तिरुवनंतपुरम: पिछले हफ्ते कांग्रेस नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) केरल में सत्ता में लौटने के एक दिन बाद कांग्रेस नेता वी. डी. सतीसन ने दिप्रिंट से कहा था कि वह मुख्यमंत्री पद के लिए कोई “दावा” नहीं कर रहे हैं.
उन्होंने कहा, “2021 में जब मैंने जिम्मेदारी संभाली थी, तब मेरा काम यूडीएफ को दोबारा सत्ता में लाना था. मैंने शानदार जीत के साथ अपना काम पूरा कर लिया है. 1957 के बाद केरल के इतिहास में यह सबसे बड़ी जीत है.”
केरल में यूडीएफ ने 140 में से 102 विधानसभा सीटें जीती थीं.
हालांकि, मुख्यमंत्री कौन बनेगा, इस पर फैसला ज्यादा मुश्किल था.
अगले दिन एआईसीसी द्वारा नियुक्त दो नेता, अजय माकन और मुकुल वासनिक केरल पहुंचे. उन्होंने कांग्रेस के 63 नए चुने गए विधायकों से बातचीत की.
इनमें से 40 से ज्यादा विधायकों ने एआईसीसी नेता के. सी. वेणुगोपाल का समर्थन किया, जबकि सतीसन के समर्थन में सिर्फ कुछ विधायक थे, लेकिन कांग्रेस के सहयोगी दल— इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) और केरल कांग्रेस (जोसेफ) — सतीसन के समर्थन में मजबूती से खड़े रहे.
जहां वेणुगोपाल विधायकों का समर्थन जुटाने में लगे थे, वहीं सतीसन ने पार्टी नेतृत्व के सामने अपना पक्ष अलग तरीके से रखा. कई जिलों में उनके समर्थक सड़कों पर उतर आए. जगह-जगह फ्लेक्स बोर्ड लगाए गए जिन पर लिखा था, “जिसने सेना का नेतृत्व किया, वही राज्य पर राज करे.”
कुछ समर्थकों ने इससे भी आगे बढ़ते हुए वेणुगोपाल के पोस्टरों को नुकसान पहुंचाया, जिससे मुकाबले की तीव्रता साफ दिखाई दी.
पार्टी की चर्चा के आखिरी दिन वायनाड में पोस्टर लगाए गए. 2019 से यह लोकसभा सीट राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा का प्रतिनिधित्व करती रही है.
इन पोस्टरों में चेतावनी दी गई थी कि अगर सतीसन को मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया तो वायनाड अगला अमेठी बन जाएगा.
इस बीच, दिप्रिंट को पता चला है कि राहुल गांधी के दफ्तर में सतीशन के समर्थन में सैकड़ों ईमेल भेजे गए. केरल की जनता को धन्यवाद देने वाली राहुल गांधी की फेसबुक पोस्ट पर भी सतीशन के समर्थन में बड़ी संख्या में कमेंट आए.
आखिरकार सब कुछ सतीसन के पक्ष में गया और गुरुवार को एआईसीसी ने उन्हें केरल का 13वां मुख्यमंत्री घोषित कर दिया.
इसके साथ ही विपक्ष के नेता रहे सतीसन राज्य के सबसे बड़े पद पर पहुंच गए और उन्होंने प्रशासनिक अनुभव रखने वाले दो वरिष्ठ नेताओं को पीछे छोड़ दिया.
इस खबर पर प्रतिक्रिया देते हुए सतीशन ने वेणुगोपाल और रमेश चेन्निथला दोनों का धन्यवाद करना नहीं भूले.
अब उन्हें मुख्यमंत्री पद के साथ आने वाली चुनौतियों का सामना करना होगा. ये चुनौतियां प्रशासन के साथ-साथ राज्य की जटिल सामुदायिक राजनीति से भी जुड़ी होंगी.
सतीसन ने गुरुवार को कैंटनमेंट हाउस, जो विपक्ष के नेता का आधिकारिक आवास है, वहां मीडिया से बात करते हुए कहा, “यह टीम यूडीएफ और लाखों कांग्रेस कार्यकर्ताओं की मेहनत है, जिन्होंने मुझे इस भूमिका तक पहुंचाया. मैं उनका आभारी हूं. केरल की जनता ने मुझे बहुत बड़ी जिम्मेदारी दी है. हमने उनसे जो वादे किए हैं, उन्हें पूरा करने के लिए हम हर संभव कोशिश करेंगे. हम राज्य में एक नए दौर की शुरुआत के लिए कड़ी मेहनत करेंगे.”
विधायक से मुख्यमंत्री तक
एर्नाकुलम जिले के नेट्टूर से आने वाले वी.डी. सतीसन का राजनीतिक सफर छात्र राजनीति से शुरू हुआ था. इसके बाद उन्होंने 1996 के केरल चुनाव में किस्मत आजमाई, लेकिन उन्हें हार मिली.
उन्हें पहली सफलता 2001 में परवूर सीट से मिली. तब से वह लगातार इस सीट से जीतते आ रहे हैं. पिछले दो चुनावों में उन्होंने 20 हजार से ज्यादा वोटों के अंतर से जीत हासिल की.
