नई दिल्ली: 28 साल का एक स्पोर्ट्स रिपोर्टर 20 जुलाई को ‘चलो संसद’ विरोध मार्च देखने गया था. वह पहली बार किसी छात्र प्रदर्शन में शामिल हुआ था. उसने अपनी बाइक दिल्ली के एक इलाके में पार्क की और कनॉट प्लेस की तरफ पैदल जा रहा था. तभी वह सुरक्षाबलों और “पत्थर फेंक रहे हिंसक प्रदर्शनकारियों के एक समूह” के बीच फंस गया.
इस अफरा-तफरी के बीच खुद को बचाने की कोशिश कर रहे रिपोर्टर को किसी चीज से चोट लगी. पहले उसे लगा कि यह आंसू गैस का गोला है. बाद में जब उसने मेडिकल सलाह के लिए ChatGPT का सहारा लिया, तो AI चैटबॉट ने बताया कि ये चोटें पैलेट गन से लगी हैं.
20 जुलाई को पैलेट लगने का यह अब तक सामने आया तीसरा मामला है. दिप्रिंट ने पहले जानकारी दी थी कि 25 साल के अकाउंट्स मैनेजर इरशाद मंसूरी लेडी हार्डिंग अस्पताल में पैलेट लगने का इलाज करा रहे हैं. वहीं 19 साल के साहिल लोहचब भी इलाज करा रहे हैं. दोनों ‘चलो संसद’ विरोध मार्च में शामिल हुए थे.
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर कार्यकर्ता सोनम वांगचुक और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की अपील पर हजारों लोग दिल्ली की सड़कों पर उतरे थे. उन्हें हटाने के लिए दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) ने बल प्रयोग किया, जिसमें 70 से ज्यादा लोग घायल हुए. वहीं 100 से ज्यादा सुरक्षाकर्मी भी घायल हुए.
सबसे ज्यादा झड़पें पटेल चौक मेट्रो स्टेशन के पास हुईं. यहां दिल्ली पुलिस और RAF ने कई आंसू गैस के गोले छोड़े और जमकर लाठीचार्ज किया. जवाब में प्रदर्शनकारियों ने कांच और प्लास्टिक की बोतलों समेत कई चीजें सुरक्षाबलों पर फेंकी. इस दौरान संसद मार्ग के आउटर सर्कल वाले प्रवेश को दिल्ली पुलिस ने बैरिकेड कर दिया था, इसलिए सैकड़ों लोगों को कनॉट प्लेस से जनपथ होते हुए संसद मार्ग तक पैदल जाना पड़ा.
हालांकि दिल्ली पुलिस ने 20 जुलाई की कार्रवाई में पैलेट गन के इस्तेमाल से इनकार किया है. भीड़ नियंत्रण के लिए पैलेट गन उसके हथियारों में शामिल नहीं है. लेकिन RAF के हथियारों में यह मौजूद है. ThePrint ने CRPF के प्रवक्ता और RAF की आईजी सीमा धुंडिया से फोन और WhatsApp पर कई बार संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन खबर लिखे जाने तक कोई जवाब नहीं मिला. RAF, CRPF की दंगा नियंत्रण इकाई है.
करीब 2010 में जम्मू-कश्मीर में राज्य पुलिस और CRPF ने भीड़ नियंत्रण के लिए पैलेट गन का इस्तेमाल शुरू किया था. कई मामलों में इससे लोगों की आंखों की रोशनी चली गई. 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कहा था कि पैलेट गन चलाने से पहले सुरक्षाबल सोच-समझकर फैसला लें. अगले साल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि भीड़ नियंत्रण में पैलेट गन का इस्तेमाल “आखिरी विकल्प” के तौर पर किया जाता है.
AIIMS दिल्ली के पूर्व इमरजेंसी मेडिसिन डॉक्टर और मेडिको-लीगल विशेषज्ञ डॉ. नमित गुप्ता ने ThePrint से कहा कि पैलेट सीसे की धातु से बने बहुत छोटे कण होते हैं. ये शरीर के अंदर घुसने वाली ऐसी चोट पहुंचाते हैं जिन्हें ऑपरेशन से निकालना आसान नहीं होता.
उन्होंने कहा, “अक्सर लोगों की आंख, चेहरा जैसे नाजुक हिस्सों में चोट लगती है.” उन्होंने आगे कहा, “पैलेट बहुत छोटे धातु के कण होते हैं जो अनिश्चित दिशा में चलते हैं. इसलिए आसपास खड़े लोगों को भी चोट लग सकती है.”
