NEET परीक्षा को लेकर हुए भारी विवाद और हंगामे का एक दुर्भाग्यपूर्ण नतीजा यह हुआ है कि कई बड़े और बेहद चिंताजनक मुद्दों पर ठीक से ध्यान ही नहीं दिया गया. पहली नजर में यह कुछ हद तक राहत की बात लगती है कि सरकार ने गड़बड़ियों को रोकने के लिए सख्त कानून लाने का प्रस्ताव दिया है और NEET परीक्षा में जरूरी सुधार सुझाने के लिए एक समिति भी बनाई है.
लेकिन ऐसे कदम उस असली समस्या को नहीं छूते, जिसकी वजह से यह स्थिति पैदा हुई है. NEET से जुड़े कई अहम मुद्दों को या तो जानबूझकर या फिर लापरवाही की वजह से पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया है.
सबसे पहले, मैं कभी भी मेडिकल शिक्षा में दाखिले के लिए एक केंद्रीकृत परीक्षा की जरूरत को पूरी तरह समझ नहीं पाया. इसी तरह, सेंट्रल यूनिवर्सिटीज एंट्रेंस टेस्ट (CUET) शुरू किए जाने से भी मुझे उतनी ही निराशा हुई. हमारे देश में ऐसा लगता है कि हर समस्या का एक ही समाधान लागू करने की सोच बनी हुई है, खासकर शिक्षा के क्षेत्र में.
मैं पहले भी यह बात कह चुका हूं और इसे दोहराना जरूरी है. हम अपने युवाओं की लगातार परीक्षाएं लेकर उन्हें मानसिक रूप से थका रहे हैं. हमारे बच्चे स्कूल के शुरुआती वर्षों से ही लगातार उबाऊ और कल्पनाशक्ति से रहित परीक्षाओं का सामना करते हैं. समय के साथ उन्हें कई ऐसी परीक्षाएं भी देनी पड़ती हैं, जिनका उनकी स्कूल की पढ़ाई से सीधा संबंध नहीं होता. इस तरह की परीक्षा व्यवस्था रचनात्मकता को खत्म कर देती है. पढ़ाई का मकसद सिर्फ उन अनगिनत परीक्षाओं में अच्छा प्रदर्शन करना रह जाता है, जिनसे छात्र को गुजरना पड़ता है.
फिर क्या यह हैरानी की बात है कि खुद को IT सुपरपावर कहने वाले भारत में आज तक कोई बड़ी IT खोज या ऐसा बड़ा नवाचार, जैसे कोई नई कोडिंग भाषा, हमारे शिक्षा संस्थानों से निकलकर नहीं आया?
यह भी नहीं भूलना चाहिए कि स्कूल के बच्चों को अपनी पसंद के कोर्स के हिसाब से JEE, NEET, CUET या नेशनल लॉ स्कूल प्रवेश परीक्षा जैसी किसी न किसी परीक्षा में बैठना ही पड़ता है. स्कूल और कॉलेज के दौरान वे कई और परीक्षाएं भी देते हैं, जो उन्हें गणित या सामान्य ज्ञान में “प्रतिभाशाली” साबित करती हैं. इसका मतलब भी हमेशा साफ नहीं होता.
राष्ट्रीय शिक्षा नीति क्या कहती है
मेरी सबसे बड़ी निराशा इस बात से है कि NCERT को छोड़कर शिक्षा से जुड़ी लगभग कोई भी बड़ी संस्था इस स्थिति को राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के मुताबिक सुधारने में न तो दिलचस्पी दिखा रही है और न ही सक्षम नजर आती है. इसमें UGC, AICTE और हमारे शिक्षा संस्थान भी शामिल हैं.
राष्ट्रीय शिक्षा नीति मूल्यांकन के मुद्दे पर बिल्कुल साफ है और इसमें कई बेहद प्रगतिशील सुझाव दिए गए हैं. लेकिन इन सुझावों का हमेशा पालन नहीं होता. उदाहरण के लिए CUET को लागू करना, इन सिफारिशों के बिल्कुल उलट है.
जहां तक राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं में बार-बार होने वाले पेपर लीक का सवाल है, दिप्रिंट में हाल ही में प्रकाशित एक लेख में बताया गया है कि सिर्फ तकनीक का सही इस्तेमाल करके इस समस्या का काफी हद तक समाधान किया जा सकता है.
