सुप्रीम कोर्ट ने इस महीने की शुरुआत में एक शादी को खत्म कर दिया, जो पिछले 15 साल पहले ही टूट चुकी थी. तलाक के लिए कोर्ट को पहले इसे “एक मृत संबंध, जो पहले ही सड़ चुका है और हर दिन और खराब हो रहा है, जिससे जीवन में सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और मानसिक खालीपन पैदा हो रहा है” कहना पड़ा. तभी जाकर उस अलग हो रहे कपल को संबंध तोड़ने की अनुमति मिली.
अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लंबी चली यह प्रक्रिया “एक स्वतंत्र और मुक्त वातावरण से वंचित करने” जैसी है और कोर्ट को “पार्टियों को एक पुरानी और अटकी हुई शादी से मुक्त करना चाहिए.” इस फैसले में राकेश रमन बनाम कविता 2023 के एक और मामले का हवाला दिया गया और कहा गया कि “क्रूरता, एक दोष के रूप में, केवल एक पक्ष पर नहीं डाली जा सकती और इसलिए भले ही शादी पूरी तरह टूट चुकी हो, फिर भी लोगों को साथ रखना दोनों तरफ क्रूरता के बराबर है.”
लेकिन ज्यादातर भारतीयों के पास सुप्रीम कोर्ट जाकर अपने तलाक के मामलों को सुलझाने का न तो साधन होता है और न ही मौका. उन्हें इसकी जरूरत भी नहीं होनी चाहिए.
हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 13B आपसी सहमति से तलाक की अनुमति देती है. एक बार जब दोनों पति पत्नी सहमति दे देते हैं, तो कोर्ट 6 महीने की “कूलिंग ऑफ पीरियड” देता है, और उसके बाद ही शादी खत्म मानी जाती है. लेकिन कानून की दूसरी व्यवस्था सिर्फ दोष आधारित या विवादित तलाक देती है, जिसमें याचिकाकर्ता को यह साबित करना होता है कि दूसरे पक्ष ने कोई गलती की है, जैसे क्रूरता, छोड़ देना, व्यभिचार, मानसिक बीमारी, या किसी दूसरे धर्म में परिवर्तन.
पुराने पड़ चुके भारतीय कानून
इंडियन एक्सप्रेस के इस संपादकीय के अनुसार, “जहां सहमति नहीं होती, वहां पक्षों को या तो साबित करना पड़ता है या लगभग गढ़ना पड़ता है कि कोई वैवाहिक गलती हुई है. इस प्रक्रिया में सामान्य मतभेद आपराधिक रूप ले लेते हैं और जो रिश्ते बस काम नहीं कर रहे होते, उन्हें दोष की लड़ाई में बदल दिया जाता है.”
ज्यादातर लोकतांत्रिक देशों ने पहले ही “अनसुलझे और काम न करने वाले रिश्तों” की हकीकत को स्वीकार कर लिया है. UK ने कई साल की कानूनी मांगों के बाद 2020 में नो फॉल्ट डिवोर्स लागू किया, जो दो साल बाद लागू हुआ. ऑस्ट्रेलिया ने यह 1975 में किया. 2010 में न्यूयॉर्क अमेरिका का आखिरी राज्य बना जिसने नो फॉल्ट डिवोर्स लागू किया, जिससे 1970 में कैलिफोर्निया में शुरू हुई 40 साल पुरानी प्रक्रिया खत्म हुई.
एक शादी जो खत्म हो चुकी है उसे सम्मानजनक तरीके से खत्म होना चाहिए, न कि यह लड़ाई कि उसे किसने खत्म किया. भारत इस बात को लगभग स्वीकार करने के करीब पहुंच चुका है, लेकिन हमारे कानून अभी पीछे हैं.
इसके बजाय कानून में ऐसी प्रक्रिया है जो इसके उलट दिशा में जाती है. हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 9 किसी पति या पत्नी को वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए याचिका दाखिल करने की अनुमति देती है, जब दूसरा साथी बिना उचित कारण के साथ छोड़ देता है. हालांकि कागज पर यह नियम जेंडर न्यूट्रल है, लेकिन इसकी उत्पत्ति और उपयोग ऐसा नहीं है.
भारत ने यह प्रावधान ब्रिटिश चर्च कोर्ट्स से लिया था, जहां पत्नी को पति की संपत्ति माना जाता था. नो फॉल्ट डिवोर्स से कम से कम 50 साल पहले इंग्लैंड ने वैवाहिक अधिकारों की बहाली को खत्म कर दिया था, लेकिन भारत में यह अभी भी मौजूद है.
1983 में आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने टी सरीथा बनाम टी वेंकट सुब्बैया मामले में धारा 9 को असंवैधानिक माना था, जहां एक युवा अभिनेत्री को घर लौटने के लिए मजबूर किया जा रहा था. फैसले में कहा गया कि यह महिला को उसके उस अधिकार से वंचित करता है कि वह तय करे कि कब और कैसे उसका शरीर मातृत्व के लिए उपयोग होगा.
