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Wednesday, 15 July, 2026
होममत-विमतराम मंदिर ट्रस्ट पर लगे आरोप BJP की राजनीति के लिए इतने अहम क्यों हैं

राम मंदिर ट्रस्ट पर लगे आरोप BJP की राजनीति के लिए इतने अहम क्यों हैं

अगर राम मंदिर जैसे घोटाले के आरोप किसी विपक्ष शासित राज्य में लगे होते, तो संभव है कि ईडी मनी लॉन्ड्रिंग कानून (पीएमएलए) के तहत मामला दर्ज कर कथित अपराध से हुई कमाई की जांच शुरू कर देती.

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पिछले चार दशकों तक राम जन्मभूमि आंदोलन, यानी अयोध्या में राम मंदिर बनाने का अभियान, बीजेपी-आरएसएस-वीएचपी के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा रहा. इसे सिर्फ एक राजनीतिक अभियान के तौर पर नहीं, बल्कि एक तथाकथित सभ्यतागत मिशन और जन आंदोलन के रूप में भी पेश किया गया. दावा किया गया कि इसका उद्देश्य हिंदू पहचान को फिर से स्थापित करना और मध्यकाल तथा मुस्लिम आक्रमणों के दौरान हुए कथित ऐतिहासिक अन्याय को ठीक करना है.

असल में, यह आज़ाद भारत में धर्म और राजनीति को जोड़ने वाले सबसे बड़े अभियानों में से एक बन गया. सालों तक “हिंदू आक्रोश” को योजनाबद्ध तरीके से बढ़ाया गया. धार्मिक पहचान को राजनीतिक पहचान में बदल दिया गया. धर्मनिरपेक्षता (सेक्युलरिज्म) को दुश्मन की तरह पेश किया गया. मुसलमानों को बार-बार “दूसरा” और विरोधी बताया गया. इसका मकसद था हिंदू वोटों को एकजुट करना और बीजेपी को राष्ट्रीय सत्ता तक पहुंचाना.

बतौर युवा पत्रकार मुझे 1980 के दशक के आखिर और 1990 के दशक की शुरुआत में चले हिंदुत्व आंदोलन की रिपोर्टिंग अच्छी तरह याद है. मैंने उस समय के माहौल और पूरे उत्तर भारत में गूंजने वाले नारों पर कई रिपोर्टें लिखीं—

“सौगंध राम की खाते हैं, हम मंदिर वहीं बनाएंगे”,
“जो हिंदू हित की बात करेगा, वही देश में राज करेगा”,
“जिस हिंदू का खून न खौले, जो राम के काम न आए…”

भगवान राम सिर्फ पूजा के देवता नहीं रहे, बल्कि उस आंदोलन का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रतीक बन गए. इस आंदोलन को “हिंदू पुनर्जागरण” के रूप में पेश किया गया, जो “छद्म धर्मनिरपेक्षता”, “मैकॉलेपुत्र” (पश्चिमी सोच वाले भारतीय) और मुसलमानों के कथित तुष्टिकरण के खिलाफ बताया गया. मैंने इस बदलाव का ज़िक्र पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अपनी जीवनी में भी किया है.

जब 1980 में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई थी, तब अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि पार्टी की विचारधारा “गांधीवादी समाजवाद” होगी, लेकिन चुनावी राजनीति में गांधीवादी समाजवाद पूरी तरह असफल रहा. लगातार चुनावी हार के बाद और 1984 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के सिर्फ दो सीटों पर सिमट जाने के बाद, वाजपेयी ने नेतृत्व से पीछे हटने का फैसला किया और लालकृष्ण आडवाणी ने पार्टी की कमान संभाल ली.

नई दिल्ली का रास्ता अयोध्या से होकर जाता है

बीजेपी अपनी चुनावी स्थिति बदलने वाला कोई बड़ा मुद्दा ढूंढ़ रही थी. ऐसे समय में लालकृष्ण आडवाणी ने अयोध्या विवाद को चुना. उस समय यह मामला ज्यादातर स्थानीय था, लेकिन विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) इसे लगातार बड़ा बना रही थी. इसके बाद जो हुआ, उसने भारतीय राजनीति की दिशा ही बदल दी. देश ने एक नया प्रतीक देखा—राम रथ. यह रथ साधारण और पुराना दिखता था, धार्मिक प्रतीकों से सजा हुआ था, लेकिन उसका संदेश पूरी तरह राजनीतिक था.

