ब्रिटेन की संसद में प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर के आखिरी प्राइम मिनिस्टर्स क्वेश्चंस (PMQs) के दौरान राजनीति का एक दुर्लभ और सकारात्मक पल देखने को मिला. यह हर हफ्ते होने वाला आधे घंटे का सत्र है, जो ब्रिटेन की संसदीय व्यवस्था का अहम हिस्सा है.
विपक्ष की नेता केमी बेडेनॉक ने अपने हिस्से के छह सवाल पूछे. इस दौरान दोनों नेताओं के बीच बातचीत में हल्का मज़ाक, नरम लहज़ा और आपसी सम्मान दिखाई दिया. इससे लगा कि कई महीनों की सार्वजनिक नोकझोंक के पीछे दोनों के बीच निजी स्तर पर अच्छे संबंध भी हैं.
मीडिया ने भी इस पर काफी ध्यान दिया. द स्कॉट्समैन अखबार ने लिखा कि किएर स्टार्मर और बेडेनॉक की यह बातचीत ऐसे समय में एक सीख है, जब सोशल मीडिया का गुस्सा अब असली दुनिया में भी दिखाई देने लगा है और एक खतरनाक माहौल बना रहा है. रेडियो चैनल LBC पर मशहूर पत्रकार जेम्स ओ’ब्रायन ने भी बेडेनॉक के शालीन व्यवहार की तारीफ की. उन्होंने कहा कि “मुझे लगा कि अगर ट्विटर (अब एक्स) नहीं होता, तो शायद वह हमेशा ऐसी ही होतीं.”
यह बात मेरे मन में भी आई. क्या एक्स र दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के असर के बिना हम सभी बेहतर इंसान होते? जो लोग एक्स का इस्तेमाल करते हैं, वे जानते हैं कि यह प्लेटफॉर्म, जहां कभी बहस जैसी बातें होती थीं, अब गाली-गलौज, भीड़ बनाकर किसी पर हमला करने और अपमान करने की जगह बन गया है. मैंने ऐसे कई लोगों को देखा है, जिन्हें मैं जानता हूं और जिनका सम्मान करता हूं, लेकिन वे भी सोशल मीडिया पर अपने सबसे खराब व्यवहार का प्रदर्शन करने लगते हैं. वे मुद्दे पर जवाब देने के बजाय सीधे व्यक्ति पर हमला करते हैं और खुद ही गलत तर्क बनाकर फिर उन्हें गलत साबित करने लगते हैं.
एक बात स्वीकार करनी होगी. मैं पहले पत्रकार रहा हूं और मेरे लिए एक्स से दूर रहना आसान नहीं था, क्योंकि यह तुरंत खबरें देने वाला प्लेटफॉर्म है, लेकिन कई बार मुझे भी किसी पर गुस्सा निकालने या उसे जवाब देकर चुप कराने की इच्छा हुई. ऐसा करने की इच्छा इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि सोशल मीडिया लोगों को यह महसूस कराता है कि नफरत, बुराई और कटुता सिर्फ दूसरे लोगों में है, जबकि वे खुद भी ऑनलाइन बिना सोचे-समझे कठोर बातें कहने लगते हैं. आखिर सोशल मीडिया हमें सार्वजनिक बातचीत को इतना खराब करने के लिए क्यों उकसाता है?
इस विषय पर कई गंभीर शोध और अध्ययन किए गए हैं. कंप्यूटर वैज्ञानिक और लंबे समय तक सिलिकॉन वैली में काम कर चुके जेरॉन लैनियर ने लिखा है कि बदतमीजी सोशल मीडिया का “कच्चा तेल” है. यही वह ईंधन है, जिससे ऐसे एल्गोरिदम चलते हैं जो लोगों में गुस्सा, चिंता और छिपी हुई समूहबंदी की भावना बढ़ाते हैं. यही चीज़ लोगों को बार-बार सोशल मीडिया पर वापस आने के लिए मजबूर करती है. अगर कोई यह सोचता है कि एक्स, फेसबुक, इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म सिर्फ कुछ बुरे लोगों की वजह से खराब हुए हैं, तो वह इनके पूरे बिजनेस मॉडल को सही तरीके से नहीं समझ रहा है.
