नेपाल के विदेश मंत्री शिसिर खनाल ने 14 से 17 जून तक चीन की चार दिन की यात्रा की. प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह के नेतृत्व में नई सरकार बनने के बाद यह चीन की सबसे उच्चस्तरीय नेपाली यात्रा मानी जा रही है. उनके कार्यक्रम में चीनी विदेश मंत्री वांग यी और चीनी पीपुल्स पॉलिटिकल कंसल्टेटिव कॉन्फ्रेंस की राष्ट्रीय समिति के अध्यक्ष वांग हुनिंग के साथ बैठकें शामिल थीं.
हालांकि नेपाल और चीन के संबंध ऐतिहासिक रूप से तिब्बत के माध्यम से धार्मिक और सांस्कृतिक जुड़ाव पर आधारित रहे हैं, लेकिन अब आर्थिक संबंधों का महत्व लगातार बढ़ गया है. 2024 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 2.16 अरब डॉलर रहा. इसमें नेपाल का चीन को निर्यात केवल 1 करोड़ डॉलर था, जिससे लगभग 2 अरब डॉलर का व्यापार घाटा हुआ. चीन से सबसे अधिक मूल्य के निर्यात में इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण शामिल हैं. चीन ने लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने पर भी जोर दिया है और हाल के वर्षों में चीनी पर्यटकों की संख्या लगातार बढ़ी है.
नेपाल की विदेश नीति में चीन को एक महत्वपूर्ण विकास साझेदार माना जाता है. पिछले एक दशक में विभिन्न सरकारों ने बीजिंग के साथ संबंधों को भारत के खिलाफ संतुलन बनाने के बजाय एक स्वतंत्र द्विपक्षीय संबंध के रूप में पेश करने की कोशिश की, लेकिन इसमें सीमित सफलता मिली.
उदाहरण के तौर पर, नेपाल की कम्युनिस्ट सरकारों ने, खासकर पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के नेतृत्व में, चीन को नेपाल की क्षेत्रीय विदेश नीति का प्रमुख आधार बना दिया था. राजनीतिक अस्थिरता और अल्पकालिक नीतियों के कारण चीन के साथ संबंध अक्सर अति-राष्ट्रवादी राजनीति का साधन बन गए. प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह के कार्यकाल में यह तरीका बदलता हुआ दिखाई दे रहा है.
सत्ता में आने के पहले 100 दिनों में, बालेंद्र शाह के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी (रास्वपा) सरकार ने नेपाल की विदेश नीति को योजना, धैर्य, साझेदारी और प्रगति के आधार पर आगे बढ़ाया है. भारत और नेपाल के बीच हाल की बातचीत और संपर्कों में ये सभी बातें दिखाई देती हैं. काठमांडू अब यही ऊर्जा चीन के साथ संबंधों में भी लाना चाहता है.
एक योजनाबद्ध यात्रा
नेपाल में कई लोगों का मानना है कि विदेश मंत्री खनाल की चीन यात्रा सावधानीपूर्वक योजना का परिणाम है, जो पिछली सरकारों के लिए हमेशा चुनौती रही थी. पहले के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री अक्सर जल्दबाजी में चीन या भारत की यात्रा करते थे, जिससे यह संकेत मिलता था कि एक स्थलरुद्ध देश के लिए कौन सा पड़ोसी अधिक प्राथमिकता रखता है. लेकिन इस बार रास्वपा के मुखिया रवि लामिछाने और विदेश मंत्री खनाल ने भारत यात्रा करके प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह की पहली विदेश यात्रा से पहले भारत के साथ बड़े राजनयिक संपर्कों की नींव तैयार कर दी है. और विदेश मंत्री खनाल की चीन यात्रा को मद्देनजर रखा जाए तो हो सकता है कि प्रधानमंत्री भारत यात्रा के बाद चीन भी जाएं.
