कुछ हफ्ते पहले, मेरा एक फ्रेंड दो बीघा ज़मीन के नए तरीके से रिस्टोर किए गए एडिशन की स्क्रीनिंग देखकर लौटा. वह काफी उदास था. बिमल रॉय की 1953 की इस क्लासिक फिल्म की दर्दभरी ताकत आज भी वैसी ही है, लेकिन पिछले 70 से ज्यादा सालों में दर्शक बदल गए हैं. कुछ साल पहले तक यह फिल्म लोगों को दुखी कर देती थी, लेकिन अब इसके कुछ दृश्य लोगों के लिए हंसी का कारण बन गए हैं.
गरीबी पर बनी इस बेहद दर्दनाक फिल्म में दो ऐसे दृश्य हैं, जो सबसे ज्यादा दिल छूते हैं. पहले सीन में शंभू महतो, जिसका किरदार बलराज साहनी ने बहुत ही दर्द के साथ निभाया है, अपनी ज़मीन खोने की कगार पर पहुंच चुका है. वह काम की तलाश में एक जगह से दूसरी जगह भटकता रहता है. वह अपने भूखे छोटे बेटे के साथ कोलकाता की सड़क पर सूट पहने एक आदमी के पास जाकर कहता है, “गरीब आदमी हूं बाबूजी, कहीं काम मिलेगा?”
लेकिन वह आदमी रुककर जवाब देने की भी ज़रूरत नहीं समझता. वह उसे बेरुखी से हाथ के इशारे से भगा देता है. दूसरे सीन में शंभू हाथ से खींची जाने वाली रिक्शा चलाने लगता है. एक प्रेमी जोड़ा आपस में झगड़ रहा होता है. दोनों अलग-अलग रिक्शा किराये पर लेते हैं और शहर की सड़कों पर एक-दूसरे का पीछा करने लगते हैं. शंभू उस आदमी को कोलकाता की भीड़भाड़ वाली सड़कों पर खींचता है. सवारी उसे ज्यादा पैसे देने का लालच देकर और तेज़ दौड़ने के लिए कहती रहती है. शंभू इतनी तेज़ दौड़ता है कि एक घोड़ा गाड़ी के बराबर पहुंच जाता है और आखिर में उसे भी पीछे छोड़ देता है. उधर, वह प्रेमी जोड़ा उन रिक्शा खींचने वाले लोगों की तकलीफ से पूरी तरह बेखबर, खुलकर हंसता रहता है.
मुंबई के जिस सिनेमा हॉल में यह फिल्म दिखाई जा रही थी, वहां भी वही हंसी सुनाई दी. दर्शक भी फिल्म के उस प्रेमी जोड़े के साथ ठीक उन्हीं सीन्स पर हंस रहे थे, जिन्हें देखकर लोगों का दिल टूट जाना चाहिए था.
वही कहानी, बस वक्त बदला
कुछ हफ्तों बाद वही चीज़ फिर हुई, लेकिन इस बार फिल्म में नहीं, बल्कि असली सड़कों पर. कभी शंभू महतो के चेहरे पर दिखने वाली वही बेबसी अब उत्तर भारत के कई इलाकों में सड़क के बीच फंसे ई-रिक्शा चालकों के चेहरों पर दिखाई दी.
पिछले कुछ दिनों में इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर “टिर्री कंट्रोल” नाम का एक नया सोशल मीडिया ट्रेंड तेज़ी से फैल रहा है. इसमें कुछ युवा बाइक से ई-रिक्शा का पीछा करते हैं. वे ई-रिक्शा को अपमानजनक तरीके से “टिर्री” कहते हैं और BAT-BMS नाम के मोबाइल ऐप की मदद से चलते-चलते उसका सिस्टम बंद कर देते हैं. यह ऐप असल में तकनीशियनों के लिए बनाया गया था, ताकि वे ब्लूटूथ से चलने वाली लिथियम-आयन बैटरियों की निगरानी कर सकें.