डॉ. गुप्ता, जिन्हें पैलेट से घायल मरीजों का इलाज करने का अनुभव है, ने कहा कि अगर पैलेट मांसपेशी में फंस जाए और किसी जरूरी अंग, खून की नस या नसों को नुकसान न पहुंचाए, तो डॉक्टर अक्सर उसे वहीं छोड़ देते हैं. लेकिन लंबे समय तक निगरानी जरूरी होती है क्योंकि कुछ मामलों में इससे खून के थक्के या सीसे का जहर जैसी दिक्कतें हो सकती हैं. उन्होंने कहा कि आंखों में लगने वाली चोट सबसे गंभीर होती है क्योंकि तेज रफ्तार वाले छोटे पैलेट आंख के नाजुक हिस्से को आसानी से भेद सकते हैं और हमेशा के लिए नजर जाने का खतरा रहता है.
‘उसने मेरी तरफ निशाना लगाया, मैं भागा’
दिप्रिंट से बात करते हुए रिपोर्टर ने कहा कि वह प्रदर्शनकारियों का समर्थन करने के लिए संसद तक निकाले जा रहे मार्च में गया था. उसने कहा, “उनकी मांगों को लेकर मेरी भी वही भावना थी.”
उसने बताया कि वह बाइक से दिल्ली आया था. बाइक पार्क करने के बाद वह कनॉट प्लेस की तरफ जा रहा था, तभी जंतर मंतर से प्रदर्शनकारी मार्च निकालने लगे.
शाम 4 बजे से 4.30 बजे के बीच उसने कनॉट प्लेस के पास बड़ी संख्या में सुरक्षाबलों और करीब 500 प्रदर्शनकारियों को देखा. उसने कहा, “CP के एक हिस्से में भीड़ अचानक हिंसक हो गई. मैंने खुद को बचाने की कोशिश की. मैं भागने लगा, लेकिन प्रदर्शनकारी पत्थर फेंकने लगे और सुरक्षाबलों ने आंसू गैस छोड़ी. हालात बहुत तेजी से बिगड़ गए.”
उसने कहा, “कुछ ही मिनटों में सब कुछ अफरा-तफरी में बदल गया. मैंने RAF के एक जवान को मेरी तरफ निशाना लगाते देखा. लोग हर तरफ भाग रहे थे और मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूं. इसलिए मैं दूसरी तरफ भागा. लेकिन मुझ पर गोली चला दी गई. मैं गिर गया. चारों तरफ इतना शोर था कि मुझे लगा यह आंसू गैस है.”
रिपोर्टर किसी तरह उठा और सुरक्षित जगह पहुंच गया. वहां मौजूद लोगों ने उसकी मदद की और शाम करीब 6 बजे उसे घाव साफ करने के लिए पीने का पानी मिला.
लेकिन उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसे किस चीज से चोट लगी है.
उसने कहा, “जैसे ही नेटवर्क मिला, मैंने अपने घाव की फोटो लेकर ChatGPT पर अपलोड की और पूछा कि क्या यह रबर पैलेट है या पैलेट गन की चोट. AI प्लेटफॉर्म ने इसकी पुष्टि की. उसने मुझे टिटनेस का इंजेक्शन लगवाने की सलाह दी.” इसके बाद वह एक निजी अस्पताल गया और इंजेक्शन लगवाया.
अगले दिन वह सफदरजंग अस्पताल गया, जहां अल्ट्रासाउंड और एक्स-रे में वही बात सामने आई जिसका शक AI चैटबॉट ने जताया था. उसने कहा, “डॉक्टरों ने अल्ट्रासाउंड और एक्स-रे किया. उसमें पैलेट दिखाई दिए. डॉक्टरों ने बताया कि मेरे शरीर में करीब 25-30 पैलेट के घाव हैं. उन्होंने कहा कि इन्हें निकालना मुश्किल होगा क्योंकि बहुत ज्यादा पैलेट हैं और इसके लिए कई जगह चीरे लगाने पड़ेंगे. उन्होंने कहा कि ये घाव खतरनाक नहीं हैं और समय के साथ ठीक हो जाएंगे.”
दिप्रिंट ने जो मेडिको-लीगल केस (MLC) रिकॉर्ड देखा है, उसके मुताबिक रिपोर्टर को पैलेट गन की चोटों के साथ अस्पताल लाया गया था और उसने चोट वाली जगहों पर दर्द की शिकायत की थी. रिकॉर्ड में लिखा है कि जांच के समय वह होश में था और उसकी हालत स्थिर थी. उसका ब्लड प्रेशर 117/86 mmHg और ऑक्सीजन लेवल 99 प्रतिशत था.
