राजनीतिक बदलाव के साथ होर्डिंग और पोस्टर भी बदल जाते हैं. इसलिए यह स्वाभाविक है कि अब पश्चिम बंगाल में सार्वजनिक जगहों पर शुभेंदु अधिकारी के पोस्टर और होर्डिंग दिखाई दें, लेकिन इस बार एक और बदलाव हो रहा है, जिसका रणनीतिक महत्व कहीं ज्यादा बड़ा है—सिलीगुड़ी कॉरिडोर को मजबूत करना और सीमा सड़कों तथा बाड़बंदी के लिए ज़मीन अधिग्रहण को सर्वोच्च प्राथमिकता देना.
इस लेख में हम उन कदमों पर नजर डालेंगे जो 60 किलोमीटर लंबे और 22 किलोमीटर चौड़े सिलीगुड़ी कॉरिडोर को मजबूत करने के लिए उठाए जा रहे हैं. यही वह संकरा रास्ता है जो भारत के सातों पूर्वोत्तर राज्यों को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता है. आम बोलचाल में इसे ‘चिकन नेक’ (मुर्गी की गर्दन) कहा जाता है और यह हमेशा से रणनीतिक चुनौती रहा है.
दक्षिण और पश्चिम में बांग्लादेश तथा उत्तर में तिब्बत (चीन) के बीच स्थित सिलीगुड़ी कॉरिडोर भारत को नेपाल, बांग्लादेश और भूटान से भी जोड़ता है. साथ ही यह चुम्बी घाटी तक पहुंच का मार्ग भी है, जो भारत (सिक्किम), चीन (तिब्बत) और भूटान के त्रि-जंक्शन पर स्थित बेहद महत्वपूर्ण और विवादित क्षेत्र है. इस कॉरिडोर की सीमाएं नेपाल, भूटान और बांग्लादेश से लगती हैं और यह चुम्बी घाटी से केवल 130 किलोमीटर दूर है.

हाईवे, हाई-स्पीड रेल और असम तक अंडरग्राउंड रेल लिंक
पिछले कुछ हफ्तों में इस कॉरिडोर से जुड़े तीन महत्वपूर्ण फैसले लिए गए हैं.
पिछले महीने पश्चिम बंगाल सरकार ने राष्ट्रीय राजमार्गों के सात हिस्सों को भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) और नेशनल हाईवेज एंड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड (NHIDCL) को सौंपने के लिए सैद्धांतिक मंजूरी दे दी. इससे राज्य के प्रमुख सड़क मार्गों पर लंबे समय से लंबित बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का रास्ता साफ हो गया. ये सड़कें पहले राज्य के लोक निर्माण विभाग (PWD) के राष्ट्रीय राजमार्ग विंग के अधीन थीं. सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के बार-बार अनुरोध के बावजूद इनके हस्तांतरण का प्रस्ताव लगभग एक साल से लंबित था.
इनमें 329.6 किलोमीटर लंबा NH-312 शामिल है, जो जंगीपुर, उमरपुर, कृष्णानगर, बोंगांव और बसीरहाट को भारत-बांग्लादेश सीमा पर स्थित घोजाडांगा तक जोड़ता है. इसके अलावा बिहार-पश्चिम बंगाल सीमा से गाजोल तक एनएच-31 और फरक्का तक एनएच-33 भी शामिल हैं.
चार अन्य हिस्से, जिनमें सेवोक आर्मी कैंटोनमेंट–कोरोनेशन ब्रिज–कालिम्पोंग–पश्चिम बंगाल-सिक्किम सीमा मार्ग (नए एनएच-10 के तहत) शामिल है, NHIDCL को सौंप दिए गए हैं. इसके अलावा हासीमारा-जयगांव मार्ग (भारत-भूटान सीमा तक), बराडीघी-मयनागुड़ी-चांगराबांधा मार्ग (बांग्लादेश सीमा तक) और सिलीगुड़ी-कुर्सियांग-दार्जिलिंग हिल रोड भी अब सीधे केंद्र सरकार की निगरानी में हैं. पश्चिम बंगाल सरकार की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, इन सात मार्गों पर बुनियादी ढांचा विकास से सिक्किम, भूटान और बांग्लादेश के साथ संपर्क मजबूत होगा और उत्तर बंगाल तथा डुआर्स क्षेत्र की कनेक्टिविटी भी बेहतर होगी.