हालांकि, उनके समर्थकों के मुताबिक, सतीशन को पहले कई अहम जिम्मेदारियां नहीं मिल पाईं. इनमें कांग्रेस की छात्र इकाई केरल स्टूडेंट्स यूनिसन (केएसयू) के प्रदेश अध्यक्ष और यहां तक कि केपीसीसी अध्यक्ष का पद भी शामिल था.
सतीशन 2021 में विपक्ष के नेता (LoP) बने और उन्होंने रमेश चेन्निथला की जगह ली. कांग्रेस की लगातार दो विधानसभा चुनाव हार के बाद उन्हें यह जिम्मेदारी दी गई थी.
उन्हें यह पद उस समय मिला जब यूथ कांग्रेस ने ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) को पत्र लिखकर पार्टी नेतृत्व में बदलाव की मांग की थी.
हालांकि, 61 साल के सतीशन का मुख्यमंत्री बनना इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि उनके पास मंत्री रहने का कोई अनुभव नहीं है.
वहीं वरिष्ठ कांग्रेस नेता रमेश चेन्निथला केरल के इतिहास में सबसे कम उम्र के मंत्री बनने का रिकॉर्ड रखते हैं. वह 1986 में सिर्फ 28 साल की उम्र में राज्य के ग्रामीण विकास मंत्री बने थे.
इसके बाद उन्होंने गृह, विजिलेंस, जेल और फायर एंड रेस्क्यू सर्विसेज जैसे कई विभाग संभाले. वह 2005 से 2014 तक केपीसीसी के अध्यक्ष भी रहे और बाद में 2016 से 2021 तक विपक्ष के नेता बने. उन्होंने महाराष्ट्र के लिए एआईसीसी प्रभारी की जिम्मेदारी भी संभाली.
के. सी. वेणुगोपाल 2004 से 2006 तक केरल के पर्यटन और देवस्वोम मंत्री रहे. इसके अलावा वह 2011 से 2012 तक बिजली राज्य मंत्री और 2012 से 2014 तक नागरिक उड्डयन राज्य मंत्री भी रहे.
फिलहाल वह एआईसीसी महासचिव (संगठन) जैसे कांग्रेस के सबसे ताकतवर पदों में से एक संभाल रहे हैं.
प्रशासनिक अनुभव की कमी के बावजूद सतीशन की लोकप्रियता यूडीएफ की जीत के रणनीतिकार की उनकी छवि से जुड़ी है.
वह जब से विपक्ष के नेता बने हैं, तब से यूडीएफ ने पांच में से चार उपचुनाव जीते हैं. इनमें त्रिक्काकारा, पुथुप्पल्ली, पलक्कड़ और नीलांबुर शामिल हैं. सिर्फ त्रिशूर की चेलक्कारा सीट पर हार मिली.
नीलांबुर सीट, जो पहले एलडीएफ के पास थी, वहीं से सतीशन आखिरकार “किंगमेकर” बनकर उभरे.
सतीसन ने नीलांबुर विधानसभा उपचुनाव में पी.वी. अनवर को दूर रखने का फैसला किया. आईयूएमएल और कांग्रेस के कुछ नेता चाहते थे कि अनवर को यूडीएफ में जगह दी जाए, लेकिन सतीसन ने इसकी अनुमति नहीं दी.
पहले अनवर के प्रतिनिधित्व वाली नीलांबुर सीट पर तब उपचुनाव हुआ जब एलडीएफ से विवाद के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया था.
अनवर को बाहर रखने का फैसला आखिरकार सही साबित हुआ. यूडीएफ ने उनके समर्थन के बिना ही जीत दर्ज की.
इस घटना को सतीसन के उभार के तौर पर देखा गया. इसे उनके कठिन फैसले लेने की क्षमता का सबूत माना गया.
कुछ ही महीनों बाद यूडीएफ ने 2025 के स्थानीय निकाय चुनावों में बड़ी जीत हासिल की. विधानसभा चुनाव से चार महीने पहले हुए इन चुनावों में यूडीएफ ने छह में से चार कॉरपोरेशन जीते.
यह सफलता हाल ही में खत्म हुए विधानसभा चुनावों में भी दोहराई गई. मतदान से पहले सतीशन ने दावा किया था कि यूडीएफ 100 से ज्यादा सीटों के साथ सत्ता में लौटेगा.
उन्होंने यहां तक कह दिया था कि अगर यूडीएफ नहीं जीता तो वह राजनीति से संन्यास ले लेंगे. वह यूडीएफ के चुनाव अभियान का चेहरा बन गए थे.
यूडीएफ के पक्ष में काम करने वाली सबसे अहम चुनावी लाइन यह रही कि सतीशन लगातार कहते रहे कि केरल का लेफ्ट असली लेफ्ट नहीं है.
उन्होंने कहा कि वह अब अति-दक्षिणपंथी बन चुका है. उन्होंने यह भी दावा किया कि लेफ्ट के कई समर्थक यूडीएफ की तरफ आएंगे.
आखिर में ऐसा ही हुआ.
