नई दिल्ली: भारत और यूनाइटेड किंगडम (यूके) के बीच हुआ मुक्त व्यापार समझौता (FTA) 15 जुलाई से लागू होने जा रहा है. दोनों सरकारों ने बुधवार को इसकी घोषणा की.
यह समझौता भारत और किसी यूरोपीय या पश्चिमी देश के बीच पहला द्विपक्षीय व्यापार समझौता लागू होने का प्रतीक होगा. इससे पहले यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (EFTA) के साथ हुआ समझौता पिछले साल लागू हुआ था, लेकिन वह चार देशों—स्विट्जरलैंड, नॉर्वे, आइसलैंड और लिकटेंस्टीन—के एक बहुपक्षीय संगठन के साथ था.
केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने एक बयान में कहा, “15 जुलाई 2026 को CETA और डबल कॉन्ट्रिब्यूशन कन्वेंशन के एक साथ लागू होने से भारत के निर्यात के लिए बड़े नए अवसर खुलेंगे. हमारे 99 प्रतिशत टैरिफ लाइनों पर तुरंत शुल्क-मुक्त पहुंच सुनिश्चित करके हमने लंबे समय से मौजूद शुल्क बाधाओं को व्यवस्थित रूप से खत्म किया है. इससे वास्तव में सभी के लिए समान अवसर पैदा होंगे और हमारे वस्त्र, चमड़ा, समुद्री उत्पाद, इंजीनियरिंग और प्रोसेस्ड फूड सेक्टर बिना किसी नुकसान के प्रतिस्पर्धा कर सकेंगे और अपने विश्वस्तरीय उत्पादों की आपूर्ति कर सकेंगे.”
उन्होंने आगे कहा, “सबसे अहम बात यह है कि यह व्यवस्था पूरी आर्थिक सुरक्षा पर आधारित है. हमारी संवेदनशील कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आयात में उतार-चढ़ाव से बचाने के लिए कड़ी बहिष्करण सूचियां लागू की गई हैं.”
“साथ ही, हमारे पेशेवरों को दोहरी बीमा अंशदान से छूट देकर हम अपनी प्रतिभा शक्ति के वित्तीय हितों की रक्षा कर रहे हैं. यह दोहरी उपलब्धि हमारे वैश्विक व्यापारिक विस्तार को तेज करेगी, जबकि घरेलू हितों की भी मजबूती से रक्षा करेगी.”
इस समझौते को दोनों सरकारों ने मंजूरी दे दी है. इसे लागू करने की तारीख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके ब्रिटिश समकक्ष कीर स्टार्मर ने इस सप्ताह G7 शिखर सम्मेलन के दौरान हुई द्विपक्षीय बैठक में तय की.
14 दौर की बातचीत के बाद भारत और यूके ने पिछले साल मई में FTA वार्ता पूरी होने की घोषणा की थी. इस पर 25 जुलाई 2025 को लंदन में दोनों प्रधानमंत्रियों की मौजूदगी में साइन किए गए थे.
कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक एंड ट्रेड एग्रीमेंट (CETA) के तहत यूके कई भारतीय निर्यात उत्पादों पर शुल्क को शून्य कर देगा, जबकि भारत के डेयरी, अनाज, तिलहन और सब्जी क्षेत्रों को संरक्षण मिलेगा.
ब्रिटिश अनुमान के अनुसार, इस समझौते से भारत की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में हर साल लगभग 5.1 अरब पाउंड की बढ़ोतरी होगी, जबकि यूके की GDP में लगभग 4.8 अरब पाउंड की वृद्धि होगी. लंबे समय में इससे दोनों देशों के बीच व्यापार में हर साल लगभग 25.5 अरब पाउंड की बढ़ोतरी हो सकती है.
निर्यातकों के लिए इस समझौते का क्या मतलब है
भारतीय निर्यातकों को कई क्षेत्रों में शुल्क कम होने या पूरी तरह खत्म होने का फायदा मिलेगा.
यूके द्वारा भारतीय निर्यात पर लगाए गए शुल्क, जिनमें प्रोसेस्ड फूड उत्पादों पर 70 प्रतिशत तक, समुद्री उत्पादों पर 21.5 प्रतिशत, इंजीनियरिंग सामान और ऑटो कंपोनेंट्स पर 18 प्रतिशत तक, चमड़ा और फुटवियर उत्पादों पर 16 प्रतिशत तक, और वस्त्र एवं कपड़ों पर 12 प्रतिशत तक शुल्क शामिल हैं, अब शून्य कर दिए जाएंगे. रसायन और फार्मास्यूटिकल उत्पादों पर लगने वाले 8 प्रतिशत तक के शुल्क भी यूके द्वारा खत्म किए जाएंगे.
इस समझौते के तहत भारत ब्रिटिश व्हिस्की पर लगने वाले लगभग 150 प्रतिशत शुल्क को घटाकर 40 प्रतिशत करेगा. साथ ही ब्रिटिश ऑटोमोबाइल आयात के लिए नया कोटा लागू होगा, जिस पर मौजूदा 100 प्रतिशत की जगह 10 प्रतिशत शुल्क लगेगा.
भारत से यूके को होने वाले लगभग 100 प्रतिशत व्यापार मूल्य को कवर करने वाली करीब 99 प्रतिशत टैरिफ लाइनों को समाप्त कर दिया जाएगा. FTA में भारतीय कर्मचारियों की आवाजाही के लिए भी नियामक ढांचा दिया गया है, जिसमें बिजनेस विजिटर, इंट्रा-कॉर्पोरेट ट्रांसफर, कॉन्ट्रैक्ट सर्विस सप्लायर, स्वतंत्र पेशेवर और ठेकेदार शामिल हैं.
इस समझौते की एक और महत्वपूर्ण विशेषता डबल कॉन्ट्रिब्यूशन कन्वेंशन है. इस वर्ष फरवरी में हस्ताक्षरित यह समझौता यूके में अस्थायी रूप से काम कर रहे भारतीय कर्मचारियों और भारतीय नियोक्ताओं को तीन वर्षों तक सामाजिक सुरक्षा अंशदान से छूट देगा. इससे भारतीय कंपनियों को लगभग 4,000 करोड़ रुपये की बचत होगी, जबकि कर्मचारी अस्थायी रूप से यूके में काम करेंगे.
भारत अपने लगभग 90 प्रतिशत टैरिफ लाइनों में चरणबद्ध तरीके से कटौती करेगा. समझौता लागू होने के अगले दशक के भीतर, यानी 2036 तक, लगभग 85 प्रतिशत शुल्क पूरी तरह समाप्त कर दिए जाएंगे.
पूरे समझौते में 30 अध्याय होंगे, जिनमें सरकारी खरीद से संबंधित प्रावधान भी शामिल हैं. यह द्विपक्षीय स्तर पर पहली बार सहमति से शामिल किया गया प्रावधान है.
इसके अलावा, भारतीय इस्पात उत्पादकों को यूके के नए इस्पात उपायों और नियमों से कुछ सुरक्षा मिलेगी, जो 1 जुलाई से लागू होने वाले हैं. अंतिम समझौते के तहत भारत के लगभग 85 प्रतिशत इस्पात निर्यात इन नए उपायों के दायरे से बाहर रहेंगे. साथ ही भारतीय इस्पात को अवशिष्ट कोटा और ऑथराइज्ड यूज स्कीम (AUS) के जरिए अतिरिक्त संरक्षण मिलेगा.
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