इस बीच, रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने नई दिल्ली और न्यू जलपाईगुड़ी (सिलीगुड़ी) के बीच बुलेट ट्रेन चलाने की घोषणा भी की है. इससे यात्रा का समय 20 घंटे से घटकर लगभग 6 घंटे रह जाएगा. यानी यात्रा समय में दो-तिहाई से अधिक की कमी आएगी और भौतिक दूरी के साथ-साथ मानसिक दूरी भी कम होगी.
मंत्री ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ‘चिकन नेक’ क्षेत्र में अंडरग्राउंड रेल लिंक के काम को भी तेज करने का आश्वासन दिया है. यह रेल लाइन उत्तर दिनाजपुर जिले के टिनमाइल हाट से रंगापानी और फिर बागडोगरा तक जाएगी. यह प्रस्तावित परियोजना पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे (Northeast Frontier Railway) के कटिहार मंडल के अंतर्गत आती है. इसका दायरा पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग और उत्तर दिनाजपुर जिलों तथा बिहार के किशनगंज जिले तक फैला हुआ है. इस परियोजना का उद्देश्य इस रणनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र में सुरक्षित, भरोसेमंद और बिना रुकावट वाली रेल कनेक्टिविटी सुनिश्चित करना है. असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इस प्रस्तावित अंडरग्राउंड रेल लिंक को एक बड़ी रणनीतिक सफलता बताया है. उनके अनुसार, इससे पूर्वोत्तर भारत और देश के बाकी हिस्सों के बीच एक सुरक्षित और पूरी तरह भरोसेमंद परिवहन गलियारा तैयार होगा.
अलग-अलग हालात: नेपाल, भूटान और बांग्लादेश की सीमाएं
अब आइए देखें कि इस सीमा क्षेत्र में भारत को अपने पड़ोसी देशों के साथ किन ताकतों और चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. भूटान और नेपाल के साथ भारत के संबंध, बांग्लादेश के साथ संबंधों से अलग हैं. भारतीय नागरिक बिना वीजा के नेपाल और भूटान जा सकते हैं और वहां प्रवेश के लिए केवल वैध पासपोर्ट पर्याप्त होता है. भारत भी इन दोनों देशों के नागरिकों को ऐसी ही वीजा-मुक्त सुविधा देता है.
लेकिन बांग्लादेश जाने के लिए वीजा ज़रूरी है. पहले पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर राज्यों के निवासी जिला मजिस्ट्रेट द्वारा जारी सीमित भारत-बांग्लादेश पासपोर्ट के जरिए यात्रा कर सकते थे, लेकिन यह व्यवस्था 2013 में बंद कर दी गई थी. भारत-नेपाल और भारत-भूटान सीमा के विपरीत, 2,216.7 किलोमीटर लंबी भारत-बांग्लादेश सीमा पर कड़ी निगरानी रखी जाती है. इसमें से 1,647.7 किलोमीटर हिस्से पर बाड़ लगाई जा चुकी है और अधिकारी सरकार ने बाकी बचे हिस्सों में बाड़ लगाने के लिए ज़मीन हस्तांतरण की प्रक्रिया तेज़ कर दी है.
NHAI की दो अन्य परियोजनाएं भी सिलीगुड़ी कॉरिडोर को केंद्र सरकार की प्रमुख सड़क योजना भारतमाला परियोजना के लॉजिस्टिक्स नेटवर्क से जोड़ने में मदद करेंगी. इनमें गोरखपुर-सिलीगुड़ी एक्सप्रेसवे शामिल है. यह 519 किलोमीटर लंबा नियंत्रित प्रवेश (एक्सेस-कंट्रोल्ड) ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे होगा, जो उत्तर प्रदेश के गोरखपुर को सिलीगुड़ी से जोड़ेगा. यह लगभग भारत-नेपाल सीमा के समानांतर चलेगा. इससे दोनों स्थानों के बीच यात्रा का समय काफी कम होगा और भारत-नेपाल सीमा के साथ व्यापार तथा लोगों की आवाजाही भी बढ़ेगी.
