लगभग 1 व्यक्ति को दोनों बीमारियां थीं.

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नई दिल्ली: एक नई स्टडी के मुताबिक, 40 साल की उम्र के बाद जिन लोगों में डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर (हाइपरटेंशन) की पहचान हो, उनकी दूसरी बीमारी की भी रेगुलर जांच होनी चाहिए. स्टडी में पाया गया है कि 40 साल के बाद इन दोनों बीमारियों के एक साथ होने का खतरा तेज़ी से बढ़ जाता है.

यह स्टडी शनिवार को Diabetes & Metabolic Syndrome: Clinical Research & Reviews जर्नल में छपी थी. इसमें 56,000 से ज्यादा वयस्कों के इलेक्ट्रॉनिक हेल्थ रिकॉर्ड का एनालिसिस किया गया.

डॉक्टर पहले से जानते थे कि डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर अक्सर साथ-साथ होते हैं, लेकिन इस स्टडी ने पहली बार उम्र के हिसाब से बताया है कि भारतीयों में यह खतरा कब तेजी से बढ़ना शुरू होता है और दोनों बीमारियों का आपस में कितना मजबूत संबंध है.

शोधकर्ताओं ने पाया कि करीब 40 साल की उम्र से डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर एक साथ होने के मामले तेज़ी से बढ़ने लगते हैं. यह बढ़ोतरी 50 साल की उम्र के आखिर तक जारी रहती है, फिर इसकी रफ्तार कम हो जाती है और करीब 70 साल की उम्र के बाद यह स्थिर हो जाती है. स्टडी में शामिल हर 20 में से लगभग 1 व्यक्ति को दोनों बीमारियां थीं.

स्टडी के मुख्य लेखक और मैक्स हेल्थकेयर, नई दिल्ली के क्लीनिकल रिसर्च विभाग के डॉ. अभय इंद्रायन ने दिप्रिंट से कहा, “हमारा मुख्य उद्देश्य यह जानना था कि भारतीयों में डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर एक साथ कितने आम हैं. हमने पाया कि करीब 5 प्रतिशत वयस्कों में दोनों बीमारियां साथ मौजूद थीं.”

उन्होंने कहा कि कम उम्र में दोनों बीमारियां लगभग नहीं के बराबर होती हैं, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ इनका खतरा लगातार बढ़ता जाता है.

स्टडी में “सिनर्जी फैक्टर” भी निकाला गया. इसका मतलब है कि दोनों बीमारियां संयोग से जितनी बार साथ होनी चाहिए, उससे कितनी ज्यादा बार वास्तव में साथ पाई जाती हैं.

डॉ. इंद्रायन ने कहा, “अगर दोनों बीमारियां एक-दूसरे से बिल्कुल अलग होतीं, तो ये साथ बहुत कम मिलतीं, लेकिन हमने पाया कि ये उम्मीद से लगभग दोगुनी बार साथ होती हैं. हाई ब्लड प्रेशर डायबिटीज का खतरा बढ़ाता है और डायबिटीज हाई ब्लड प्रेशर का, क्योंकि दोनों के कई जोखिम कारक एक जैसे हैं.”

भारत में डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर दोनों का बोझ दुनिया में सबसे ज्यादा है. ICMR-INDIAB स्टडी के मुताबिक, भारत में 10.1 करोड़ लोग डायबिटीज और 31.5 करोड़ लोग हाई ब्लड प्रेशर से पीड़ित हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया में करीब 83 करोड़ लोग डायबिटीज और 140 करोड़ लोग हाई ब्लड प्रेशर के साथ जी रहे हैं.

नई दिल्ली के फोर्टिस सी-डॉक हॉस्पिटल फॉर डायबिटीज एंड एलाइड साइंसेज के चेयरमैन डॉ. अनूप मिश्रा ने दिप्रिंट से कहा, “अब हमें डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर को दो अलग-अलग बीमारियां मानना बंद करना चाहिए. कई भारतीयों में ये दोनों साथ शुरू होती हैं और साथ ही रहती हैं.”

उन्होंने कहा, “अगर किसी व्यक्ति में एक बीमारी मिलती है, तो दूसरी बीमारी की जांच भी तुरंत शुरू कर देनी चाहिए. दूसरी बीमारी के लक्षण आने का इंतजार करने से दिल की बीमारी, स्ट्रोक और किडनी को नुकसान जैसी गंभीर समस्याओं से बचने का कीमती समय निकल सकता है.”

‘बड़ा ग्रुप’

मैक्स हेल्थकेयर के रिसर्चर्स की स्टडी में 56,393 एडल्ट्स के हेल्थ रिकॉर्ड की जांच की गई, जिन्होंने 2021 और 2024 के बीच दिल्ली-एनसीआर के छह हॉस्पिटल में प्रिवेंटिव हेल्थ चेक-अप करवाए थे.

डॉ. इंद्रायन ने कहा, “यह एक साथ होने वाले प्रिवेलेंस पर इस तरह की स्टडी के लिए एक बड़ा ग्रुप है.”