लेकिन भारत के ज्यादातर ई-रिक्शा में इस्तेमाल होने वाली सस्ती बैटरियों में पासवर्ड सिक्योरिटी नहीं होती. इसलिए इस ऐप का इस्तेमाल करने वाला कोई भी व्यक्ति 10 से 15 मीटर की दूरी से बैटरी से जुड़ सकता है. यानी कोई भी चलते हुए ई-रिक्शा से कनेक्ट होकर उसे बीच रास्ते में बंद कर सकता है, जिससे चालक और यात्री वहीं फंस जाते हैं.
हर वीडियो को प्रैंक (मज़ाक) की तरह बनाया जाता है और गरीब ई-रिक्शा चालक की घबराहट और परेशानी को ही सबसे मजेदार हिस्सा बनाकर दिखाया जाता है. इन वीडियो के कमेंट्स में भी लोग इस हरकत की तारीफ करते हैं और इसे बढ़ावा देते हैं.
हालांकि, ई-रिक्शा भारत के शहरों और कस्बों में लोगों को लास्ट-माइल तक पहुंचाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन ये प्रैंक करने वाले लोग इसका बचाव यह कहकर करते हैं कि कुछ ई-रिक्शा चालक लापरवाही से गाड़ी चलाते हैं. कम से कम कुछ मामलों में तो यही वजह बताई जाती है, लेकिन ज्यादातर कंटेंट बनाने वाले अपने इस काम की कोई सफाई देने की ज़रूरत भी नहीं समझते. उनके लिए ई-रिक्शा चालकों की परेशानी ही काफी है.
कई चालकों को यह पता ही नहीं चला कि उनके ई-रिक्शा को दूर से ऐप के जरिए बंद किया गया था. उन्हें लगा कि गाड़ी खराब हो गई है, इसलिए उन्होंने उसे दोबारा चालू कराने के लिए मैकेनिक को पैसे भी दिए. लगभग सभी चालकों की उस दिन की कमाई भी चली गई. ऐसे ही एक वीडियो, जिसे कई हज़ार लोग देख चुके हैं, में अमान सिद्दीकी नाम का एक इन्फ्लुएंसर एक ऐसे ई-रिक्शा चालक से मिलता है, जो पूरे दिन सड़क पर फंसा रहा. उसके पास ई-रिक्शा का रोज़ का किराया चुकाने तक के पैसे नहीं बचे थे. सिद्दीकी ने उसी ऐप की मदद से उसका ई-रिक्शा दोबारा चालू किया. तब चालक ने बताया कि इस वजह से उसकी पूरे दिन की कमाई चली गई.
रिक्रिएशनल क्रूएलिटी
इस तरह की हरकत के लिए एक शब्द है, जो वन्यजीव संरक्षण की दुनिया से लिया गया है. इसे “रिक्रिएशनल क्रूएलिटी” कहा जाता है. इसका मतलब है किसी जानवर का सिर्फ उसकी तकलीफ देखकर मज़ा लेने के लिए शिकार करना, उसे फंसाना या पकड़ना. “टिर्री” वाले वीडियो इसका सबसे सीधा और सबसे खतरनाक उदाहरण हैं, लेकिन यही सोच कामकाजी और गरीब लोगों को रोजमर्रा में बेइज्जत करने के पीछे भी काम करती है.
आज की ऐप-बिस्ड फैसिलिटी ने लोगों के बीच दूरी पैदा कर दी है. जब हर काम ऐप या वेबसाइट के जरिए होने लगे, डिलीवरी फीस और दूसरी ऑनलाइन सर्विस के बीच सब कुछ सिर्फ स्क्रीन तक सीमित रह जाए, तो दूसरी तरफ मौजूद इंसान के बारे में ज्यादा सोचने की ज़रूरत ही महसूस नहीं होती.
ऐप ने इंसान की जगह ले ली और इंसान सिर्फ एक ईटीए (Expected Time of Arrival) यानी आने का अनुमानित समय बनकर रह गया. इसका नतीजा यह हुआ कि हममें से कई लोग कामकाजी वर्ग के लोगों को इंसान की तरह देखना भी छोड़ चुके हैं, लेकिन उन्हें कंटेंट की तरह जरूर देखने लगे हैं.