लेकिन यह विस्तृत मानवाधिकार दृष्टि ज्यादा समय तक नहीं टिक सकी. अगले साल दिल्ली हाई कोर्ट ने इस तर्क को पलट दिया और सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य मामले में दिल्ली के पक्ष में फैसला दिया. तब से हिंदू मैरिज एक्ट और स्पेशल मैरिज एक्ट की धारा 9 और 22 लागू हैं, हालांकि 2024 में गुजरात नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के छात्रों ने इस प्रावधान को चुनौती देते हुए PIL दाखिल की है.
‘धारा 9 का इस्तेमाल तलाक से पहले का एक कदम’
दिल्ली की वरिष्ठ वकील अनिंदिता पुजारी इस प्रावधान को पूरी तरह गलत नहीं मानतीं.
उन्होंने कहा, “धारा 9 खुद में उत्पीड़न का साधन नहीं है. यह किसी व्यक्ति को किसी हिंसक घर में लौटने के लिए मजबूर नहीं करती.”
लेकिन उनकी चिंता यह है कि इसका उपयोग अब कैसे हो रहा है.
उन्होंने कहा, “हर दिन इसका इस्तेमाल तलाक से पहले एक कदम के रूप में किया जाता है. याचिका दाखिल करने वाला पक्ष अक्सर इसे प्रक्रिया को टालने, दूसरे मामलों में रणनीतिक फायदा लेने या उस शादी की औपचारिकता बनाए रखने के लिए इस्तेमाल करता है जो वास्तव में खत्म हो चुकी है.”
उन्होंने कहा, “पति अक्सर इसे उन सामाजिक उम्मीदों के आधार पर इस्तेमाल करते हैं जो शादी से जुड़ी होती हैं, खासकर तब जब महिलाएं घर छोड़ चुकी होती हैं, चाहे कारण असहमति हो, उपेक्षा हो या हिंसा. उन्हें इस तरह दिखाया जाता है जैसे उन्होंने शादी को निभाने में असफलता दिखाई हो.” वहीं दूसरी तरफ, महिलाएं भी अक्सर इसे इसलिए इस्तेमाल करती हैं ताकि उन्हें यह न लगे कि उन्होंने पहली बार शादी तोड़ी है और उन्हें सामाजिक आलोचना का सामना न करना पड़े.
जो भी धारा 9 का इस्तेमाल करता है, फायदा संस्था को ही होता है.
पुजारी ने एक हालिया मामला बताया जहां पति ने वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए याचिका दायर की थी. पत्नी एक विशेष जरूरतों वाले बच्चे की अकेले देखभाल कर रही थी और उसके पास सुनवाई के लिए आने जाने का खर्च भी मुश्किल से था. जिस प्रावधान का उद्देश्य पति-पत्नी को फिर से साथ लाना था, वही तलाक से पहले का एक कदम बन गया.
उन्होंने कहा, “कपल समझ जाते हैं कि वे साथ नहीं रह सकते, लेकिन कानूनी प्रक्रिया में उन्हें लड़ना पड़ता है. यह एक बड़ी दुविधा है.”
यह दुविधा और बढ़ जाती है क्योंकि अलग हो चुके जोड़ों के पास सम्मानजनक तरीके से अलग होने का कोई रास्ता नहीं है, हालांकि इसकी मांग लंबे समय से होती रही है. 1978 में ही, लॉ कमीशन ऑफ़ इंडिया ने सिफारिश की थी कि शादी का ऐसा टूटना जिसे ठीक न किया जा सके, उसे तलाक के आधार के तौर पर जोड़ा जाना चाहिए.
दिल्ली में वकालत करने वाली वकील गायत्री दहिया भी इस पैटर्न को अपनी प्रैक्टिस में देखती हैं.
उन्होंने कहा, “ऐसी शादियां होती हैं जहां साफ दिखता है कि रिश्ता पूरी तरह टूट चुका है. लेकिन कानून कपल को पूरी प्रक्रिया से गुजरने पर मजबूर करता है.”
2006 में नवीन कोहली बनाम नीलू कोहली मामले में सुप्रीम कोर्ट ने संसद से कहा था कि “जब शादी पूरी तरह टूट चुकी हो, तो कानून के लिए इस तथ्य को न मानना अवास्तविक होगा.” पिछले 48 वर्षों में विवाह कानून संशोधन विधेयक दो बार 2010 और 2013 में पेश हुआ, लेकिन दोनों बार यह समाप्त हो गया.