पार्टिसिपेंट्स को डायबिटीज होने की कैटेगरी में तब रखा गया जब वे पहले से ही इलाज पर थे, या अगर HbA1c नाम का ब्लड टेस्ट – जो पिछले दो से तीन महीनों का एवरेज ब्लड शुगर लेवल दिखाता है – 6.5 परसेंट या उससे ज़्यादा था, या अगर फास्टिंग ब्लड शुगर 126 mg/dL या उससे ज़्यादा था.

हाइपरटेंशन को इसका इलाज कराने वाले, या 140/90 mmHg या उससे ज़्यादा ब्लड प्रेशर रीडिंग वाले के रूप में डिफाइन किया गया था.

कुल मिलाकर, 20.9 परसेंट पार्टिसिपेंट्स को डायबिटीज और 11.4 परसेंट को हाइपरटेंशन था. लगभग 4.9 परसेंट को दोनों थे.

भारत के बाहर भी देखा गया पैटर्न

अगर डायबिटीज और हाइपरटेंशन एक-दूसरे से अलग-अलग होते, तो रिसर्चर्स का अंदाज़ा है कि उनका ओवरलैप सिर्फ आधा होता. इसके बजाय, डबल बोझ उम्मीद से लगभग दोगुना होता है.

रिसर्चर्स का कहना है कि यह पैटर्न मोटापा, इंसुलिन रेजिस्टेंस, पुरानी सूजन, फिजिकल इनएक्टिविटी और ब्लड वेसल के काम में गड़बड़ी जैसे शेयर्ड बायोलॉजिकल ड्राइवर्स की ओर इशारा करता है, न कि ये दोनों बीमारियां सिर्फ इत्तेफाक से एक साथ दिखाई देती हैं.

ये नतीजे एक बड़े ग्लोबल पैटर्न को दिखाते हैं.

अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन जर्नल हाइपरटेंशन में छपे 2021 के एक रिव्यू में डायबिटीज और हाइपरटेंशन को शेयर्ड बायोलॉजिकल रास्तों से एक-दूसरे को बढ़ावा देते हुए बताया गया है. इंसुलिन रेजिस्टेंस और डायबिटीज लोगों को हाई ब्लड प्रेशर और वैस्कुलर स्टिफनेस की ओर ले जाते हैं, जबकि वही आर्टरी स्टिफनेस बदले में इंसुलिन रेजिस्टेंस को और खराब कर देती है.

लेखकों ने सूजन, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और ब्लड वेसल डिसफंक्शन जैसे ओवरलैपिंग ड्राइवर्स की ओर इशारा किया, जो इस बात की मुख्य वजह हैं कि ये दोनों स्थितियां एक साथ क्यों होती हैं.

कोलंबिया यूनिवर्सिटी के मेलमैन स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के रिसर्चर्स ने एक अलग यूएस एनालिसिस किया, जो डायबिटीज केयर में पब्लिश हुआ. इसमें दो दशकों के नेशनल हेल्थ सर्वे डेटा (1999–2018) का इस्तेमाल किया गया और पाया गया कि उस समय में हाइपरटेंशन और टाइप 2 डायबिटीज दोनों वाले अमेरिकी वयस्कों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई, 6 प्रतिशत से 12 प्रतिशत तक.

स्टडी में डायबिटीज वाले लगभग दो-तिहाई वयस्कों को हाइपरटेंशन भी था, और हाइपरटेंशन वाले लगभग एक चौथाई लोगों को डायबिटीज भी थी.

नई दिल्ली के BLK मैक्स हॉस्पिटल में सेंटर फॉर डायबिटीज, थायरॉइड, ओबेसिटी और एंडोक्राइनोलॉजी के सीनियर डायरेक्टर डॉ. अशोक कुमार झिंगन के अनुसार, इन नतीजों से यह पक्का होता है कि डायबिटीज को सिर्फ ब्लड शुगर की बीमारी मानने से आगे बढ़ने की ज़रूरत है.

उन्होंने कहा, “एक डॉक्टर के तौर पर जो रोज़ाना कॉम्प्लेक्स मेटाबोलिक डिसऑर्डर को मैनेज करता है, यह स्टडी आज के एंडोक्राइनोलॉजी में एक ज़रूरी सच्चाई को सामने लाती है: टाइप 2 डायबिटीज का इलाज अकेले नहीं किया जा सकता.”

उन्होंने आगे कहा कि डायबिटीज वाले लोगों को अक्सर दिल और किडनी की दिक्कतें हो जाती हैं.

डॉ. झिंगन ने कहा, “क्लिनिकल प्रैक्टिस में, डायबिटीज को मैनेज करने के लिए हमें ग्लाइसेमिक (ब्लड शुगर) कंट्रोल से कहीं आगे देखना होगा. शुरुआती स्क्रीनिंग, ब्लड प्रेशर का सही मैनेजमेंट, लिपिड ऑप्टिमाइज़ेशन और ऑर्गन-प्रोटेक्टिव थेरेपी का समय पर इस्तेमाल, किडनी और कार्डियक बीमारियों के आखिरी स्टेज के नतीजों को रोकने के लिए बहुत ज़रूरी हैं.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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