मेलों, यात्राओं, धार्मिक सभाओं, जुलूसों और जागरणों के जरिए राम जन्मभूमि आंदोलन पूरे देश में फैल गया और एक राष्ट्रीय राजनीतिक अभियान बन गया. राम रथ यात्रा इस आंदोलन की सबसे बड़ी पहचान बन गई. 1989 में बीजेपी के पालमपुर प्रस्ताव में पहली बार आधिकारिक तौर पर राम मंदिर को पार्टी का मिशन घोषित किया गया. उसी समय से अयोध्या का रास्ता, नई दिल्ली की सत्ता तक पहुंचने का रास्ता बन गया.

अटल बिहारी वाजपेयी के गांधीवादी समाजवाद से आगे बढ़कर, आडवाणी के नेतृत्व में बीजेपी ने राम जन्मभूमि आंदोलन को अपना मुख्य राजनीतिक मुद्दा बनाया. इसी बदलाव ने बीजेपी को एक छोटी राजनीतिक पार्टी से देश की सबसे बड़ी चुनावी ताकत बना दिया.

यही वजह है कि राम मंदिर ट्रस्ट पर हाल में लगे चोरी, गबन और फंड के गलत इस्तेमाल के आरोप इतने महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं. ये आरोप किसी भूकंप से कम नहीं हैं. ये बीजेपी की उस वैचारिक नींव पर चोट करते हैं, जिस पर उसने अपनी राजनीति खड़ी की है.

राम मंदिर आरएसएस- बीजेपी के लिए सबसे बड़ा आंदोलन, नैतिक आधार, चुनावी ताकत और पिछले 40 साल की राजनीति का केंद्र रहा है.

ऐसे में भ्रष्टाचार के आरोप सिर्फ ट्रस्ट की साख पर नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक अभियान की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करते हैं. यह सिर्फ एक झटका नहीं है, बल्कि उस पूरी नींव पर हमला है, जिस पर यह राजनीतिक इमारत खड़ी की गई.

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी इस विवाद से खुद को अलग नहीं कर सकती. हर अहम मौके पर पार्टी ने राम मंदिर को अपनी राजनीतिक पहचान का सबसे बड़ा हिस्सा बनाया. 1990 की राम रथ यात्रा में बीजेपी के कई बड़े नेता आडवाणी के साथ चले थे. उस समय गुजरात बीजेपी के महासचिव रहे नरेंद्र मोदी राज्य में इस यात्रा के प्रमुख आयोजकों में शामिल थे. बाद में वे इसी आंदोलन के सबसे बड़े राजनीतिक लाभार्थी बने.

प्रधानमंत्री बनने के बाद 2020 में मोदी ने शिलान्यास समारोह में राम मंदिर की आधारशिला रखी. चार साल बाद, प्राण प्रतिष्ठा समारोह में उन्होंने मुख्य यजमान की भूमिका निभाई. यह समारोह 2024 के लोकसभा चुनाव से कुछ महीने पहले हुआ था. किसी भी संवैधानिक लोकतंत्र में किसी चुने हुए प्रधानमंत्री का किसी धार्मिक स्थल पर इस तरह प्राण प्रतिष्ठा कराना एक असाधारण बात मानी जाती है.

यह समारोह सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं था, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक कार्यक्रम भी था. मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी ने धर्म और राजनीति के बीच की दूरी को लगभग खत्म कर दिया. राम मंदिर, नरेंद्र मोदी की राजनीतिक छवि से अलग नहीं रहा. यह रिश्ता सिर्फ प्रतीकात्मक भी नहीं था.

राम मंदिर ट्रस्ट में लंबे समय से जुड़े आरएसएस और वीएचपी के पदाधिकारी, हिंदुत्व आंदोलन से जुड़े धार्मिक नेता और उत्तर प्रदेश सरकार के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं. मोदी के पूर्व प्रधान सचिव नृपेंद्र मिश्रा ने मंदिर निर्माण की निगरानी की.