कुछ साल पहले तक सोशल मीडिया पर लोग ऐसे वीडियो बनाते थे, जिनमें वे गरीब पुरुषों, महिलाओं और बच्चों के पास जाकर उन्हें पैसे देते थे. वे ठेले या रेहड़ी लगाने वालों के लिए यूपीआई आईडी बनवाते थे और अपने फॉलोअर्स से कहते थे कि वे उन दुकानदारों से सामान खरीदें, जिनका बिल्कुल कारोबार नहीं हो रहा था.
इस तरह के वीडियो इतने ज्यादा बनने लगे कि बाद में इनके हज़ारों पैरोडी वीडियो भी आने लगे. इन पैरोडी में उन क्रिएटर्स की आलोचना की जाती थी, जो दूसरों की मदद दिखाकर खुद तारीफ बटोरना चाहते थे, लेकिन इंटरनेट पर बढ़ती जहरीली और उकसाने वाली संस्कृति के कारण अब यह सोच और भी ज्यादा खराब हो गई है.
आज किसी बेबस इंसान का मजाक उड़ाना, उसके काम में बाधा डालना और उसकी रोजी-रोटी पर हमला करना ही लोगों के लिए नया और अलग तरह का मनोरंजन बन गया है. ऊपर से इसे “सिर्फ मजाक” कहकर पेश किया जाता है, ताकि पीड़ित की तकलीफ को छोटा दिखाया जा सके. बेशक, ऐसे लोग हमेशा उन्हीं को निशाना बनाते हैं, जो सामाजिक हैसियत में उनसे नीचे माने जाते हैं. उदाहरण के लिए, वे कभी किसी थार चलाने वाले के साथ ऐसा करने की हिम्मत नहीं करेंगे.
समाज में गहराई तक बसी हुई सोच
पिछले साल पटना में एक महिला ने अपने पुराने स्कूल के एक सहपाठी का वीडियो बनाया, जो पिज्जा डिलीवर करने का काम कर रहा था. उसने वीडियो में उसका मज़ाक उड़ाया और कहा कि वह यह वीडियो अपने पूरे स्कूल बैच को भेजेगी.
जब इस पर लोगों ने कड़ी आलोचना की, तो महिला ने बाद में कहा कि यह “स्क्रिप्टेड कंटेंट” था. सोशल मीडिया पर जब किसी क्रिएटर की क्रूएलिटी गलत वजह से वायरल हो जाती है, तो अक्सर यही सफाई दी जाती है. उस दिन उसके सहपाठी की शर्मिंदगी सच में थी या सिर्फ अभिनय था, इससे उस वीडियो के असर पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा.
अभिनेत्री दिया मिर्ज़ा और ई-रिक्शा का पीछा करके वीडियो बनाने वाले सोशल मीडिया क्रिएटर्स में शायद कोई समानता न दिखे, लेकिन दोनों में एक बात समान है—समाज में मौजूद वर्गभेद (क्लास हायरार्की) की अनकही समझ. पिछले हफ्ते दिया मिर्ज़ा एक पॉडकास्ट में अपने प्लास्टिक-फ्री घर की तारीफ कर रही थीं. उन्होंने बताया कि उनके पांच साल के बेटे ने घर पर नारियल पानी बेचने वाले एक दुकानदार को डांट दिया था. नाराज़ बच्चे ने उस गरीब दुकानदार से कहा था कि वह अपना प्लास्टिक का बैग वापस ले जाए.
उसी पॉडकास्ट में मौजूद सोहा अली खान ने बच्चे की इस हरकत को “बड़ों के सामने डटकर बोलने की हिम्मत” बताया, लेकिन दोनों में से किसी ने भी इस बात पर विचार नहीं किया कि आखिर किस सामाजिक स्थिति ने एक संपन्न परिवार के बच्चे को एक गरीब वयस्क से इस तरह बात करने का आत्मविश्वास दिया.