बढ़ता ध्रुवीकरण
जब हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर कैस सनस्टीन ने 2017 में अपनी मशहूर किताब #Republic: Divided Democracy in the Age of Social Media प्रकाशित की, तब यह बात पूरी तरह नहीं समझी गई थी कि सोशल मीडिया लोगों को गहराई से बांटने वाली ताकत है. यह सिर्फ समाज में मौजूद मतभेद नहीं दिखाता, बल्कि उन्हें और बढ़ाता भी है.
आज इस बात के मजबूत सबूत हैं कि समाज लगातार ज्यादा ध्रुवीकृत (बंटा हुआ) होता जा रहा है. जो लोग इसे नहीं मानते, वे सिर्फ इसलिए ऐसा सोचते हैं क्योंकि वे खुद किसी एक पक्ष में खड़े हैं. सनस्टीन ने अपनी किताब में एक उदाहरण दिया. साल 1960 में सिर्फ 5% रिपब्लिकन और 4% डेमोक्रेट लोगों ने कहा था कि अगर उनका बेटा या बेटी दूसरी राजनीतिक पार्टी के व्यक्ति से शादी करे, तो उन्हें बुरा लगेगा, लेकिन 2010 तक यह आंकड़ा बढ़कर रिपब्लिकन में 49% और डेमोक्रेट में 33% हो गया.
अमेरिका की राजनीति की गहरी जानकारी न होने पर भी यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि इसके बाद ये आंकड़े और बढ़े होंगे. साथ ही, जिन इको चेंबर और जानकारी के बंद दायरे (इन्फॉर्मेशन ककून) की बात सनस्टीन ने की थी, वे अब और बढ़ गए हैं. अब समाज सिर्फ पुराने बंटवारे—रूढ़िवादी और आधुनिक, वाम और दक्षिणपंथ, उदार और गैर-उदार—तक सीमित नहीं है.
अब हालात और ज्यादा बिखर गए हैं.
उदाहरण के लिए, अब वामपंथी, थोड़े कम वामपंथी से लड़ रहा है, उदारवादी, थोड़े कम उदारवादी से, और रूढ़िवादी, अपने जैसे ही विचार रखने वाले लेकिन थोड़ा अलग सोच वाले व्यक्ति से टकरा रहा है. इस बीच, कई नई रिसर्च बताती हैं कि ऐसे बंटवारे पैदा करने वाले एल्गोरिदम खासकर युवाओं की मानसिक सेहत पर बुरा असर डाल रहे हैं. ऑस्ट्रेलिया पहला देश बना, जिसने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगा दी.
इस महीने की शुरुआत में ऑस्ट्रेलिया दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस नीति को “बहुत प्रेरणादायक” बताया. अगर यह इस बात का संकेत है कि भारत भी जल्द ऐसा ही कानून ला सकता है, जैसा कई दूसरे देश भी सोच रहे हैं, तो इसका स्वागत किया जाएगा, लेकिन सिर्फ इतना काफी नहीं होगा. यह सही है कि सोशल मीडिया कंपनियों ने अपने एल्गोरिदम में कुछ छोटे-छोटे बदलाव किए हैं.
लेकिन जेरॉन लैनियर ने कुछ साल पहले सही कहा था कि ये बदलाव कुछ कमियां तो दूर कर सकते हैं, लेकिन बड़ी टेक कंपनियों के उस बिजनेस मॉडल को नहीं बदलेंगे, जो लोगों के व्यवहार को बदलकर मुनाफा कमाता है. इन कंपनियों पर तब तक बड़ा असर नहीं पड़ेगा, जब तक लोग उन पर दबाव नहीं बनाएंगे कि वे अपने एल्गोरिदम बदलें, कंटेंट को दिखाने और सुझाने का तरीका सुधारें और मानसिक सेहत की कीमत पर लोगों की ज्यादा भागीदारी (एंगेजमेंट) बढ़ाने की कोशिश बंद करें.
तब तक लोगों के लिए सबसे ज़रूरी बात यह है कि वे समझें कि सोशल मीडिया पर उन्हें कैसे प्रभावित किया जाता है और किस तरह मानसिक रूप से बांधे रखा जाता है. यही जागरूकता उन्हें गुस्से में हर समय बहस करने वाले लोगों और लगातार नकारात्मक खबरें देखते रहने से होने वाले मानसिक तनाव से बचा सकती है.
मुकुंद पद्मनाभन क्रिया यूनिवर्सिटी में फिलॉसफी के प्रोफेसर और ‘द हिंदू’ के पूर्व एडिटर हैं. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
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