अगर यह मंदिर, जैसा कि मोदी ने कहा था, “सभ्यतागत न्याय” का बड़ा प्रतीक था, तो अब उस पर लगे आरोप बीजेपी के सामने एक बड़ा नैतिक और अस्तित्व का सवाल खड़ा करते हैं.

सालों तक बीजेपी कहती रही कि राम मंदिर आंदोलन उसकी राजनीति को सिर्फ चुनावी फायदे से ऊपर ले जाता है. पार्टी ने खुद को “हिंदू धर्म” का संरक्षक बताया. राम मंदिर बीजेपी को ऐसी धार्मिक वैधता देता था, जो उसके राजनीतिक विरोधियों के पास नहीं थी. अब यह दावा गंभीर सवालों के घेरे में है.

2019 के अयोध्या फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद गिराए जाने को “कानून के शासन का गंभीर उल्लंघन” बताया था, लेकिन राजनीतिक रूप से देखें, तो उसी आंदोलन ने बीजेपी को राष्ट्रीय राजनीति में सबसे ताकतवर पार्टी बना दिया. इसी “कानून के शासन के गंभीर उल्लंघन” से जुड़े आंदोलन की प्रमुख चेहरों में से एक साध्वी ऋतंभरा को मोदी सरकार ने पद्म भूषण—देश का तीसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान—भी दिया. साध्वी ऋतंभरा 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद गिराए जाने के दिन दिए गए अपने नारे “एक धक्का और दो, बाबरी मस्जिद तोड़ दो” के लिए जानी जाती हैं. उस दिन संघ परिवार के कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद गिरा दी थी.

एक असामान्य चुप्पी

आज राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े आरोप लगातार बढ़ते जा रहे हैं. 2021 में ज़मीन खरीद को लेकर ट्रस्ट पर सवाल उठ रहे हैं. निर्मोही अखाड़ा ने वीएचपी पर पैसों के गलत इस्तेमाल का आरोप लगाया है. डिजिटल धोखाधड़ी के आरोप भी लगे हैं. सबसे गंभीर आरोप यह है कि मंदिर के कर्मचारियों और ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने श्रद्धालुओं के चढ़ावे में से करोड़ों रुपये निकाल लिए.

मुख्यधारा का मीडिया इन आरोपों की गंभीरता को कम करके दिखाने की कोशिश कर सकता है, लेकिन इतिहास एक चेतावनी देता है. बड़े भ्रष्टाचार के घोटाले सरकारों के लिए बहुत भारी पड़ सकते हैं. बोफोर्स घोटाले ने राजीव गांधी सरकार को बड़ा नुकसान पहुंचाया था, जबकि कॉमनवेल्थ गेम्स और 2G स्पेक्ट्रम घोटाले के आरोपों ने यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल को कमजोर कर दिया था. भ्रष्टाचार के आरोप बहुत जल्दी किसी भी राजनीतिक छवि को नुकसान पहुंचा सकते हैं और नैतिक विश्वसनीयता खत्म कर सकते हैं.

इस मामले में बीजेपी की प्रतिक्रिया भी अलग रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राम मंदिर के आरोपों पर अब तक एक शब्द भी नहीं कहा है और पूरी तरह चुप हैं. गृह मंत्री अमित शाह, जो आमतौर पर विपक्ष पर जल्दी हमला बोलते हैं और केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई का ज़िक्र करते हैं, इस मामले में भी चुप हैं. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस मुद्दे पर जवाब देने के बजाय विपक्ष पर हमला किया और कहा कि वक्फ बोर्ड में कथित गड़बड़ियों पर विपक्ष का मुंह “फेविकोल से चिपका हुआ है.”

लेकिन सवाल यह है कि वक्फ बोर्ड का राम मंदिर ट्रस्ट पर लगे आरोपों से क्या संबंध है? ध्यान भटकाने से काम नहीं चलेगा. देश के सामने सीधा सवाल है—क्या श्रद्धालुओं के चढ़ावे की रकम चोरी हुई? अगर हुई, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? अगर वीएचपी नेता और राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय नैतिक आधार पर इस्तीफा भी दे दें, तो क्या सिर्फ इससे मामला खत्म हो जाएगा? जवाबदेही उन लोगों तक भी पहुंचनी चाहिए, जिनकी राजनीति राम मंदिर से जुड़ी रही है.