साधारण रिश्ते से आगे
कानून में यह कमी अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूरी की जाती है. संविधान का अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को “पूर्ण न्याय” के लिए कोई भी आदेश देने की शक्ति देता है. इस अनुच्छेद का अक्सर शादियों को खत्म करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें वह शादी भी शामिल है जिसे कोर्ट ने “सड़ती हुई” कहा था, भले ही कोर्ट ने खुद इस रास्ते की सीमाओं को भी स्वीकार किया हो. अनुच्छेद 142 अपने आप में तलाक का कोई अधिकार नहीं देता, और हिंदू मैरिज एक्ट के तहत शादी को अभी भी “पवित्र संबंध” माना जाता है, जिसे केवल देश की सबसे बड़ी अदालत ही पूरी तरह टूटे हुए रूप में घोषित कर सकती है.
इसका मतलब यह है कि भारत का सुप्रीम कोर्ट अपने विशेष संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए, उन कपल्स के लिए लगभग एकमात्र रास्ता बन जाता है जिनकी शादी खत्म हो चुकी है लेकिन उसे दोष के आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता, और जहां एक पक्ष सहमति नहीं देता. यह लगभग एक दया याचिका जैसा बन जाता है, जहां लोगों को यह साबित करना पड़ता है कि उनका दुख अदालत के लिए पर्याप्त है.
लेकिन यह विवेकाधिकार उल्टा भी काम करता है. निर्मल सिंह पनेसर बनाम परमजीत कौर पनेसर 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने 89 वर्षीय पति की याचिका पर शादी खत्म करने से इनकार कर दिया. हालांकि दोनों कई दशकों से अलग रह रहे थे, पत्नी 82 साल की थी और उसने कहा कि वह तलाकशुदा होने के “कलंक” के साथ मरना नहीं चाहती. कोर्ट ने कहा कि शादी “पवित्र, आध्यात्मिक और एक अमूल्य भावनात्मक जीवन-सहारा” है.
आखिर में संस्था को बचाने की सोच व्यक्तियों से ऊपर रखी गई.
इस साल मई में सुप्रीम कोर्ट ने एक निचली अदालत के फैसले को पलट दिया, जिसमें एक महिला डेंटिस्ट को अपने आर्मी ऑफिसर पति के प्रति “क्रूर” कहा गया था क्योंकि वह अपने पेशे को जारी रखते हुए उससे अलग रह रही थी. महिला को सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ा ताकि उस रिकॉर्ड को हटाया जा सके. बेंच ने निचली अदालत की सोच को “पुरानी, सामंती सोच” कहा.
लेकिन हमेशा समस्या निचली अदालतों की नहीं होती. कभी-कभी कानून ही समस्या होता है. दिल्ली की वकील गायत्री दहिया ने कहा, “कोई भी अदालत, निचली हो या ऊंची, सिर्फ वही कानून लागू कर सकती है जो मौजूद है.”
2011 में जब विवाह कानून संशोधन विधेयक पर विचार हुआ, तो इसका विरोध राजनीतिक स्पेक्ट्रम के दोनों तरफ से हुआ. CPI(M) की वृंदा करात ने कहा कि यह संशोधन असमान रिश्तों में महिलाओं के खिलाफ गलत इस्तेमाल हो सकता है. वहीं BJP के अरुण जेटली ने कहा कि यह संशोधन उन देशों में काम करता है जहां मजबूत सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था है. दोनों ने कहा कि बिल तभी पास होना चाहिए जब पहले एक सुरक्षा जाल बनाया जाए जो उस महिला को सहारा दे सके जो शादी छोड़ना चाहती है. यहां तक कि दहिया जैसी वकील, जो व्यक्तिगत रूप से irretrievable breakdown (ऐसा बिखराव जिसे ठीक न किया जा सके) को मान्यता देने के पक्ष में हैं, भी मानती हैं कि सुधार बिना सुरक्षा व्यवस्था के लागू नहीं किया जा सकता.
क्योंकि भारत में शादी सिर्फ एक साधारण रिश्ता नहीं है. कई भारतीय महिलाओं के लिए यह घर, आय, सामाजिक सुरक्षा और कानूनी पहचान भी है. इसके बाहर राज्य बहुत कम सहारा देता है. दहिया ने कहा, “भारतीय राज्य शादी को एक जरूरी पूंजीवादी पितृसत्तात्मक इकाई के रूप में देखता है, जिसे वह हर कीमत पर बनाए रखता है. परिवार इकाई को बनाए रखना है, उत्तराधिकार की लाइन को बनाए रखना है, और श्रम बल को बनाए रखना है.”
शादी के टूटने को कानूनी रूप से मान्यता देने के लिए पहले राज्य को यह स्वीकार करना होगा कि उससे निकलने के परिणामों की जिम्मेदारी सिर्फ शादी पर नहीं डाली जा सकती. तब तक भारतीय जोड़े सुप्रीम कोर्ट की दया पर निर्भर हैं.
करणजीत कौर एक पत्रकार, ‘Arré’ की पूर्व एडिटर और ‘TWO Design’ में पार्टनर हैं. वह @Kaju_Katri पर ट्वीट करती हैं. निजी विचार हैं.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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