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Monday, 18 May, 2026
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राज्यों में कांग्रेस की पकड़ लगातार कमजोर, 2008 से 2026 के बीच आधी हुई विधायकों की संख्या

2008 में, जब राहुल गांधी ने नेतृत्व की भूमिका संभाली थी, तब पूरे देश में पार्टी के 1,204 विधायक थे. दिप्रिंट के विश्लेषण से पता चलता है कि 2026 में यह संख्या घटकर करीब 676 विधायकों तक रह गई है.

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नई दिल्ली: कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन केरल में फिर सत्ता में लौट आया है, लेकिन दिप्रिंट के विश्लेषण के अनुसार, यह राज्य विधानसभाओं में पार्टी की मौजूदगी में लगातार हो रही गिरावट के बीच सिर्फ एक छोटा सा अपवाद लगता है. यह विश्लेषण 2007 के बाद राज्यों में कांग्रेस के विधायकों की संख्या पर आधारित है—वही साल जब राहुल गांधी को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का महासचिव बनाए जाने के बाद उन्होंने पार्टी में फैसले लेने में अहम भूमिका निभानी शुरू की थी.

2008 में पूरे देश में पार्टी के 1,204 विधायक थे, लेकिन दिप्रिंट द्वारा एकत्र किए गए आंकड़ों से पता चलता है कि तब से कांग्रेस विधायकों की संख्या लगभग 44 प्रतिशत घट गई है और 2026 में यह घटकर करीब 676 रह गई है. दूसरी तरफ, बीजेपी के विधायकों की संख्या 2008 में 889 से बढ़कर 2026 में 1,787 हो गई है, यानी इसमें 101 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है.

भारत में कुल 4,120 विधायकों में अब हर दूसरा विधायक बीजेपी का है, जबकि हर छह में से सिर्फ एक विधायक कांग्रेस का है.

दिप्रिंट द्वारा किए गए इस विश्लेषण में उन उम्मीदवारों के पार्टी संबंध को आधार बनाया गया है जिन्होंने वर्षों में विधानसभा चुनाव जीते. इसमें बाद में हुए दल-बदल या उपचुनाव शामिल नहीं हैं.

हालांकि, राहुल को 2007 में सीधे तौर पर इंडियन यूथ कांग्रेस और नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया की जिम्मेदारी दी गई थी, लेकिन इसके बाद उन्होंने पार्टी के फैसले लेने की प्रक्रिया में अहम भूमिका निभानी शुरू कर दी थी. उनकी मां और उस समय की पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उन्हें लगभग पूरी छूट दे दी थी. 2017 में उन्होंने औपचारिक रूप से पार्टी की कमान राहुल को सौंप दी.

2008 के बाद पार्टी सिर्फ 2012 में ही 1,200 के आंकड़े को पार कर पाई थी, जब उसके पास 1,224 विधायक थे. इसके बाद 2014 में यह संख्या 25 प्रतिशत गिरकर 911 रह गई. कांग्रेस और बीजेपी विधायकों की संख्या का ग्राफ 2013-14 में एक-दूसरे को काटता और उलटता दिखता है, जिसके बाद बीजेपी लगातार ऊपर की तरफ बढ़ती रही.

जनवरी 2013 में राहुल को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का उपाध्यक्ष बनाया गया था, जिसके बाद उन्होंने संगठन को बड़े स्तर पर चलाना शुरू किया, जबकि सोनिया की भूमिका काफी हद तक औपचारिक रह गई. 2017 में उन्होंने सोनिया की जगह कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभाला, लेकिन 2019 लोकसभा चुनाव में हार के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया. इसके बाद सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष के रूप में फिर कमान संभालनी पड़ी.

अक्टूबर 2022 में मल्लिकार्जुन खरगे ने अध्यक्ष पद संभाला, लेकिन 2019 के बाद से राहुल ने कोई औपचारिक पद नहीं लिया है, फिर भी फैसले लेने के मामले में उन्हें पार्टी का वास्तविक प्रमुख माना जाता है. राहुल 22 साल से सांसद हैं और इस समय लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं.

दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर चंद्रचूड़ सिंह कांग्रेस की गिरावट की जिम्मेदारी पूरी तरह राहुल पर डालते हैं. उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “उन्हें यह समझ ही नहीं है कि राजनीति कैसे चलती है, बात इतनी सी है…उनकी राजनीतिक सोच उस राजनीतिक संस्कृति से काफी अलग है जिसमें हम रहते हैं.”

हालांकि, दिल्ली स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के फेलो राहुल वर्मा कांग्रेस की विधानसभा स्तर पर घटती मौजूदगी के लिए सिर्फ सांसद राहुल गांधी को जिम्मेदार नहीं मानते, क्योंकि पार्टी लंबे समय से ढांचागत गिरावट का सामना कर रही है.

वर्मा ने कहा, “अगर आप 1952 से 2024 तक हर दशक का ग्राफ देखें, तो कांग्रेस लगातार राज्य विधानसभाओं में सीटें और वोट शेयर खोती जा रही है.”

उन्होंने आगे कहा, “जहां तक राहुल गांधी की जिम्मेदारी की बात है, तो किसी न किसी रूप में वह पिछले 12-15 साल से पार्टी का चेहरा रहे हैं. इसलिए गिरावट का पूरा दोष उन पर नहीं डाला जा सकता, लेकिन इस ट्रेंड को पलट नहीं पाने के लिए उन्हें जिम्मेदार जरूर माना जाएगा.”