जांच को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं. उत्तर प्रदेश सरकार की एसआईटी की जांच किसी स्वतंत्र जांच से ज्यादा सरकारी जांच जैसी दिखाई देती है. इससे भी ज्यादा हैरानी की बात यह है कि एफआईआर तब दर्ज हुई, जब एसआईटी अपनी शुरुआती रिपोर्ट दे चुकी थी और उसके बाद राम जन्मभूमि ट्रस्ट के एक सदस्य ने शिकायत दर्ज कराई. इससे एक सीधा सवाल उठता है—क्या एफआईआर दर्ज कराने वाले ट्रस्ट या उसके सदस्य को एफआईआर दर्ज होने से पहले एसआईटी की रिपोर्ट दिखाई गई थी?

आमतौर पर अगर किसी संज्ञेय अपराध की जानकारी मिलती है, तो पहले एफआईआर दर्ज होती है, उसके बाद जांच शुरू होती है. यहां उल्टा हुआ. अगर इतने गंभीर आरोप किसी विपक्ष शासित राज्य में लगे होते, तो संभव है कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) मनी लॉन्ड्रिंग कानून (पीएमएलए) के तहत तुरंत जांच शुरू कर देता और कथित अपराध से कमाए गए पैसे की भी जांच करता, लेकिन यहां जांच पूरी तरह राज्य सरकार की व्यवस्था के अंदर ही सीमित दिखाई देती है.

मिशन या कमीशन

जब बीजेपी ने राम मंदिर को अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि बताया, तब उसने पूरे देश को उस उपलब्धि का हिस्सा बनने के लिए कहा था. अब वह यह नहीं कह सकती कि मंदिर की जवाबदेही किसी और की है. मोदी और अमित शाह की चुप्पी भी अपने आप में एक राजनीतिक संदेश है.

अगर पैसों की गड़बड़ी के आरोप सही साबित होते हैं, तो सिर्फ पैसा ही नहीं चुराया गया होगा. बल्कि लोगों का भरोसा और उनकी आस्था भी चोटिल हुई होगी.

पिछले 40 साल से बीजेपी कहती रही कि हिंदुत्व उसका “आध्यात्मिक उद्देश्य” है, लेकिन आज, हिंदुत्व एक ऐसा राजनीतिक अभियान दिखाई देता है, जो लगातार लोगों को भावनात्मक रूप से जोड़ने, गुस्सा, नफरत, शिकायत और ध्रुवीकरण की राजनीति पर टिका रहा. यह आज़ाद भारत का सबसे बड़ा राजनीतिक भ्रम है.

राम जन्मभूमि आंदोलन ने राजनीति और धर्म के रिश्ते को बदल दिया. भाषा धार्मिक थी, लेकिन तरीका पूरी तरह राजनीतिक था. आस्था को चुनावी रणनीति बना दिया गया. मंदिर सिर्फ पूजा की जगह नहीं रहा, बल्कि चुनावी जीत का एक राजनीतिक साधन बन गया.

यही वजह है कि राम मंदिर से जुड़े भ्रष्टाचार के आरोप इतने महत्वपूर्ण हैं. ये बीजेपी की पूरी राजनीतिक सोच और उसकी वैचारिक नींव पर सवाल खड़े करते हैं. जो आंदोलन खुद को “हिंदू धर्म” का प्रतिनिधि बताता था, वही आज ऐसे आरोपों का सामना कर रहा है, जो उसकी बनाई हुई छवि पर सीधा वार करते हैं.

बीजेपी की सत्ता की राजनीति में धर्म ने प्रतीक दिए और राजनीति ने उसका फायदा उठाया. धार्मिक अनुष्ठान तो बड़े स्तर पर किए गए, लेकिन धर्म के मूल मूल्य कहां थे? भगवान राम जिन मूल्यों—सत्य, ईमानदारी और करुणा—का प्रतीक हैं, वे मूल्य भगवान राम के नाम पर की गई बीजेपी की राजनीति में दिखाई नहीं दिए.

बीजेपी को अब देश को एक बहुत ही मुश्किल सवाल का जवाब देना है. क्या राम मंदिर आंदोलन कभी सच में एक मिशन था, या यह हमेशा कमीशन के बारे में था?

लेखिका अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की सांसद (राज्यसभा) हैं. उनका एक्स हैंडल @sagarikaghose है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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