बीजिंग पहुंचने से ठीक पहले, खनाल ने 5 जून को भारत की अपनी पहली यात्रा भी की थी. उन्होंने भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात की. यह रास्वपा अध्यक्ष रवि लामिछाने की एक हफ्ते की दिल्ली यात्रा के बाद की गई पहल थी. लामिछाने ने प्रधानमंत्री मोदी, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और विदेश मंत्री जयशंकर से मुलाकात की थी. एक स्थलरुद्ध देश के लिए विदेश नीति की योजना और क्रियान्वयन में संतुलन बहुत महत्वपूर्ण होता है, इसलिए भारत की यात्रा मंत्री खनाल और रास्वपा अध्यक्ष लामिछाने दोनों के लिए एक बड़ा अवसर थी.
नेपाल भारत के साथ आर्थिक एकीकरण को और गहरा करना चाहता है और अपने संबंधों को नए स्तर पर ले जाना चाहता है. दिल्ली के साथ विकास साझेदारी नई युवा नेतृत्व वाली सरकार की घरेलू और विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. जैसा कि लामिछाने ने हिंदुस्तान टाइम्स में अपने लेख में लिखा, “नेपाल किसी अनिश्चित भविष्य की ओर नहीं बढ़ रहा है, बल्कि एक बेहद महत्वाकांक्षी दृष्टि को अपना रहा है.”
इसलिए खनाल की यात्राएं, पहले दिल्ली और अब बीजिंग, साझेदारी की एक ऐसी सोच को दिखाती हैं जो इस धारणा से अलग है कि नेपाल भारत और चीन के बीच प्रभाव की राजनीति का मैदान बन रहा है.
नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई ने भी खनाल की चीन यात्रा पर टिप्पणी करते हुए अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर लिखा की, “मैं यह जोड़ना चाहूंगा कि दोनों देशों में राजनीतिक व्यवस्था और नेताओं के बदलने के बावजूद नेपाल-चीन संबंध इतिहास में सबसे स्थिर, अनुमानित और मित्रतापूर्ण संबंध बने रहे हैं.”
एक अलग पोस्ट में भट्टराई ने इस यात्रा का स्वागत किया और इसे नेपाल-चीन के लंबे समय से चले आ रहे संबंधों को और मजबूत करने का अवसर बताया.
स्पष्ट है कि नेपाल में इस यात्रा पर काफी करीबी नजर रखी जा रही है.
नेपाल-चीन संबंधों को नया रूप देना
यह कोई छिपी बात नहीं है कि नेपाल की भू-रणनीतिक स्थिति भारत और चीन दोनों की नेपाल नीति में एक अहम कारक है, लेकिन आज नेपाल खुद को किस नजर से देखता है, इसे भी ध्यान में रखना जरूरी है.
यात्रा से पहले नेपाल के विदेश मंत्रालय ने कहा था कि खनाल की यात्रा का उद्देश्य “आपसी हितों के मुद्दों पर चर्चा करना और गहरे सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए नेपाल-चीन संबंधों को और मजबूत करना” है.
विदेश मंत्री खनाल ने चीनी विदेश मंत्री वांग यी के साथ अपनी उच्चस्तरीय बैठक में आर्थिक साझेदारी, निवेश, बुनियादी ढांचा विकास और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने जैसे मुद्दों पर चर्चा की. हालांकि बैठक पर जारी चीनी प्रेस रिलीज में व्यापार घाटे का जिक्र नहीं था, लेकिन नेपाली पक्ष ने बताया कि वांग यी के साथ व्यापक चर्चा के दौरान व्यापार से जुड़े मुद्दों पर भी बात हुई.
नेपाल की चीन नीति की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक निरंतरता और योजनाओं के क्रियान्वयन की कमी है, जिसका मुख्य कारण काठमांडू की राजनीतिक अस्थिरता है. चूंकि RSP नेतृत्व वाली सरकार ने नीतियों में अधिक निरंतरता का वादा किया है, इसलिए चीन चाहता है कि बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) जैसी परियोजनाएं आगे बढ़ें. यह पहल मई 2017 में समझौता होने के बाद से ही अटकी हुई है.
2019 में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की नेपाल यात्रा के दौरान, बीजिंग ने काठमांडू के साथ सहयोग की एक व्यापक योजना पेश की थी, जिसमें BRI और उससे जुड़ी परियोजनाओं को प्राथमिकता दी गई थी.
