नई दिल्ली: दिल्ली पुलिस ने उत्तर भारत में चल रहे एक बाल तस्करी रैकेट का भंडाफोड़ किया है. इसमें 12 लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें सरगना और दिल्ली के रोहिणी इलाके में स्थित एक आईवीएफ अस्पताल का मालिक भी शामिल है.
इस मामले का खुलासा 5 जून को शुरू हुई कार्रवाई से हुआ, जब सेंट्रल जिले की ऑपरेशंस यूनिट को तस्करी के बारे में सूचना मिली. इसके बाद पाताल ग्राहक (decoy customers) को पहाड़गंज के आरके आश्रम मेट्रो स्टेशन के पास भेजा गया. वहां इन लोगों ने एक महिला से मुलाकात की और एक नवजात लड़के को खरीदने का सौदा किया. इसके लिए 20,000 रुपये की टोकन मनी दी गई. इस सौदे के बाद ज्योति उर्फ कमलेश को दो अन्य सहयोगियों शालू और ललित के साथ गिरफ्तार किया गया.
भारतीय न्याय संहिता की धाराएं 143(4), 61(2) और 3(5) तथा जुवेनाइल जस्टिस (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम 2015 की धारा 81 के तहत एफआईआर दर्ज की गई है. यह मामला पहाड़गंज पुलिस स्टेशन में दर्ज हुआ.
सेंट्रल के डीसीपी रोहित राजबीर सिंह ने बताया कि तीनों आरोपियों से लगातार पूछताछ और तकनीकी जांच के बाद पता चला कि वे एक बड़े संगठित अंतरराज्यीय बाल तस्करी गिरोह का हिस्सा थे, जो अलग-अलग स्रोतों से नवजात बच्चों को हासिल करके उन्हें निःसंतान दंपतियों को बड़ी रकम लेकर अवैध रूप से बेचता था.
जांच में पता चला कि ज्योति मुख्य तस्कर के रूप में काम कर रही थी और अलग-अलग मध्यस्थों के जरिए नवजात बच्चों को हासिल कर रही थी. डीसीपी ने बताया कि इनमें से एक स्रोत काला था, जो राजस्थान से नवजात बच्चे उपलब्ध कराता था.
अन्य सदस्यों में विपिन शामिल था, जो ड्राइवर के रूप में काम करता था और बच्चों को इकट्ठा करने और उन्हें एक जगह से दूसरी जगह ले जाने का काम करता था, पुलिस ने बताया.
आरोपी ज्योति के कहने पर दो और लोगों प्रातिभा और विपिन को तब गिरफ्तार किया गया जब वे एक और नवजात बच्चे की व्यवस्था करने जा रहे थे. उनके पास से 2,92,400 रुपये नकद बरामद हुए, जिसे पुलिस के अनुसार एक नवजात बच्चे को खरीदने के लिए इस्तेमाल किया जाना था.
आगे की जांच में गुरुग्राम में घरेलू सहायिका के रूप में काम करने वाली ओमवती की भूमिका सामने आई. पुलिस ने बताया कि ओमवती कई बार मध्यस्थ के रूप में काम करती थी और नवजात बच्चों की व्यवस्था में मदद करती थी, जिन्हें बाद में तस्करी नेटवर्क के सदस्यों को अवैध बिक्री के लिए सौंप दिया जाता था.
जांच में दिल्ली के बेगमपुर स्थित हीरा मल्टी स्पेशलिटी हॉस्पिटल की मालिक डॉ. विवेकी की भी मिलीभगत सामने आई है. डीसीपी ने बताया कि डॉ. विवेकी कथित तौर पर इस अवैध तस्करी में अहम भूमिका निभा रही थीं. वे तस्करी किए गए बच्चों को अपने अस्पताल में रखती थीं और बांझपन के इलाज के लिए आने वाले निःसंतान दंपतियों में संभावित खरीदारों की पहचान करती थीं.
जब निःसंतान दंपति इलाज के लिए अस्पताल आते थे, तो डॉ. विवेकी उनकी पसंद के अनुसार सौदा करती थीं. एक बच्ची को 3-4 लाख रुपये में और एक बच्चा लड़का 7-8 लाख रुपये में बेचा जाता था. लड़कों की मांग ज्यादा थी.
जांच में यह भी सामने आया है कि फर्जी मेडिकल और सहायक दस्तावेज, जिनमें अस्पताल रिकॉर्ड, डिलीवरी दस्तावेज, जन्म संबंधी रिकॉर्ड और अन्य कागजात शामिल हैं, तैयार किए जाते थे ताकि झूठे तौर पर माता-पिता का संबंध स्थापित किया जा सके और बच्चों के अवैध हस्तांतरण को आसान बनाया जा सके, डीसीपी ने बताया.
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