राष्ट्रीय शिक्षा नीति का उद्देश्य छात्रों का मूल्यांकन केवल बड़ी अंतिम परीक्षाओं और रटने पर आधारित व्यवस्था से हटाकर लगातार होने वाले, योग्यता आधारित मूल्यांकन की ओर ले जाना है. इसमें आलोचनात्मक सोच और व्यावहारिक समझ जैसी उच्च स्तर की क्षमताओं को प्राथमिकता दी गई है. इसके मुख्य सुझावों में 360 डिग्री प्रोग्रेस कार्ड की व्यवस्था शामिल है, जिसमें छात्र का मूल्यांकन खुद, उसके साथी और शिक्षक मिलकर करें. इसमें बौद्धिक क्षमता, व्यवहार और सॉफ्ट स्किल्स भी शामिल हों.
बोर्ड परीक्षा सुधारों के तहत NEP सुझाव देती है कि बोर्ड परीक्षाओं का दबाव कम किया जाए. छात्रों को कई बार परीक्षा देने की सुविधा मिले. मॉड्यूल-आधारित परीक्षा हो और अलग-अलग स्तर के विषय चुनने का विकल्प दिया जाए. नीति यह भी कहती है कि कक्षा 3, 5 और 8 में मानकीकृत मूल्यांकन हो, ताकि बच्चों की सीखने की प्रगति का आकलन किया जा सके, लेकिन उन पर पास या फेल होने का दबाव न पड़े.
इसके अलावा NEP के तहत PARAKH नाम की संस्था बनाने का भी प्रावधान किया गया. यह भारत में राज्य और केंद्रीय शिक्षा बोर्डों के छात्रों के मूल्यांकन को एक समान बनाने वाली सर्वोच्च संस्था है. NCERT के माध्यम से PARAKH ने अमेरिका की एजुकेशनल टेस्टिंग सर्विस (ETS) और विभिन्न राज्य बोर्डों के साथ मिलकर एक समान ग्रेडिंग प्रणाली विकसित करने का काम किया है, ताकि अलग-अलग बोर्डों के बीच का अंतर कम हो सके. यही व्यवस्था भारत को चाहिए, जिससे देशभर के विभिन्न बोर्डों के परीक्षा परिणामों को एक समान तरीके से समझा और तुलना की जा सके.
मुझे चिंता इस बात की है कि राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं के मामले में भारत धीरे-धीरे अमेरिका की SAT और ACT जैसी परीक्षाओं की कमियों की तरफ बढ़ता जा रहा है. ये दोनों उच्च स्तर की मानकीकृत परीक्षाएं हैं, जिनका इस्तेमाल मुख्य रूप से कॉलेज में दाखिले के लिए होता है. इनमें छात्रों की रैंकिंग और तुलना पर ज्यादा जोर होता है, न कि उनके समग्र विकास पर.
इसके उलट, राष्ट्रीय शिक्षा नीति बहुत दूरदर्शी तरीके से मूल्यांकन को रोजमर्रा की पढ़ाई का हिस्सा बनाती है. जहां NEP मूल्यांकन को शिक्षा का हिस्सा मानती है, वहीं SAT और ACT उसे सिर्फ चयन का माध्यम मानती हैं. दुख की बात यह है कि NEET और JEE ने ऐसी परीक्षा व्यवस्था बना दी है, जिसने असली शिक्षा के उद्देश्य और उसके मायने को बहुत बड़ा नुकसान पहुंचाया है.
स्कूल की परीक्षाएं ही काफी होनी चाहिए
भारत को सबसे पहले यह समझना होगा कि NEET और CUET जैसी परीक्षाओं से शिक्षा का स्तर बेहतर नहीं हुआ है.
अब समय आ गया है कि हम नई शिक्षा नीति (NEP) की बात मानें और स्कूल की अंतिम परीक्षाओं की अहमियत फिर से बढ़ाएं. मेडिकल, लॉ या किसी भी दूसरे उच्च शिक्षा संस्थान में दाखिले के लिए इन्हीं परीक्षाओं के नतीजों का इस्तेमाल किया जाए, जैसा कि NEP में सुझाव दिया गया है.
NEP जो कहती है और हमने जो लागू किया है, दोनों में सबसे बड़ा फर्क सोच का है. एक तरफ बौद्धिक विकास है, दूसरी तरफ सिर्फ एक खराब तरीके से बनाई गई परीक्षा के आधार पर रैंकिंग. एक तरफ लगातार मूल्यांकन है, दूसरी तरफ सिर्फ एक बार की परीक्षा. एक तरफ पूरे व्यक्तित्व का विकास है, दूसरी तरफ सिर्फ सीमित तरीके से आंकना. भारत के लिए सही रास्ता यही है, क्योंकि इससे हमारे युवाओं का दिमाग विकसित होगा, न कि उन पर बेवजह का दबाव पड़ेगा.
दिनेश सिंह दिल्ली यूनिवर्सिटी के पूर्व वाइस चांसलर और USA के टेक्सास में ह्यूस्टन यूनिवर्सिटी में मैथ के एडजंक्ट प्रोफेसर हैं. वे @DineshSinghEDU पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.
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