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Thursday, 23 July, 2026
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इरोम शर्मिला से वांगचुक तक—हर सरकार झुकने से डरती है, वह नहीं मानती कि विरोध प्रदर्शन असर करते हैं

सत्ता को भरोसा रहता है कि समय के साथ भीड़ कम हो जाएगी, अनशन टूट जाएगा और युवा थक जाएंगे. सरकार के पास बहुत वक्त है, लेकिन क्या CJP के पास भी है?

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सबसे पहले, वे आपकी जान बचाते हैं.

18 जुलाई की सुबह-सुबह, नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर सादे कपड़ों में पुलिसकर्मी तेज़ी से उस मंच के चारों ओर सफेद चादरें लगा देते हैं, जहां सोनम वांगचुक अपने अनशन के 21वें दिन बैठे थे. इन सफेद चादरों के पीछे दिल्ली पुलिस की कार्रवाई छिप गई. फिर वांगचुक को बिना सही स्ट्रेचर के एंबुलेंस में बैठाकर वहां से ले जाया गया.

शांतिपूर्ण प्रदर्शन को रोकने की इस कार्रवाई को सफेद चादरों से ढकना एक बड़ा प्रतीक था. यह सोमवार सुबह प्रदर्शन स्थल पर पहुंचे युवा छात्रों के लिए एक चेतावनी होनी चाहिए थी कि आगे हिंसा हो सकती है. वांगचुक पिछले तीन हफ्तों से अनशन पर हैं. वह सीजेपी के आंदोलन में शामिल हुए हैं. उनकी मांग है कि कई प्रवेश परीक्षा पेपर लीक और सीबीएसई रिजल्ट विवादों को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें.

दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश पर पुलिस ने वांगचुक को सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया. वहां पहले डॉक्टरों ने उनकी पत्नी गीतांजलि अंगमो को मेडिकल रिपोर्ट देने से मना कर दिया. बाद में उन्हें फोन के साथ अपने पति से मिलने की भी अनुमति नहीं दी गई. वांगचुक के अपने डॉक्टरों को भी उनसे मिलने नहीं दिया गया, जबकि वही डॉक्टर पिछले कुछ दिनों से उन्हें पूरी तरह स्वस्थ बता रहे थे.

शनिवार सुबह तक, जब 20 जुलाई को संसद मार्च की तैयारी तेज़ हो गई, तब वांगचुक का शरीर खुद एक आपात स्थिति का प्रतीक बन गया. सोमवार को जब हज़ारों लोग सड़कों पर उतर आए, तब उनका शरीर उसी सरकार के इलाज से ज़िंदा रखा जा रहा था, जिस पर वह सवाल उठा रहे हैं और जवाबदेही मांग रहे हैं. उस समय तक प्रदर्शनकारियों को सरकार की ओर से सिर्फ यही एक प्रतिक्रिया देखने को मिली थी. पहली प्रतिक्रिया यह थी कि उन्हें “विदेशी ताकतों” से जुड़ा बताया गया और देश की प्रगति में रुकावट कहा गया. खुद धर्मेंद्र प्रधान ने सीजेपी को “अराजक तत्वों की बी टीम” बताया और कहा कि वे “देश को बांटने वालों” के लिए नारे लगाते हैं, लेकिन अगर कुछ हुआ है, तो वह यह कि प्रदर्शनकारियों से बात करने और इस्तीफा देने से इनकार ने पूरे देश को एकजुट कर दिया है.

600 किलोमीटर दक्षिण में

वांगचुक को हटाए जाने के बाद से दो दिनों में जंतर-मंतर पर भीड़ और बढ़ गई है. छात्रों के साथ अब पूर्व सैनिक, रिटायर स्कूल शिक्षक और वे माता-पिता भी जुड़ गए हैं, जिनके बच्चों ने नीट पेपर लीक के बाद आत्महत्या कर ली थी. सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने भी वांगचुक को पुलिस द्वारा हटाए जाने के बाद अनशन शुरू किया, लेकिन उन्होंने सोमवार को अपना अनशन खत्म कर दिया. देश के कई दूसरे शहरों में भी एकजुटता दिखाने के लिए सांकेतिक अनशन शुरू हो गए हैं.

कल सुबह, मानसून सत्र के पहले दिन, जब प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर से संसद तक पैदल जाने निकले, तो दिल्ली पुलिस ने BNSS की धारा 163 लागू कर दी. प्रदर्शन स्थल के पास के मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए गए और इस मार्च को “बिना अनुमति का जुलूस” बताया गया. निहत्थे प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए दिल्ली पुलिस ने 2,000 से ज्यादा जवान तैनात किए. स्टील की बैरिकेडिंग लगाई गई, वाटर कैनन और आंसू गैस वाले वाहन लगाए गए.