दूसरी परियोजना 506 किलोमीटर लंबा खड़गपुर-सिलीगुड़ी आर्थिक कॉरिडोर है. यह बर्धमान, मोरग्राम, मालदा और रायगंज होते हुए उत्तर बंगाल को बंदरगाह शहर खड़गपुर से जोड़ेगा. इससे माल ढुलाई बेहतर होगी, क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण बढ़ेगा और रास्ते में स्थित चाय, जूट और कृषि उत्पादों के व्यापारिक केंद्रों को लॉजिस्टिक सहायता मिलेगी.
लालमोनिरहाट में बांग्लादेश-पाकिस्तान-चीन का नया गठजोड़
जहां एक ओर भारत अपना बुनियादी ढांचा मजबूत कर रहा है, वहीं दूसरी ओर एक नई चुनौती भी सामने आ रही है. यह चुनौती उत्तरी बांग्लादेश में स्थित द्वितीय विश्व युद्ध काल के लालमोनिरहाट एयरबेस को फिर से विकसित करने में चीन और पाकिस्तान की भागीदारी से जुड़ी है.
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेज़ों द्वारा बनाया गया यह एयरबेस बर्मा अभियान में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया था. 1,166 एकड़ में फैले इस हवाई अड्डे में 4 किलोमीटर लंबा रनवे है, जो ऐतिहासिक रूप से एशिया के सबसे बड़े रनवे में से एक माना जाता था. विश्वसनीय जानकारी के अनुसार, बांग्लादेश इस एयरफील्ड को दोहरे उपयोग (सैन्य और नागरिक) वाले परिचालन एयरबेस में बदलना चाहता है. इसके लिए चीन वित्तीय और तकनीकी सहायता दे रहा है, जबकि एक पाकिस्तानी रक्षा ठेकेदार जमीन पर निर्माण कार्य कर रहा है.
इसका भारत की पूर्वी क्षेत्र की रक्षा व्यवस्था पर गंभीर रणनीतिक असर पड़ सकता है. यह एयरफील्ड भारतीय सीमा से केवल 12 से 20 किलोमीटर दूर है. यह पश्चिम बंगाल के कूचबिहार और जलपाईगुड़ी जिलों के पास स्थित है और सिलीगुड़ी कॉरिडोर से लगभग 135 किलोमीटर की दूरी पर है. 1971 तक लालमोनिरहाट एयरबेस का इस्तेमाल पाकिस्तान वायु सेना मुख्य रूप से एक सहायक और अग्रिम एयरबेस के रूप में करती थी, न कि स्थायी लड़ाकू विमान स्टेशन के रूप में. बाद में यह कई दशकों तक बांग्लादेश वायु सेना के अधीन लगभग निष्क्रिय पड़ा रहा.
लेकिन अब इसके फिर से सक्रिय होने की संभावना चिंता का विषय बन गई है. शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग सरकार के सत्ता से हटने तक भारत बांग्लादेश सीमा को एक मित्रवत और कम सैन्यीकृत सीमा मानता था, जहां भारी वायु रक्षा तैनाती की बजाय मुख्य रूप से सीमा सुरक्षा की जरूरत होती थी, लेकिन इस नए घटनाक्रम के बाद भारत को उत्तर बंगाल में अपनी वायु रक्षा, निगरानी और घुसपैठ-रोधी क्षमताओं को और मजबूत करना होगा.
सुरक्षित बॉर्डर के लिए हमेशा चौकसी
यह एक ऐसा कॉरिडोर है जिस पर भारत को बहुत ध्यान से नज़र रखनी होगी. इसमें हमारी एक्ट ईस्ट पॉलिसी के तहत सिलीगुड़ी को एक ट्रेड और लॉजिस्टिक्स हब बनाने की क्षमता है, लेकिन यह चीन की सलामी-स्लाइसिंग टैक्टिक्स का भी शिकार हो सकता है, जिससे हमें सावधान रहना होगा. हमारे बॉर्डर को सुरक्षित रखने की कीमत हमेशा चौकसी है.
संजीव चोपड़ा एक पूर्व आईएएस अधिकारी और सेंटर फॉर कंटेम्पररी स्टडीज, प्राइम मिनिस्टर्स म्यूजियम एंड लाइब्रेरी (PMML), नई दिल्ली में सीनियर फेलो हैं, जहां उनकी फेलोशिप का टॉपिक है बॉर्डर्स, बाउंड्रीज एंड ब्लूवाटर्स ऑफ भारत. उनका एक्स हैंडल @ChopraSanjeev है. यह लेख लेखक के निजी विचार हैं.
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