इन्फोग्राफिक: दीपाक्षी शर्मा | दिप्रिंट
इन्फोग्राफिक: दीपाक्षी शर्मा | दिप्रिंट

गिरावट

वर्मा इस ग्राफ को विस्तार से समझाते हुए बताते हैं कि कांग्रेस और बीजेपी के लिए ग्राफ के पलटने का मोड़ 2013-14 में आता है—तब तक कांग्रेस कई राज्यों में हार झेल चुकी थी.

उन्होंने कहा, “यही वह समय था जब नरेंद्र मोदी किसी तरह बीजेपी के कैंपेन कमेटी प्रमुख बने. इसके बाद बीजेपी हर साल अपने खाते में ज्यादा राज्य जोड़ती चली गई. उन राज्यों में कांग्रेस धीरे-धीरे कमजोर होती गई.”

उदाहरण के तौर पर हरियाणा में, जहां बीजेपी 2009 में सिर्फ चार सीटें जीत पाई थी, वहीं 2014 में उसके 47 विधायक हो गए.

इसी तरह असम में कांग्रेस 15 साल तक सत्ता में रही थी, जबकि 2011 में बीजेपी सिर्फ पांच सीटें जीत पाई थी, लेकिन 2016 में स्थिति बदल गई, जब बीजेपी ने 60 सीटें जीत लीं.

2017 में बीजेपी को उत्तर प्रदेश में अपनी सबसे बड़ी और अहम जीत मिली, जहां उसने 312 सीटों के भारी बहुमत के साथ जीत हासिल की. बीजेपी के विधायकों की संख्या 2016 में 1,051 से बढ़कर 2017 में 1,348 हो गई, यानी 28 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई.

वर्मा ने कहा, “तो जो आप देखते हैं, वह 2013 से 2018 के बीच बीजेपी के विस्तार का पहला दौर है और यही राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की गिरावट का पहला दौर भी है.”

दिसंबर 2017 में राहुल के पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद से लेकर 2021 तक के कुछ वर्षों में ग्राफ दिखाता है कि कांग्रेस और बीजेपी दोनों की राज्यों में पहुंच लगभग एक जैसी बनी रही. इसकी वजह यह थी कि 2018 के बाद बीजेपी ने कुछ राज्य गंवा दिए थे, जैसे राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश, या फिर कुछ राज्यों में कांग्रेस को लगभग उतनी ही सीटें मिलीं.

वर्मा ने आगे बताया, “हालांकि, 2022-23 के बाद प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में बीजेपी के विस्तार का दूसरा दौर शुरू होता है.”

2024 में, जिस साल गांधी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बने, उस समय कांग्रेस के पास 669 विधायक थे, जो पार्टी के इतिहास में सबसे कम संख्या थी. 2025 में यह संख्या और गिर गई और पूरे देश में पार्टी सिर्फ 656 विधायकों तक सीमित रह गई. 2026 के विधानसभा चुनावों में उसके खाते में 20 विधायक और जुड़े.

कुछ राज्यों में पूरी तरह सफाया

सालों के दौरान कांग्रेस ने कुछ राज्यों में पूरी तरह गिरावट देखी है.

उदाहरण के तौर पर गुजरात में, कांग्रेस ने 2017 में बीजेपी को कड़ी टक्कर दी थी. 182 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस ने 77 सीटें जीती थीं, जबकि बीजेपी को 99 सीटें मिली थीं, लेकिन 2022 के अगले चुनाव में कांग्रेस सिर्फ 17 सीटों तक सिमट गई, जबकि बीजेपी ने 156 सीटें जीत लीं.

आंध्र प्रदेश में, जहां 2008 में कांग्रेस के 185 विधायक थे, वहीं 2014 में राज्य के बंटवारे के बाद पार्टी लगभग खत्म हो गई. महाराष्ट्र में भी कांग्रेस 2009 में 288 में से 82 सीटें जीतने से गिरकर 2024 में सिर्फ 16 सीटों तक पहुंच गई.

इन्फोग्राफिक: दीपाक्षी शर्मा | दिप्रिंट
इन्फोग्राफिक: दीपाक्षी शर्मा | दिप्रिंट

इस महीने की शुरुआत में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट की केरल में जीत के बाद, केरल चौथा ऐसा राज्य बन गया है जहां कांग्रेस का मुख्यमंत्री है. इससे पहले कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस के मुख्यमंत्री हैं.

हालांकि, यह जीत ऐसे समय आई है जब पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में पार्टी की सीटें घटकर एक अंक में पहुंच गई हैं. असम में भी पार्टी पीछे रह गई—वह राज्य जहां उसने 2016 के मध्य तक लगातार 15 साल शासन किया था. दूसरी तरफ, बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में 10 साल के भीतर बड़ी छलांग लगाई—2016 में अपनी पहली 3 सीटें जीतने से लेकर अब 207 सीटों तक पहुंच गई.

विश्लेषक चंद्रचूड़ सिंह का मानना है कि राहुल की रणनीतिक सोच भारतीय राजनीतिक व्यवस्था से जुड़ी हुई नहीं है.

उन्होंने कहा, “उदाहरण के तौर पर देखिए कि बीजेपी ने प्रचार कैसे शुरू किया…उसने युवाओं से शुरुआत की. राहुल खासकर हिंदी पट्टी में युवाओं तक पहुंचते नहीं दिखते. केरल में दक्षिण भारत के युवाओं के साथ वह सहज नज़र आते हैं. तमिलनाडु में भी वह युवाओं के साथ काफी सहज हैं, लेकिन देश के उत्तरी हिस्से, खासकर हिंदी पट्टी में, आप उन्हें उसी सहजता के साथ नहीं देखेंगे.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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