दिनभर प्रदर्शन की जो वीडियो सामने आए, उनमें हमने देखा कि इन सभी साधनों का इस्तेमाल भारत के बच्चों पर किया गया. युवा लड़के-लड़कियों पर आंसू गैस छोड़ी गई, लाठियों से उनके सिर फोड़ दिए गए, भगदड़ में उनकी चप्पलें पीछे छूट गईं. वे चिल्ला रहे थे और हैरान थे कि सिर्फ परीक्षा सही तरीके से कराने की मांग करने पर उनके अपने देश ने उनके साथ ऐसा व्यवहार किया. भारत की एक नई पीढ़ी अब समझ रही है कि जब सरकार जवाब देती है, तो कई बार उसका तरीका यही होता है.

जंतर-मंतर से वांगचुक को हटाने के अगले ही दिन सरकार ने 600 किलोमीटर दक्षिण में भी ऐसा ही किया. जुलाई की शुरुआत से, केन-बेतवा लिंक परियोजना के दौधन जलाशय में डूबने वाले गांवों के आदिवासी परिवार छतरपुर में बराना नदी के किनारे धरने पर बैठे थे.

प्रदर्शनकारियों ने चिता सत्याग्रह शुरू किया था. वे नदी में चिताओं पर लेट गए थे. उन्होंने अपने गले में फंदे भी डाल रखे थे, जैसे अपनी ही मौत का प्रदर्शन कर रहे हों. यह प्रदर्शन तब शुरू हुआ जब उनके जल सत्याग्रह—जिसमें लोग नदी में ठुड्डी तक पानी में खड़े रहे, पर किसी ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया.

19 जुलाई को पुलिस और प्रशासन ने नदी का जलस्तर बढ़ने का कारण बताते हुए अचानक प्रदर्शनकारियों को वहां से हटा दिया. साथ ही उनके नेता अमित भटनागर को भी हिरासत में ले लिया, जो पिछले दो हफ्तों से अनशन पर थे. आप चाहें तो इसे सरकार की प्रतिक्रिया कह सकते हैं, लेकिन सरकार बातचीत या समझौते के लिए आगे आती नहीं दिख रही.

जब कोई नागरिक किसी परियोजना के सामने लेट जाता है या देश की राजधानी में बैठकर खाना छोड़ देता है, तब सरकार का पूरा तंत्र हरकत में आ जाता है. प्रदर्शनकारियों की “सेहत” की चिंता दिखाते हुए डॉक्टर और एंबुलेंस पहुंच जाते हैं, अदालतों को मामला देखना पड़ता है और कुछ लोग चिंता भी जताते हैं, लेकिन इस पूरे तंत्र का वह हिस्सा नहीं चलता, जो वास्तव में प्रदर्शन खत्म कर सकता है.

क्योंकि अगर एक भूखे प्रदर्शनकारी की मांग मान ली गई, तो यह बाकी लोगों के लिए भी एक उदाहरण बन जाएगा. अगर दबाव में आकर एक बार भी जवाबदेही तय होती है, तो यह सरकार की रियायत मानी जाएगी. इसका मतलब होगा कि लोकतांत्रिक तरीके से किया गया विरोध असर करता है. फिर सरकार को आगे होने वाले हर आंदोलन और सत्याग्रह में भी यही करना पड़ेगा. ऐसी मिसाल कोई भी सरकार नहीं बनाना चाहती—खासकर वह सरकार, जिसने साफ कहा है कि वह “त्यागपत्र” देने में विश्वास नहीं रखती.

लेकिन सरकार के पास इतना समय और ताकत है कि वह एक आम नागरिक की हर चीज़ से ज्यादा देर तक टिक सकती है—यहां तक कि उसकी ज़िंदगी से भी.

एक जानी-पहचानी कहानी

यह सब सिर्फ इस सरकार से शुरू नहीं हुआ और न ही इसके साथ खत्म होगा. मणिपुर की इरोम शर्मिला ने नवंबर 2000 में मालोम नरसंहार के कुछ दिनों बाद खाना छोड़ दिया था. उनकी मांग थी कि सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम (AFSPA) को हटाया जाए. इसके बाद उन्होंने 16 साल तक खाना नहीं खाया. इन 16 सालों में ज्यादातर समय उन्हें इंफाल के एक अस्पताल के वार्ड में रखा गया. उनकी नाक में ट्यूब डालकर उनकी इच्छा के खिलाफ उन्हें खाना दिया जाता था. हर बार खाना देने के बाद उन पर IPC की धारा 309 के तहत आत्महत्या की कोशिश का मामला भी दर्ज किया जाता था.

इस दौरान केंद्र में कई सरकारें आईं और चली गईं—अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह और फिर नरेंद्र मोदी, लेकिन उनकी नाक में लगी ट्यूब नहीं हटी. 2016 में शर्मिला ने अपना अनशन खत्म कर दिया, लेकिन AFSPA आज भी लागू है. तब उन्होंने कहा था, “लोग मुझे हमेशा उसी ट्यूब के साथ देखना चाहते हैं, बिना किसी इच्छा वाली, सिर्फ विरोध के प्रतीक के रूप में, लेकिन यह मेरा चुनाव है. मुझे एक इंसान के रूप में देखे जाने का भी अधिकार है.”