कम से कम चार वरिष्ठ सीपीआई(एम) नेताओं ने विधानसभा चुनाव में यूडीएफ समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और सभी ने लेफ्ट के गढ़ माने जाने वाले इलाकों में यूडीएफ को जीत दिलाई.
सतीसन ने दिप्रिंट से कहा, “हमने यह भी कहा था कि हम ‘नेहरूवादी लेफ्ट’ हैं और मौजूदा सरकार ‘अति-दक्षिणपंथी’ है. लेफ्ट के कई समर्थक हमारे साथ आ गए. यही फर्क था. इसी वजह से मैंने कहा था कि एक दर्जन से ज्यादा मंत्री हारेंगे और 13 मंत्री अपनी सीट हार गए.”
उभार और टकराव
कड़े फैसले लेने वाले नेता के रूप में पहचाने जाने वाले वी. डी. सतसन को कभी उनकी ही पार्टी के कार्यकर्ता “घमंडी” नेता के रूप में जानते थे.
हालांकि, विधानसभा चुनाव के बाद दिप्रिंट से बात करने वाले कांग्रेस के एक पदाधिकारी ने कहा, “वी.डी. सतीसन शुरुआत में ही माहौल बनाने में सफल रहे. लोगों ने उनके नेतृत्व के लिए वोट दिया. यह घमंड की बात नहीं थी, बल्कि ज़रूरत पड़ने पर मजबूत रुख लेने की बात थी.”
उन्होंने कहा कि इस साल फरवरी में सतीसन की 30 दिन की ‘पुथुयुगा यात्रा (न्यू एज मार्च)’ ने उनका एक अलग चेहरा दिखाया. ऐसा चेहरा, जिससे लोग आसानी से जुड़ सके.
एआईसीसी के एक पदाधिकारी ने पहले दिप्रिंट को बताया था कि सतीसन चुनाव से पहले युवाओं से बेहतर जुड़ने के लिए खुद को ‘Gen Z lingo’ यानी नई पीढ़ी की भाषा और स्टाइल के हिसाब से अपडेट कर रहे थे.
हालांकि, जनता और आईयूएमएल का समर्थन मिलने के बावजूद सतीसन के लिए रास्ता आसान नहीं रहा.
उनका कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं और समुदाय के नेताओं के साथ कई बार टकराव हुआ.
उदाहरण के तौर पर, पूर्व केपीसीसी अध्यक्ष के. सुधाकरन और सतीसन के बीच तनाव कई बार सार्वजनिक रूप से सामने आया. दोनों के बीच विवाद मुख्य रूप से संगठन में नियुक्तियों को लेकर था. एक बार सुधाकरन ने कथित तौर पर सतीसन के लिए अपमानजनक शब्द का इस्तेमाल किया था.
बताया जाता है कि पुथुप्पल्ली उपचुनाव में जीत के बाद दोनों के बीच इस बात को लेकर भी सार्वजनिक बहस हुई कि प्रेस कॉन्फ्रेंस को कौन संबोधित करेगा.
मुख्यमंत्री पद की दौड़ में सुधाकरन ने खुलकर के. सी. वेणुगोपाल का समर्थन किया. वडकारा सांसद शफी परांबिल ने भी वेणुगोपाल का साथ दिया.
अपने इस रुख की वजह से पार्टी के लोकप्रिय युवा चेहरों में से एक शफी परांबिल को सोशल मीडिया पर आलोचना का सामना करना पड़ा.
कई लोगों ने उन्हें “गद्दार” तक कहा, क्योंकि शफी को सतीसन का करीबी माना जाता था. सतीसन को समुदाय के नेताओं के विरोध का भी सामना करना पड़ा. कांग्रेस द्वारा उन्हें मुख्यमंत्री बनाए जाने के फैसले की शुरुआती आलोचना करने वालों में जी. सुकुमारन नायर भी शामिल थे, जो नायर सेवा सोसायटी (एनएसएस) के प्रमुख हैं.
एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में नायर ने कांग्रेस पर पार्टी की परंपराओं और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को नज़रअंदाज़ करने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि पार्टी ने अपने ज्यादातर विधायकों की राय को महत्व नहीं दिया. उन्होंने यह भी कहा कि यह फैसला कांग्रेस नेतृत्व पर आईयूएमएल के प्रभाव को दिखाता है.
पिछले कुछ वर्षों में, केरल के एझावा समुदाय की बड़ी सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था श्री नारायण धर्म परिपालन योगम (एसएनडीपी) योगम के महासचिव वेल्लप्पल्ली नटेसन का भी सतीसन के साथ कई बार टकराव देखा गया.
इन्हीं विवादों में से एक में नटेसन ने यह कहकर विवाद खड़ा कर दिया था कि मुस्लिम बहुल मलप्पुरम में दूसरे समुदाय डर के माहौल में जी रहे हैं.
इस पर सतीसन ने जवाब देते हुए कहा था कि समुदाय के नेताओं को सांप्रदायिकता का औज़ार नहीं बनना चाहिए. इसके बाद नटेसन ने सतीसन को “घमंडी” बताया और कहा कि उनमें राजनीतिक अनुभव और परिपक्वता की कमी है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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