सफदरजंग अस्पताल की केस शीट में लिखा है, “सूचना देने वाले के मुताबिक मरीज शाम करीब 4 बजे जंतर मंतर प्रदर्शन में शामिल होने गया था. वहां हालात बिगड़ गए और अफरा-तफरी मच गई. स्थिति को काबू करने के लिए आंसू गैस और पैलेट का इस्तेमाल किया गया.”
रिपोर्टर की दाहिनी कोहनी और पीठ पर चोट लगी है. अब वह दूसरी मेडिकल राय लेने की योजना बना रहा है. उसने कहा, “जब मुझे गोली लगी, वहां बहुत लोग थे. मुझे लगता है कि जिस अधिकारी ने मुझ पर गोली चलाई, उससे और भी लोग घायल हुए होंगे.”
उसने कहा कि वह प्रदर्शनकारियों का समर्थन करने के लिए फिर से जंतर मंतर जाएगा.
‘राष्ट्रीय झंडा लहरा रहा था’
19 साल का साहिल लोहचब भी जंतर मंतर प्रदर्शन में शामिल होने गया था.
साहिल नजफगढ़ का रहने वाले हैं और दिल्ली यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग (SOL) का अंतिम वर्ष का छात्र हैं.
उनकी मां ने दिप्रिंट को बताया कि दोपहर करीब 3 बजे जब साहिल “राष्ट्रीय झंडा लहरा रहा था”, तभी उसकी दाहिनी आंख और शरीर के ऊपरी हिस्से में पैलेट लगे. मंगलवार सुबह तक वह AIIMS ट्रॉमा सेंटर पहुंच गया था, जहां अगले दिन उसका ऑपरेशन हुआ.
गुरुवार को AIIMS ट्रॉमा सेंटर के बाहर पार्क में इंतिजार कर रहीं उनकी मां ज्योति ने बताया कि साहिल अपने पिता दीपक के साथ ड्राइवर का काम भी करता था ताकि परिवार का खर्च चल सके. उन्होंने बताया कि साहिल दिल्ली पुलिस में भर्ती होना चाहता था और हेड कांस्टेबल भर्ती की तैयारी कर रहा था.
वह स्टाफ सिलेक्शन कमीशन (SSC-CGL) ग्रुप-B और ग्रुप-C की परीक्षा भी दे चुका था.
मां ने कहा, “उसने मुझे बताया था कि वह प्रदर्शन में जा रहा है. मैंने उसे रोकने की कोशिश की, लेकिन उसने कहा कि बहुत सारे छात्र जा रहे हैं, कुछ नहीं होगा.”
इसके बाद कई घंटों तक उसे किए गए फोन का कोई जवाब नहीं मिला. दोपहर करीब 3 बजे परिवार को फोन आया कि साहिल घायल हो गया है.
उन्होंने कहा, “हम तुरंत लेडी हार्डिंग पहुंचे, लेकिन वहां से उसे सफदरजंग भेज दिया गया. वहां बेड नहीं मिला, फिर AIIMS गए, फिर मैक्स अस्पताल गए. वहां भी चोट की वजह से भर्ती नहीं किया गया. हम पूरी रात उसे एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल ले जाते रहे.”
आखिरकार साहिल को सुबह करीब 4 बजे AIIMS ट्रॉमा सेंटर में भर्ती किया गया, जहां बुधवार को उसका ऑपरेशन हुआ.
बाद में डॉक्टरों ने ज्योति को बताया कि साहिल को पैलेट की चोट लगी है.
उसकी दाहिनी आंख बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई है. ज्योति ने कहा, “डॉक्टरों ने बताया है कि उसकी आंख की रोशनी वापस आने की सिर्फ एक प्रतिशत संभावना है. वह खाना खा पा रहा है, बात कर पा रहा है, लेकिन उसका हाथ सूजा हुआ है और उसे बहुत दर्द हो रहा है.”
लोहचब परिवार के लिए साहिल की चोट आर्थिक संकट भी बन गई है.
साहिल की कमाई से नजफगढ़ में किराए के घर में रहने वाले पांच लोगों का परिवार चलता था. उसके दो छोटे भाई, जिनकी उम्र 15 और 12 साल है, अभी स्कूल में पढ़ते हैं.
ज्योति ने कहा, “हमारी आर्थिक हालत ऐसी है कि सिर्फ एक कमाई से घर नहीं चल सकता. वह मेरा सबसे बड़ा बेटा है. उसकी पूरी जिंदगी बाकी है. अब वह क्या करेगा?”
उन्होंने कहा कि परिवार साहिल के लिए मुआवजा और नौकरी दोनों चाहता है. “कम से कम उसे नौकरी मिलनी चाहिए. उसे मुआवजा भी मिलना चाहिए. उसकी क्या गलती थी? उसकी जिंदगी क्यों बर्बाद हो?”
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