तमिलनाडु के इदिन्थाकरई के मछुआरों को भी ऐसी ही चुप्पी का सामना करना पड़ा. जब 2011 में कुडनकुलम परमाणु संयंत्र के आसपास के गांवों के लोग अपने समुद्र किनारे बन रहे रिएक्टर के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने लगे, तब यूपीए सरकार ने फिर से “विदेशी हाथ” की बात कही. तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने साइंस मैगज़ीन से कहा था कि अमेरिका और स्कैंडिनेविया की कुछ एनजीओ इस आंदोलन को पैसा दे रही हैं. गृह मंत्रालय ने कई एनजीओ के बैंक खाते भी फ्रीज कर दिए. करीब 9,000 ग्रामीणों पर सिर्फ अपनी सुरक्षा की मांग करने के लिए अंग्रेज़ों के समय के देशद्रोह के मामले दर्ज कर दिए गए.

जहां लोगों पर सीधे अपराध का आरोप नहीं लगाया जा सकता, वहां सरकार इंतज़ार करने की रणनीति अपनाती है. नर्मदा बचाओ आंदोलन ने सरदार सरोवर बांध से प्रभावित लोगों को उचित मुआवजा दिलाने के लिए 30 साल तक संघर्ष किया. सरकार ने समितियां बनाईं, एक्शन टेकन रिपोर्ट पेश कीं और अलग-अलग राज्य सरकारें कभी आंदोलन के साथ खड़ी हुईं, तो कभी उसके खिलाफ. आखिरकार बांध बन गया.

1984 की भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ित—जो कांग्रेस सरकार के समय जहरीली गैस का शिकार हुए थे, ने भी कई केंद्र सरकारें बदलते देखीं. 2023 तक बेहतर मुआवजे की उनकी याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी. कई बार ऐसा भी हुआ कि जो काम सरकार नहीं करती, वह कोई दूसरी घटना कर देती है. जैसे शाहीन बाग के सीएए विरोधी प्रदर्शन को महामारी ने खत्म कर दिया.

एक अपवाद

इन सभी सरकारों में एक बात समान रही. शब्द बदल जाते हैं, लेकिन सोच वही रहती है. हर सरकार यह मानकर चलती है कि उसे कभी झुकना नहीं पड़ेगा.

लेकिन कृषि कानूनों के मामले में ऐसा नहीं हुआ. सरकार का कहना था कि ये कानून किसानों के हित में हैं, लेकिन उन्हें किसानों से ठीक से बात किए बिना संसद से पास करा दिया गया. जब 2020 की सर्दियों में किसान दिल्ली की सीमाओं पर पहुंच गए, तब सरकार ने किसान नेताओं से बातचीत शुरू की. कुल 11 दौर की बातचीत हुई और सरकार ने कुछ छोटी मांगें भी मान लीं, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला.

इसी दौरान सरकार और उसके समर्थक मीडिया ने वही अभियान चलाया, जो आज भी देखने को मिल रहा है. कहा गया कि ये असली किसान नहीं हैं, इनमें खालिस्तानी घुस आए हैं. सरकार, मंत्री और पार्टी प्रवक्ताओं ने उन्हें “टुकड़े-टुकड़े गैंग”, “अर्बन नक्सल” कहा. यह भी कहा गया कि उन्हें चीन और पाकिस्तान का समर्थन है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी—जो एक बार भी किसानों से मिलने नहीं गए, ने उन्हें “आंदोलनजीवी”, यानी आंदोलन से फायदा उठाने वाले लोग कहा.

आईटी सेल ने भी अपनी भूमिका निभाई. अमित मालवीय ने एक वीडियो शेयर किया, जिसे ट्विटर ने खुद छेड़छाड़ किया गया बताया. 2013 की एक रैली की तस्वीरों को नया बताकर अलगाववाद का सबूत बताया गया. कई क्रिकेटरों और बॉलीवुड सितारों ने भी तय समय पर #IndiaTogether और #IndiaAgainstPropaganda के साथ पोस्ट किए, लेकिन नवंबर 2021 में आखिरकार तीनों कृषि कानून वापस ले लिए गए.

यह भारत के किसानों की बड़ी जीत थी. यह जीत उन्हें दिल्ली की सीमाओं पर एक साल तक डटे रहने के बाद मिली. उन्होंने कड़ाके की सर्दी, भीषण गर्मी झेली और करीब 700 लोगों की मौत हुई. इसके बाद सरकार को पीछे हटना पड़ा.

उम्मीद है कि सीजेपी के प्रदर्शनकारियों को भी उनकी मांगें मिलेंगी, भले ही जंतर-मंतर पर हिंसा हुई हो, लेकिन इसके लिए उन्हें आंदोलन को इतना लंबा चलाना होगा कि सरकार को झुकना पड़े. उन्हें सिर्फ एक बात याद रखनी होगी. सत्ता को भरोसा रहता है कि समय के साथ भीड़ कम हो जाएगी, अनशन खत्म हो जाएगा और युवा थक जाएंगे. सरकार के पास बहुत समय है, लेकिन क्या CJP के पास भी है?

करनजीत कौर एक पत्रकार, ‘Arré’ की पूर्व संपादक और ‘TWO Design’ में पार्टनर हैं. वह @Kaju_Katri पर ट्वीट करती हैं. विचार उनके निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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