2019 के संयुक्त बयान में दोनों पक्षों ने कहा था, “चीन और नेपाल बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव को एक अवसर के रूप में देखते हैं ताकि सभी क्षेत्रों में परस्पर लाभकारी सहयोग को गहराई दी जा सके, साझा समृद्धि हासिल की जा सके और क्षेत्र में शांति, स्थिरता और विकास बनाए रखा जा सके.”
जहां काठमांडू BRI को आर्थिक व्यवहार्यता के नजरिए से देख सकता है, वहीं बीजिंग इसे अब भी एक रणनीतिक पहल मानता है.
उदाहरण के तौर पर, BRI के तहत प्रस्तावित सबसे महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में से एक “ट्रांस-हिमालयन मल्टी-डायमेंशनल कनेक्टिविटी नेटवर्क” है, जिसमें नेपाल और चीन के बीच सड़क और रेल संपर्क विकसित करने की योजना है. यह संपर्क नेटवर्क निश्चित रूप से चीन को भारतीय उपमहाद्वीप के और करीब लाता है.
वांग यी ने खनाल के साथ बैठक में एक बार फिर कहा कि “चीन नेपाल के साथ उच्च गुणवत्ता वाले बेल्ट एंड रोड निर्माण के लिए तैयार है. इसमें बिजली ग्रिड, राजमार्ग, बंदरगाह, विमानन और अन्य क्षेत्रों में सहयोग पर ध्यान दिया जाएगा, ताकि नेपाल को एक ‘स्थलरुद्ध देश’ से ‘स्थलरुद्ध लेकिन जुड़ा हुआ देश’ बनाया जा सके.”
चीन चाहता है कि नेपाल BRI और उससे जुड़ी परियोजनाओं को आगे बढ़ाए.
यह भी ध्यान देने योग्य है कि जब नेपाल ने BRI पर समझौता ज्ञापन पर साइन किए थे, तब बीजिंग ने इसे नेपाल में भारत के लंबे समय से चले आ रहे प्रभाव पर एक कूटनीतिक और रणनीतिक जीत के रूप में देखा था. खासकर इसलिए क्योंकि भारत ने बेल्ट एंड रोड फोरम में शामिल होने से इनकार करते हुए कहा था, “कोई भी देश ऐसी परियोजना को स्वीकार नहीं कर सकता जो उसकी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से जुड़े मूल मुद्दों की अनदेखी करे.”
चीन की प्राथमिकता बनी सुरक्षा
चीन नेपाल से सुरक्षा संबंधी आश्वासन चाहता है, जो तिब्बत और वन चाइना सिद्धांत से जुड़े हुए हैं. इसका मुख्य कारण यह है कि नेपाल की तिब्बत के साथ लंबी, हालांकि पहाड़ी, सीमा लगती है.
काठमांडू की ओर से मिलने वाले आश्वासन बीजिंग के सुरक्षा हितों के लिए जरूरी हैं.
नेपाल में बड़ी संख्या में तिब्बती निर्वासित रहते हैं. बताया जाता है कि CIA ने 1950 से 1970 तक नेपाल में खम्पा विद्रोहियों को प्रशिक्षण और हथियार दिए थे ताकि वे तिब्बत में कम्युनिस्ट शासन का विरोध कर सकें. तिब्बत में चीन की कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद वहां के भीतर होने वाले विरोध और हिमालयी सीमाओं के जरिए बाहरी प्रभावों से प्रेरित गतिविधियां आज भी बीजिंग के लिए चिंता का विषय हैं.
सुरक्षा के प्रति आपसी सम्मान का यह सिद्धांत 1960 की चीन-नेपाल शांति और मित्रता संधि में भी दिखाई देता है, जब दोनों देशों ने “शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पांच सिद्धांतों” का समर्थन किया था.
इसीलिए मंत्री खनाल की यात्रा के दौरान चीन ने एक बार फिर नेपाल से यह आश्वासन मांगा कि काठमांडू “कभी भी किसी ताकत को नेपाल की जमीन का इस्तेमाल चीन के हितों को नुकसान पहुंचाने के लिए नहीं करने देगा” और यह भी कि “चीन का विकास नेपाल के लिए एक अवसर है.”