समाजशास्त्री अमिता बाविस्कर ने इस तरह के दिखावटी पर्यावरण प्रेम के लिए “बुर्जुआ पर्यावरणवाद (Bourgeois Environmentalism)” शब्द दिया था.
अमिता बाविस्कर ने लिखा था कि ऐसे लोगों की सोच होती है कि “उत्पादन से जुड़ी बदसूरती को शहर से हटा देना चाहिए.”
यानी धुआं छोड़ने वाले उद्योग, गंदा पानी छोड़ने वाली फैक्ट्रियां और वे सभी जगहें, जहां लाखों लोग काम करते हैं लेकिन जो देखने में अच्छी नहीं लगतीं, उन्हें शहर से दूर किसी गांव या सुनसान जगह पर भेज देना चाहिए, ताकि अमीर लोगों की नजर उन पर न पड़े.
यही सोच उन करोड़ों मेहनतकश लोगों के साथ भी दिखाई देती है.
उन्होंने लिखा, “घरेलू कामगार, रेहड़ी-पटरी वाले और दूसरे सेवा देने वाले लोग, जिनकी सेवाओं के बिना अमीर लोगों की आरामदायक जिंदगी चल ही नहीं सकती, उन्हें भी ऐसी जगह रहना चाहिए, जहां उनके घर अमीर लोगों की आंखों, कानों और नाक को परेशान न करें.”
मनोरंजन के लिए की जाने वाली इस तरह की क्रूरता शायद सबसे साफ तरीके से RWA (रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन) और ऊंची इमारतों वाली हाउसिंग सोसायटियों के मनमाने नियमों में दिखाई देती है. इनके नियमों में डिलीवरी करने वाले कर्मचारियों को लिफ्ट जैसी सुविधाओं का इस्तेमाल करने से रोकना या घरेलू कामगारों (मेड) और आया (नैनी) को लंच के समय पार्क जैसी खुली जगहों पर बैठने या इकट्ठा होने से मना करना शामिल है. गुरुग्राम की एक हाउसिंग सोसायटी में दो घरेलू कामगारों—काजल और मंजू पर इसलिए 100-100 रुपये का जुर्माना लगाया गया, क्योंकि उन्होंने सर्विस लिफ्ट की जगह मुख्य लिफ्ट का इस्तेमाल किया था. फिर सवाल उनकी तनख्वाह का भी आता है.
अभिनेत्री कीर्ति कुल्हाड़ी, जिन्होंने कई फिल्मों में पारंपरिक सोच से अलग महिला किरदार निभाए हैं, ने कुछ महीने पहले एक इंटरव्यू में कहा था कि उन्हें यारी रोड स्थित अपने नए घर के लिए घरेलू मदद नहीं मिल रही थी. उनके मुताबिक, एक रसोइया और घरेलू काम करने वाली महिला ने रोज दो घंटे काम करने के बदले महीने के 10,000 रुपये मांगे थे.
कीर्ति कुल्हाड़ी को यह रकम बहुत ज्यादा लगी. उन्होंने यह भी कहा कि शायद उस महिला ने यह कीमत इसलिए बताई क्योंकि उन्हें पता था कि उनका संभावित एम्पलॉयर कौन है. लेकिन शायद अभिनेत्री के मन में यह बात नहीं आई कि वही घरेलू कामगार उनके रोज के दो घंटे बचा देती, जिनकी कीमत खुद कीर्ति कुल्हाड़ी के लिए कहीं ज्यादा होती, लेकिन शायद इन बातों पर रुककर सोचना हम खुद से बहुत ज्यादा उम्मीद कर रहे हैं.
आखिर हंसना कहीं ज्यादा आसान है, खासकर तब, जब मजाक का निशाना आप खुद न हों.
करनजीत कौर एक पत्रकार, ‘Arré’ की पूर्व संपादक और ‘TWO Design’ में पार्टनर हैं. वह @Kaju_Katri पर ट्वीट करती हैं. विचार उनके निजी हैं.
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