नेपाल के संदर्भ में तिब्बत को लेकर चीन की मूल नीति नहीं बदली है, लेकिन अब बीजिंग ने अपनी सुरक्षा चिंताओं का दायरा बढ़ाकर ताइवान को भी शामिल कर लिया है.
चीनी विदेश मंत्रालय ने कहा, “नेपाल ‘वन-चाइना पॉलिसी’ का पूरी तरह से पालन करता है, चीन के पूर्ण एकीकरण का समर्थन करता है और किसी भी ताकत को नेपाल की ज़मीन का इस्तेमाल करके चीन के हितों को नुकसान नहीं पहुंचाने देता.”
ताइवान चीन की प्रमुख सुरक्षा प्राथमिकताओं में से एक है. भारतीय उपमहाद्वीप और अन्य क्षेत्रों के छोटे देशों से बीजिंग के पक्ष में एक जैसी बात कहलवाकर चीन यह सुनिश्चित करना चाहता है कि ताइपे के साथ कोई महत्वपूर्ण कूटनीतिक बातचीत या संपर्क न हो. इससे ताइवान के अंतरराष्ट्रीय दायरे को सीमित किया जा सके और वन चाइना सिद्धांत को क्षेत्रीय कूटनीति की अनिवार्य शर्त के रूप में मजबूत किया जा सके.
यह तब भी दिखाई दिया जब नेपाल में पदभार संभालने के तुरंत बाद चीनी राजदूत झांग माओमिंग ने कथित तौर पर नेपाल के गृह मंत्री सुदान गुरूंग से मुलाकात में नेपाल में ताइवान से जुड़ी गतिविधियों पर चीन की आपत्तियां जताईं और नेपाली भूमि पर तिब्बतियों की तथाकथित “अलगाववादी” गतिविधियों को लेकर चिंता व्यक्त की.
आगे की राह
नेपाल की नई सरकार जब तक चीन के साथ दीर्घकालिक जुड़ाव या विस्तृत कार्ययोजना जारी नहीं करती, तब तक काठमांडू को अपने हितों, प्राथमिकताओं और BRI या अन्य परियोजनाओं की वास्तविक व्यवहार्यता का सावधानी से आकलन करना होगा. यह नेपाल की वर्तमान सोच के अनुरूप होगा, जिसमें BRI जैसी पहलों का मूल्यांकन राष्ट्रीय हितों, आर्थिक प्राथमिकताओं और दीर्घकालिक वित्तीय सुरक्षा के आधार पर किया जाता है. साथ ही यह सुनिश्चित करना कि चीन के साथ कोई भी परियोजना किसी के लिए खतरा न बने, क्षेत्रीय सहयोग और संपर्क के लिए बेहतर माहौल तैयार करने में मदद करेगा.
साथ ही काठमांडू स्थित विदेश मामलों के विशेषज्ञ मानते हैं कि नेपाल के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण होना चाहिए कि ऐसी परियोजनाएं टिकाऊ हों, पारदर्शी हों, आर्थिक रूप से व्यवहार्य हों और राष्ट्रीय विकास के लिए लाभकारी हों.
नेपाल की पिछली सरकार चीन के साथ महत्वाकांक्षी समझौते करना चाहती थी, लेकिन व्यवहार में वह केवल निष्क्रियता की स्थिति बनाए रखने और ऐसे समझौतों का उपयोग अति-राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने के लिए ही कर पाई.
ऋषि गुप्ता ग्लोबल स्ट्रैटेजिक मामलों पर कमेंटेटर हैं. इस लेख में व्यक्त की गई राय पूरी तरह से लेखक की निजी है, और किसी भी रूप में लेखक के वर्तमान या पूर्व संस्थानों के विचारों को नहीं दर्शाती है.
(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: आज़ादी के बाद पश्चिम बंगाल में सिर्फ 9 मुख्यमंत्री रहे और राजनीति के 5 दौर देखे गए